बाबू भैया की कलम से – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Fri, 22 Aug 2025 06:10:02 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 भाजपा में पुराने “बल्ब” बदलने का शुरू हुआ दौर https://samacharpacheesa.com/?p=16458 Fri, 22 Aug 2025 06:10:02 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=16458 छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अंतत: अपने मंत्री मंडल का पूर्ण गठन कर ही लिया। ना सिर्फ मंत्री मंडल का पूर्ण गठन किया बल्कि प्रदेश को एक मंत्री हरियाणा की तर्ज पर बोनस में दे दिया। अब मुख्यमंत्री सहित ये सभी 14 मंत्री प्रदेश के विकास में अपना योगदान देंगें। अभी हाल कल ही तीन मंत्रियों ने पद की गोपनीयता की शपथ ली। तीनों ही पहली बार के विधायक हैं। पहली बार में ही सत्ता का भागीदार बना दिया गया। अभी तक शासन का अनुभव नहीं है ,लेकिन अब लेंगें। इन तीन मंत्रियों को मिला कर अब मंत्रिमंडल में 7 मंत्री पहली बार के मंत्री हो गए। पूरी टीम में अगर हम प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री को नया माने तो 11 अन्यथा 10 मंत्री नए लोगों को बनाया गया है। शेष में सिर्फ रामविचार नेताम,केदार कश्यप,दयालदास बघेल पुराने नेता हैं, जिनके पास मंत्री परिषद का अनुभव है। बाकी सभी नए हैं। अनेक मंत्रियों ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर अपनी प्रतिष्ठा बनाई है। अजय चंद्राकर सहित मंत्री पद की योग्यता में परखे जा चुके लगभग 9 क्षमता वान पुराने मंत्री रहे सदस्य भी विधानसभा में बैठते हैं। उनको भी इस बात की प्रतीक्षा थी कि कब उनके मोबाइल की घंटी बजेगी। कुछ ने तो शपथ के लिए जरूरी तैयारियां भी कर ली थी। मोबाइल की घंटी ने धोखा दे दिया। घंटी बजी भी तो अब तक प्रशाशन -शासन के अनुभवहीन तीन सदस्यों के मोबाइल की बज गई। विपक्ष ने इसे बेवजह बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर कह दिया कि अनुभवी लोगों को छोड़ दिया गया। पुराने अनुभवी सदस्यों का अपमान कर दिया। यही भाजपा का असली चरित्र है। शायद सोचा हो कि रूठे लोगों को साध लिया जाएगा, तो कुछ रास्ता निकले। कुछ हंगामा बरपा हो जाए। पर कुछ खुल कर सामने अब तक नहीं आया। इतनी जल्दी आएगा भी नहीं। क्योंकि ये भाजपा है। इसमें विद्रोह बहुत सोच समझ कर ही किया जा सकता है। विपक्ष ने यह भी कहा नए लोग आखिर क्या कर पाएंगें। यह नहीं समझा गया कि जो यह बयान दे रहे हैं ,एक दिन वे भी राजनीति में नए रहे हैं। सबकी अपनी क्षमता होती है,ऊर्जा होती है मौका मिलने पर ही वह क्षमता उभर कर सामने दिखाई देती है। पहले भी मंत्री मंडल में 7 मंत्री नए और पहली बार के विधायक थे। सबने अपनी क्षमता का ठीक ठीक प्रदर्शन किया है। हां यह जरूर है कि कुछ मंत्री कुछ मायनों में असफल भी रहे हैं। बदनामी भी हुई है। लेकिन अधिकांश सदस्यों ने अच्छा प्रदर्शन भी किया है। वित्त मंत्री के रूप में ओ.पी.चौधरी ,विजय शर्मा,अरुण साव ने अपनी क्षमता का भरपूर व बेहतर प्रदर्शन किया है। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने एक अच्छा मंत्री मंडल देने का प्रयास किया है,जिसमें जातिगत समीकरण व संतुलन दिखाई देता है। पूरे 14 मंत्रियों में 7 यानि 50त्न ओबीसी वर्ग से हैं इसमें भी सातों अलग अलग जाति से चुने गए हैं। दो कुर्मी जाति से तो एक एक साहू,यादव,देवांगन,,राजवाड़े,जायसवाल जाति के सदस्यों को शामिल करके पूर्ण संतुलन बैठाया गया है। 2 अनु.जाति, 3 अनु.जनजाति, 2 सामान्य वर्ग को मंत्रिमंडल में शामिल कर सभी वर्ग को साधने का पूरा आधार बनाया गया है। मंत्री मंडल का सारा सस्पेंस अब खत्म हो गया है। अब तक विरोध खुल कर सामने नहीं आया है। लेकिन कल शपथ ग्रहण समारोह में कुछ नेताओं ने अनुपस्थित रह कर और कुछ लोगों ने थोड़ी देर रुक कर वापस जाकर अपना अप्रत्यक्ष विरोध प्रदर्शित जरूर किया है। जिसकी चर्चा भी हुई है। अजय चंद्राकर,अमर अग्रवाल, लता उसेंडी,रेणुका सिंह,राजेश मूणत,धरमलाल कौशिक,पुन्नूलाल मोहिले,और कुछ हद तक कांग्रेस से जोगी कांग्रेस के रास्ते भाजपा में शामिल हुए धर्मजीत सिंह भी मंत्री परिषद में अपना महत्व चाहते थे। सपना सबका टूट गया है। अब उनका अगला कदम क्या होगा यह देखने वाली बात होगी। जानकर लोगों का कहना है कि भाजपा में खुल कर विरोध या विद्रोह करने की स्थिति नहीं बन सकेगी। यह जरूर है कि विधानसभा के अगले सत्र में भाजपा सरकार को दो -दो विपक्ष का सामना करना पड़ सकता है ,इसकी संभावना है। कुल मिला कर भाजपा हाई कमान ने यह निर्णय लेकर प्रदेश वासियों व अपने कार्यकर्ताओं को साफ साफ संकेत दे दिए हैं। अगला चुनाव वोट बैंक के सबसे बड़े ओबीसी वर्ग को लक्ष्य बना कर ही लड़ा जाएगा। नए लोगों को महत्व देकर यह भी संकेत दे दिया है कि भाजपा अब पीढ़ी परिवर्तन की दिशा में बढ़ रही है। इसे कोई रोक नहीं सकता। जहां जिसकी उपयोगिता होगी वैसे ही उसका उपयोग किया जाएगा।

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सरकार” का वर्चस्व बनाम मजबूर सरकारें https://samacharpacheesa.com/?p=16358 Fri, 01 Aug 2025 05:50:53 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=16358 रावतपुरा सरकार के नाम से प्रसिद्ध रविशंकर का साम्राज्य व उसकी धोखाघड़ी व गड़बड़ी देख कर भी श्रद्धालुओं की आंखें नहीं खुल रही हैं। इसके पहले एक नहीँ अनेक बाबाओं की पोल पट्टी खुल चुकी है। अनुयायियों में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं दिखाई देती। आखिर यह मायाजाल है क्या? करोड़ों अरबों की सम्पति के मालिक ये यूं ही नहीं बन रहे,कोई तो इसके पीछे राज मौजूद है। कुछ बाबा अच्छे भी हो सकते हैं। हम सभी पर प्रश्न नहीं उठा रहे हैं। लेकिन अधिकांश को हम देख रहे हैं कि देखते ही देखते देश भर में इनकी जमीन जायदाद की सीमा बढ़ती ही जा रही है। लगभग सभी राज्यों की सरकारें मिट्टी के मोल इनके आश्रम,अस्पताल,स्कूल, कालेज के लिए जमीन न्योछावर कर, अपने को धन्य समझ रहीं है। कई मुख्य मंत्री,मंत्री,और उनसे ऊंचे ओहदे वाले पदाधिकारी भी इनकी शरण में देखे जाते हैं। इसी कारण आम जनता सोचती है कि पहुंचे हुए बाबा है। जनता भी इसी भ्रम में चरणों में ढेर हो जाती है। बड़े लोगों का इन बाबाओं से रिश्ता क्या है और क्या