मेरी बात – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 25 Mar 2025 02:32:08 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 यह कैसा लोकतंत्र है? https://samacharpacheesa.com/?p=14794 Tue, 04 Feb 2025 06:03:16 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=14794 अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटना इसी को तो कहते हैं। प्रयागराज के महाकुंभ में भगदड़ के कारण कुछ लोगों की मृत्यु हो गई। उस पर एक टीवी चैनल का रिपोर्टर समाचार बना रहा था, तो उसे वहां के कुछ लोगों ने रोकने की कोशिश की। यहां तक कि उसे धक्के मार कर बाहर निकला गया। वह रिपोर्टर मौत के आंकड़ों पर सवाल उठा रहा था और उसे रोका जा रहा था। इस देश में लोकतंत्र है। अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है। यही तो है अभिव्यक्ति की आजादी कि जो सच है, वह दिखाया जाए। रोज चैनल वाले यह दिखा रहे हैं कि 30 करोड़ आ गए 35 करोड लोगों ने संगम में स्नान कर लिए। इतना प्रमाणिक आंकड़ा आपको रोज मिल रहा है।लेकिन जो लोग भगदड़ में मर गए, उनके आंकड़े प्रशासन क्यों छिपा रहा है। आखिर इतनी पारदर्शिता तो होनी ही चाहिए कि कितने लोग मरे। अगर कोई पत्रकार जानना चाहता है, तो उसे जानने का पूरा अधिकार है।उसे रोकने का मतलब है कि आप कहीं न कहीं कुछ छुपा रहे हैं। यह अपने आप में अपराध है। पत्रकारिता के शाश्वत मूल्यों पर प्रहार है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यही है कि हमारे पूरे सिस्टम में कथनी करने का अंतर है। जो सच है, वह दिखाया जाना चाहिए। इसमें किसी को बुरा नहीं लगेगा। क्योंकि यह भगदड़ सहज रूप में उभर कर सामने आई। हालांकि भगदड़ के पीछे एक कारण तो लोगों का धैर्य खो देना भी है। दूसरा कारण यह है कि मेला स्थल में वी वीआईपीयों के लिए एक अलग रास्ता बनाया गया और सामान्य लोगों के लिए दूसरा रास्ता। इस देश में आखिर इतना वर्ग भेद क्यों होता है? क्यों इस देश के चंद लोग वीवीआईपी माने जाते हैं और एक बड़ी आबादी के लोग कीड़े-मकोड़े? अकसर धार्मिक स्थलों में इस तरह का अपराध देखने को मिलता है। मैं कई बार यह नहीं समझ पाता कि अगर वीवीआईपी भगवान के पहले दर्शन कर लेगा तो क्या भगवान उसे कुछ ज्यादा आशीर्वाद प्रदान कर देंगे? ऐसा कुछ नहीं होने वाला। बस उसकी आत्मा को संतुष्टि मिलती है कि वह बड़ा आदमी, नेता या अफसर है। ऐसी विषमता देखकर धर्म स्थलों में लोगों को बहुत गुस्सा आता है। कायदे से तो इस देश में यह वीवी आई पी-संस्कृति ही खत्म होनी चाहिए। भगवान के दर पर क्या राजा, क्या गरीब, सब बराबर हैं । लेकिन यहां भी भेद किया जाता है। इस देश में सच्चा लोकतंत्र तब आएगा, जब एक आम आदमी भी भीड़ में खड़ा हो और उसके ठीक पीछे या आगे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री या कोई बड़ा अफसर। सबके लिए समान व्यवस्था होनी चाहिए। हां जो वीवीआई पी हैं,उनकी सुरक्षा के लिए अगल-बगल कमांडो आदि तैनात रहें, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन उन्हें खड़ा होना चाहिए आम लोगों की कतार में। पर ऐसा होता कहां है। दुनिया के अनेक देशों में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आदि के लिए बहुत अधिक प्रोटोकॉल का पालन नहीं होता। सामान्य लोगों की तरह ही वे आना-जाना करते हैं। लेकिन हमारे यहां दिक्कत यह है कि सदियों की गुलामी के बाद देश आजाद हुआ तो कुछ लोगों के दिमाग से अभी भी राजशाही का भूत नहीं उतरा है। वे चुने हुए प्रतिनिधि को राजा समझ बैठते हैं। उनकी व्यवस्था में लगे लोग उनको राजा महाराजा बनाकर व्यवहार करते हैं। आम लोगों को जनप्रतिनिधियों से दूर कर दिया जाता है। उन्हें धक्का मारा जाता है। उन पर लाठियां बरसाई जाती है। इस देश में यह विषमतावादी लोकतंत्र आखिर कब तक चलेगा? इस पर विचार करना चाहिए। और अगर महाकुंभ में ज्यादा मौतें हुई हैं,तो उसमें घबराने की कोई बात नहीं। सच को सामने आने देना चाहिए। ऐसा करके हम अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करेंगे और लोकतंत्र को लोकतंत्र बने रहने देंगे, उसे राजतंत्र नहीं बनाएंगे।

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कुम्भ एक सांस्कृतिक उत्सव https://samacharpacheesa.com/?p=14356 Fri, 24 Jan 2025 05:58:34 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=14356 144 साल के बाद आया है यह महाकुंभ. प्रश्न यह है कि कुंभ तो कुंभ है, फिर यह यह महाकुंभ क्यों है. इसका उत्तर यही है कि इसके पहले ग्यारह कुंभ आ चुके हैं. ग्यारहवें कुंभ के बाद जो कुंभ आता है, उसे महाकुंभ कहा जाता है और यह आदिकाल से चला रहा है. इस वर्ष के कुंभ को इसीलिए महाकुंभ कहा जा रहा है. इस महाकुंभ का साक्षी बनने के लिए दुनिया भर के सनातन प्रेमी पधार रहे हैं. मैं यह देखकर अभिभूत हूं कि प्रयागराज में में विदेश के भी अनेक श्रद्धालु मगन होकर डाल रहे हैं. मुख्यमंत्री के सामने उपस्थित होकर शिव तांडव स्त्रोत और रामचरितमानस की चौपाइयां सुन रहे हैं. यह है सनातन का असर. कुछ सनातन विरोधी हिंदू तथाकथित प्रगतिशीलता के रौ में बह कर ठंडी को कोस रहे हैं. प्रयागराज की भीषण ठंड में कुछ लोग मर गए. एक वामपंथी चिंतक ने लिखा, इसके लिए जिम्मेदार कौन है. वह परोक्ष रूप से मोदी सरकार को लांक्षित करने की कोशिश में थे. उनकी बातों से यही ध्वनि हो रहा था. जबकि ठंड तो हर साल पड़ती है. हर साल लोग प्रयागराज के संगम में जाकर स्नान करते हैं. प्रतिवर्ष कल्पवास होता है. माघ मेला लगता है. इसी तरह की भीषण ठंड पड़ती है. लेकिन लोग पूरी श्रद्धा के साथ जाते हैं. वहां स्नान करते हैं. मेरे पिताजी भी लंबे समय तक वहां जाते रहे. कुछ कमजोर शरीर वाले दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं. लेकिन जिनकी आस्था, श्रद्धा मजबूत होती है, इच्छा शक्ति भी, वे डुबकी लगा कर बाहर निकल जाते हैं. उन्हें कुछ नहीं होता. गंगा यमुना और लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के संगम में नहा कर लोग अपने आप को भाग्यशाली महसूस करते हैं. उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनके पापों का नाश हो चुका है. हालांकि मेरी अपनी निजी मान्यता यह है कि अगर कोई पापी है, तो वह यह सोचे कि संगम में डुबकी लगाने मात्रसे उसके पाप खत्म हो गए, तो यह भरम है. हाँ,इतना जरूर है कि पापी व्यक्ति संगम में डुबकी लगाने के