एक्सक्लूसीव – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Wed, 09 Oct 2024 05:47:45 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 अनइन्स्टॉल ऐप भी चुराता है मोबाइल डाटा, तुरंत सेटिंग में जाकर करें ये काम, फिर नहीं रहेगा चोरी का डर https://samacharpacheesa.com/?p=10555 Wed, 09 Oct 2024 05:47:45 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=10555

स्मार्टफोन से बेकार के मोबाइल ऐप डिलीट करने के बाद यूजर्स बेफ्रिक हो जाते हैं. लेकिन, अनइन्स्टॉल होने के बाद भी ये ऐप्स मोबाइल डाटा पर डाका डालते रहते हैं. ऐसे में इन्हें पूरी तरह से मोबाइल से बाहर करना जरूरी है.

स्मार्टफोन आज हर आदमी की जरूरत बन गई है. क्योंकि, वॉइस और वीडियो कॉलिंग के साथ-साथ इसमें इंटरनेट से जुड़ी तमाम सुविधाएं मिलती हैं. यूजर एक्सपीरियंस को बेहतर बनाने के लिए मोबाइल में कई ऐप इन्स्टॉल किए जाते हैं.

ऐप इन्स्टॉलेशन के दौरान यूजर्स कई बातों का ध्यान रखते हैं लेकिन, क्या आप जानते हैं कि ऐप को अनइन्स्टॉल करने के बाद भी सावधानी बरतनी जरूरी है, क्योंकि इनसे आपके मोबाइल डाटा का चोरी होने का डर बना रहता है.

ऐसा इसलिए क्योंकि, अनइन्स्टॉल करने पर मोबाइल ऐप, होम पेज से तो डिलीट हो जाते हैं लेकिन फोन की सेटिंग में छिपे होते हैं और हमारा डाटा जुटाते रहते हैं. ऐसे में आपकी गोपनीय जानकारी को लेकर खतरा बना रहता है. आइये आपको बताते हैं कि आखिर इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है.

मोबाइल फोन की सेटिंग में गूगल के ऑप्शन पर क्लिक करें. इसके बाद मैनेज योर गूगल अकाउंट पर जाएं.यहां मौजूद डेटा एंड प्राइवेस पर क्लिक करें. इस दौरान नीचे थर्ड पार्टी ऐप्स एंड सर्विस का ऑप्शन दिखेगा. इस ऑप्शन पर क्लिक करें, यहां फोन में मौजूद व डिलीट ऐप्स दिखाई देंगे. इस लिस्ट में अन-इन्स्टॉल ऐप पर क्लिक करें.
इसके बाद एक्सेस और कनेक्शन डिलीट पर क्लिक करें, फिर मोबाइल डेटा शेयर होना बंद हो जाएगा.
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बिल्‍डर के प्रोजेक्‍ट में खरीदा है फ्लैट, कब्‍जा लेने से पहले जांच लें यह डॉक्‍यूमेंट, वरना पैसे देकर भी फंस जाएंगे https://samacharpacheesa.com/?p=10440 Mon, 07 Oct 2024 06:05:25 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=10440 कम दाम पर संपत्ति हासिल करने की चाह में एक बड़ा वर्ग बिल्डर और डेवलपर के प्रोजेक्ट्स में तभी निवेश कर देता है, जब उनका निर्माण कार्य शुरुआती दौर में होता है या फिर उनकी लांचिंग ही हुई होती है. प्रोजेक्ट की लांचिंग से लेकर उसके निर्माण और परियोजना के ग्राहकों को मकानों का कब्जा एक लंबी प्रक्रिया होती है जिसमें नि:संदेह कई साल लग जाते हैं. रियल एस्टेट सलाहकार प्रदीप मिश्रा का कहना है कि आपने भी अगर किसी बिल्डर के प्रोजेक्ट में निवेश किया है या फिर करने की सोच रहे हैं तो नियमित अंतराल पर आपको खुद लोकेशन पर जाकर प्रोजेक्ट की प्रगति का अवलोकन करते रहना चाहिये.

