इन दिनों – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 25 Mar 2025 02:31:42 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 समाचार पचीसा-ई-पेपर- बुधवार, 13-12-2023 https://samacharpacheesa.com/?p=9229 Wed, 13 Dec 2023 06:33:58 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=9229

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मोदी की अंतरराष्ट्रीय नीति में 3 सूत्रीय कॉकटेल https://samacharpacheesa.com/?p=8016 Thu, 14 Sep 2023 06:46:14 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=8016 जी20 की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारत का डंका दुनियाभर की चौपालों पर बज रहा है। जी0 समिट में सभी देशों की सहमति से घोषणापत्र भी जारी किया गया। इसे भारत की बड़ी कूटनीतिक और राजनयिक जीत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आम सहमति की संभावना जब न के बराबर लग रही थी तब भारत की कोशिशें रंग अफ्रीका का आना लाई। यह भारत के बढ़ते कद को दिखाता है। यह दिखाता है कि विश्व को साथ लाने में भारत की भूमिका काफी अहम है। विदेश सेवा के भारतीय राजनयिकों, सदस्य देशों के साथ कई महीनों की कड़ी मेहनत और 3 सितंबर से रात भर जागने वाले पांच लोगों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि सहमति बनाने में कामयाबी हासिल हो पाई। टीम मोदी ने चाणक्य नीति को चरितार्थ कर दिया। युद्ध और शांति काल में विदेश नीति का पुराना और आजमाया हुआ ग्रंथ चाणक्य का अर्थशास्त्र है। चाणक्य की साम, दाम, दंड, भेद वाली नीति से तो आप सभी वाकिफ हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सिद्धांत भी बड़े काम के हैं। इसमें जो रणनीतियाँ शामिल हैं उनमें शामिल हां, संधि (ट्रीटी), विग्रह (संधि तोडऩा और युद्ध शुरू करना), आसन (तटस्थता), यना (युद्ध के लिए मार्च की तैयारी), सामश्रय (समान लक्ष्य रखने वालों के साथ हाथ मिलाना) और अंत में द्वैदभाव (दोहरी नीति यानी एक दुश्मन से कुछ समय के लिए दोस्ती और दूसरे से दुश्मनी)। संधि (शांति स्थापित करना) की नीति इस नियम पर आधारित है कि जब किसी राज्य को अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ता है, तो उसे जीवित रहने के लिए शांतिपूर्ण समझौते पर बातचीत करने का प्रयास करना चाहिए। यदि शांति स्थापित करने के सिद्धांत का विश्लेषण किया जाए तो इसे कई ऐतिहासिक शांति संधियों के संदर्भ में समझा जा सकता है। कौटिल्य संधि के अन्य रूपों, काल संधि (अस्थायी गठबंधन) या स्थावर संधि (स्थायी गठबंधन) की भी बात करते हैं, जिसमें एक छोटा राज्य अधिक शक्तिशाली सहयोगी को सेवा प्रदान करके और शक्तिशाली लोगों के साथ गठबंधन में रहकर रहने का सौदा कर सकता है। कौटिल्य कहते हैं कि अगर राजा को लगे कि दुश्मन की सेना की ताकत समान है और जंग लडऩे का मतलब है दोनों तरफ तबाही का खुला निमंत्रण को ऐसी परिस्थिति में समझौता यानी तटस्थ रहकर शांति का प्रयास आवश्यक है। जवाहर लाल नेहरू ने कौटिल्य की आसन नीति अपनाई जिसका परिणाम ती गुटनिरपेक्षता और मोदी ने कौटिल्य की संधि, आसन और सामरस्य नीति का कॉकटेल तैयार किया। नई दिल्ली ने अपने घोषणापत्र के जरिए चीन को भी अपरोक्ष रूप से साधा। लेकिन इसमें कहीं भी लद्दाख या एलएसी का जिक्र नहीं था और न ही अरुणाचल प्रदेश में उसकी हरकतों का उल्लेख था। लेकिन इस घोषणापत्र में परोक्ष रूप से वो सब था जो भारत चाहता था।