साथ यह संकल्प करें अब से वह कोई पाप नहीं करेगा,तो उसके पुराने पाप खत्म हो सकते हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि संगम में डुबकी लगाने के बाद वह फिर से पाप कर्म शुरू कर दे. ऐसे व्यक्ति को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर वह कर क्या रहा है. कुंभ आत्म परिष्कार का एक अवसर है. कुंभ हमारी सांस्कृतिक यात्रा का एक पड़ाव है. कुंभ हमारी सनातन परंपरा का अद्भुत प्रकल्प है. जिसे देखने, महसूस करनेऔर उस पल को जीने के लिए दुनिया भर से भारतीय और विदेशी प्रयागराज पहुंचते हैं. लोग अपने-अपने हिसाब से वहां तरह-तरह के अनुष्ठान करते हैं. मुंडन करवाना, जनेऊ संस्कार तथा यज्ञ आदि करवाते हैं. कुल मिलाकर एक प्राचीन परंपरा का नाम है कुंभ, जहां पहुंचने वाले व्यक्ति को अपने धर्म प्राण होने का बोध होता है. इसमें दो राय नहीं की आत्मा भी निर्मल होती है. जब हम धर्म कर्म करते हैं तो हृदय को निर्मल करके जीने का भी यत्न करते हैं. का संदेश भी है. हमारा जीवन सत्कर्मों के कुंभ से भरा रहे. पाप का कुंभ वहां फूट जाए और सत्कर्मों का कुंभ लबालब भर जाए. प्रयागराज पर्यटन की जगह नहीं है. वह हृदय को पवित्र करने की जगह है. इस बार महाकुंभ है तो उम्मीद की जाती है कि यह कुंभ पूरे देश के लिए शुभ साबित होगा. पूरी दुनिया का कल्याण हो, ऐसी मंगल कामना भी महाकुंभ कर रहा है. बस अनुरोध यही किया जा सकता है कि हृदय रोगी वहां न जाएँ. जाएँ तो बिल्कुल सुबह डुबकी न लगाएं. इसी कारण कुछ बुजुर्गों की वहां मृत्यु हो चुकी. श्रद्धा अपनी जगह है और स्वास्थ्य अपनी जगह. प्रयागराज का यह सांस्कृतिक महाकुंभ विश्व में भारत की एक बेहतर छवि निकलने का एक सुंदर उपक्रम भी है।

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पत्रकार की हत्या https://samacharpacheesa.com/?p=13608 Tue, 07 Jan 2025 06:32:00 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=13608 बस्तर में एक पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या कर दी गई. पुलिस की तत्परता के कारण पत्रकार के सभी निर्मम हत्यारे गिरफ्तार हो गए. हत्यारों की सारी अकड़ भी खाक में मिल गई. अपनी अर्जित आर्थिक हैसियत के कारण वे तन कर चला करते थे. शादी में करोड़ों रुपए काअपव्यय करके खुश थे. अब वही जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं. और इस देश में अगर न्याय जिंदा है तो उन्हें आजीवन कारावास मिलना चाहिए और मुख्य आरोपी को फांसी की सजा भी मिले तो कम है. अब बात पत्रकारिता की अभिव्यक्ति की. बस्तर में इसके पहले भी पत्रकारों की हत्याएं होती रही है. कुछ हत्याएं नक्सलियों ने की. एक पुरानी कविता है कि प्रेम को पंथ कराल महा तलवार की धार पर धावनों है. इस कविता में प्रेम की जगह प्रेस कर देना चाहिए. प्रेस को पंथ कराल महा तलवार की धार पर धावनो है. नि:संदेह.भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली हुई है. लेकिन क्या सचमुच पत्रकारिता में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. पत्रकार दुनिया भर को आईना दिखा सकता है, लेकिन जैसे ही वह सरकार को आईना दिखाने लगता है, तो उसके सामने खतरे बढऩे लगते हैं. पिछली कांग्रेस सरकार में हमने यह देखा. कुछ पत्रकारों को विशुद्ध रूप से अभिव्यक्ति के कारण प्रताडि़त किया गया. उन्हें जेल भेज दिया गया. वे और उनके परिवार के लोग मानसिक संत्रास से गुजरते रहे. मुझे लिखने में रत्ती भर का संकोच नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में भी पत्रकार प्रताडि़त होते रहे. अब यह सिलसिला बंद होना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान सरकार इस बार के लिए वचनबद्ध हो कि सरकार के विरुद्ध लिखे जाने पर किसी भी पत्रकार को प्रताडि़त नहीं किया जाएगा. आपत्ति है, तो उसे पत्रकार पर मानहानि का मुकदमा चलाया जा सकता है. लेकिन फर्जी एफ़आइआर दर्ज करके उसे गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए. लोकतंत्र में लोकतांत्रिक तरीके से कम होना चाहिए. न कि सामंती अंदाज में. राजतंत्र में ऐसा होता था. अंग्रेजों के शासनकाल में भी ऐसा होता था. जिस स्वतंत्रता सेनानी ने अंदर कर दिया जाता था. कहा जाता था, यह राजद्रोह कर रहा है. ठीक है उस समय अंग्रेजों के खिलाफ लिखा जाना, उनकी नजऱों में एक तरह से राजद्रोह ही था. लेकिन आपको देश आजाद है. अब तो किसी भी सरकार के विरुद्ध दिखा जा सकता है. अगर कोई चुनी हुई सरकार कुछ गलत कर रही है, तो हर पत्रकार और अख़बार का दायित्व है कि वह उसके विरुद्ध आवाज़ उठाए. लेकिन मेरा निजी अनुभव यह है की सरकार के विरुद्ध लिखने पर सरकार का कोई पिछलग्गू उसके खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कर देता है. कुछ तो पत्रकार पर झूठे आरोप लगा देते है कि वह पैसे मांग रहा था. पत्रकार पर ब्लैकमेल का आरोप आसानी से लगाया जा सकता है. किसी आरोप के तहत देश के अनेक पत्रकारों पर कार्रवाई होती रही है. पत्रकारों पर ऐसे आरोप बिल्कुल उसी तरह के होते हैं, जैसे कोई बहू थाने में जाकर ससुराल वालों पर दहेज प्रताडऩा का आरोप लगा दे. सबको पता है कि ज्यादातर आप झूठे होते हैं. मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि आज भी पत्रकारिता जिंदा है. आज भी पत्रकारों का जमीर जिंदा है. आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो बिकते नहीं. बस्तर में ऐसे पत्रकारों की भरमार है. वे बेबाकी के साथ सच लिखते हैं. भले ही उनकी जान चली जाए. पिछले साल बस्तर के पत्रकार को सच लिखने के कारण फर्जी तरीके से गिरफ्तार कर लिया गया था. उनकी गाड़ी में गांजा रखकर आरोप लगाया कि वह गांजा की तस्करी कर रहे थे. पत्रकारों के सामने बड़ी चुनौती यही है की पुलिस के खिलाफ लिखो तो पुलिस पीछे पड़ जाती है.नक्सलियों के विरुद्ध लिखो तो नक्सली पीछे पड़ जाते हैं, और माफिया के विरुद्ध लिखो तो वे जान लेने पर आमादा हो जाते हैं. लेकिन इतना सब होने के बावजूद सच्ची कलम न झुकती है, न रूकती है. चलती रहती है भले ही जान चली जाए. किसी पत्रकार की हत्या के मामले में कोई भी सरकार कुछ नहीं कर सकती भले ही अपराधी बाद में पकड़ में आ जाए, वह एक प्रक्रिया है. लेकिन वह पत्रकार सुरक्षा कानून तो बना ही सकती है. वर्तमान सरकार के मुखिया विष्णु देव साय ने पत्रकार सुरक्षा कानून की बात तो की है. उम्मीद है कि यह जल्द से जल्द बन जाएगा.