ऐसे प्रोजेक्‍ट में विशेष तौर पर स्ट्रक्चर पूरा होने के बाद जब उसकी फिनिशिंग की बारी आती है तो उस मौके पर यह और अधिक जरूरी हो जाता है. जब प्रोजेक्ट पूरा हो जाय और बिल्डर ग्राहकों को कब्जा यानी पजेशन की पेशकश शुरू कर दे तो उस समय आपको किन कागजात और दस्तावेजों की जांच परख करनी चाहिए? यह दस्तावेज क्या है और इनका महत्व क्या है, इसकी पूरी जानकारी आपको देते हैं.

कम्प्लीशन या ऑक्यूपेंसी सर्टीफिकेट
इन दोनों ही शब्दों का अर्थ एक ही है, बस फर्क इतना है कि कुछ शहरों में इसे कम्प्लीशन तो कुछ जगहों पर इसे ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट कहा जाता है. यह सर्टिफिकेट बिल्डर उस शहर की लोकल अथॉरिटी या फिर डेवलपमेंट एजेंसी से प्राप्त करता है, जहां से उसने परियोजना के निर्माण का नक्शा पास कराया है. यह दस्तावेज इस बात को स्पष्ट करता है कि परियोजना पूरी हो गई है. साथ ही प्राधिकरण के समक्ष प्रोजेक्ट बनाने से पहले जो नक्शे ​बिल्डर ने जमा करवाये, थे उसी के अनुरूप उसका निर्माण किया गया है. इसके साथ ही बिल्डर का प्राधिकरण के प्रति कोई बकाया नहीं है. यह बात आप समझ लें कि कई बार इस कागज के न होने पर रजिस्ट्रार ऑफिस में आपके नाम पर संपत्ति की रजिस्ट्री भी नहीं हो पाती है.

करें. कम्प्लीशन सर्टीफिकेट से ही इसका भी पता चल जाएगा. यह बात तो आप लोग भी जानते ही होंगे कि उत्तरी भारत का एक बड़ा हिस्सा सेस्मिक जोन-4 में गिना जाता है जो भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में से एक माना जाता है. ऐसे में यह भी देख लें कि बिल्डर ने इमारतों का जो स्ट्रक्चर तैयार किया है, वह भूकंपरोधी मानकों पर भी खरा उतरता हो. कई बार इमारतों में कुछ जगहों पर दरारें दिखने लगती हैं या फिर टूटफूट हो जाती है तो उस स्थिति में मकान की पजेशन से पहले ही आप बिल्डर से उसे दुरुस्त कराने के लिए कह सकते हैं.

फायर फाइटिंग अप्रूवल
बीते तीन दशकों से मल्टीस्टोरी रूप में रिहाइशी इमारतों का प्रचलन बढ़ा है. ऐसे में वक्त के साथ ही इन इमारतों में आग से निपटने के लिए पानी का टैंक हर टॉवर में पाइप की व्यवस्था, कॉमन एरिया के साथ मकानों के भीतर भी स्मोक डिटेक्टर, फायर एक्सटिंग्विशर आदि की व्यवस्थाएं अब जरूरी हो गई हैं. प्रोजेक्ट पूरा हो जाने के बाद बिल्डर को अग्निशमन विभाग से भी संबंधित स्वीकृति लेनी होती है. संबंधित विभाग प्रोजेक्ट का अवलोकन करता है और उपकरणों की परख करने के बाद स्वीकृति देता है. ऐसे में कब्जा लेने से पहले यह भी जरूर देख लें कि वहां आग बुझाने संबंधी उचित इंजताम किए गए हों.