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आर्थिक कॉरिडोर से गरीबों को क्या मिलेगा? https://samacharpacheesa.com/?p=8006 Wed, 13 Sep 2023 07:28:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=8006 भारत ने जी20 का सफल आयोजन कर पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा दी है। इंडिया, मिडिल ईस्ट से लेकर यूरोप तक जाने वाले रेल-समुद्री यातायात कॉरिडोर के निर्माण पर सदस्य देशों की सहमति को इस बैठक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है कि इस कॉरिडोर के बनने से यूपी-बिहार या तमिलनाडु और केरल के सुदूर इलाकों में काम करने वाले किसानों-गरीबों को इससे क्या लाभ मिलेगा? एपीडा के आंकड़ों के अनुसार भारत ने वर्ष 2022-23 में 13,185 करोड़ रुपये मूल्य की फल-सब्जियों का निर्यात किया था। इसमें 6219 करोड़ रुपये से ज्यादा के फल और 6965 करोड़ रुपये से अधिक की सब्जियां शामिल थीं। प्रोसेस्ड फूड और दालों को मिलाकर यह आंकड़ा 18 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा था। भारत आम, केला और पपीता जैसे फलों के उत्पादन में दुनिया में नंबर एक पर है, लेकिन इसके बाद भी हमारी फलों-सब्जियों के निर्यात में वैश्विक हिस्सेदारी एक फीसदी से भी कम है। इसका बड़ा कारण यह है कि हमारे देश में फलों-सब्जियों को रखने और उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए अच्छी गुणवत्ता की और सस्ती दरों पर उपलब्ध कोल्ड स्टोरेज चेनों की भारी कमी है। वैश्विक व्यापार के लिए यह कमी और ज्यादा हो जाती है। फलों-सब्जियों के देरी से बाजार में पहुंचने से व्यापारियों को भारी नुकसान होने की संभावना लगातार बनी रहती है। चूंकि, कहा जा रहा है कि इस कॉरिडोर के निर्माण से यूरोपीय बाजारों में पहुंचने वाले फलों-सब्जियों के पहुंचने में 40 फीसदी का समय कम लगेगा, इससे भारतीय उत्पादों के यूरोपीय बाजार तक पहुंचने में इनके न खराब होने की दर बढ़ जाएगी। इसका सीधा लाभ भारतीय किसानों को मिलेगा। यूरोप भारत के कुल कारोबार का तीसरा सबसे बड़ा साझीदार है। वर्ष 2021 में भारत के कुल व्यापार का लगभग 10.8 फीसदी व्यापार यूरोपियन यूनियन के साथ हुआ था। अमेरिका के 11.6 फीसदी और चीन के 11.4 फीसदी की व्यापारिक हिस्सेदारी होने के बाद भी यूरोप भारत के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका बड़ा कारण है कि भारत यूरोपीय देशों को कृषि उत्पादों, फलों-सब्जियों, कपड़ों और दवाओं का निर्यात करता है, जिसके कारण उसका निर्यात पक्ष यूरोप में बहुत संतुलित है, जबकि चीन से भारत ज्यादातर वस्तुएं आयात करता है और व्यापारिक असंतुलन बुरी तरह चीन के पक्ष में झुका हुआ है। भारतीय उत्पादकों से यूरोप के बाजारों तक पहुंचने में अलग-अलग देशों की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अभी 30 से 45 दिन तक का समय लगता है। जबकि अनुमान है कि मुंबई से शुरू होने वाले 6000 किलोमीटर लंबे इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर बनने से यह समय 12 से 15 दिन तक कम हो जाएगा। समय के साथ खराब होने वाले कृषि, फल-सब्जी और डेयरी उत्पादों के संदर्भ में यह समय बहुत महत्त्वपूर्ण है।

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विनोबा का अनुशासन-पर्व! https://samacharpacheesa.com/?p=7998 Tue, 12 Sep 2023 06:45:14 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7998 सर्वोदय जैसा पवित्र विचार और जय जगत जैसा उदात्त-चिंतन देने वाले आचार्य विनोबा भावे का 11 सितम्बर को जन्मदिन था। वे गांधीजी की वैचारिक-परम्परा को गति देने वाले ऋषि थे। अपने जीवन के अनेक वर्ष उन्होंने पदयात्रा में ही निकाल दिए. उनका भूदान आंदोलन पूरी दुनिया में अपने किस्म का