कहलाएगा? यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ चर्चा प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों के बीच जरूर सुनी जाती है कि इन बाबाओं के साम्राज्य की बढ़ोतरी में कुछ बड़े लोगों के काले धन का भी हिस्सा है। सच झूठ तो बहुत बड़ी हिम्मती जांच से ही पता चल सकता है। रामरहीम डेरा सच्चा सौदा,आशाराम बापू, जैसे अनेक नाम सामने आ चुके उसके बाद भी अनुयायियों को समझ नहीं आ रही है कि उनके इस अंधी दौड़ के कारण देश के लोगों का क्या क्या लूटा जा रहा है। कोई नहीं सोच रहा है कि आखिर ये बाबा, सन्त,महात्मा, युग पुरुष के रूप में पूजे जाने वाले सामान्य लोग इतना बड़ा साम्राज्य कैसे और किसकी मदद से खड़ा कर लेते हैं। हर क्षेत्र के बड़े बड़े उद्योगपतियों, हर दल के बड़े बड़े नेताओं को इनका अनुयायी बनते व उनके सामने शीश झुकाते देखा जाता है। यही कारण भी बन जाता है कि लोग सोचते हैं कि इतने बड़े बड़े लोग जब इनके अनुयायी हैं तो कोई खास बात ही होगी। एक कथाकार हैं जो एक स्वामी से अपने गलत प्रवचन के लिए नाक रगड़ कर माफी भी मांग चुके हैं। उन्हें देखने -जानने वालों को अच्छी तरह मालूम है कि वे कल क्या थे,और आज क्या हैं। उनको बुलाने वाले आयोजक उनके सहारे अब राजनीति के माहिर नेता बन चुके हैं। कभी आसपास फटकने को तरसता यह आयोजक आज प्रदेश के बड़े बड़े नेताओं व मंत्रियों की करीबी हासिल कर चुका है। लालच नेता को यह हुआ कि आयोजक ने हजारों की भीड़ के बीच इन बड़े लोगों की महाराज से भेंट करवा कर उनके मुखार बिंद से इन नेताओं की प्रसंशा करवा दी। कुछ दल विशेष को राम राम करवा दिया। बात तो कई हैं पर अभी हाल रविशंकर महाराज जो अपने को सरकार कहलाना पसंद करते हैं (राउतपुरा सरकार) के बड़े कारनामे का खुलासा हुआ है। अखबारों के सारे रंग राउतपुरा के कारनामों के रंग से रंगे हुए हैं। आये दिन नए खुलासे हो रहे हैं। महाराज ने धर्म के नाम पर कई संस्थान खड़े कर लिए। आश्रम बन गया। कॉलेज ,और मेडिकल कॉलेज भी खुल गया। मेडिकल कॉलेज खोलने जरूरी प्रमाणों के लिए क्या क्या नहीं किया। कॉलेज के निरीक्षण को अपने तरीके से सेटिंग करवा लिया। बड़े बड़े सरकारी संस्थानों के डॉक्टर, विशेषज्ञों के साथ केंद्रीय स्वास्थय मंत्रालय से आये लोगों को भी सेटिंग में शामिल कर लिया। टीम के सामने गबरू जवानों के साथ बुजुर्ग नकली मरीजों की नगद भुगतान कर भरती करवा कर निरीक्षण की खाना पूर्ति करवा ली। अब जनता सोचे कि ये महाराज या बाबा जिस नाम से भी पुकार लो, असल में क्या कर रहे हैं। इनके असली काम प्रवचन करना या अपने भक्तों को संकट से उभारना है या जनता के समर्थन व बड़े बड़े लोगों तक पैठ बना कर अपना उल्लू सीधा करना है। अखबार ने रविशंकर महाराज के नाम के साथ सभी केंद्रीय मंत्रालय के अधिकारियों व सभी संलग्न अधिकारियों व डॉक्टरों के संस्थानों सहित आज ही सूची भी प्रकाशित की है। जनता के सामने बाबाओं-महाराजों की सच्चाई को उजागर कर दिया है,करते आ रहे हैं। अब जनता जागे तब कुछ बात बने। और एक बात कि देश भर के मंदिरों में गरीब-अमीर जनता अपनी श्रद्धा के अनुसार चढ़ावा चढ़ाती है। यह राशि अरबों-खरबों तक पहुंच गई होगी,उनका सदुपयोग जनहित की योजनाएं बना कर भारत की गरीब जनता के बीच किया जाए। केंद्र की सरकार को इस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। बाकि जो है वो तो हैइये है।

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भाजपा सरकारें धर्मान्तरण विरोधी कानून क्यों नहीं बनाती ? https://samacharpacheesa.com/?p=16340 Fri, 25 Jul 2025 06:04:15 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=16340 बस्तर के राजा प्रवीरचंद भंजदेव जब तक जीवित रहे,कभी किसी आदिवासी ने अपने धर्म का त्याग नहीं किया था। राजा साहब आदिवासियों को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि अपना धर्म अपनी परम्परा ही हमारी सांस्कृतिक सम्पति है। यही हमारा सम्मान है। यही हमारा जीवन है।जीवन जीने का तरीका भी यही है। अपने धर्म व परम्परा के साथ ही हमारा मानव जीवन है। उनके रहते आदिवासी जन के साथ बस्तर क्षेत्र की समस्त जनता अपने धर्म व परम्पराओं का निर्वहन निर्विघ्न रूप से कर अपना जीवन जीते रहे। समस्या तब आई जब एक घटना में राजा प्रवीर चंद भंजदेव की गोलीकांड में हत्या कर दी गई। आदिवासियों के बीच नेतृत्व शून्यता आने से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। आदिवासी अपने राजा का विकल्प ना पा कर किसको मुखिया माने की स्थिति में आ गया। यही जो गैप बना उसी का फायदा एक तरफ नक्सलियों ने तो दूसरी तरफ ईसाई मिशीनरीयों ने भरपूर उठाया। दोनों ने ही अपना प्रचार प्रसार इसी शून्यता का लाभ उठाते हुए आदिवासियों के बीच खूब किया। आदिवासी जो नए नेतृत्व की तलाश में था कहीं ना कहीं भ्रमित होने लगा। यहीं से नक्सलियों के शनै:शनै: क्षेत्र में पैठ बढ़ाने व मिशिनरियों को आदिवासियों को रिझाने का मौका भरपूर मिला। चंगाई सभा व प्रार्थनाओं की श्रृंखलाएं शुरू हुई। चर्चों का जगह जगह निर्माण धड़ल्ले से शुरू हुआ। आदिवासियों को सरकारी विकास की घोषणाओं के बाद भी जल-जंगल और जमीन के मामले में जहां खड़े थे वहीं खड़े रहने की अपने तरीके से वजहें बताई जाने लगी। सरकारों के खिलाफ भीतरी तौर पर माहौल बनाने का बड़ा खेल शरू हुआ। तत्कालीन किसी भी सरकार ने इस मुद्दे पर कोई गंभीर संज्ञान नहीं लिया। मध्यप्रदेश के दौर से लेकर छतीसगढ़ बनने तक। धर्मान्तरण के खिलाफ कोई आवाज उठी हो,आंदोलन या कड़ा प्रतिकार हुआ हो,ऐसा देखने सुनने में नहीं आया। जब छतीसगढ़ की पहली अपनी सरकार बनी। आदिवासी के नाम पर अजित जोगी प्रथम मनोनीत मुख्य मंत्री बने। सोचा गया कि अब आदिवासियों का निश्चित रूप से उद्धार होगा। लेकिन अंतराल में वे आदिवासी से ज्यादा ईसाई बने हुए दिखे। धर्मान्तरण का दौर तेजी से चलने की खबरें आने लगी। विपक्ष ने आरोप लगाने शुरू किये कि जोगी ईसाई मिशनरी को बढ़ावा दे रहे हैं। धर्मान्तरण को बढ़ावा दे रहे हैं। भाजपा ने निश्चित रूप से विरोध दर्ज कराया लेकिन वह प्रभावशाली नहीं रहा। 2004 में धर्मान्तरण का किंचित विरोध करने वाले दल भाजपा की खुद की सरकार विषम परिस्तिथियों में बनी। डॉ. रमनसिंह प्रथम निर्वाचित मुख्य मंत्री बने। 