आबादी – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Sat, 04 Feb 2023 05:57:36 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 ठेलों-खोमचों की बढ़ती संख्या https://samacharpacheesa.com/?p=6070 Sat, 04 Feb 2023 05:57:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6070 रायपुर शहर का निरंतर विस्तार हो रहा है। यहां की आबादी भी बढ़ती जा रही है। आज से 15 वर्ष पूर्व जब नई राजधानी का निर्माण होने लगा तब पुराने रायपुर शहर को व्यवस्थित करने के लिए सड़कों का जाल बिछा। शहर के किनारे कॉलोनियां बसने लगी और देखते ही देखते शहर का दायरा कई किलोमीटर बढ़ गया। अब सवाल यह है कि रायपुर राजधानी में जो जनसंख्या बढ़ी है वह किस वजह से है? पहला कारण तो राजधानी बनने के बाद मंत्रालय सचिवालय सहित अन्य कार्यालयों में काम करने आए कर्मचारियों-अधिकारियों के कारण जनसंख्या बढ़ी। नए राज्य में व्यापार, उद्योग में बढ़ोतरी हुई और यहां भी काम करने वाले रायपुर में आकर बसते गए। आसपास के गांव से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण पलायन कर रायपुर में बसते चले गए। इन सबके अलावा उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उड़ीसा जैसे पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में ठेले-खोमचे लगाने वाले छोटे व्यापारी राजधानी रायपुर में बढ़े है। पिछले 2-3 वर्षों में ठेले-खोमचे लगाने वाले व्यापरियों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। अब स्थिति यह है कि आप किसी भी सड़क से गुजरे सड़क के किनारे ठेले-खोमचे लगाने वाले चाट पकौड़ी गुपचुप बेचने वाले मिल जाएंगे। यह ठेले खोमचे लगाने वाले कहां से आए है, इसका कोई व्यस्थित रिकॉर्ड पुलिस के पास है भी या नहीं इसमें संदेह है। राजधानी में अपराध की दर भी बढ़ी है। पिछले कुछ वर्षों में दूसरे प्रदेशों से ऑटो चलाने या ठेला-खोमचा चलाने के नाम पर आए अपराधियों ने बड़ी वारदातों को अंजाम दिया है। इसलिए राजधानी में जो छोटे व्यापारी काम कर रहे है उन पर निगरानी की आवश्यकता है। वैसे तो केंद्र सरकार ने स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम पारित किया हुआ है। इस कानून के हिसाब से सड़क किनारे ठेले-खोमचों लगाने वालों का पंजीयन कर उन्हें स्थायी व्यवस्थापन करना है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि राजनेता अपना वोट बैंक साधने के लिए ऐसे ठेले-खोमचों वालों को राजधानी में लाकर बसा रहे है। इसका दुष्परिणाम यातायात व्यवस्था में बदहाली के रुप में देखा जा सकता है। सड़कें भले ही चौड़ी हो गई हो लेकिन ठेले-खोमचों के जगह घेरने और वहां पर ग्राहकों की भीड़ के कारण यातायात प्रभावित हो रहा है। वैसे तो कानून कहीं पर भी ठेला लगाना प्रतिबंधित है लेकिन नेताओं के संरक्षण में ऐसा किया जा रहा है। प्रशासन को इस बात पर गौर करना चाहिए यातायात प्रभावित होने के कारण राजधानी में बूढ़ापारा स्थित धरना स्थल को बदलने की मांग की जा रही है। ठेले-खोमचों का भी व्यवस्थापन होना चाहिए।

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स्मार्ट शहर में उद्यान की कमी https://samacharpacheesa.com/?p=5450 Tue, 27 Dec 2022 07:25:21 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5450 छत्तीसगढ़ का राज्य का निर्माण नहीं हुआ था उसके पहले रायपुर शहर की आबादी 5-6 लाख के आसपास थी। लेकिन शहर में एक दर्जन उद्यान मौजूद थे। शनिवार-रविवार के दिन गांधी उद्यान, गुलाब उद्यान, मोतीबाग, बूढ़ा गार्डन, गुरुतेग बहादुर उद्यान में परिवार सहित मनोरंजन के लिए लोग जाते थे। सन् 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बना और रायपुर उसकी राजधानी बनी। शुरु से ही इस बात की चिंता