अभिनव-प्रयोग था। मेरे पिता भी उनके अनुयायी थे। उनकी भूदान यात्रा में भी उन्होंने भाग लिया था। आज भूमाफियाओं का दौर है. सर्वोदय की जगह स्वंयमोदय का दौर है. पूंजीवादी मानसिकता ने करुणा के मूल तत्व को लगभग खत्म कर दिया है. ऐसे अराजक समय में हमें बार-बार गांधी और विनोबा की ओर ही निहारना पड़ता है, उनके विचारों का अवगाहन करना पड़ता है. उन्होंने जो चिंतन दिया, वो आज भी प्रासंगिक है. महान देश बनाने के अपने विचार को विनोबा ने निरंतर गति दी। सर्वोदय और भूदान का अलख जगाते हुए विनोबा देश के हर हिस्से में गए। खूब भूदान भी लिया और अपना चिंतन भी लोगों तक पहुंचाया। पदयात्रा के दौरान विनोबा छत्तीसगढ़ भी पधारे थे. उस दौरान उन्होंने जगह-जगह प्रवचन भी दिए थे. ये प्रवचन आज भी तरोताज़ा हैं। आज से पांच दशक पहले जो बातें विनोबा रखते थे, वे आज भी उतनी जरूरी हैं. चाहे वो ग्राम स्वराज्य की बात हो, चाहे सर्वधर्म सद्भाव की अथवा भाषा को लेकर। आचार्य विनोबा भावे को पन्द्रह से अधिक भाषाएं आती थी। लिख, पढ़ और बोल सकते थे। यह उनकी अद्भुत प्रतिभा का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने एक सुझाव दिया था कि सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में भी लिखा जाए। इससे फायदा यह होगा कि लोग आसानी से और दूसरी भाषाओं को सीख सकेंगे । इस मामले में मेरा निजी अनुभव यही है। मुझे कुछ भाषाओं के गीत आज भी याद है क्योंकि मैंने उन्हें देवनागरी लिपि में पढ़ा। चाहे वह तेलुगु भाषा हो, उडिय़ा हो या तमिल। तेलुगु गीत देखें,योधरे वयशीवन्न शुभोदय के स्वागता। स्वराष्ट्रकास दल्लीका, सुप्रभात शुचिसुताम।… उडिय़ा का गीत, एई जन्म माटी ममता में प्रणे भरे थाऊ ,एहर लागी एहर कोने पारण मोर जाऊ। आचार्य जी ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि देवनागरी हिंदी की लिपि नहीं है यानी भारतीय भाषाओं के लिपि है। इस बात को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। आपातकाल को उन्होंने अनुशासन पर्व कहा था। इस बात को लेकर के उनकी काफी आलोचना हुई थी, लेकिन अनुशासन पर्व उन्होंने क्यों कहा, इसको भी समझना होगा। अनुशासन का अर्थ होता है किसी नियम में बंध कर रहना। तो उस समय इंदिरा गांधी ने देश को अपने नियम में बांध कर रखा था, तो एक तरह से वह अनुशासन ही तो हुआ! अनुशासन पर्व में व्यंग्य की भी ध्वनि है। बाबा ने बहुत बड़ा व्यंग्य किया था। उन्होंने देश में गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए आमरण अनशन शुरू किया था। दुर्भाग्य की बात यह रही कि गौवध पर प्रतिबंध का झूठा वादा करके उनका अनशन तुड़वा दिया गया था। उसके कुछ समय बाद ही बिनोवा भावे जी की मृत्यु हो गई उन्होंने स्नेहेन सहजीवनम का सुंदर मंत्र दिया। उन्होंने गीता का सुंदर भाष्य किया। कुरान की सुंदर आयतों का हिंदी में अनुवाद भी किया। महावीर और बुद्ध के वचनों को भी हिंदी में प्रस्तुत किया। वे चाहते थे कि भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखा जाए। मेरा सौभाग्य है कि उनकी रचनावाली के पूरे अठारह खंड मेरी धरोहर हैं, जिन्हें समय-समय पर देखकर खुद को पुनरनवीन करता रहता हूँ। उनको नमन।

