आरक्षण – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Wed, 03 May 2023 08:50:03 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश https://samacharpacheesa.com/?p=6822 Wed, 03 May 2023 08:50:00 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6822 प्रदेश में आरक्षण को लेकर भ्रम का वातावरण है, उस पर सुप्रीम कोर्ट के एक ऑर्डर को लेकर मीडिया से राजनीति तक जिस प्रकार से प्रचारित किया गया, उससे भ्रम और बढ़ गया है। सोमवार को इस तरह की खबर आई कि प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट ने 58 प्रतिशत आरक्षण को जारी रखने का फैसला दे दिया है। मतलब उच्च न्यायालय ने सितंबर में प्रदेश में लागू 58 प्रतिशत आरक्षण को खारिज कर दिया था उसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। इस खबर के बाद सरकार ने भी बैठक कर भर्ती परीक्षा कराने का निर्णय लिया ऐसी खबर आई। आज जब सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर की कॉपी मिली तो पता चला कि सुप्रीम कोर्ट ने 58 प्रतिशत को लेकर कोई आदेश नहीं दिया है। कोर्ट ने केवल प्रदेश में भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया को जारी रखने के लिए कहा है। इस आदेश में न तो उच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख है और न ही आरक्षण कोटा को लेकर कोई आंकड़ा। ऑर्डर में तो यह भी लिखा है कि प्रदेश में जो भी निर्णय लिया जाएगा वह कोर्ट के अंतिम निर्णय से प्रभावित होगा। अब सवाल यह भाई कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 58 प्रतिशत के बारे में कुछ कहा ही नहीं तो मीडिया से लेकर सरकार तक में इसकी चर्चा कैसे हुई? इसका दोषी कौन है? पहली बात तो सरकार के पक्ष रखने वाले वकीलों ने मीडिया और सरकार को जो बताया होगा वही बात सार्वजनिक हुई होगी, इसका मतलब इस भ्रम को फैलाने के दोषी वकील हैं? या मीडिया ने बिना जानकारी लिए आधे अधूरे तथ्य के आधार पर समाचार परोस दिया? अगर ऐसा है भी तो सरकार को तो आदेश की कॉपी मिलने तक इंतजार कर लेना था, इसका श्रेय लेने की हड़बड़ी में शासन ने भी लापरवाही की। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद संकट और गहरा गया है। हालांकि सरकार की जिद है कि 76 प्रतिशत पर ही भार्ती करनी है वरना देश भर में 50 प्रतिशत आरक्षण कोटा के आधार पर भर्ती परीक्षाओं के परिणाम घोषित कर सकती है और नई परीक्षाएं भी ले सकती है। जब निर्णय आएगा तब नई व्यवस्था लागू की जा सकती है। सरकार को विषय की गंभीरता समझनी चाहिए, छात्र परेशान हैं, महाविद्यालयों में प्रवेश बाधित होंगी। पीढ़ी का नुकसान है, ऐसे में सरकार को युवाओं को समझते हुए आगे बढऩा चाहिए। लेकिन चुनाव करीब है और वोटबैंक का सवाल है इसलिए कुछ निर्णय होगा इसकी संभावना कम है। वैसे भी आरक्षण को लेकर पिछले 6-8 महीनों से केवल राजनीति हो रही, जिसका खामियाजा पढऩे वाले बेरोजगार युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। प्रदेश में आरक्षण का मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फैसले से पेचीदा हुआ जब प्रदेश में 2012 से लागू 58 प्रतिशत आरक्षण को असंवैधानिक करार दे दिया गया। इसके बाद प्रदेश में वापस 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू हो गई। इस निर्णय से सबसे अधिक नुकसान जनजातीय समाज को हुआ क्योंकि 2012 में जनजातीय वर्ग के आरक्षण का कोटा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 प्रतिशत किया गया था वहीं अनुसूचित जाति की आबादी के अनुसार आरक्षण को 16 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत किया गया था। इस निर्णय से नाराज अनुसूचित जाति समाज के प्रतिनिधि उच्च न्यायालय गए थे। इधर प्रदेश सरकार ने जनजाति समाज के विरोध को देखता हुए विधानसभा में आरक्षण कोट में संशोधन करने एक और विधायक ले जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। इसके