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समरसता की ”भागवत”-कथा https://samacharpacheesa.com/?p=13314 Tue, 31 Dec 2024 05:55:02 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=13314 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी के समय-समय पर आने वाले बयान उनके महान व्यक्तित्व का परिचय देते हैं. उनकी किसी भी बात में छोटापन नजर नहीं आता. वह बड़ी उदारता के साथ, बेबाक तरीके से अपनी बात रखते हैं. कुछ उनकी बातों से सहमत होते हैं, कुछ असहमत भी होते हैं. लेकिन वह इसकी परवाह नहीं करते और अपनी बात कह देते हैं. जैसे पिछले दिनों उन्होंने देश के कुछ मस्जिदों की खुदाई और कुछ लोगों द्वारा हिन्दुओं का नेता बनने को लेकर के जो बयान दिया, वह अपने आप में अभूतपूर्व था. इस बयान की उदारवादी लोगों ने खुलकर प्रशंसा की.विपक्षी दलों ने भी उनके बयान को हाथों हाथ लिया. हालांकि कुछ कट्टरपंथी लोगों ने उनके इस बयान से असहमति जाहिर की. कुछ धर्माचार्य ने नाराजगी भी व्यक्त की लेकिन इससे भागवत जी को कोई फर्क नहीं पडऩे वाला. वह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जो व्यावहारिक सच है, उसको कहने में संकोच नहीं करते. इसलिए मैंने हमेशा उनके बयानों की तारीफ की है. समाज में अगर ऐसे प्रमुख लोग उदारता के साथ समरसता की बात करेंगे तो देश में कहीं कोई दंगा-फसाद न हो. कुछ समय पहले भागवत जी ने कहा था कि देश में रहने वाले हिंदू और मुसलमानों का डीएनए एक है. यह बहुत बड़ी बात थी. इससे लाखों मुसलमान को बहुत अच्छा लगा था. उन्होंने भी भागवत जी की खुलकर तारीफ की थी. यह राष्ट्र शुरू से सनातन रहा है. लेकिन जब आक्रमणकारी मुगल आए तो उसके बाद बहुत से हिंदू धर्म परिवर्तन करके मुसलमान हो गए.
इसमें दो राय नहीं की मोहन भागवत जब से संघ के सरसंघचालक यानी प्रमुख बने हैं, तब से समाज में संघ को लेकर एक सकारात्मक भाव जाग्रत हुआ है. संघ की छवि और निखरी है. मैंने भी बाल्यकाल से संघ की गतिविधियों को देखा है और यही पाया है कि यह संगठन राष्ट्र के उन्नयन हेतु सतत लगा हुआ है. अगर यह संगठन हिन्दू एकता की बात करता है तो कोई गलत नहीं करता. सभी को अपने धर्म की बात करने का अधिकार है. सभी मजबूत रहें,लेकिन उनमें किसी अन्य धर्म के लिए नफरत का कोई भाव न रहे. अगर मोहन भागवत जी हिंदुओं से कहते हैं कि सबसे अधिक बच्चे पैदा करो तो कोई गलत बात नहीं करते. देश की सामाजिक स्थिति जिस तरह होती जा रही है, उसे देखते हुए अब यह बहुत जरूरी भी हो गया है. इस बयान को किसी दूसरे धर्म की प्रतिद्वंद्विता के रूप में न देखकर, आत्म सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाना चाहिए. इसमें दो राय नहीं कि हिन्दुओं की अतिरिक्त सावधानी के चक्कर में जनसंख्या में गिरावट तो आई है. तुलनात्मक आंकड़े सच का बयान कर रहे हैं. इसलिए मैं कहता हूं कि मोहन भागवत जी का बयान हमेशा समयसापेक्ष आता है. जिस पर चिंतन की जरूरत है. रायपुर के पांच दिवसीय प्रवास में भी उन्होंने लगातार स्वयंसेवकों का अपने व्यक्तित्व के निखारने की सलाह दे रहे हैं. पेड़ लगाने की बात कर रहे हैं. पानी बचाने का संदेश और पॉलिथीन मुक्त समाज व्यवस्था पर भी उन्होंने जोर दे रहे हैं. उनकी बातों में कहीं भी नफरत कीटाणु नजर नहीं आते. वे उदारमन के साथ राष्ट्र के विकास में लगे रहने की सलाह देते हैं. उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को देखकर दूसरे धर्म के लोगों को यह सीख लेनी चाहिए कि उनके बयान भूल कर भी नफरत वाले नहीं होने चाहिए. क्योंकि घृणा नहीं प्यार से ही राष्ट्र का विकास संभव है. इस बात को भागवत जी अच्छे से समझते हैं. अगर उनकी बातों को हम भागवत -कथा की तरह आत्मसात कर लें, तो हिंदुत्व का विकास भी होगा, और राष्ट्र का भी।

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पुस्तक-संस्कृति पर कुठाराघात ! https://samacharpacheesa.com/?p=13053 Tue, 24 Dec 2024 06:19:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=13053 यह सूचना पढ़कर मुझे दुख हुआ। आपको भी होगा कि डाक विभाग ने रजिस्टर्ड प्रिंटेड बुक सेवा बंद कर दी है। सचमुच यह सस्ती थी। कैसे प्रकाशन व्यवसाय में फर्क पड़ेगा। पुस्तक भेजने के लिए लेखक-प्रकाशक इसी सेवा का उपयोग करते थे। लेकिन अब पुस्तक रजिस्टर्ड पार्सल से भेजे जाएंगी, डाकघर से पहले से अधिक लगेगा। मुझे पता चला है कि पहले एक सामान्य पुस्तक भेजने में पहले 30 रुपए लगते थे, लेकिन अब 57 रुपए लगेंगे। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है। शर्म आना चाहिए हमारी सरकार को। एक तरफ यह पुस्तक संस्कृत की बात करती है, दूसरी तरफ इस संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश कर रही है। कायदे से तो होना यह चाहिए कि हर छपी पुस्तक को भेजना और सस्ता हो। ?30 से भी कम। लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं। इसकी बुद्धि और अधिक भ्रष्ट हुई हो सकता है ?30 की जगह ?60 लेने लग जाए।