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निर्गुट से जी-20 शिखर सम्मेलन तक भारत https://samacharpacheesa.com/?p=7981 Sat, 09 Sep 2023 07:07:29 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7981 भारत आगामी 9-10 सितंबर को होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए तैयार है। जी-20 देशों के राष्ट्राध्यक्षों के अलावा भारत के निमंत्रण पर बांग्लादेश, नाइजीरिया, मॉरीशस वगैरह देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भी सम्मेलन में विशेष अतिथि के रूप में शिरकत करेंगे। इससे पहले इतना भव्य आयोजन 1983 में राजधानी दिल्ली में हुआ था। तब दिल्ली में 7-12 मार्च, 1983 को निर्गुट सम्मेलन का आयोजन हुआ था। उसमें दर्जनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों समेत 140 देशों के नुमाइंदों ने भाग लिया था। इसके अलावा अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और मौरिस मिटर्रैंड वगैरह के संदेश भी सरकार को मिले। तब कहा गया था कि इतना विशाल सम्मेलन कभी कहीं नहीं हुआ। उसमें क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो, पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक, फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (पीएलओ) के नेता यासर अराफात भी पधारे थे। ये सब अशोक होटल में ठहरे थे। तब सुरक्षा कारणों के चलते कास्त्रो और अराफात के चेहरों से मिलते-जुलते तीन-तीन और व्यक्ति भी अशोक होटल और विज्ञान भवन में घूम रहे थे। यह सब इसलिए किया जा रहा था ताकि इन्हें किसी भी संभावित हमलों से बचाया जा सके। निर्गुट सम्मेलन का आयोजन विज्ञान भवन में हुआ था। बहरहाल, अब जी-20 सम्मेलन के दौरान विज्ञान भवन कहीं नहीं है। तब भी नई दिल्ली को एक तरह से सील कर दिया गया था। पर तब बैंक, सरकारी दफ्तर और स्कूल-कॉलेज खुले रहे थे। निर्गुट सम्मेलन में भाग लेने के लिए आने वाले राष्ट्राध्यक्षों की कारों के काफिले एयरपोर्ट से शांतिपथ, तीन मूर्ति, साउथ एवेन्यू, विजय चौक, मदर टेरेसा क्रिसेंट, सरदार पटेल मार्ग, पंचशील मार्ग, सफदरजंग रोड और विज्ञान भवन के आसपास रहे थे। इस बार काफिले प्रगति मैदान तक जाएंगे क्योंकि वहां पर बने भारत मंडपम में ही जी-20 सम्मेलन का आयोजन होना है। बहरहाल, जी-20 सम्मेलन का आयोजन उस समय हो रहा है जब भारत संसार की आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। 1983 से 2023 का भारत एकदम अलग है। कुछ समय पहले भारत ब्रिटेन को पीछे छोड़कर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। अब अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी की ही अर्थव्यवस्था आज के दिन भारत से बड़ी है। हमारी प्रगति की रफ्तार को देखकर यह कहा जा सकता है कि हम जल्दी ही जापान और जर्मनी को भी मात दे देंगे। हम दुनिया के आईटी सेक्टर की सबसे बड़ी ताकत हैं। निश्चित रूप से जी-20 शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन से सारे संसार में भारत की प्रतिष्ठा और बढ़ेगी।

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काशी-अयोध्या से बिछ रही सनातन पर सियासत https://samacharpacheesa.com/?p=7975 Fri, 08 Sep 2023 09:56:07 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7975 तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने जब सनातन पर विवादित बयान दिया तो उनको इस बात का अंदाजा जरूर रहा होगा कि इसका असर कितना व्यापक होने वाला है। अब उसी सनातन के विवादित बयान के आधार पर भारतीय जनता पार्टी ने जब तमिलनाडु के रास्ते नॉर्थ इंडिया के राज्यों में लॉन्ग डिस्टेंस सियासत की रणनीति बनाकर आगे बढऩा शुरू किया है। योजना के मुताबिक, तमिलनाडु के मंत्री की सनातन पर की गई तल्ख टिप्पणी के बाद अब अयोध्या और बनारस के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी अपनी सियासत को मजबूत करने जा रही है। इसके लिए बाकायदा तमिलनाडु बीजेपी से लेकर केंद्रीय भाजपा नेतृत्व के पदाधिकारियों से विचार विमर्श भी