15 साल राज किया लेकिन धर्मान्तरण रोकने के लिए कोई कानूनी प्रावधान करने से गुरेज करते रहे। धर्मान्तरण के खिलाफ इन 15 सालों में भाजपा ने कोई बडा आंदोलन या प्रदर्शन नहीं किया। पूरा 15 साल का कार्यकाल सिर्फ शासन का आनंद लेने में बीत गया। बातें खूब होती रहीं, धर्मान्तरण भी खूब होता रहा। 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। धर्मान्तरण चूंकि कांग्रेस के एजेंडे में नहीं है , इसलिए पूरे 5 साल कांग्रेस की इस बारे में आवाज नहीं सुनाई दी। 15 साल के बाद भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर हमले करना शुरू किया। धर्मान्तरण को बड़ा मुद्दा किसी खास योजना की तहत बनाया गया। लगातार हमलावर हुई भाजपा ने शनै:शनै: मुद्दे को राई से पहाड़ बनाने में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी। अब तो ऐसा लगता है जैसे जैसे भाजपा की साय सरकार आगे बढ़ रही है,वैसे वैसे भाजपा धर्मान्तरण पर आक्रामक रुख अपना रही है। उसके साथ उनके साथी संगठन विश्व हिन्दू परिषद,हिन्दू जागरण मंच,बजरंग दल व अन्य इसी तरह के अनुसांगिक संगठन आये दिन इसी समाज के चंगाई सभा व प्रार्थना बैठकों पर आक्रामक होती जा रही है। आने वाले चुनाव तक यह किस रूप तक पहुंचेगी कहा नहीं जा सकता। भाजपा अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे पर शिद्दत से काम कर रही है। आदिवासियों को साधने पर उसकी पैनी नजर है। उनके अनुसार आदिवासी हिन्दू है,सनातनी हैं,यह सच भी साबित किया जा सकता होगा। लेकिन आदिवासियों में अधिकांश आदिवासी अपने को हिन्दू नहीं मानते,अनेक मानते हैं कि वे हिन्दू ही हैं। इस मतभेद का भाजपा को भविष्य में अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए सामना करना होगा। मुद्दे का केंद्र सरकार ही संविधान संशोधन के द्वारा हल निकाल सकती है। जब इस बात का प्रयास होगा तब आदिवासी समाज में कैसी और क्या प्रतिक्रिया होती है यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल यही कहा जा सकता है कि रमन व साय सरकार कोई ऐसा कानून नहीं बना पाई जिससे धर्मान्तरण पर रोक लग सके। सिर्फ जूदेव परिवार के प्रयासों के सहारे इसका हल निकलना मुश्किल है।

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अघोषित आपातकाल या आपातकाल अपनी बात, अपनी अपनी सोच https://samacharpacheesa.com/?p=16194 Fri, 27 Jun 2025 07:08:30 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=16194 भाजपा ने 50 साल पुरानी आपातकाल की भूली हुई यादों को फिर से जिंदा करने हर साल 25 जून को सरकारी तौर पर देश भर में संविधान हत्या दिवस मनाने का बड़ा फैसला किया है। उनका कहना है कि नई पीढ़ी इस घटना को नहीं जानती। उसे जानना चाहिए कि देश में किसने और किस पार्टी की नेता ने संविधान की हत्या की थी। 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया था। नागरिकों के समस्त मौलिक अधिकारों को समाप्त कर दिया था। प्रेस पर नियंत्रण करते हुए उस की आजादी पर बंदिश लगा दी थी। कोई भी समाचार सरकारी अधिकारियों व पार्टी नेताओं की सहमति के बगैर प्रकाशित नहीं हो सकता था। अदालतें भी दबाव से बची नहीं थीं। अधिकारी व कांग्रेस नेता तानाशाही पर उतर आये थे। जनता को भी परेशानी झेलनी पड़ी। हजारों -हजार विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। सभी दिग्गज विपक्षी नेताओं की आवाज दबा दी गई। जेलों में अनेक यातनाओं को झेलते हुए सभी नेतागण 22 महीने अभिव्यक्ति की आजादी से दूर कर दिए गए। जनता में जिसने भी आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाई उनमें से अधिकांश को जेल भेज दिया गया,या उन पर घोर अत्याचार किया गया। अन्याय अत्याचार तानाशाही का ऐसा दौर चला कि लोग उफ्फ भी ना कर पाए। आपातकाल लगाने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विश्वस्त नेताओं व खुफिया एजेंसियों की खबरों पर यकीन करके आपातकाल की घोषणा की थी। उनको बताया गया कि देश के बड़े व प्रभावी विपक्षी दल के नेता किसी बड़े आंदोलन को अंजाम देने की फिराक में हैं। इस आंदोलन से देश में आंतरिक युद्ध की स्थिति पैदा होने वाली है। यह भी कहा गया कि आपकी कुर्सी को भी खतरा है। दरअसल हुआ यह था कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जिन राजनारायण ने इलाहाबाद से चुनाव लड़ा था,उन्होंने चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। इस संदर्भ में एक याचिका उत्तर प्रदेश की उच्च न्यायालय में लगाई थी। उस याचिका में इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला आ गया जिसमें श्रीमती गांधी को चुनाव लडऩे की भी पाबंदी का फैसला था। विषम स्थितियों को देखकर श्रीमती गांधी ने आपातकाल लगाया। संविधान के अनुच्छेद 352 में प्रावधान था कि देश में आंतरिक अशांति की स्थिति में आपातकाल लगाया जा सकता है। उसी का प्रयोग करते हुए इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया। सीधे तौर पर देखने में यह अपनी गद्दी को बचाने की कवायद ही नजर आती है। यहां तक सब कुछ संविधान में प्रावधानों के अनुसार था। परन्तु जिस तरह अपमानजनक ढंग से विपक्षी नेताओं को चुन चुन कर जेल के सीखचों के पीछे भेजा गया। यातनाएं दी गई,अमानवीय व्यवहार किया गया। यहां तक कि जेल में बंद रहने के समय सम्बन्धियों की मृत्यु में भी पेरोल नहीं दिया गया। जनता व प्रेस को भी घेरे में लिया गया,बंदिशें लगाई गईं। देश में अराजक स्थिति पैदा हुई। मनमानी व तानाशाही पूर्ण रवैया अपनाया गया। वह तत्कालीन जनता को नहीं भाया। जनता की नाराजी की समझ बनती उसके पहले ही हालात बिगड़ चुके थे। इंदिरा गांधी ने स्थिति की नाजुकता को समझते हुए,आपातकाल वापस लेने की घोषणा कर दी। साथ ही आम चुनाव की घोषणा कर दी। तब तक बात बिगड़ चुकी थी। हवा उल्टी बहने लगी कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हार गई। जीते हुए सारे दलों ने मिलकर जनतादल का गठन किया। जनता दल में विचारधारात्मक रूप से अलग अलग विचार रखने वाले नेता इकठ्ठे हुए थे। एक मंच भाया नहीं। परिणाम वही आया जो आना था। कई प्रयोगों व नेतृत्व बदलने के खेल के बाद अन्तत: जनतादल का प्रयोग विफल साबित हुआ। इसका पूरा फायदा लेते हुए इंदिरा गांधी फिर से कांग्रेस सरकार सत्ता में लाने में सफल हुई। फिर इंदिरा गांधी का दौर