फेसबुक के माध्यम से हम सब विरोध कर रहे हैं लेकिन क्या बहरी सरकार को सुन सकेगी? अगर सुनकर अपना निर्णय वापस ले सके तो बहुत अच्छी बात है। मैंने जब सोशल मीडिया में अपनी पीड़ा व्यक्त तो अनेक लोगों की सकारात्मक टिप्पणियां मिलीं। बात निकलती है तो फिर दूर तलक जाती है। उम्मीद करता हूं कि पूरे देश की पीड़ा का संज्ञान सरकार ज़रूर लेगी। यह जन विरोधी कदम है। इसे जल्द से जल्द से वापस लिया जाए। मेरी पीड़ा पर अपनी सहमति जताते हुए वरिष्ठ लेखक देवेंद्र दीपक जी ने सही कहा है कि “ज्ञान परम्परा की रक्षा की बात करने वाली सरकार का ज्ञान घातक निर्णय! और वह निर्णय भी चुपचाप। बजट के समय घोषण करती तो बात सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती ?। प्रधानमंत्री युवकों को पुस्तक पढऩे के लिए प्रेरित करते हैं, दूसरी ओर उनकी सरकार पुस्तक के डाक व्यय बढ़ाती है ?। यह निर्णय पुस्तक स़ंस्कृति विरोधी निर्णय है। निंदा करता हूं।” गौ भक्त फैज़ खान का सुझाव मुझे ठीक लगा कि साहित्यिक डाक पर तो विशेष सब्सिडी देकर बहुत सस्ते में ये काम करना चाहिए। घनघोर लापरवाही भी। सजग लेखक अरुणकांत शुक्ल ने बताया कि “डाक बांटने का काम ठेके पर दे दिया जा रहा है। रजिस्टर्ड और स्पीड पोस्ट को छोड़कर सभी डाक कूड़े के ढेर जैसी पोस्ट ऑफिस में पड़ी रहती हैं और फिर कबाड़ी को या फेंक दी जाती हैं।” कथाकार हरिप्रकाश राठी ने भी मेरा साथ देते हुए कहा कि “एक तरफ साहित्य को प्रतिष्ठित करने की बात हो रही है , दूसरी ओर हर वह कार्य किया जा रहा है जिससे साहित्य नेपथ्य में चला जाये। साहित्यिक पतन अंतत: सांस्कृतिक , सामाजिक पतन की पूर्व भूमिका नहीं तो और क्या है ? पोस्टल मूल्यों में बढ़ोतरी कोढ़ में खाज जैसी बात होगी।” रंगकर्मी जितेंद्र भइया ने अपनी पीड़ा कुछ यूँ व्यक्त की कि “दुनिया में आज तक कोई सरकार जन हितैषी काम करने वाली नहीं बनी, सबके सब धन को महत्व देते हैं। यही कारण है कि आज मानवता इंसानियत शर्मनाक स्थिति से भी ज्यादा नीचे जा चुकी है और दु:ख इस बात का है कि हम जिस संस्कृति संस्कारों पर गर्व करने की बात करते हैं उसी देश में सबसे ज्यादा मानवता इंसानियत का स्तर बहुत नीचे गिर चुका है और उसके पीछे सीधा सा कारण है हमारी बनाई हुई व्यवस्था जो अंग्रेजों की है, जिसके बारे में राजीव भाई ने बहुत कुछ बोला है। लेकिन कोई सरकार, कोई प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री, कोई नेता इस पर बात ही नहीं करता। अब तो शर्म आने लगी है कि हम एक ऐसी सरकार को झेल रहे हैं जो अपने आपको राष्ट्रवादी कहती है जिसमें राष्ट्र का कहीं कोई अता-पता नहीं है। मैं अपने तो यहाँ इस सरकार के नुमाइंदों से कई बार मिला हूँ लेकिन किसी के चेहरे पर मैंने शिकन नहीं देखी कि गाय हर जगह मर रही है, हाँ इनसे हिंदू मुस्लिम करवा लो।

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साहित्य में लोक विमर्श जरूरी https://samacharpacheesa.com/?p=12624 Tue, 10 Dec 2024 06:06:59 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=12624 कल ‘इंटेलेक्चुअल फोरम ऑफ़ छत्तीसगढÓ नामक संस्था के शहर के कुछ राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों के बीच साहित्य में लोक विमर्श विषय पर मुझे बोलना था. मैंने विस्तार के साथ अपनी बात रखी और चिंता व्यक्ति की कि साहित्य में अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है. साहित्य का पूरा ध्यान अब नागर विमर्श तक सिमट गया है. लोगों का गांव से मोह भंग होता जा रहा है. गाय की जगह लोग कुत्ता पालने में रुचि रखते हैं. गाय की जगह ‘गेÓ ( समलैंगिता ) पर बात करना आधुनिकता हो गई है. गांव में पहले हर दूसरे बच्चे के नाम के आगे पीछे राम शब्द जुड़ा रहता था लेकिन अब वह दौर भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. हमारा भारतीय समाज लोकानुरागी रहा है. लोक उसकी आत्मा का हिस्सा रहा. लोक के आलोक में ही सदियों से उसका जीवन दीप्त होता था. लेकिन धीरे-धीरे शहरीकरण ने लोक को हाशिये पर धकेल कर उसे केवल लोग बना कर रख दिया. इसका दुष्परिणाम समाज भोग रहा है. हम सब जानते हैं कि लोक का भोजन अमृततुल्य रहा है, क्योंकि उसमें शुद्धता की गारंटी हुआ करती थी. और आज भी बहुत हद तक वहाँ शुद्धता बची हुई है. लेकिन इसके ठीक विपरीत अनुभव यही बताता है कि शहरी भोजन अब जहर बनता जा रहा. सांसों में घुलता विषैला धुआँ और खानपान में मिलावट शहरी जीवन का साइड इफेक्ट हो गया है. लोक में रहने वाला समाज सहज रूप से शुद्ध प्रकृति के साथ रहता है. चतुर्दिक पसरी हरियाली और नदी-तालाब की समृद्धि तन-मन दोनों को स्वस्थ बनाए रखती है.जबकि कभी प्रकृति के संग रहने वाला नागर समाज अब धीरे-धीरे प्रकृति मां का दुश्मन होता जा रहा है. सभी जीव-जन्तु प्रकृति के साथ मज़े से रहते हैं. तथाकथित विकास के नाम पर मनुष्य पेड़ काट रहा है. वह एक तरह से ‘कालिदासÓ बना हुआ है. जिस डाल पर बैठा है, उसे ही काटे जा रहा. लोग नदी को प्रणाम तो करते हैं और तुरत प्रदूषित करने लगते हैं. कुछ तो इतने चेतना-शून्य हो जाते हैं कि उनके कारखाने का दूषित जल सीधे जीवनदायिनी नदी में समाता रहता है. सिस्टम भी इसकी अनदेखी करता है. मनुष्य सुंदर विशाल पहाड़ों को खोद रहा है.