किया गया है। इसमें तमिलनाडु के तीन प्रमुख शहरों से स्टालिन को काउंटर करने और वहां से सनातन की सियासत की बड़ी रणनीति बनाई जा रही है। भारतीय जनता पार्टी ने डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन के सनातन पर दिए गए विवादित बयान के बाद राजनीतिक सरगर्मियों को आगे बढ़ा दिया है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक उदयनिधि ने भले ही तमिलनाडु में अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने के लिए अपने बाबा एम करुणानिधि की सियासत का दांव चला है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने तमिलनाडु के विवादित बयान को उत्तर भारत में सियासी रूप से बहुत बड़ा बनाने की योजना बना डाली है। योजना के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी अब सनातन के मुद्दे पर तमिलनाडु को सीधे अयोध्या और बनारस से जोडऩे जा रही है। अयोध्या में अगले साल होने वाले राम मंदिर के शुभारंभ पर तमिलनाडु से आने वाले राम भक्तों की संख्या सबसे ज्यादा होने वाली है। अभी भी बनारस और अयोध्या में लगातार दक्षिण भारत के राज्यों में तमिलनाडु के लोगों की संख्या इन शहरों में सबसे ज्यादा हो रही है। रणनीति के मुताबिक तमिलनाडु में ज्यादा से ज्यादा लोगों को अयोध्या और बनारस में दर्शन के माध्यम से सनातन को मजबूत करने का सफल प्रयास करने की योजना बनाई गई है। योजना के मुताबिक, रामलला के दर्शन करने के साथ काशी विश्वनाथ के दर्शन को आने वाली ट्रेनों और वहां से आने वाले भक्तों की संख्या को देखते हुए भाजपा की तमिलनाडु इकाई ने बड़ा अभियान शुरू किया है। तमिलनाडु के एक वरिष्ठ भाजपा नेता बताते हैं कि जनवरी में रामलला के दर्शन की शुरुआत वाले दिन के आसपास सिर्फ तमिलनाडु से ही पांच लाख लोगों के जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह संख्या वह दोगुनी करने की तैयारी में लगे हुए हैं। हालांकि,बीते डेढ़ साल के भीतर तमिलनाडु के अलग-अलग इलाकों के हजारों लोगों ने न सिर्फ काशी विश्वनाथ का दर्शन किया है बल्कि अयोध्या में रामलला के भी दर्शन किए हैं।

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संविधान सभा में बताए थे भारत के मायने https://samacharpacheesa.com/?p=7967 Thu, 07 Sep 2023 06:43:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7967 इंडिया बनाम भारत की चर्चा इस वक्त देश में सबसे ज्यादा हो रही है। अब जब चर्चा हो रही है कि क्या आधिकारिक रूप से देश का नाम बदलने वाला है। ऐसे में देश का संविधान लिखने वाली सभा की एक पर हुई बहस के बारे में जानना भी जरूरी होगा। जो बेहद दिलचस्प थी। संविधान का अनुच्छेद एक कहता है इंडिया, यानी भारत, राज्यों का एक संघ होगा। हालांकि, मूल मसौदे में भारत नाम का कोई जिक्र नहीं था। दरअसल, चार नवंबर 1948 को संविधान सभा में संविधान का मसौदा पेश किया गया था। यह मसौदा डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा तैयार किया गया था। लगभग एक साल बाद 17 सितंबर 1949 को अंबेडकर ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें पहले उप खंड में भारत नाम के संशोधन में बदलाव का सुझाव दिया गया। 