शुरू हुआ जो उनकी हत्या तक जारी रहा। कई कवायदों के बाद 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अपने दम पर पूरी ताकत से केंद्र में सरकार बनाई। कांग्रेस का कहना है कि तब से अलग तरह की बदले की राजनीति का सूत्रपात हुआ। अघोषित आपातकाल चलाया जा रहा है। तब के आपातकाल से बदतर स्थिति आज है। बदला लिया जा रहा है। इसी बदले की राजनीति के चलते भाजपा 50 साल बाद जिस आपातकाल को जनता ने भुला दिया था। उसे याद दिलाने संविधान की हत्या दिवस \ का नाम देकर एक राजनैतिक माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। शिवसेना के संजय राउत जैसे नेता आपातकाल को संविधान के अनुरूप किया गया काम बताते हैं। भाजपा इसे संविधान की हत्या बता रही है। लोग इस मुद्दे को लेकर दो विचारों में विभक्त हैं। कुछ कह रहे हैं इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र व संविधान की हत्या की थी। कुछ कहते हैं कि ज्यादतियों की खबरों के बीच आपातकाल ने देश में अनेक सुधार भी किये थे। जैसे कोरोना के समय प्रदूषण मुक्त स्थिति बनी तो गंगा साफ हो गई थी। उसी तरह आपातकाल लगने से अनेक अपराध व बुराइयां उस वक्त समाज से खत्म सी हो गई थी। अपराध नियंत्रित थे। अपनी अपनी बात अपने अपने विचार।राजनीति अपनी जगह है पर कुछ रूप में आपातकाल का अनुभव खराब रहा तो कुछ मायनों में अच्छा भी रहा।

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गौठान हो या गौधाम, गौधन की चिंता करती हैं छत्तीसगढ़ की सरकारें https://samacharpacheesa.com/?p=16155 Fri, 13 Jun 2025 06:50:27 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=16155 प्रदेश व देश की सरकार के लिए भी और हर भारतीय व्यक्ति के लिए गौधन की रक्षा की प्राथमिकता से सोच होना चाहिए। केंद्र सरकार ने कोई केंद्रीय बड़ा उद्दम इस के लिए किया हो ऐसा अभी कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन कुछ प्रदेश सरकारें अपने प्रयासों से गौमाता की चिंता कर रहीं हैं। यह भारतीय समाज के उत्साह का विषय है। इन राज्य सरकारों में सौभाग्य से हमारी छत्तीसगढ़ की सरकारों ने अच्छा काम किया है और कर रहे हैं। बिना शक कहा जा सकता है कि इसकी शुरुवात कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने की। जिसने गौठान निर्माण-गोबर खरीदी-गौमूत्र खरीदी-नरवा-गरुवा-घुरुवा-बारी और अनेक योजनाओं के माध्यम से गौ-संरक्षण का काम शुरू किया। इसे देख कर कुछ राष्ट्रीय स्वयं संघ सदस्यों ने अपने गौरक्षा के एजेंडे की भावना के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से उनके सरकारी आवास में भेंट कर उन्हें साधुवाद भी दिया था। इस संबंधी समाचार अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित भी हुआ। कांग्रेस सरकार अपनी योजना की सार्थकता से उत्साहित हुई। पीछे देखें तो 15 साल के रमन राज -अजित जोगी राज में इस पर सिर्फ और सिर्फ चर्चा होती रही। कुछ हुआ नहीं। सबसे महत्वपूर्ण पहलू इस योजना का यह रहा कि मुख्य मंत्री भूपेश बघेल ने इसे गौधन सुरक्षा के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना दिया। इसे ग्रामीण विकास के आर्थिक पहलू से जोड़ दिया। कई गौठानों में गोबर से कंडे-अगरबत्ती-दीया-गोबर स्टीक व अन्य अनेक प्रोडक्ट बनाए जाने लगे। ग्रामीणों को तकनीकी सहयोग करने वालों ने इसे ऑनलाइन मार्केट से भी जोड़ दिया। ये उत्पाद ऑनलाइन बिकने लगे थे। ग्रामीणों की आय में इजाफा होने लगा था। इसकी लोक प्रियता बढऩे लगी। साथ ही गौमाता की सुरक्षा भी आसानी से होने लगी। सड़कों पर आवारा कहलाने वाले मवेशियों की आमद घटने लगी। पशुओं की सड़क दुर्घटनाओं में दुर्भाग्यजनक मौतों में कमी आने लगी। इस बढ़ते दौर में लोकप्रियता चरम पर जाने लगी। अचानक इसपर राजनीति की नजर लग गई। बड़े बड़े खेल होने लगे। इस योजना को बदनाम करने का बीड़ा उठाया गया। बदनाम करने का पहले ही वार के रूप में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप विपक्षी दल ने योजना बद्ध तरीके से लगाने सिलसिलेवार लगाने शुरू किये। तीर निशाने पर बैठा। बात जनता के बीच शुरू हो गई। गोबर पानी में बह गया जैसे सामान्य आरोप भी कारगर साबित हुए। ये जनता है,कब क्या और क्यों सोच ले कहना मुश्किल है। भूपेश सरकार की यह महत्ती योजना अपनी निर्णायक स्थिति तक पहुंचने के पहले ही बदनाम कर दी गई। बदनामी इतनी हुई कि, सरकार ही चली गई। आरोप लगाने वाली पार्टी की सरकार आ गई। आते ही अपने आरोपों को सही साबित करने की सोच से गौठान बन्द करवा दिए गए। गोबर खरीदी,गौमूत्र खरीदी-गोबर के बायो प्रोडक्ट बन्द कर दिए गए। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को मददगार इस योजना का लगभग दम निकाल दिया गया। लगा वर्तमान सरकार ने विपक्ष में रहते सही आरोप लगाए थे। लगभग डेढ़ साल तक योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। अब अचानक वर्तमान सरकार को इस योजना के बन्द करने के नुकसान समझ में आने लगे हैं। अब सरकार ने इस योजना को नए अवतार में प्रदेश में उतारने की ठानी है। पहले इसे गौ- अभ्यारण की योजना बनाया। अब इसका नया नामकरण हुआ है गौधाम. सरकार के एक प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल में बताया कि दोनों अलग अलग योजनाएं हैं। अभ्यारण 110 एकड़ में फैले परिसरों में बनेगा। उसका स्वरूप भले ही नहीं बताया गया लेकिन भव्य होगा और अनेक सुविधाएं गौधन के लिए यहां होगी यह कहा गया। गौधाम उससे छोटी योजना है इसका विस्तार प्रदेश के हर ब्लाक में होगा बताया गया। बजट बन गया है। जमीनों को फिर से चिन्हित कर लिया गया है,या पुराने ही गौठानों के स्थान पर बनाए जायेंगें यह अभी जनता के दरबार में सामने नहीं आया है। जनता के धन के खजाने से फिर से बड़ा खर्च किया जाएगा।यह जरूर समझ आने लगा है। इसमें भी भ्रष्टाचार होगा या नहीं होगा यह अभी नहीं बाद में सामने आएगा। गौठान हो या गौधाम एक बात समझ में आ रही हैं कि कहीं ना कहीं भूपेश सरकार की योजना का वजन वर्तमान सरकार को भी समझ में आ गया है। इसीलिए नए सिरे से अच्छी तरह योजना को भले ही नए अवतार में सही चलाने की सोच बनाई गई है। इस सोच का स्वागत होना चाहिए। बधाई पूर्ववर्ती व वर्तमान सरकार को जिन्होंने इस घोर कलयुग में सबसे दुर्भाग्यजनक़ स्थिति भोग रहे गौधन की किसी भी रूप में चिंता तो की।