उसके दुष्परिणाम भी भोग रहा है. फिर भी वह सबक ग्रहण नहीं करता. पहले कहावत थी कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है. अब गीदड़ की जगह मनुष्य शब्द का प्रयोग करना चाहिए. धीरे-धीरे अपने ही गांव से मनुष्य का मोह भंग हो रहा है. कोगों को गांव की खेती-बाड़ी छोड़कर शहर में आकर चौकीदारी करना मंजूर है, लेकिन गांव में रहना गवारा नहीं. गांव में गाय पालने वाला व्यक्ति शहर आकर कुत्ते पालने लगता है. यह अजीब-सा बदलाव है. जैसे गांव से गंवईपन गायब होता जा रहा है, उसी तरह साहित्य से भी लोक-विमर्श धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है. उसकी जगह महानगरीय जीवन और उसके नाना संक्रमण केंद्र में आते जा रहे हैं. कहानी, कविताओं में, उपन्यासों में गांव की सोंधी खुशबू गायब है. हमारा सांस्कृतिक बोध भी खत्म होता जा रहा है. संस्कृति अब उपेक्षित- बहिष्कृत शब्द हो गया है. संस्कृति कोई कठिन शब्द नहीं है. जो श्रेष्ठ है, वही संस्कृति है. जिसमें परिष्कार की भावना है. जो उदात्त है. जो सकारात्मक है. जो हमें बेहतर मनुष्य बनाए रखती है, वह संस्कृति है. जो हमें संस्करवान बनाए, वह संस्कृति है. साहित्य में इस तरह के सांस्कृतिक मूल्य आने चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि अब जो नया साहित्य रचा जा रहा है, उसमें अप-संस्कृति की बहुलता है. लिव-इन रिलेशनशिप है, समलैंगिकता है,नग्नता की खुली वकालत है. बार-बार यह भी बताया और एक हद तक समझाया भी जा रहा है कि औरत की देह उसकी अपनी है. उसे आजादी है कि वह उसका चाहे जैसा इस्तेमाल करे. नैतिकता अब आउटडेटेड हो गई है. अब जो जितना अधिक अनैतिक है, वह उतना जिय़ादा आधुनिक है. यह अजीब किस्म की उलटबासी है. अपनी सनातनी परंपरा का बोध ही खत्म हो गया है.
जैसे-जैसे हम लोक विमर्श या लोक जीवन से दूर होते जा रहे हैं, लोक ही क्या अपने अतीत से ही हमारा विश्वास उठता जा रहा है. समाज में आत्महीनता या पतन आ रहा है, और यह साहित्य में भी स्वाभाविक रूप से आ रहा है. हम प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ते हैं,तो उसमें लोक-विमर्श दिखाई देता है. परंपरा के प्रति लगाव भी नजर आता है. उनकी ‘पूर्व संस्कारÓ जैसी कहानी की कहीं चर्चा नहीं होती. वेद व्यास जी का लोकप्रिय कथन है, ‘प्रत्यक्षदर्शी लोकानाम सर्वदर्शी भवेन्नर:Ó लोक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से देखे बगैर हम मानव जीवन को ठीक से नहीं समझ सकते. इसलिए हमारे विमर्श के केंद्र में लोक- दर्शन होना चाहिए. लेकिन भारतीय समाज धीरे-धीरे इतना आधुनिक होता जा रहा है कि उसे लोक की बात करना पिछड़ापन लगने लगा है. लोक-संस्कृति, लोक-कला, लोक-वाद्य, लोक की वेशभूषा, लोक-पर्व, लोक के उत्पाद : इन सबसे जैसे मोह भंग होता गया है. धोती-कुर्ते वाला व्यक्ति हमें दूसरे लोक से आया हुआ प्राणी लगता है. साड़ी में लिपटी हुई स्त्री हमें पिछड़ी हुई प्रतीत होती है. गाय को उपेक्षित करने वाला व्यक्ति जब विदेशी नस्ल का कोई कुत्ता पालता है, तो उसे लोग ‘एनिमल लवरÓ कहने लगते हैं. गोया गाय एनिमल ही नहीं है. यह तथाकथित परिवर्तन उत्थान है या सामाजिक पराभव, इस पर अब बात करना बेमानी है. लोग अपनी सुंदर परंपराओं से, संस्कृतियों से और कुछ बेहतर शाश्वत मूल्यों से दूर होते चले जा रहे हैं. लगता है, यह लोक विमुखता अब बढ़ती ही जाएगी.

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साहित्य का ‘उर्फीकरण’! https://samacharpacheesa.com/?p=11717 Tue, 12 Nov 2024 05:45:37 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=11717 जिस समाज में नग्नता को धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी हो, उस दौर में अगर ‘साहित्य आज तक’ जैसे कार्यक्रम में खुलेआम फूहड़, अश्लीलता का भोंडा प्रदर्शन करने वाली किसी मॉडल को बुलाया जा रहा हो और उसे देखने के लिए रु. 499 का टिकट लगाया जा रहा हो, तो इसमें बहुत अधिक चिंता करने की बात नहीं है. न इस मसले को लेकर शुद्धतावादियों को अपना खून सुखाने की जरूरत है. टीवी चैनल आज तक वालों की पत्रकारिता हम सब देख रहे हैं. वहाँ कितनी पत्रकारिता और कितनी प्रायोजकीयता होती है, वह किसी से छिपी नहीं है. और ऐसे लिटफेस्ट में साहित्य के नाम पर क्या कुछ होता है, यह भी कहने की आवश्यकता नहीं. यहां साहित्य गौण रहता है, ‘टीआरपी’ की भावना अधिक होती है. धीरे-धीरे हमारा पूरा साहित्यिक समाज कॉर्पोरेट घराने में तब्दील होता चला जा रहा है. अब ऐसा लगने लगा है कि साहित्य आम लोगों की चीज नहीं रही. साहित्य केवल प्रदर्शन का नाम हो गया है. तथाकथित बड़े प्रकाशक भी यही कोशिश करते रहे हैं कि बड़े अफसर या किसी पहुँच वाले शख्स की किताबें छापें, जो उन्हें मालामाल कर सके. और उसकी किताब बहुत शानदार ढंग से छपाते भी हैं. इतनी आकर्षक कि पहली नजर में देखकर लगता है कि यह कोई महान कृति है. बेचारा गुमराह पाठक खरीद लेता है और उसे पढ़ कर सिर पीटता है और गाली देते हुए कहता है कि उसका तो नुकसान हो गया. मॉडल के रूप में अपनी नग्नता को डंके की चोट पर सार्वजनिक करने वाली ‘अद्भुत प्रतिभा’ की धनी ऊर्फी जावेद को देखने-सुनने लोग 499 रुपये खर्च करके जाएंगे और शायद आनंदित होकर भी लौटें. पता नहीं आयोजन के दिन वह किस तरह के कपड़े पहन कर आएगी. अकसर तो वह जिस्मदिखाऊ अजीबोगरीब कपड़े पहनकर लोगों को चौंकाने का काम ही करती है. उसके डिज़ाइनर कपड़े शरीर को ढंकने वाले हों तो भी कोई बात है. लेकिन वह शरीर को दिखाने वाले ही वाहियात किस्म के कपड़े पहन कर निकलती है. और हालात यह होती है कि उसकी हर हरकत वायरल हो जाती है. पहले लोग ‘वायरल फीवर’ से ग्रस्त हुआ करते थे. अब लोगों की हरकतें ‘वायरल’ होती हैं. इसी कड़ी में सबसे चर्चित नाम अब ऊर्फी जावेद का है. हालांकि कई बार लोगों को यह भ्रम होता होगा कि क्या यह शायर जावेद अख्तर की कोई रिश्तेदार है, तो ऐसा कुछ नहीं है.