की गई कि प्रदेश की राजधानी के लिए रायपुर नगर से बाहर एक नया शहर का विकास करना चाहिए। इसलिए रायपुर का व्यवस्थित विकास करने के बजाय नई राजधानी बनाने में सरकार ज्यादा मशगुल रही। अब रायपुर शहर पुराना रायपुर हो गया और राज्य बनने के बाद एकाएक आबादी बढऩे लगी। अभी 2021 की जनगणना नहीं हुई लेकिन अनुमान है कि रायपुर शहर की आबादी लगभग 20 लाख है। इसका मतलब है कि पिछले 22 वर्षों में आबादी 4 गुना बढ़ गई है। ये इस बात से भी पता चलता है कि सड़कों पर जिस तरह से लोगों की भीड़ उमड़ती है और ट्रैफिक जाम होता है। उससे लगता है कि शहर में क्षमता से ज्यादा लोग मौजूद है। ऐसी बात नहीं है कि यातायात का दबाव कम करने के लिए सड़कें चौड़ी नहीं हुईं, फ्लाईओवर नहीं बने, यहां तक कि नहरों को पाटकर कैनाल लिंक और छोटी रेलवे लाइन के ऊपर एक्सप्रेस हाईवे तैयार कर दिए गए है। इसके बावजूद भी शहर में गाडिय़ों की भीड़ और उसके कारण यातायात पर दबाव कम नहीं हो रहा है। दुर्घटनाएं बढ़ गईं है। इन सबके बीच राजधानी में मनोरंजन के स्थान नहीं बढ़ पाए। जितने उद्यान राज्य बनने के समय थे, उसके बाद कलेक्टर परिसर में ऑक्सीजोन का निर्माण को गिना जा सकता है। लेकिन इसके बदले शहर के आसपास कितनी कॉलोनियां बसी है उस अनुपात में उद्यान विकसित नहीं हो पाए। ऊपर से जो उद्यान लोगों के मनोरंजन के काम आते थे उन पर भी प्रशासन की वक्र दृष्टि पड़ गई। बूढ़ा गार्डन अस्त-व्यस्त है। गार्डन के पास तालाब के किनारे एक मनोरंजन स्थल बनाया गया है लेकिन वहां उद्यान का मजा नहीं है। रायपुर का सबसे लोकप्रिय उद्यान मोतीबाग था। लेकिन राज्य बनने के बाद इस उद्यान के चारों ओर भवन बन गए, उद्यान का आकार छोटा होता चला गया। अब स्थिति यह है कि यह उद्यान आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है। इस उद्यान के सौंदर्यींकरण पर पिछले 22 वर्षों में कई बार करोड़ों रुपए फूंक दिए गए लेकिन उद्यान की न तो दशा सुधरी न विस्तार हुआ। इस बीच केंद्र सरकार ने शहरों को स्मार्ट बनाने की एक योजना 2016 में लेकर आई। इस स्मार्ट शहर परियोजना में रायपुर भी शामिल है। इस परियोजना के लिए करोड़ों रुपए मिले। लेकिन अभी भी नगर निगम और स्मार्ट सिटी एजेंसी के लिए रायपुर शहर में उद्यान का विकास प्राथमिकता नहीं है। जितने छोटे-छोटे उद्यान कॉलोनियों और मोहल्लों में विकसित हुए उनकी दुर्दशा देखते ही बनती है। आज भी किसी शहर के लिए पर्यटन और मनोरंजन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र उद्यान ही है। राज्य बना उसके पहले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल का विकास देखे तो जगह-जगह पर सुंदर उद्यान विकसित किए गए है। भारत में पिछले 50 वर्षों में जितने नए शहर बने है, जिनमें मैसूर, बैंगलौर, दिल्ली, हैदराबाद, लखनऊ या जिस राज्य की राजधानी में आप चलें जाएं वहां बड़े और खूबसूरत उद्यान शहर की खूबसूरती को बढ़ाते है। उद्यान में पेड़ पौधे पर्यावरण को भी दुरुस्त रखता है। ऐसा लगता है कि रायपुर केवल एक व्यापारिक शहर बनकर रह गया है जहां पैसों का लेन-देन और बाजार तो बड़े-बड़े सजते हैं लेकिन तनाव भरी जिंदगी में सुकुन का पल बिताने के लिए हरी-भरी जगह देखने को नहीं मिलती। स्मार्ट सिटी एजेसी या नगर निगम इन्हें चाहिए कि शहर के चिन्हित खाली पड़े स्थानों पर बड़े-बड़े भवन और शॉपिंग सेंटर न बनाकर अच्छे उद्यान विकसित करें। जो उद्यान बने हुए है उनका विस्तार करे और जो बदहाल है उनका सौंदर्यींकरण कर लोगों के उपयोग के लायक बनाए। प्रदेश का विकास राजधानी की खूबसूरती को दर्शाता है। बाहर से आने वाला व्यक्ति राजधानी की हरियाली और उद्यानों को देखकर प्रदेश की सोच का आंकलन करता है।

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