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अब भ्रष्टाचार मुक्त विकास ही लिखेगा नक्सल क्षेत्र का भाग्य https://samacharpacheesa.com/?p=16097 Fri, 30 May 2025 05:41:06 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=16097 बस्तर जिले को केंद्र सरकार ने नक्सल मुक्त क्षेत्र घोषित करते हुए वहां नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण दी जा रही सारी सुविधाओं को व करोड़ों के ग्रांट को बंद कर दिया है। 2022 के बाद से ही कांकेर,कोंडागांव,बस्तर को पूर्ण, तथा सुकमा,बीजापुर, नारायणपुर को आज अखबारों की खबर के अनुसार आंशिक रूप से 2022 के बाद से नक्सलमुक्त क्षेत्र माना गया है। बस्तर की तो आज बाकायदा घोषणा हुई ,लेकिन अन्य ये क्षेत्र कब नक्सल मुक्त घोषित हुए यह समझ नहीं आया। अखबार में बाकायदा एक नक्शा प्रकाशित करते हुए यह बताने का प्रयास किया गया है कि नारायणपुर का आधा क्षेत्र ,बीजापुर का बड़ा भाग ,सुकमा का अधिकांश क्षेत्र, तथा कांकेर का आंशिक , कोंडा गांव, बस्तर का इलाका पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो चुका है। शेष हैं तो नारायणपुर,सुकमा,दंतेवाड़ा,बीजापुर का कुछ हिस्सा है। जहां नक्सलियों की आमद रफ्त बनी हुई है। वे भी अब फ़ोर्स के घेरे में हैं। जिसके कारण ही केंद्र सरकार ने दावा किया है कि देश से 2026 मार्च तक नक्सलियों को समाप्त कर दिया जाएगा। नक्शे को सच माने तो हमारे प्रदेश में मात्र 30 प्रतिशत ही प्रभावित क्षेत्र बचा हुआ है। जिसे खाली करने के लिए हमारी फ़ोर्स दिनरात एक किये हुए है। हम सब को इस खबर से निश्चित ही खुश होना चाहिए। खाली कराए गए अनेक इलाकों में पुलिस कैम्प बनाने में सफलता हासिल की गई है। कुछ ऐसे इलाक़े भी खाली कराने में फ़ोर्स सफल हुई है, जिसमें कभी नसालियों का एकतरफा वर्चस्व हुआ करता था। यह कहा जा सकता है कि वहां शासन की पहुंच पकड़ तक नहीं थी। नक्सलियों का फरमान चलता था। आज प्रशासन की पकड़ है। कभी हम पर हावी नक्सली अपनी जान की खैर मनाते घने जंगलों में भागते फिरने व छुपने मजबूर हो गए हैं। अब हमारे जवान उन पर हावी हैं। बहुत हुई नक्सलियों की सुनवाई अब तो उनकी शांति की गुहार की कोई सुनवाई ही नहीं है। नक्सलियों की वार्ता के पांच प्रस्ताव को राज्य व केंद्र सरकार खारिज कर चुके हैं। अब राज्य व केंद्र सरकारें सख्त है। नक्सलियों के लिए एक ही बात बची है कि या तो चुपचाप बिना शर्त समर्पण करों या मरो या भागो। बस्तर इलाके को सम्पूर्ण नक्सल मुक्त करने का जिम्मा फ़ोर्स के 53000 जवानों ने उठा रखा है। शासन का पुलिस प्रशासन को सीधे आदेश हैं या तो समर्पण कराओ या मार गिराओ। अभी हाल एक अनुमान के अनुसार बस्तर इलाके के बीहड़ों में करीब 2000 नक्सली मौजूद हैं, जिसे सुरक्षा बलों ने घेर रखा है। कब कहां उन्हें मार गिराया जाए या समर्पण को मजबूर कर दिया जाए ,यह खबर कभी भी सामने आ सकती है। नक्सलियों के सामने अब इसके सिवाय कोई चारा नहीं दिखाई देता कि,या तो बिना शर्त समर्पण कर दें या बलों के द्वारा मरने तैयार रहें। नक्सल लीडर वासवराजु की मौत के बाद से नक्सलियों के सामने सक्षम नेतृत्व का भारी संकट पैदा हो गया है। दिशाविहीन नक्सली इधर उधर भटकने को मजबूर हो गए हैं। कोई रणनीतिक फैसला नहीं कर पा रहे हैं। क्या करें क्या ना करें इस उहापोह की स्थिति में हमारी फ़ोर्स से घिरे हुए अपनी भविष्य की दशा का इंतजार कर रहे हैं। नया समीकरण यह बना है कि जो ग्रामीण हमारी फ़ोर्स को देख कर भाग जाते थे आज वे ना सिर्फ फ़ोर्स का स्वागत कर रहे हैं बल्कि पूरा सहयोग भी करने आगे आ रहे हैं। अब नक्सली किसी भी गांव में खुले आम मीटिंग कर लेने से वंचित हो गए हैं। हर गांव में उन्हें अपने पराये की पहचान कठिन हो गई है। विश्वास का भारी संकट पैदा हो गया है। यही हमारी फ़ोर्स की ताकत बन गया है। नक्सलियों की एक एक गतिविधियों की फ़ोर्स को जानकारी हो रही है। घेरने में आसानी हो रही है। ग्रामीण युवाओं का नक्सलियों के प्रति आकर्षण कम ही नहीं लगभग खत्म सा हो गया है। यही आकर्षण अब फ़ोर्स के प्रति ज्यादा दिखाई दे रहा है। नक्सलियों का नेटवर्क लगभग खंडित हो गया है। हम हमारे प्रदेश को नक्सल मुक्त करने के बहुत ही करीब हैं। जरूरत अब है तो सिर्फ इस बात की है कि केंद्र व राज्य मिल कर डबल इंजिन की ताकत का इस्तेमाल करें। जहां जहां हम क्षेत्र को मुक्त कराते जा रहे हैं वहां वहां पूरी ईमानदारी के साथ भ्रष्टाचार मुक्त विकास कार्य तत्काल बिना देरी किये शुरू कर दें। पक्की सड़कें,नलजल,संचार,अस्पताल,राशन दुकानें ,स्कूल ,आश्रम,छात्रावास बनाना चालू हो जाए। इस पर सरकार के मुखिया स्वयं निगरानी रखें। अपने मंत्रिमंडल को भी कहें कि जब जब दौरे पर जाएं इस मुक्त क्षेत्रों की देखरेख पूरी ईमानदारी से करें। ईमानदारी का शब्द के इस्तेमाल का अर्थ यह है कि इन क्षेत्रों में यदि विकास कार्यों में भी भ्रष्टाचार हुआ तो फिर भगवान ही मालिक होगा।

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नक्सल उन्मूलन के साथ और प्रगति करेगा प्रदेश https://samacharpacheesa.com/?p=16038 Fri, 23 May 2025 06:17:46 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=16038 प्रदेश में बहुत खुशी की बात यह हो रही है कि अब हमारे नक्सल क्षेत्र से जवानों के शहादत की नहीं लगातार नक्सलियों के मौतों की खबरे आती हैं। अभी कल ही हमारे प्रदेश की नक्सलियों से रक्षा करने वाले डीआरजी के जवानों ने नक्सलियों के कोर ग्रुप के खूंखार लीडर गगन्ना उर्फ नम्बला केशव उर्फ वासव राजू समेत 27 नक्सलियों का काम तमाम कर दिया। लगातार 50 घंटे पैदल चलकर फ़ोर्स के जवानों ने यह अभूतपूर्व कारनामा कर दिखाया। वासव राजू पर सरकार की ओर से डेढ़ करोड़ रुपये का इनाम था। वासव राजू नक्सलियों का योजनाकार (आपरेशन हेड) नेता था। वासवराजु के शव की पहचान उसके साथ काम कर चुके आत्मसमर्पित नक्सलियों से कराई गई । फ़ोर्स के पास राजू की पुरानी तस्वीर थी। इसलिए पहचान में दिक्कत थी। यह मुठभेड़ अबुझमाण्ड के अबूझ गहन जंगलों में हुई। जवानों ने 27 नक्सलियों को मार कर यह साबित कर दिया कि हमारे लिए कोई भी स्थान अब अबूझ नहीं है। नक्सलियों को अबुझमाण्ड के जंगलों में