अनुसार प्रदेश में 76 प्रतिशत आरक्षण कोटा दिया गया है जिसमें आदिवासियों को 32 प्रतिशत के साथ पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। इस विधेयक को राजभवन में लंबित रखा गया है क्योंकि उच्च न्यायालय के फैसले को शासन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई है। अब सवाल यह है कि जब 58 प्रतिशत आरक्षण कोटा असंवैधानिक है तो फिर 76 प्रतिशत कैसे स्वीकृत होगा? मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चलती रही और आरक्षण की व्यवस्था के भ्रम में प्रदेश की भर्ती परीक्षाओं और शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश की परीक्षाएं लटक गई। इस कारण छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से भर्ती के लिए अनुमति मांगने के प्रयास किए। इसी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी लेकिन उसमें कोई स्पष्टता नहीं है।

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प्रदेश में आरक्षण कोटे पर भ्रम https://samacharpacheesa.com/?p=6759 Tue, 18 Apr 2023 08:42:39 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6759 मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार ने प्रदेश में विभिन्न वर्गों को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने के लिए विधानसभा में एक विधेयक पारित कराया है। इस विधेयक के अनुसार अनुसूचित जनजाति वर्ग को 32 प्रतिशत, ओबीसी को 27, अनुसूचित जाति को 13 और ईडब्ल्यूएस को 4 प्रतिशत देने का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक अभी राज भवन से अनुमति की प्रतीक्षा में अटका हुआ है। इधर मुख्यमंत्री ने सोमवार को एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पारित आरक्षण संशोधन विधेयक को संविधान की 9वीं अनुसुची में शामिल किया जाए। इस प्रश्न के बाद आरक्षण कोटे को लेकर भ्रम और गहरा गया है। एक बात तो तय है कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव को 8 महीने का समय भी नहीं बचा है। ऐसी स्थिति में आरक्षण कोटे में बढोत्तरी का लाभ कांग्रेस पार्टी को चाहिए तो किसी हाल में विधेयक को स्वीकृत कराकर लागू कराना होगा। कांग्रेस को इस बात का भी भय है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव में नुकसान हो सकता है। गत वर्ष सितंबर में प्रदेश में लागू 58 प्रतिशत आरक्षण कोटा और तृतीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती के लिए अनुसुचित क्षेत्रों में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण के प्रावधान को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इस बात से प्रदेश के जनजातिय युवाओं में खासी नाराजगी हुई थी। यह नाराजगी कोटा नहीं बढऩे के कारण चुनाव में बरकरार रह सकती है। वैसे अभी पिछले छ: महीनों से नई भर्ती के लिए विज्ञापन शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश परीक्षा और अनेक संपन्न हुई परीक्षाओं के परिणाम पर रोक लगी हुई है। इस वजह से भी युवा परेशान और नाराज है। राज्यपाल आरक्षण विधेयक पर कोई निर्णय लेने से पहले सर्वोच्च न्यायालय में लंबित इस मामले की सुनवाई और निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे है। दूसरी ओर विधानसभा ने भी पारित आरक्षण कोटा कानून को संविधान की 9वीं अनुसुची में डालने का अशासकीय संकल्प पारित किया है। अब मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री को इस बारे में पत्र लिखना समझ से परे है। कुछ दिन पूर्व मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली गए थे और बताया गया कि दोनों के बीच अनेक विषयों पर बात भी हुई लेकिन प्रधान मंत्री से बात करते हुए क्या मुख्यमंत्री ने प्रदेश के आरक्षण विधेयक के संबंध में कोई चर्चा की थी क्या? देशभर में किसी भी राज्य को आरक्षण कोटा 50 प्रतिशत से अधिक