बिजली-पानी सीवेज कनेक्शन
इन दस्तावेजों को परखने के बाद यह भी देखें कि परियोजना में बिजली-पानी की सुचारू आपूर्ति शुरू हो गई हो और सीवेज का कनेक्शन भी मिल गया हो. निश्चय ही किसी भी जगह रहने के लिए यह बुनियादी जरूरतें हैं. कई बार परियोजनाओं में तय समय पर कब्जा देने में देरी होने पर बिल्डरों की तरफ से ग्राहकों को कहा जाता है कि वह अपने मकानों का कब्जा ले लें और शेष सुविधाएं कुछ ही दिनों में शुरू करवा दी जाएंगी. बिल्डर की तरफ से यह कदम पजेशन में होने वाली देरी पर ग्राहक को चुकाई जाने वाली पेनाल्टी से बचने के लिए उठाया जाता है. लिहाजा समझदारी इसी में है कि जब तक बुनियादी सुविधाएं न मिलें आप भूलकर भी कब्जा न लें.

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किरायेदार के लिए रेंट एग्रीमेंट नहीं बनवाएं लीज एंड लाइसेंस, कभी नहीं होगा विवाद का टंटा, 100% सुरक्षित रहेगा मकान https://samacharpacheesa.com/?p=10326 Sat, 05 Oct 2024 04:59:00 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=10326 आम तौर पर संपत्तियों में ​निवेश के दो उद्देश्य होते हैं. पहला कि आप उसे स्वयं के इस्तेमाल के लिए खरीदना चाहते हैं और दूसरा कि संपत्ति को मौजूदा समय में खरीद लिया जाय और जब पैसों की आवश्यकता पड़े तो उसे बेचकर लाभ कमाया जाय अथवा किराये पर चढ़ाकर हर महीने एक सुनिश्चित आमदनी सुरक्षित की जाए. किराये पर देना संपत्तियों के जरिये आय हासिल करने का सबसे अच्छा उपयुक्त साधन है, लेकिन कई बार कुछ ऐसे किरायेदार भी मकान मालिकों से टकरा जाते हैं जो विवाद का कारण बन जातें. अगर मकान मालिक वहां नहीं रहता तो संपत्ति पर मालिकाना हक की दिक्‍कत भी हो जाती है. इस विवाद से बचने का ही तरीका आज हम आपको बताएंगे.

मकान मालिकों के हितों की सुरक्षा के लिए ही ज्‍यादातर मामलों में रेंट एग्रीमेंट बनवाया जाता है. हालांकि, इस एग्रीमेंट के बावजूद बड़े पैमाने पर किरायेदार से मकान मालिक की हितों की पूरी तरह रक्षा नहीं हो पाती. ऐसे में किसी भी विवाद से बचने के लिए अब मालिकों ने ‘लीज ऐंड लाइसेंस’ एग्रीमेंट का विकल्प अपनाना शुरू कर दिया है. लीज ऐंड लाइसेंस भी काफी हद तक रेंट अथवा लीज एग्रीमेंट या किरायानामा की तरह ही होता है, बस इसमें लिखे जाने वाले कुछ क्लॉज बदल दिये जाते हैं. प्रॉपर्टी मामलों के एक्‍सपर्ट और ओरम डेवलपमेंट्स के सीएमडी प्रदीप मिश्रा से हम जानते हैं कि लीज एंड लाइसेंस कैसे बनता है और इसके क्या लाभ हैं.

पूरी तरह मकान मालिक के हित में
चाहे रेंट या लीज एग्रीमेंट हो या फिर लीज ऐंड लाइसेंस इन सभी दस्तावेजों को एकतरफा रूप में मकान मालिक के हितों की रक्षा में बनाया जाता है. दोनों ही दस्तावजों में स्पष्ट तौर पर उल्लेख कर किया जाता है कि संपत्ति का स्वामी उसके किरायेदार को नियत समय के लिए रिहाइशी अथवा व्यावसायिक इस्तेमाल करने को दे रहा है. समय की यह अवधि 11 महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक हो सकती है. इसमें यह भी लिखा जाता है कि यदि किरायेदार रिहाइशी इस्तेमाल के लिए संपत्ति ले रहा है तो उसका इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकेगा. साथ ही तय की गई अवधि पूरी होने के बाद यदि एग्रीमेंट अथवा लीज ऐंड लाइसेंस को आगे नहीं बढ़ाया जाता तो उन परिस्थितियों में किरायेदार को संपत्ति खाली करनी होगी.