ऊर्फी जावेद की अपनी एक कहानी है. यह अलग परिवार है. वह खुद बताती है कि उसकी अजीबोगरीब हरकत के कारण उसको घर में खूब डाटा डांटा-फटकारा जाता था, इसलिए वह सत्रह साल की उम्र में घर छोड़कर भाग गई थी. लेकिन अब वह फिर घर वालों के साथ रहती है, क्योंकि उन्हें कमा कर दे रही है. उर्फी की जबरदस्त चर्चा के कारण ही साहित्य आजतक वालों ने उसे अपने ‘शो’ में आमंत्रित किया है और टिकट भी लगाया है. इसी भरोसे कि आयोजन स्थल खचाखच भरा रहेगा. लोग उसे सुनने कम, देखने अधिक आएंगे. हम सब ऐसे बीमार समय में रह रहे हैं, जब साहित्य में भी नग्नता का बोलबाला है. कुछ फिल्मों में भी नग्नता खुलेआम नजर आती है. कभी-कभी अश्लील गालियां भी दी जाती हैं. और आश्चर्य की बात है कि सेंसर बोर्ड भी उसे सेंसर नहीं करता. बेडरूम सीन भी दिखा दिया जाता है. साहित्य में अश्लीलता के लिए अभी तक कोई रोक-टोक नहीं है. कोई सेंसर बोर्ड नहीं है. इसीलिए अब साहित्य के कथित मंच पर बेशर्म मॉडल भी बुला ली जाती है. मेरे लिए यह चौंकाने वाली बात बिल्कुल ही नहीं है. जो लोग आयोजन कर रहे हैं,उनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है. उनका मकसद बाजार है. कि कैसे उन्हें अधिक-से-अधिक लोकप्रियता मिले और विज्ञापन अर्जित कर सकें. उनका असली लक्ष्य बाज़ार होता है, साहित्य नहीं. ऊर्फी जावेद को बुला कर आयोजक अपनी दुकानदारी जमा लेगा. वह अपनी कमाई कर लेगा और सच्चा साहित्य खून के आँसू रोएगा. यह और कुछ नहीं, बदलते हुए समय में साहित्य का उर्फीकरण है।

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मानस पढ़ो बनो तुम ज्ञानी.. https://samacharpacheesa.com/?p=10071 Tue, 13 Aug 2024 05:56:45 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=10071 कल 11 अगस्त को गोस्वामी तुलसीदास जी की 527 वीं जयंती थी. उनकी महान रचना रामचरित मानस को पढ़ते हुए हम बड़े हुए हैं. बचपन में पिताजी ने मानस पढऩे के लिए दिया था। उसका नियमित पारायण हम लोग करते थे । राम मंदिर में जाते तो वहां किष्किंधा कांड और सुंदरकांड आदि भी नियमित पढऩे का अभ्यास चलता । इसी का सुपरिणाम यह हुआ कि किष्किंधा कांड की बहुत सारी चौपाइयां याद हो गई । रामचरितमानस की अनेक चौपाइयां, दोहे सहजता के साथ कंठस्थ हो गए। उसका लाभ यह हुआ कि मेरे लेखन में भी रामचरितमानस की चरणधूलि आती रही । और आज भी जब कभी मन अशांत होता है और कुछ अनुसंधान करने की इच्छा होती है, तो रामचरितमानस को पढऩे लगता हूँ। तुलसीदास की चौपाइयों और दोहों से गुजरते हुए खुद को अनायास ही पुनरनवीन करने लगता हूँ। बड़े होने के बाद रामचरित मानस को कभी मैंने एक धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं पढ़ा, ज्ञानार्जन के निमित्त ही पढा। अब भी पढ़ रहा हूँ। बहुत से लोग पढ़ते हैं । अनेक घरों में अखंड रामायण पाठ भी होता है। बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ लोग मंत्रमुग्ध होकर मानस का पाठ करते हैं । संगीतबद्ध पाठ भी करते हैं । फिल्मी धुनों मैं चौपाइयां तक गाते हैं, जिसे सुनकर श्रोता सिर हिला- हिला कर मगन हो जाते हैं । लेकिन मैं इस तरह की भक्ति से परे होकर एक विशुद्ध साहित्यिक विद्यार्थी के रूप में अकसर मानस को पढ़ता हूँ। बालकांड को बड़े मनोयोग से पढ़ता रहा हूं और हतप्रभ हो जाता हूं कि कैसे महाकवि तुलसीदास जी ने इतने विशाल ग्रंथ की रचना सहज भक्ति-भावना के साथ कर दी। इतना महान काव्य ग्रंथ रच कर भी तुलसी कहते हैं, ”कबित्त बिबेक एक नहीं मोरे /सत्य कहूं लिखि कागद कोरेÓÓ। बालकांड में उन्होंने काव्य-विमर्श भी जबरदस्त किया है। कविता कैसी होनी चाहिए, कवि को कैसा होना चाहिए, इस पर वे विस्तार से प्रकाश डालते हैं। मानस रामजी की महान कथा है, जिसे तुलसीदास ने सहज सरल शब्दों में प्रस्तुत किया मगर उन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ यह स्वीकार किया कि यह मेरी अपनी कृति नहीं है। यह तो वाल्मीकि रामायण और नाना पुराण आदि पढ़कर जो कुछ नवनीत निकला, उसे मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ। और उन्होंने यह भी कहा कि ”कबि न होऊँ नहिं चतुर कहावऊँ / मति अनुरूप राम गुन गावउँ। कह रघुपति के चरित अपारा/ कहँ मति मोरि निरत संसाराÓÓ। अर्थ कठिन नहीं है कि न तो मैं कवि हूं और न अपने आप को चतुर कहलाता हूँ। मेरी अपनी जैसी बुद्धि है, उसके अनुरूप मैं रामजी के गुण गा रहा हूँ। कहाँ भगवान श्री रघुनाथ जी का अपार चरित्र और कहां संसार में आसक्त मेरी बुद्धि । यह महाकवि तुलसीदास जी की अद्भुत उदारता है । उन्होंने ऐसे महान ग्रंथ की रचना कर दी जो सीधे पूजा घर की पूजनीय वस्तु बन गया। तुलसीदास जी ने बालकाण्ड में सज्जनों की वंदना की और गुरुजनों को भी बंदना की । तथाकथित ज्ञानियों की भी वंदना की। साधुओं की वंदना की । श्रेष्ठ कवियों को याद किया। चौपाई इस तरह है , ‘जे प्राकृत कबि परम सयाने/ भाषा जिन्ह हरि चरित बखाने। भए जे अहहीं जे होइहिंआगे / प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागेÓ। तुलसीदास जी कहते हैं जो बड़े बुद्धिमान प्राकृत कवि हैं। जिन्होंने भाषा में हरि चरित्रों का वर्णन किया है । जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं और जो इस समय वर्तमान हैं और जो आगे भी होंगे। उन सबको मैं सारा कपट त्याग कर प्रणाम करता हूँ। इस तरह कदम-कदम पर तुलसीदास जी ने विनम्रता के साथ यह स्वीकार किया कि मैं कुछ भी नहीं हूँ। यह तो प्रभु की कृपा से मानस की रचना हो गई। तुलसीदास जी यह भी जानते थे कि श्रद्धाहीन लोगों को यह ग्रन्थ पसंद नहीं आएगा इसलिए उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में यह दोहा रचा, ”जे श्रद्धा संबल रहित नहीं संतन कर साथ/ तिन्ह कहुँ मानस अगम अति, जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।