घेरने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत व सटीक इरादे के साथ 50 घंटे पैदल चल कर यह सफलता हासिल की है। माना जाता है कि वासव राजू के मारे जाने की पुष्टि होने के बाद अब इस क्षेत्र में या यूँ कहें कि नक्सलियों के पास नेतृत्व का अभाव हो गया है। नक्सलियों में नेतृत्व विहीनता के चलते पहले से अधिक घबराहट का अंदेशा है। ऐसी स्थिति में फ़ोर्स को और कामयाबी मिल सकने की उम्मीद है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सभी मृत नक्सलियों के शव बरामद किये जा चुके हैं। कररेगुड़ा की पहाडिय़ों पर मिली कामयाबी के बाद लगातार मिल रही कामयाबी से फ़ोर्स में भारी उत्साह है। नक्सली भागने -छुपने या मरने की स्थिति में पहुंच गए हैं। मुकाबला करने की हिम्मत टूट रही है। एक के बाद एक इलाके में हमारी फ़ोर्स का कब्जा होता जा रहा है। गहन नक्सल क्षेत्र में नक्सलियों की सफाई होती जा रही है। हम विश्वास कर सकते हैं कि आने वाले 2026 में नक्सल समाप्ति का लक्ष्य पूरा हो जाएगा। नक्सल लीडरों में अब चंद ही योजनाकार व सेंट्रल कमेटी के मेंबर नेता शेष बचे हैं। उनको घेरे में लेने फ़ोर्स हर संभव प्रयास कर रही है। फ़ोर्स के जवान बधाई के पात्र है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब इस संकल्प को सार्वजनिक किया तो अधिकांश लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई सरकार इस लक्ष्य को पा सकती है। चार माह के एक्शन व बड़ी संख्या में मारे जा रहे नक्सलियों की सूचना ने उस धारणा को बदलने का काम किया है। केंद्रीय सरकार के संकल्प की मॉनिटरिंग जिस तरीके से प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय व गृह मंत्री विजय शर्मा कर रहे हैं,और लगातार सफलता मिल रही है,तो कहा जा सकता है कि जल्द ही हमारा बस्तर नक्सल मुक्त होकर देश दुनिया के पर्यटन के नक्शे में अहम स्थान बना लेगा। लगने लगा है कि हमारा बस्तर फिर एक बार चहकेगा, मुस्कुराएगा, गुनगुनएगा। अपनी आदिवासी संस्कृति से , गीत संगीत, नृत्य से दुनिया को आकर्षित करने की स्थिति में होगा। उसकी कोटमसर की गुफाएं, अदभुत जलप्रपात ,वर्जिन जंगल देश विदेश के पर्यटकों से फिर आबाद होंगें। खूंखार जानवरों से आदिम जाति के आपसी सामंजस्य व प्रेम की चर्चाएं फिर छिड़ेंगी। आदिवासी क्रांतियों की फिर चर्चा होगी। उनकी जीवन शैली पर रिसर्च होने शुरू होंगें। पर्यटन बढ़ेगा तो देश -दुनिया की चर्चा में आएगा हमारा प्रदेश। राजस्व में बढ़ोतरी होगी। खुशहाली बढ़ेगी। इतनी खुशिया सिर्फ नक्सल उन्मूलन के संकल्प के पूरे होते ही हमें मिलने वाली हैं। ऐसा सपना अब राज्य की जनता भी देखने लगी है। केंद्र सरकार ,प्रदेश सरकार और नक्सलियों से आये दिन दो-दो हाथ कर रहे जवानों को एक एक घटना के बाद प्रशंसा मिल रही है। प्रशंसा के पात्र वे पर्दे के पीछे के लोग भी हैं जो नक्सली नेताओं के मूवमेंट की पल पल की जानकारी हमारे अधिकारियों के माध्यम से जवानों तक उपलब्ध कर रहे है जिनके कारण फ़ोर्स सटीक ऑपरेशन चला रही है। लोगों का कहना है कि अगर नक्सलियों का समूल नाश का सपना सच हो गया तो प्रदेश की जनता का आकर्षण भाजपा की प्रदेश सरकार व केंद्र सरकार के प्रति बढ़ेगा जो उसे राजनैतिक लाभ भी पहुंचाएगा।

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प्रदेश में शराब की ताकत और सरकारों की मजबूरियां https://samacharpacheesa.com/?p=15774 Wed, 02 Apr 2025 05:46:38 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=15774 शराब ना बेचें तो प्रदेश के विकास का क्या होगा। यह यक्ष प्रश्न पिछली सरकार के साथ वर्तमान सरकार के सामने भी खड़ा है। शराब बेचना प्रदेश सरकार की बड़ी मजबूरी है। सरकार किसी की भी हो शराब बेचे बगैर नहीं रह सकती। कारण भी बहुत बड़े हैं। बजट के राजस्व व्यय का बड़ा हिस्सा शराब से ही आता है। शराब ना बेची जाए तो सरकार चलाना या यूँ कहें कि बड़ा बजट बनाना लगभग नामुमकिन सा है। जब कांग्रेस सरकार ने शराब बंदी की बात अपने घोषणापत्र में की , तो विपक्ष में भाजपा थी। कांग्रेस की सरकार जिसने यह घोषणा की थी वह अच्छी तरह जानती थी कि शराब बन्द नहीं की जा सकती। हमारा प्रदेश आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। यहां शराब का धार्मिक महत्व आदिवासियों के बीच क्या है ,यह सब जानते हैं। विपक्ष में रहते भाजपा भी जानती थी कि शराबबंदी संभव नहीं है। लेकिन इसी को जानते समझते हुए भी इसे चुनावी हथियार बनाया। कांग्रेस सरकार पर कड़े प्रहार इसी नाम से किये। शराब बंदी के लिए गाहे बगाहे सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस आये दिन के कड़े प्रहार से पांच साल तक प्रभावित रही। जब जब भाजपा ने प्रहार किया कांग्रेस तब तब असहज हुई। बचाव में कहा जाता था कि अभी हमारे पांच साल पूरे तो होने दीजिये,अभी भी हमारे पास समय है। जबकि वह जानती थी हम शराबबंदी नहीं कर पायेंगें। कोरोना काल में जो कुछ व्यवस्थाएं कांग्रेस शासन काल में आबकारी विभाग नें पीने वाले दीवानों के लिए की,भाजपा ने उसकी कदम कदम पर आलोचना की।शराब बंदी की बात कहने वाली सरकार ने जब घर घर शराब पहुंचाने ऑनलाइन आर्डर पर व्यवस्था की तब भाजपा हमलावर हुई। अनेक बार भाजपा ने उग्र रुख इस विषय पर दिखाया। प्रदेश सरकारों ने लगभग 4000 करोड़ से शुरू शराब के राजस्व की बढ़ोतरी 24 साल में 7300 करोड़ तक  पहुंचा दी, पर शराब बंदी पर मौन धारण किये रही। कोई प्रयास दिखा हो प्रत्यक्ष दिखा तो नहीं। हां यह जरूर कि भाजपा ने योजना बढ़ तरीके से यह प्रोपेगंडा फैलाना जरूर शुरू किया कि सरकार बहुत बडा घोटाला शराब के धंधे में कर रही है। चर्चा जनता में भी शुरू हो गई। भाजपा ने खूब हवा दी। केंद्रीय एजेंसियों ईडी-सीबीआई-आयकर ने अपना कमाल दिखाना शुरू किया कांग्रेस घेरे में फंसती दिखी। महादेव एप से शुरू यह हमला शराब घोटाले के भीतर तक चला गया। कौन कौन भीतर हुए बताने की बात नहीं जग जाहिर हो चुका। आरोप सिद्ध होते तक हम यह नहीं कह सकते कि सभी मुजरिम हैं और एजेंसियों ने सही कार्यवाही की है। यह तो चर्चा चल ही गई कि कांग्रेस सरकार में शराब के काम में भीतर खाने सब सही नहीं चल रहा था। जनता ने सोचा और भाजपा ने एक नैरेटिव सेट किया वह सफल हो गया। परिणाम सामने आ गया। सरकार चली गई और कांग्रेस सरकार