करने की अनुमति नहीं है। मुख्यमंत्री ने पत्र में ईडब्ल्यूएस वर्ग को 10 प्रतिशत का कोटा देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आधार बनाकर प्रधानमंत्री से प्रदेश में कोटा बढ़ाने का अनुरोध किया है,जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने ईडब्ल्यूएस के 10 प्रतिशत कोटा को सामान्य वर्ग के अधीन रखा है। प्रदेश में अगर गरीबी बहुत ज्यादा है तो यह राज्य द्वारा गठित क्वंटीफायबल डेटा आयोग की रिपोर्ट में भी प्रकट हुई होगी, अगर ऐसा है तो पारित विधेयक में ईडब्ल्यूएस का कोटा केवल 4 प्रतिशत क्यों रखा गया? उसे 10 प्रतिशत किया जाना था। कुल मिलाकर प्रदेश में आरक्षण कोटे को लेकर राजनीति हो रही है और इससे युवा बेरोजगार भ्रम की स्थिति में है। इस भ्रम को दूर करना जरूरी है नहीं तो इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ सकता हैं।

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धर्मांतरण-आरक्षण पर तनाव है, आगे चुनाव है ना https://samacharpacheesa.com/?p=5627 Wed, 04 Jan 2023 06:01:43 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5627 राहत इंदौरी के शेर की लाइन है ‘सरहदों पर तनाव है क्या ? जरा पता करो चुनाव है क्या? इसी तर्ज में 2023 के चुनाव का आगाज होना शुरू हो आया है। जैसे जैसे समय खिसकेगा वैसे वैसे यह तनाव बढ़ते बुखार की तरह बढऩे लगेगा।दोनों दल अपने अपने एजेंडे पर खेलना तेजी से प्रारंभ कर चुके हैं। धर्मांतरण का जिन्न कवर्धा के बाद अब फिर नारायणपुर की घटना के सहारे बोतल से बाहर निकल गया है। विधंसबह चल रही है। तनाव तो बढऩा ही था। आज सदन में बढा भी है। इसीलिए यह शेर याद भी आया और सटीक बैठ भी रहा है। विधानसभा आज़ दूसरे दिन भी आरक्षण व धर्मांतरण के मुद्दे पर गरम रही। 70 पर 14 भारी पड़ गए। या यूं भी कह सकते हैं कि 70 पे तीन याने बृजमोहन अग्रवाल-अजय चंद्राकर-शिवरतन की तिकड़ी ही भारी पड़ जाती है। विधान सभा में प्रचलित शब्द ध्वनि की बात करें तो 70 की ध्वनि पर 3 या कह लें कि 14 की ध्वनि तेज निकलती है। 70 की आवाज के बीच 14 की गूंज अधिक सुनाई पड़ती है। आज तो आरक्षण का साथ धर्मांतरण भी जुड़ गया यानी करेला वो भी नीम चढ़ा। लोग कहने लगे हैं कि लगता है अब भाजपा का चुनावी रथ अपने पहिये घुमाना शरू करने लगा है। कांग्रेस भी कोई कमी नहीं करना चाहती। सरकार के मुख्य मंत्री भूपेश बघेल आंदोलनों -प्रदर्शन-संघर्षशीलता का प्रतीक हैं। अपनी युवा अवस्था से आंदोलनों का बड़ा अनुभव रखते हैं। प्रदर्शन और उनकी राजनैतिक समझ को भी लोगों ने देख लिया है। सीडी कांड में जमानत नहीं ली, जेल जाने का निर्णय लिया। इसी संघर्ष के रास्ते सरकार में पहुंच गए। मुख्य मंत्री बन गए। सरकार में भी अब उन्हें आंदोलन का वो जुनून कभी कभी आ जाता है। आज आरक्षण के मामले में राज्यपाल को घेरने के साथ भाजपा को भी कठघरे में लाने का काम किया। राज्यपाल के पद को भी जनता के सामने खड़ा करने का प्रयास किया। संविधानिक पद की गरिमा खुद मुख्यमंत्री की मौजूदगी में धूमिल होता दिखा। हजारों की बड़ी संख्या में उपस्थिति कार्यकर्ताओं ने दी। इनमें आम आदमी की कितनी मौजूदगी थी यह तो प्रमाणित नहीं किया जा सकता। लोगों के बीच यह संदेश जरूर चला गया कि संवैधानिक पद को भी घेरे में लिया जा सकता है। इस पद पर आसीन व्यक्ति के अच्छे बुरे कामों की सार्वजनिक व्याख्या की जा सकती है। यह अलग बात है कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है इसकी समीक्षा कौन और कैसे करेगा। प्रदेश में हुए इस विवाद से एक और संदेश भी जा रहा है कि राज्यपाल जैसे गरिमामयी पद की भूमिका तेजी से विवेक के निर्णय की ओर बढ़ रही है। कहीं राज्यों के हाल दिल्ली की सरकार की तरह तो नहीं हो जाएंगे। जिसे चुनती जनता है , पर अधिक अधिकार नियुक्त राज्यपाल का होता है। कहीं यह राज्यपालों की भूमिकाएं बदलने का समय तो नहीं आ गया ?