18 सितंबर 1949 को आजाद देश को एक के बजाय दो नाम देने के प्रस्ताव के बारे में सदस्यों के बीच भारी असहमति देखने को मिली थी। प्रारंभिक प्रावधान पर संविधान सभा में इंडिया और भारत के बीच संबंध पर काफी चर्चा हुई। सदस्यों ने कई संशोधनों का सुझाव दिया लेकिन किसी को भी स्वीकार नहीं किया गया। अंबेडकर के बाद ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता एचवी कामथ ने पहले उप खंड के हिस्से को भारत या अंग्रेजी में इंडिया से बदलने का प्रस्ताव करते हुए पहला संशोधन पेश किया। कामथ यह प्रस्ताव आयरिश संविधान से प्रेरणा लेते हुए सामने लेकर आए थे। इसी चर्चा में कांग्रेस के एक अन्य सदस्य कमलापति त्रिपाठी भी जुड़े। कमलापति ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत को इंडिया से अधिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कमलापति ने संशोधन प्रस्ताव पर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। इस दौरान उन्होंने कहा, आज देश के नाम को लेकर एक संशोधन हमारे सामने है, मुझे खुशी होती अगर प्रारूप समिति ने इस संशोधन को किसी अलग रूप में प्रस्तुत किया होता। यदि इंडिया दैट इज भारत के अलावा किसी अन्य अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया गया होता तो मैं सोचता हूं, यह इस देश की प्रतिष्ठा और परंपराओं के अधिक अनुरूप होता और वास्तव में इससे इस संविधान सभा का भी अधिक सम्मान होता। यदि दैट इज शब्द आवश्यक होते तो, जो प्रस्ताव हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है उसमें भारत दैट इज इंडिया शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित होता। मेरे मित्र कामथ ने यह संशोधन पेश किया है कि ‘भारत जैसा कि इसे अंग्रेजी भाषा में इंडिया कहा जाता है का प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रारूप समिति ने इसे स्वीकार कर लिया था यदि वह अब भी इसे स्वीकार करती है तो यह हमारी भावनाओं और हमारे देश की प्रतिष्ठा के प्रति सराहनीय विचार होगा। हमें इसे स्वीकार करने में बहुत खुशी होती।

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इंडिया और भारत पर्यायवाची शब्द https://samacharpacheesa.com/?p=7959 Wed, 06 Sep 2023 07:02:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7959 राजनीतिक गलियारों में कहा यही जा रहा है कि आने वाले संसद के विशेष सत्र में देश को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ भारत कहे जाने वाले प्रस्ताव को पास कराया जा सकता है। लेकिन संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि देश के संविधान में इंडिया, दैट इज भारत का पहले से ही जिक्र है। इसलिए इंडिया और भारत यह दोनों नाम संविधान में दर्ज हैं और एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। संविधान विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में बदलाव तकरीबन नामुमकिन जैसा ही है। वहीं देश के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोर पकडऩे लगी है कि इंडिया को आधिकारिक तौर पर भारत पुकारे जाने से क्या भारतीय जनता पार्टी को कोई बड़ा सियासी लाभ मिल सकता है या नहीं। दरअसल राष्ट्रपति की ओर से 9 सितंबर को जी-20 कार्यक्रम के दौरान भारत मंडपम में आयोजित होने वाले डिनर के निमंत्रण पत्र में द प्रेसिडेंट ऑफ भारत की ओर से न्योता भेजा गया है। इसी निमंत्रण पत्र पर छपे भारत शब्द को लेकर अब सियासत होने लगी है। राजनीतिक पार्टियों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार देश के नाम पर भी हमला कर रही है। कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने कहा कि जब संविधान के अनुच्छेद एक में कहा गया है भारत जो की इंडिया था वह राज्यों का संघ है, तो उसमें इंडिया शब्द को क्यों हटाया जा रहा है। हालांकि कांग्रेस के नेता शशि थरूर कहते हैं कि जब संविधान में इंडिया और भारत दोनों का जिक्र है, तो इसमें संवैधानिक तौर पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस नाम को लेकर सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से भी बाकायदा भारत के समर्थन में ट्वीट और बयान दिए जा रहे हैं। हालांकि संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि इंडिया और भारत के नाम को लेकर किसी तरीके का कोई संवैधानिक विवाद नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है, इंडिया जो कि भारत है, राज्यों का एक संघ होगा। यह पहला मौका नहीं है जब भारत का नाम इस तरह से इस्तेमाल किया गया। ऐसे पहले भी कई मौके आए जब इंडिया की जगह पर भारत के नाम का जिक्र हुआ। जब संविधान में इसका जिक्र है कि फिर इस तरीके के निमंत्रण पर होने वाले विवाद का मतलब महज सियासी ही माना जा सकता है। भारत और इंडिया एक दूसरे के पर्यायवाची ही हैं। इसलिए यह कहना कि इंडिया की जगह पर भारत का नाम इस्तेमाल किया गया, वह किसी बहुत बड़े फेरबदल के संकेत हैं, ऐसा कानूनी रूप से संभव नहीं नजर आ रहा है और सियासी रूप से भी इसकी संभावना न के तौर पर दिख रही है। पासपोर्ट पर भी रिपब्लिक ऑफ इंडिया अंग्रेजी में दर्ज होता है, जबकि हिंदी में भारत का गणराज्य लिखा होता है।

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करुणानिधि से आगे बढ़े उदयनिधि https://samacharpacheesa.com/?p=7951 Tue, 05 Sep 2023 06:52:06 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7951 डीएमके के नेता और तमिलनाडु सरकार के मंत्री उदयनिधि स्टॅलिन ने रविवार को चेन्नई में आयोजित एक कार्यक्रम में जिस तरीके की बयान बाजी सनातन धर्म को लेकर की इसका विरोध तमिलनाडु के अलावा देश के उत्तरी राज्यों में जमकर हो रहा है। लेकिन तमिलनाडु की सियासत को करीब से समझने वालों के लिए पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के पोते और तमिलनाडु सरकार के मंत्री उदयनिधि स्टालिन का यह बयान कोई चौंकाने वाला नहीं है। तमिलनाडु में डीएमके के सियासी जमीन का बड़ा आधार ही हिंदू विरोधी और संस्कृत के विरोध के साथ-साथ हिंदू देवी देवताओं की मान्यताओं पर सवाल उठाने से मजबूत हुआ है। इसलिए उदयनिधि स्टालिन का बयान तमिलनाडु की सियासत के लिए उनको और उनकी पार्टी के नैरेटिव के लिहाज से तो सेट हो रहा है लेकिन नए बने गठबंधन के लिए उत्तर भारत के राज्यों में एक बड़ी मुसीबत भी खड़ा कर रहा है। जो लोग तमिलनाडु की सियासत से वाकिफ होंगे उनको उदयनिधि का यह बयान बिल्कुल चौंकाने वाला नहीं लग रहा होगा। तमिलनाडु की सियासत में डीएमके की मजबूती प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के जमाने में हिंदू हिंदी संस्कृत और देवी देवताओं के अस्तित्व पर उठाए जाने सवाल के साथ ही होती रही। करुणानिधि ने मद्रास स्टेट में हिंदी विरोध को इतना ज्यादा तूल दिया कि उसको तमिल अस्मिता से जोड़ा जाने लगा। नतीजा हुआ कि समूचे तमिलनाडु में न सिर्फ हिंदी बल्कि हिंदू संस्कृति और देवी देवताओं की अस्मिता पर सवाल उठाए जाने को इतना समर्थन मिलना शुरू हुआ कि इसकी अगुवाई करने वाले करुणानिधि प्रदेश के बड़े नेता के तौर पर पहचाने जाने लगे। तमिलनाडु की सियासत में खुद को राजनीतिक तौर पर मजबूत करने और अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए करुणानिधि ने हिंदी विरोधी दिवस तक का आयोजन कर डाला था। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि अपनी पार्टी की हिंदू हिंदी संस्कृत और देवी देवताओं को न मानने वाली राजनीतिक विचारधारा को इतना मजबूती के साथ आगे बढ़ा रहे थे कि उनको इसमें हमेशा सियासी फायदा ही नजर आता था। एक बार तो सियासत में एम करुणानिधि ने भगवान राम पर ही सवाल उठाते हुए एक जनसभा में पूछ लिया था कि रामसेतु का निर्माण आखिर राम कैसे कर सकते थे। वह भगवान राम के अस्तित्व पर भी सवाल उठा चुके थे। साठ के आखिरी के दशक में करुणानिधि ने हिंदी का इस कदर तमिलनाडु में विरोध किया कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखना होना पड़ा। तमिलनाडु में हालात इस कदर एम करुणानिधि के पक्ष में आए कि सरकारी स्कूलों से लेकर बैंक अस्पताल और सरकारी दफ्तर तक में हिंदी पूरी तरीके से प्रतिबंधित हो चुकी थी।