के खिलाफ शराब की आलोचना में जुटी भाजपा खुद ही सरकार में आ गई। अब शराब बंदी की बात करना पड़ेगा लोगों ने सोचा था कि यह अब होगा। शराबबंदी होकर रहेगी। तब कांग्रेस की सरकार आबकारी विभाग के द्वारा शराब बेच रही थी,अब भाजपा की सरकार वही शराब उसी बेहतरीन व्यवस्था के बीच बेच रही है। शराब बंदी की बात एकतरफ चली गई ,सरकार बनी है, अब हम बेचेंगे ,और कांग्रेस आलोचना करेगी। यानी शराब अपनी जगह बनी हुई है ,बनी रहेगी बस पासा भर पलट गया है। आज ही शराब के शौकीनों को भाजपा सरकार ने हिन्दू नववर्ष का तोहफा दिया है। शराब को सस्ता बेचने का अभूतपूर्व निर्णय लिया है। एक गजल है महंगी बहुत है शराब ,थोड़ी थोड़ी पिया करो उसके मायने वर्तमान सरकार ने बदल दिए हैं। अब गजल के मायने यह लगने लगे हैं कि सस्ती बहुत है शराब ,अब दिल खोल कर पिया करो क्या करें शराब बेचने की मजबूरी जो है,राजस्व बढ़ाना विकास के लिए जरूरी है। सच कहा कि किसी भी विकास के लिए विनाश भी जरूरी है। तभी तो सामाजिक परिणाम की तरफ आंख मूंदकर सरकारी राजस्व बढ़ाने के लिए अब शराब बंदी की बात बन्द करके शराबियों को प्रोत्साहित करना पड़ रहा है।

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केंद्र सरकार का संकल्प बनाम नक्सलवाद https://samacharpacheesa.com/?p=15169 Thu, 13 Feb 2025 05:56:10 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=15169 बस्तर के नक्सल क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने में आ रहे हैं। सुरक्षा बलों की लगातार सफलता ने नक्सल हौसले को काफी हद तक तोडऩे का काम किया है। यह साफ दिखाई भी पड़ रहा है। सुरक्षा बलों की आक्रमकता व सूचनाओं से लेस हो जाने का भय नक्सलियों को हताश व निराश करता प्रतीत होने लगा है। कहीं ना कहीं ऐसे निर्देश सुरक्षा बलों को हैं ,जिससे सुरक्षा बल को फ्री हैंड दिया गया प्रतीत होता है। प्रदेश सरकार द्वारा भी सुरक्षा बलों का लगातार उत्साह वर्धन किया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का जगदलपुर में ग्रामीण ओलम्पिक के आयोजन में शिरकत करना तथा खुले आम चुनौती भरे शब्दों में यह घोषणा करना कि 31 मार्च 2026 तक हम बस्तर सहित देश के सभी प्रभावित क्षेत्रों से नक्सलवाद को जड़ से समाप्त कर देंगें। इस घोषणा व उनके कहे शब्दों की कड़ाई में संभवत: सुरक्षा बलों के लिए बड़े संकेत छुपे थे। इससे सुरक्षा बलों को गहन बीहड़ में नक्सलियों के कोर इलाके में घुसने व ऑपरेशन करने का हौसला व साहस में अपार वृद्धि देखी जा रही है। आये दिन उन्हें नक्सल गतिविधियों की जानकारियां मिलने में स्थानीय लोगों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सहयोग भी मिलने लगा है। खबर मिलते ही जिस तरह की सभी बलों व राज्यों की सामूहिक रणनीति से व्यूह रचना कर निरंतर सफलता हासिल की जा रही है,वह ग्रामीणों के लिए उत्साह जनक है। अब तक लगभग 414 नक्सलियों के मारे जाने की खबर से प्रदेश में भी यह बात चल पड़ी है कि अमित शाह की घोषणा की तरफ सुरक्षा बलों के कदम बढ़ रहे हैं। कुछ गंभीरता से रणनीति बनी है ,यह आभास होने लगा है। इस बीच कुछ निरपराध लोगों के मारे जाने की संभावना विपक्ष द्वारा जताई जा रही है। यह संभावना यूँ ही नहीं है,जब भी कोई बडा ऑपरेशन होता है तो वहां मौजूद ग्रामीण भी हताहत होते ही होंगे। पंजाब से आतंकवाद तब खत्म हो पाया जब बड़े ऑपरेशन में कुछ स्थानीय लोगों को भी अपनी शहादत देनी पड़ी। हम यहां यह नहीं कह रहे हैं कि ग्रामीणों की हत्या की जाए। सुरक्षा बलों को निर्देश होते हैं कि निर्दोष लोग हताहत ना हों ,इस बात का ध्यान रखा जाए। नक्सल क्षेत्र में कौन नक्सली है ,कौन ग्रामीण अनेक मौकों पर यह फर्क करना कठिन हो जाता है। इसलिए भी चूक होने की संभावना होती है। अब जब नक्सलवादी हताश व निराश दिखाई देने लगे हैं ,तो सभी दलगत राजनीति से उठकर नक्सल ऑपरेशन को जायज ठहराएं यह उम्मीद की जाती है। सुरक्षाबलों की आक्रमकता व सुनियिजित रणनीति के कारण मुठभेडों में नक्सली लगातार मारे जा रहे हैं। नक्सलियों के अग्रणी नेताओं को लक्ष्य किया गया है। अनेक इनामी नक्सली लीडर मौत के घाट उतारे गए हैं। रणनीति यह दिखाई देती है कि शीर्ष लीडरशिप समाप्त कर दी जाए। लीडरशिप के अभाव में बाकी नक्सलियों की कमर टूटेगी,और वे बगैर नेतृत्व , हताश होकर प्रदेश की राजनीति की मुख्य धारा में शामिल होने बाध्य होंगें। लगातार कुछ नक्सलियों का सरेंडर किया जाना भी इस बात की पुष्टि करता प्रतीत होता है। प्रदेश के एक पूर्व डीजीपी की माने तो प्रदेश में लगभग 4000 हजार नक्सलियों की उपस्तिथि थी। उन्हें सहयोग करने वाले भी 40000 के करीब हैं। अगर यह आंकड़ा सही माने तो नक्सलियों के इस चक्रव्यूह को तोडऩा आसान काम नहीं है। इस दिशा में नक्सल शीर्ष लीडर जिस तरह से लगातार मारे जा रहे हैं,उससे यह उम्मीद तो जाग रही है कि इसी तरह की रफ्तार बनी रही तो 2026 की गारंटी तो नहीं लेकिन एक न एक दिन नक्सलवाद समाप्त होने की संभावना बन जाएगी। 9 फरवरी को नक्सलियों के सुरक्षित कोर क्षेत्र इंद्रावती नेशनल पार्क के गहन जंगल में पुख्ता जानकारी के साथ हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने 31 नक्सलियों को मार गिराया। शेष नक्सली अपनी जान बचाकर जंगलों में भाग खड़े हुए। उनको भी सुरक्षा बल वहीं डटकर खोजने में जुटे है। यह बात ही नक्सलियों के उखड़ते पैरो का व सुरक्षाबलों के हौसले का सबूत दे रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़ी मात्रा में खतरनाक हथियार भी बरामद करने में बल को सफलता मिलती जा रही है। यह भी नक्सलियों की कमर तोडऩे के लिए महत्वपूर्ण तथ्य है। हथियार की कमी भी नक्सलियों के हौसले को कमजोर करने का काम करेगी। लंबा अरसा गुजरा नक्सल ,सुरक्षा बलों या थानों पर हमला करके हथियार लूटने की घटना को अंजाम नहीं दे पाए हैं। बाहरी सहयोगियों पर भी सरकार व सुरक्षा बलों की नजर है,ताकि हथियारों की आमद नक्सलियों को ना हो पाए। पहली बार केंद्र सरकार व राज्य सरकारें साथ मिलकर वाकई सही व सटीक रणनीति से मिलकर काम करती दिखाई दे रहीं है। अब वे खबरें नहीं दिखाई देती कि नक्सली अंधेरे व जंगल की आड़ लेकर भागने में सफल हो गए। यह भी नहीं कि नक्सलियों ने जवानों को अपने एम्बुश में फंसा कर जवानों को शहीद होने मजबूर कर दिया हो। अब आये दिन बड़ी तादाद में नक्सलियों के मारे जाने व हथियार बरामद होने की खबर यह उम्मीद तो जगा ही देती है कि सम्भवत: वाकई एक साल में नक्सल समस्या से निजात मिल जाएगी और हमारा बस्तर भी विश्व पर्यटन के नक्शे में बड़ा स्थान बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त कर लेगा। अंत में नक्सल आतंक समाप्त होने की मंगल कामना करते हुए,बस्तर के इस उद्धार के लिए अपनी शहीदी देने वाले समस्त सुरक्षा बलों व अन्य शहीदों को नमन है। यह कामना भी करते हैं कि 2026 मार्च के बाद हमारा बस्तर क्षेत्र का पर्यटन देश विदेश के लिए और भी आकर्षण का केंद्र बने।