ÓÓ और यह भी कहा कि जो बेमन के साथ इस ग्रंथ को पढ़ेंगे, उन्हें पढ़ते साथ ही नींद आने लगेगी। ”जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई /जातहिं नीद जुड़ाई होई।ÓÓ इस तरह जब तक श्रद्धा ना हो रामचरितमानस में रुचि जाग्रत नहीं होगी ।और मूर्ख लोग बिना पढ़े ही इसकी निंदा करते रहेंगे। मगर जिसने एक बार मानस से अपना रिश्ता गाँठ लिया, वह तो इसकी एक-एक चौपाई पढ़कर अपने भाग्य को सराहेगा। मानस को पढ़कर मुझे यही अनुभूति हर बार होती रही।
और अंत में…मानस- गुणगान करते हुए दस चौपाइयां बनी, वह यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।
चौपाई
रामचरितमानस जो पढ़ही। सत्य कहूं सदजीवन गढ़ही।।
हुलसी के तुलसी अति पावन। शुद्ध हृदय कवि जन-मनभावन।।
एक बार जो मानस चाखे। उसको स्वस्थ रामजी राखे।।
रामकथा कितनो मिल जाही। पर मानस से पार न पाही।
सच्चे मन जो पूजा करही। मानस पढ़कर जन-जन तरही।
कथा संग कुछ नीति बतावत। कवि तुलसी नित ज्ञान सिखावत।।
भक्ति,विवेक, ज्ञान की गंगा। पढ़ मानस मन होवत चंगा।।
मानस को अंतर में भर लें। जीवन को हम निर्मल कर लें।।
नस-नस में मानस बस जावे । तो हर मनुज महान कहावे।।
इधर-उधर मत भटको प्रानी। मानस पढ़ो, बनो तुम ज्ञानी।।

दोहा
पूजा मानस की करो, मगर होय वह व्यर्थ ।
केवल तोता-पाठ का, रहे न कोई अर्थ।।

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देश भर में गूँजा नारा… भारत माता की जय ! https://samacharpacheesa.com/?p=9937 Tue, 02 Jul 2024 06:04:23 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=9937 29 जून की रात पूरे देश में भारत माता की जय… वंदे मातरम और जय हिंद के नारे गूँज रहे थे । दक्षिण अफ्रीका के बारबाडोस में टी-20 क्रिकेट मैच में भारत सत्रह साल बाद विश्व चैंपियन जो बना था। यह 140 करोड़ भारतवासियों के लिए गर्व की बात थी। (कुछ देशविरोधियों की छाती पर सांप भी लोटे होंगे, यह अलग बात है) लेकिन कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, दिल्ली से लेकर रायपुर तक और जयपुर से लेकर राउरकेला तक भारत माता की जय के नारे गूँजते रहे । पटाखे फूटते रहे। ऐसा लगा कि अचानक दिवाली आ गई है। यह देखकर हृदय गदगद था। देश में राष्ट्रप्रेम इसी तरह बरकरार रहे। मैच शुरू होने के पहले राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होकर उसे सुनना और दोहराना तो भावुकता से भर ही रहा था । और उसके बाद पूरे मैच को देखना भी कम रोमांचक नहीं था। हालांकि खेल के अंत में डर भी लगा कि पता नहीं भारत जीत पाएगा या नहीं। लेकिन हमारे गेंदबाजों ने देश की भावनाओं को समझा और दमदार बोलिंग की। इसके कारण दक्षिण अफ्रीका के रन बनने की गति एकदम धीमी हो गई । विराट कोहली के 76 रन और सूर्यकुमार का वह रोमांचक कैच हम भूल नहीं सकते। हमारे बॉलर जसप्रीत बुमराह, अर्शदीप की बॉलिंग ने टीम इंडिया को जीत के मुहाने तक पहुंचाया। देशवासी निराश हो रहे थे और लग रहा था कि दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी मैदान मार लेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं ।और हम हारते-हारते सात रन से जीत ही गए । और उसके बाद तो कमाल हो गया। होना ही था। अभी तो सोशल मीडिया का दौर है। चीजें तुरंत वायरल हो जाती हैं ।लेकिन मैं याद करता हूँ, सन 1983 को, जब इंटरनेट नहीं था, तब भी जब भारत विश्व चैंपियन बना था, तो रायपुर के हजारों लोग जयस्तंभ चौक पर जमा हो गए थे और वहां भारत माता की जय के नारे लग रहे थे। 29 जून 2024 को भी लगभग यही नजारा दिखा। अंतर केवल इस बात का था कि इस बार हर कोई अपने मोबाइल से इस सुंदर नजारे को कैमरे में कैद कर रहा था। टीवी के विभिन्न चैनल देश भर के उत्साह को अपने-अपने चैनलों के माध्यम से सीधे यानी लाइव दिखा रहे थे। देश के कोने-कोने में भारत माता की जय के नारे गूँज रहे थे। मेरे मन मे एक नारा कौंधा,
बच्चा-बच्चा डोल रहा है
भारत की जय बोल रहा है
तिरंगा लहराते हुए लोग सड़कों पर उतर आए। और वंदे मातरम या भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। यह दृश्य देख कर उन लोगों के लिए यकायक सोचने लगा कि बेचारे उन दिलों में क्या बीत रही होगी, जो भारत माता की जय बोलने से परहेज करते हैं। इस देश में रहते हैं, इस देश का अन्न-जल ग्रहण करते हैं और भारत माता की जय बोलने में उनकी आत्मा कलपती है। कुछ तथाकथित प्रगतिशील से उग्र राष्ट्रवाद भी कह रहे होंगे। पूरे देश में भारत माता की जय की गूँज सुन-सुनकर बेचारे कितने विचलित हुए होंगे। उम्मीद है, वे भी जल्द ही भारत माता की जय बोलेंगे। रह-रह कर मुझे राष्ट्रकवि गयाप्रसाद शुक्ल सनेही की यह कविता याद आ रही है कि
जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