दोनों में क्‍या है मेन अंतर
रेंट एग्रीमेंट में मकान मालिक को ‘लेसर’ जबकि किरायेदार को ‘लेसी’ बताया जाता है तो वहीं लीज एंड लाइसेंस में ‘लाइसेंसर और लाइसेंसी’ लिखा जाता है. रेंट एग्रीमेंट को आम तौर पर रिहाइशी इस्तेमाल की संपत्तियों के लिए 11 महीने की अवधि के लिए बनवाया जाता है तो लीज एग्रीमेंट का इस्तेमाल 12 या इससे ज्यादा महीने की अवधि के लिए बनाया जाता है. साथ ही इसे सामान्यत: कॉमर्शियल प्रॉपर्टीज को किराये पर देने के लिए उपयोग में लाया जाता है. इसके उलट लीज एंड लाइसेंस को 10-15 दिन से लेकर 10 साल की अवधि के लिए बनवाया जा सकता है. खास बात यह है कि इन सभी दस्तावेजों को स्‍टांप पेपर पर नोटरी के जरिये बना सकते हैं. इसके अलावा यदि किराये की अवधि 12 या इससे अधिक समय की हो तो उसे कोर्ट से रजिस्टर्ड भी करवाना जरूरी है.
दोनों में कौन सा दस्तावेज बेहतर
रेंट या लीज एग्रीमेंट की तुलना में लीज एंड लाइसेंस ज्यादा बेहतर माना जा सकता है, क्योंकि इसे 10 से 15 दिन की न्यूनतम अवधि के साथ ही 10 साल जैसी लंबी अवधि के लिए बनवाया जा सकता है. इसके साथ ही इसमें स्पष्ट उल्लेख कर दिया जाता है कि लाइसेंसी यानी कि किरायेदार किसी भी रूप में संपत्ति पर अपना हक नहीं जताएगा और न ही मांगेगा. ऐसा होने से मकान मालिक के पास उस संपत्ति का हक बरकरार रहता है, भले ही कुछ समय के लिए वह किरायेदार के कब्जे में हो.
इसमें एक और अच्छी बात यह है कि जब दो पक्ष आपसी सहमति से रेंट या लीज एग्रीमेंट साइन करते हैं और दोनों पक्षों में से किसी एक की मृत्यु हो जाने पर उनके सक्सेसर यानी वारिस आपसी सहमति से उस एग्रीमेंट को जारी रख सकते हैं. लीज एंड लाइसेंस में ऐसा नहीं है. दोनों पक्षकारों में से किसी एक की मृत्यु की स्थिति में यह स्वयं ही शून्य यानी नल एंड वाइड हो जाता है. लिहाजा आप अपनी संपत्ति किराये पर देते समय लीज या लीज एंड लाइसेंस दस्तावेज जरूर बनवा लें जिससे कि आपकी संपत्ति पर मालिकाना हक को कोई अन्य चुनौती न दे सके.
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उम्मीदों के साथ जेल से रिहा हुआ कैदी, रजिस्टर में साइन करने के साथ ही गिर पड़ा, हो गया दुनिया से अलविदा https://samacharpacheesa.com/?p=10314 Sat, 05 Oct 2024 04:40:10 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=10314 बाड़मेर. पश्चिमी राजस्थान की बाड़मेर जिला जेल में एक कैदी की अचानक तबीयत बिगड़ने के कारण मौत हो गई. कैदी की मौत उसकी जमानत पर रिहाई के समय हुई. इससे जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया. कैदी के शव को स्थानीय अस्पताल की मोर्चरी में रखवाया गया है. वहां आज उसका मेडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम करवाया जाएगा. न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मोर्चरी पहुंचकर शव की वीडियोग्राफी करवाई है. वे पूरे मामले की जांच कर रहे हैं.