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सरकार का सुशासन पर गंभीर आरोपों के संकट https://samacharpacheesa.com/?p=14019 Thu, 16 Jan 2025 07:07:58 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=14019 विष्णुदेव सरकार के सुशासन के प्रचार के बीच स्थानीय चुनावों के आरक्षण में ओबीसी की घोर उपेक्षा और सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार की घटनाओं ने दाग लगा दिया है। इन मुद्दों ने विपक्ष को सरकार पर वार करने के लिए बैठे बिठाए राजनैतिक हथियार उपलब्ध करा दिए हैं। घात -प्रतिघात के दौर राजनैतिक मंच पर शुरू हो गये हैं। पहले सड़क निर्माण में गड़बड़ी व भ्रष्टाचार के समाचार सामने आये। बीजापुर के एक पत्रकार मुकेश चंद्राकर ने एक ठेकेदार के द्वारा सड़क निर्माण में की जा रही बड़ी गड़बड़ी को उजागर कर दिया। सरकार ने व उसके पुलिस प्रशासन ने तो कुछ कार्यवाही नहीं की लेकिन ठेकेदार व उनके गुर्गों नें पत्रकार की नृशंस हत्या कर उसे अपने परिसर में स्थित सेफ्टी टैंक में दफन कर दिया। कहा जा सकता है कि उसे सीमेंट से चिनवा दिया। सरकार कुछ करती उसके पहले बीजापुर के पत्रकारों ने अगवाई कर पुलिस को जागने को मजबूर किया। पत्रकार का शव बरामद किया गया। पूरे देश -दुनिया में इस हत्या कांड की जितनी गूंज हुई उससे ज्यादा सरकार के पीडब्ल्यूडी विभाग के इस भ्रष्टाचार की गूंज देश दुनिया में गई। सरकार के कथित सुशासन की तरह तरह से चर्चा हुई। लोगों ने कहा यह कैसा सुशासन ? बीजापुर तो चलो उस बीहड़ क्षेत्र में स्थित है जहां कहा जाता है कि ,शासन प्रशासन की पकड़ नहीं के बराबर है। वहां की घटना कोई जाबांज पत्रकार ही उठाने की हिम्मत कर सकता है। ना जाने कितने मामले वहां इस तरह के हो रहे होंगें जिसे उठाना पत्रकार के बस में भी ना हो। वहां क्या चल रहा होगा,यह आसानी से समझा जा सकता है। विभागीय अधिकारियों व ठेकेदारों के अवैध गठबंधन प्रदेश भर में इसी तरह सरकार पर पलीता लगाने का ही काम कर रहे होंगें। यह समझा जा सकता है। बीहड़ों के बाहर आकर देखें तो अब राजधानी जहां जिम्मेदार आला अफसरों से लेकर अति जिम्मेदार मंत्रिमंडल के सभी सदस्य निवास करते हैं। अपने महंगे वाहनों से नित्यप्रति सड़के नापते रहते हैं। वहां वीआईपी के आवागमन के मार्ग पर पीडब्ल्यूडी द्वारा बनाई जा रही घटिया सड़क की पोल खोलने की हिम्मत ,अपनी जान की परवाह ना करते हुए एक पत्रकार ने ही की। सरकारी अमला तो आंख मूंद कर बैठा था। निर्माण स्थल पर सिर्फ ठेकेदार के गुर्गे ही मौजूद रह कर लीपापोती करते रहे। 7 दिन तक सड़क की आवाजाही बंद कर धड़ल्ले से यह काम होता रहा। पत्रकार की नजर से नहीं बचा। उसने सारी गड़बड़ी को सरकार के सामने अपने चैनल के माध्यम से उजागर करते हुए सरकार को जगाया। पीडब्ल्यू मिनिस्टर तत्काल सतर्क हुए घटना स्थल पर पहुंचे। निश्चित ही उनकी बहुत प्रसंशा हुई। उन्होंने बाकायदा ठेकेदार से डांटते हुए सबके सामने पूछा कि कभी सड़क बनाए हो। ठेकेदार ने कह दिया साहब फिर से बना देंगें। मंत्री जी ने सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिए और बंगले पर वापस आ गए। ठेकेदार ने फिर भी मानक से सड़क नहीं बनाई और जानकारी के अनुसार मौके पर मौजूद अधिकारियों की भी नहीं सुनी। मनमानी तरीके से काम कर दिया। अब सवाल यह उठता है की जब राजधानी की सड़को में यह किया जा सकता है तो ठेकेदारों की हिम्मत व संबंधितों के आचरण को समझा जा सकता है। बीहड़ों में नक्सल क्षेत्र में हो रहे निर्माण का क्या हाल होगा सरकार ही समझेगी,और किसी के समझ में तो आएगा नहीं। जनता के टैक्स के पैसे का यह दुरुपयोग रोकने के लिए अब भगवान ही मालिक है। यह नहीं कि यह वर्तमान सरकार में ही हो रहा है सभी सरकारों में यही सिस्टम काम करता है।
साय सरकार पर दो और प्रश्न खड़े किये गए हैं। एक तो बड़ी शान से जिन्होंने बैलेट पेपर से नगरीय निकाय चुनावों को कराने की बात करके विपक्ष से भी अपनी पीठ ठोकवाने का काम किया था,उन्होंने ही बिना शर्मिंदगी से कुछ दिनों बाद ही कह दिया कि अब ईवीएम से ही चुनाव होंगें। जनता व विपक्ष सोचते ही रह गये कि यह अचानक परिवर्तन क्यों हुआ ? कोई कह रहा है कि बैलेट पेपर से सरकार को कुछ खतरे का आभास हुआ होगा। ईवीएम से कुछ अदृश्य वरदान मिलने की आशा में यह हुआ है। कोई कहता है कि ईवीएम में कोई खास राज छुपा हुआ है ,यानी जनता के बीच एक बार फिर ईवीएम संदेह के घेरे में आने को उत्सुक है। देखना होगा कि आखिर ये राज है क्या ? परिणाम बहुत कुछ इशारा कर ही देगा। विपक्ष ईवीएम को घेरने को अभी से तैयार है। इसके अलावा सरकार नगरीय निकाय चुनाव में आरक्षण को लेकर भी घेरे में आई है। ओबीसी वर्ग को आरक्षण से एकदम बाहर किया जाना चर्चा में है। आखिर यह क्या सोच कर किया गया। सरकार ओबीसी को 50 प्रतिशत आरक्षण देने के पोस्टर लगवा कर वाहवाही लूट चुकी है। अब वह कैसे इस वर्ग से गुरेज करने लगी। एक सीट भी ओबीसी को आरक्षण नहीं देना सरकार की मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि कोई बात नहीं हम सामान्य सीट पर ओबीसी को टिकट देंगें। अब सवाल यह आता है कि जब सामान्य सीट से देने तैयार हैं तो उन्ही को आरक्षण देने में क्या दिक्कत थी। यह भी कि सामान्य सीट से जीत मिलेगी या नहीं। ओबीसी बाहुल्य सीट पर अलग बात होती है सामान्य सीट पर अलग बात।ऐसी स्थिति में सुशासन की बात करके अपनी पीठ थपथपाने वाली इस सरकार पर जनता कैसे विश्वास करे कि यह साय के सुशासन की सरकार चल रही है। सरकार विश्वास के संकट से गुजर रही है।

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