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आखिर कब मिलेगी इस बर्बरता से मुक्ति? https://samacharpacheesa.com/?p=9893 Tue, 18 Jun 2024 06:21:17 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=9893 मानव समाज सदियों पहले जंगलों में निवास करता था। वह पूरी तरह से सभ्य नहीं हो सका था। निर्वस्त्र विचरण करता था। तब खाने-पीने के साधन विकसित नहीं हो सके थे। वैसी समझ भी मानव में विकसित नहीं हुई थी। तब वह पशु-पक्षियों को मार करके खा जाया करता था। पेट भरने के लिए उसके पास और कोई विकल्प नहीं था इसलिए किसी जीव का शिकार किया और उसे पका कर या कच्चा ही खा गयाम वह एक अलग किस्म का बर्बर युग था। लेकिन अब तो हम तथाकथित रूप से सभ्य हो गए हैं। कहने को सभ्य समाज में रह रहे हैं । इसलिए अब तो हमें इस तरह की जीव- हत्याओं से मुक्त हो जाना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज भी ऐसे अनेक लोग हैं, जो जीव-हत्या कर उसे खाना अपनी शान समझते हैं । कुछ लोगों ने बड़ी चालाकी के साथ जीव-हत्या को अपने धर्म-कर्म से भी जोड़ दिया है। और इस अपराध में समान रूप से सभी धर्म के लोग शामिल हैं। किसी एक धर्म का नाम लेने का मतलब नहीं, क्योंकि हम सब उनसे परिचित हैं। हमारे समाज के विभिन्न धर्म जाति में ऐसे असंख्य लोग हैं, जो किसी भी जीव की हत्या करने में कोई संकोच नहीं करते । इन पंक्तियों को लिखते हुए मेरी आँखें भर गई हैं। मैं यह सोचकर व्यथित हो जाता हूँ कि आखिर मानव समाज और कितना नीचे गिरेगा? कितना पतित होगा? आखिर उसमें यह चेतना, संवेदना कब जाग्रत होगी कि गाय एक सुंदर प्यारा जीव है, जिसके दूध का सेवन हमअपनी पौष्टिक्ता के लिए जीवन भर करते हैं। गौ वंश को लोग बेरहमी से काट देते हैं। मैं गाय, बैल, भैंस सबकी बात कर रहा हूँ। लोग भेड़-बकरे को काट कर खा जाते हैं ।और भी छोटे-छोटे पशु-पक्षी हैं, उनको भी बड़े चाव से लोग खाते हैं। मैं कई बार जब रास्ते से गुजरता हूं तो किसी मीट शॉप को देख कर कुछ देर रुक कर वहाँ मीट खरीदते हुए लोगों के चेहरे को देखता हूँ। तब मैंने पाया है कि उनमें और सड़क के श्वान में कोई खास अंतर नहीं रह जाता। हमने देखा होगा कि कुत्ते खाने के या मांस के टुकड़े को बड़े चाव से देखते हैं कि जैसे ही मिले, उसे लपक कर खा ले। मांसाहार के मामले में अनेक लोग धर्मनिरपेक्ष हो गए हैं ।बड़ी चालाकी के साथ एक जुमला उछालते हैं कि कोई क्या खाए, कोई क्या पहने; इस पर हमें टीका-टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। क्यों नहीं करनी चाहिए ?अगर आप किसी जीव की हत्या करके खा जाएंगे तो टिप्पणी तो करनी ही पड़ेगी। आप पहनने के नाम पर तार-तार फटी जींस पहनेंगे, बदन दिखाऊ टॉप पहनेंगे/पहनेंगी, तो लोग टिप्पणी करेंगे ही। जिस तरह से मांसाहार करने वाले उसे अपना अधिकार समझते हैं, तो उसके विरुद्ध टिप्पणी करने वालों को भी यह अधिकार है कि वह विरोध करें। उनकी टिप्पणी से व्यथित होने की ज़रूरत नहीं है।
लोक-जागरण बहुत ज़रूरी- मैं कह रहा था कि कितना बर्बर परिवेश हो गया है हमारा। आश्चर्य की बात यह है कि हिंसा करते हुए लोग समझ ही नहीं पाते कि वे हिंसा कर रहे हैं । हमारे यहां बलि-प्रथा रही है। कहीं-कहीं दुर्भाग्यवश आज भी जारी है । इसके विरुद्ध लोक जागरण करने की आवश्यकता है । अगर गाय, बैल, भैंस या बकरे की बलि लेने की शर्मनाक परंपरा है, तो उस परंपरा से लोगों ने मुक्ति भी पाई है। अगर इस परंपरा का अनुपालन करना ही है, तो उन जानवरों की छोटी-सी मूर्ति बनाकर या नारियल को प्रतीक बना कर भी तो बलि ली जा सकती है, ताकि आप की परंपरा बाधित न हो । लेकिन लोग ऐसा करते नहीं। वे सजीव पशुओं की हत्या कर देते हैं और फिर उसका भक्षण भी कर लेते हैं। हिंसा के पहले पशु रुदन भी करता है लेकिन उसे रुदन को हिंसक सुन नहीं पाते। पिछले दिनों 4 जून को जब 18वीं लोकसभा के नतीजे आए और तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष अन्नामलाई चुनाव हार गए ,तो प्रतिद्वंद्वी पार्टी डीएमके ने बीच सड़क पर एक बकरे के ऊपर अन्नामलाई का चित्र टांग कर उसे काटकर जश्न मनाया और लोगों को बकरा बिरयानी खिलाई। जिस किसी ने यह घटना देखी-पढ़ी, वह विचलित हो गया।
मैंने भी जब वह समाचार देखा तो कलेजा फट-सा गया। सोचने लगा कि कैसे कह दूँ, अभी हम सभ्य समाज में रह रहे हैं ! व्यक्ति विशेष के प्रति ऐसी नफरत अकल्पनीय है । आप किसी की हर पर खुशी मना सकते हैं, किसी की जीत पर मिठाई बांट सकते हैं, लेकिन इस अवसर पर सरेआम एक जीव की हत्या निसंदेह बड़ा पाप है। लेकिन यह पाप करते हुए करने वाला मानता ही नहीं कि वह पाप कर रहा है । ऐसा इसलिए होता है कि उसमें यह चेतना ही विकसित नहीं हो सकी है कि वह गलत कार्य कर रहा है । मैंने कुछ ऐसे वीडियो देखें जब एक मुस्लिम बच्चा बकरे से लिपटकर रो रहा है कि उसे मत काटना।वह दहाड़ बार-बार कर रो रहा है और लोग उसे बकरे से अलग कर रहे हैं । यह दृश्य देखकर मुझे बहुत संतोष हुआ कि उस बालक के मन में अभी मनुष्यता है। उस के मन में करुणा है। उसे पता है कि इस जीव की हत्या की जाएगी इसलिए वह रो रहा है । उसे रोते हुए देखकर के दूसरे हँस रहे हैं । यह अपने आप में वीभत्स दृश्य है। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसे दृश्यों से हमें दो-चार होना पड़ता है। हमारे जैसे लोग ऐसी विसंगति पर कलम तो चला सकते हैं लेकिन इस अन्याय को खत्म नहीं कर सकते। हम तो सिर्फ यही कामना करते हैं कि यह समाज हिंसा से मुक्त हो। धार्मिक प्रथा के नाम पर पशुओं की बली रोकी जाए। यह काम तभी हो सकता है, जब देश में एक ऐसी सरकार आए, जो तमाम तरह के खतरे उठाकर पशु बलि-प्रथा को पूरी तरह से अवैध घोषित कर दे। मेरे जैसे करोड़ों लोग उसी महान दिन की प्रतीक्षा में हैं।

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