बाड़मेर डीएसपी रमेश कुमार शर्मा ने बताया कि जेल में अचानक मौत के शिकार हुए विचाराधीन कैदी भोमाराम पर हिरण के शिकार का आरोप था. इस मामले में वह बाड़मेर जिला जेल में बंद था. वह धोरीमन्ना थाना इलाके के खुमे की बेरी गांव का रहने वाला था. शुक्रवार को उसे जमानत मिली थी. शाम को उसका भाई उसे लेने आया था. भोमाराम जेल से बाहर आने से पहले वहां रजिस्टर में साइन कर रहा था. उसी दौरान अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई और वह वहीं पर गिर पड़ा.

शव का आज मेडिकल बोर्ड से करवाया जाएगा पोस्टमार्टम
इससे जेल प्रशासन की सांसें फूल गई. कैदी को आनन-फानन में स्थानीय अस्पताल ले जाया गया. लेकिन वहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसके बाद जेल प्रशासन ने कैदी के शव को वहां मोर्चरी में रखवाया. मौत के कारणों का फिलहाल पता नहीं चल पाया है. बाद में जेल प्रशासन ने पुलिस, न्यायिक मजिस्ट्रेट और कैदी के परिजनों को घटनाक्रम की जानकारी दी. इस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट अस्पताल पहुंचे और उन्होंने कैदी की वीडियोग्राफी करवाई. कैदी के शव का पोस्टमार्टम करवाने के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया है. आज शव का पोस्टमार्टम करवाया जाएगा.

एक दिन पहले देचू थाने में हुई थी युवक की मौत
उल्लेखनीय है कि इससे एक दिन गुरुवार रात को फलौदी जिले के देचू थाने में एक युवक की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. उस युवक को पुलिस रेप केस में पूछताछ के लिए थाने लाई थी. वहां उसकी मौत हो गई. उसके बाद वहां बवाल मच गया. पुलिस का कहना है कि युवक ने सुसाइड किया है. दूसरी तरफ युवक के परिजनों का आरोप है कि उसके साथ पुलिस ने मारपीट की थी. इससे उसकी मौत हुई है. बाद में युवक के आक्रोशित परिजनों और लोगों ने देचू थाना घेर लिया था. पुलिस ने इस मामले में देचू थाने के 24 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया है.

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महाराष्ट्र चुनाव से पहले ‘मराठी’ को मिला तोहफा, इन 4 राज्यों को भी मिली खुशखबरी https://samacharpacheesa.com/?p=10266 Fri, 04 Oct 2024 04:55:22 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=10266 केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गुरुवार को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने को मंजूरी दी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला लिया गया. मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी देते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि ‘यह एक ऐतिहासिक फैसला है और यह फैसला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राजग सरकार के हमारी संस्कृति को आगे बढ़ाने, हमारी विरासत पर गर्व करने और सभी भारतीय भाषाओं तथा हमारी समृद्ध विरासत पर गर्व करने के दर्शन के अनुरूप है.’

केंद्र सरकार ने कहा कि शास्त्रीय भाषाएं भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक के रूप में काम करती हैं, तथा हर समुदाय के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सार को पेश करती हैं. भारत सरकार ने 12 अक्टूबर 2004 को ‘शास्त्रीय भाषा’ के रूप में भाषाओं की एक नई श्रेणी बनाने का फैसला लिया. जिसके तहत तमिल को शास्त्रीय भाषा घोषित किया गया तथा उसके बाद संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और उड़िया को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया.

एक सरकारी बयान में कहा गया है कि 2013 में महाराष्ट्र सरकार की ओर से एक प्रस्ताव हासिल हुआ था, जिसमें मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने का अनुरोध किया गया था. इस प्रस्ताव को भाषा विज्ञान विशेषज्ञ समिति (एलईसी) को भेज दिया गया था. एलईसी ने शास्त्रीय भाषा के लिए मराठी की सिफारिश की.

महाराष्ट्र में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं और यह राज्य में एक बड़ा चुनावी मुद्दा था. बयान में कहा गया कि इस बीच, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल से भी पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के प्रस्ताव हासिल हुए थे.

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