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एक देश-एक चुनाव के लिए बदलाव https://samacharpacheesa.com/?p=7939 Sat, 02 Sep 2023 07:24:01 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7939 केंद्र सरकार ने 18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार इस विशेष सत्र में एक देश एक चुनाव पर विधेयक ला सकती है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक देश एक चुनाव के अपने विचार को आगे बढ़ाया था। तब से अब तक कई मौकों पर भाजपा की ओर एक देश एक चुनाव की बात की जाती रही है। ये विचार इस पर आधारित है कि देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों। अभी लोकसभा यानी आम चुनाव और विधानसभा चुनाव पांच साल के अंतराल में होते हैं। इसकी व्यवस्था भारतीय संविधान में की गई है। अलग-अलग राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल अलग-अलग समय पर पूरा होता है, उसी के हिसाब से उस राज्य में विधानसभा चुनाव होते हैं। हालांकि, कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ होते हैं। इनमें अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम जैसे राज्य शामिल हैं। वहीं, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और मिजोरम जैसे राज्यों के चुनाव आगामी लोकसभा चुनाव से ऐन पहले होंगे। दरअसल, एक देश एक चुनाव की बहस 2018 में विधि आयोग के एक मसौदा रिपोर्ट के बाद शुरू हुई थी। उस रिपोर्ट में आर्थिक वजहों को गिनाया गया था। आयोग का कहना था कि 2014 में लोकसभा चुनावों का खर्च और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों का खर्च लगभग समान रहा है। वहीं, साथ-साथ चुनाव होने पर यह खर्च 50:50 के अनुपात में बंट जाएगा। सरकार को सौंपी अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में विधि आयोग का कहना था कि साल 1967 के बाद एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया बाधित हो गई। आयोग का कहना था कि आजादी के शुरुआती सालों में देश में एक पार्टी का राज था और क्षेत्रीय दल कमजोर थे। धीरे-धीरे अन्य दल मजबूत हुए कई राज्यों की सत्ता में आए। वहीं, संविधान की धारा 356 के प्रयोग ने भी एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया को बाधित किया। अब देश की राजनीति में बदलाव आ चुका है। कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों की संख्या काफी बढ़ी है। वहीं, कई राज्यों में इनकी सरकार भी है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि 2019 में एक साथ चुनाव कराते हैं, तो तकरीबन 10 लाख पोलिंग बूथ बनाने होंगे और तकरीबन 13 लाख बैलेट यूनिट्स, 9.4 लाख कंट्रोल यूनिट्स और तकरीबन 12.3 लाख वीवीपैट मशीनों की जरूरत होगी। एक इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन की कीमत 33 हजार 200 रुपए पड़ती है। चुनाव आयोग का कहना था कि साथ चुनाव होते हैं तो अकेले ईवीएम पर ही 4 हजार 555 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

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