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विधानसभा में कामकाज ठप https://samacharpacheesa.com/?p=5624 Wed, 04 Jan 2023 05:56:27 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5624 संसदीय लोकतंत्र में विधानसभा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। छत्तीसगढ़ विधानसभा का शीतकालीन सत्र दो हिस्सों में बंट गया जिसका पहला हिस्सा विशेष सत्र के रुप में 2 दिसम्बर को आहूत किया गया। एक लंबे अवकाश के बाद सोमवार 2 जनवरी से पुन: प्रारंभ हुआ। 1 माह पूर्व विधानसभा में आरक्षण का विधेयक पारित किया गया था जिस पर राज्यपाल की अनुमति नहीं मिल पायी है। इस मुद्दे पर सदन में जमकर हंगामा हो रहा है। पहले और दूसरे दिन बमुश्किल प्रश्नकाल ही संपन्न हो सका, जबकि विधानसभा की कार्य सूची में अनेक महत्वपूर्ण राजकीय कार्य का उल्लेख किया गया था। मंगलवार को 2 विधेयक सदन के पटल पर रखा जाना था जिसमें छत्तीसगढ़ जुआ प्रतिषेध विधेयक और अनाधिकृत विकास का नियमितीकरण का संशोधन विधेयक था। आरक्षण विषय पर हंगामा होने के कारण विधेयक प्रस्तुत नहीं किए जा सके। ध्यानाकर्षण पर भी चर्चा नहीं हो सकी। प्रश्नोत्तरी शांतिपूर्ण आज संपन्न हुआ। विधानसभा में विभिन्न विषयों पर चर्चा की जाती। राज्य में अनेक ऐसे मुद्दे है जिस पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। धर्मान्तरण को लेकर बस्तर जल रहा है। अगर इस पर फौरी तौर पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। इस विषय पर अगर विधानसभा में चर्चा हो तो इसके सुखद परिणाम निकल सकते है। वैसे तो विपक्ष ने प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था पर स्थगन लेकर आए थे लेकिन उसकी अनुमति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नहीं दी गई। इस विषय पर अगर स्थगन प्रस्ताव के जरिए चर्चा हो जाती तो समस्या की महत्वपूर्ण बिन्दु सामने आती। स्थगन पर जब चर्चा अस्वीकृत कर दी गई तब भाजपा के सदस्य गर्भगृह में आकर स्वमेव निलंबित हो गए। इन सब हंगामे के बीच में दिनभर के लिए सभा की कार्रवाई स्थगित कर दी गई। स्थगित तो इसलिए भी हो गयी क्योंकि कांग्रेस पार्टी का जन अधिकार रैली का आयोजन राजधानी में किया गया था, जिसमें कांग्रेस पार्टी के मंत्रियों और विधायकों को शामिल होना था। इस प्रकार जो चर्चा विधानसभा के सदन में हो सकती है उसे सार्वजनिक तौर पर रैली के माध्यम से करना विधानसभा के प्रति कम होती आस्था को दर्शाता है। विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान भी बार-बार विधानसभा अध्यक्ष की ओर से यह हिदायत मंत्रियों को दी जा रही है कि वे तैयारी कर सदन में आए। इसका मतलब है कि मंत्री विधानसभा की कार्रवाई को लेकर गंभीर नहीं है। संसदीय लोकतंत्र के मंदिर के प्रति निर्वाचित प्रतिनिधियों की आस्था कम होगी तो यह लोकतंत्र को कमजोर करेगा।

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राजभवन के सवाल सरकार के जवाब https://samacharpacheesa.com/?p=5500 Thu, 29 Dec 2022 06:16:08 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5500 प्रदेश में विभिन्न वर्गों को आरक्षण का कोटा बढ़ाने संबंधी विधेयक विधानसभा में पास होकर राजभवन में राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए अटका हुआ है। यह विधेयक उस विषय पर है जिसे उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण का कोटा बढऩे के कारण आदिवासियों को दिया गया 32 प्रतिशत का आरक्षण अवैध है। स्वाभाविक है जब 58 प्रतिशत को कोर्ट ने खारिज कर दिया तो विधानसभा से पारित 76 प्रतिशत के आरक्षण कोटे को न्यायालय कैसे स्वीकृति देगा? यही सवाल राजभवन पैदा हुआ और इसका जवाब देने के लिए सरकार तक भेजा गया। राजभवन के द्वारा विधेयक पर सवाल किए जाने पर राजनीति शुरु हो गयी। सरकार की ओर से राजभवन के विरुद्ध टिप्पणियां होने लगी, यहां तक के उस विधि विशेषज्ञ पर सवाल भी सवाल दागे गए और इस प्रक्रिया को गैर संवैधानिक बताया गया। कांग्रेस पार्टी ने विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं करने का विरोध करते हुए 3 जनवरी से पूरे प्रदेश में आंदोलन करने की भी घोषणा कर दी है। इसका मतलब है कि सरकार जिनके द्वारा बनाई गई है, उसी सरकार की पार्टी अपने मुखिया के विरुद्ध आंदोलन करेगी। यह भी हुआ कि सरकार 10 सवालों का जवाब दे देगी और मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि जवाब राजभवन को भेज दिए गए है। ऐसी जानकारी मिल रही है कि जवाब के नाम पर कोई तथ्यात्मक जानकारी सरकार की ओर से राजभवन को नहीं दिए गए है। यहां से कई सवाल खड़े होते है पहला तो यह कि किसी विधेयक पर हस्ताक्षर कब करेगी यह संविधान में नहीं लिखा है और राज्यपाल को दस्तखत करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह है कि क्या राजभवन के पास किसी विधेयक से संबंधित सवाल पूछने का अधिकार है? एक बात तो तय है कि राज्यों में नियुक्त राज्यपाल के पास संवैधानिक विशेषाधिकार होते है। इस विशेषाधिकार के तहत वह अपनी सरकार से किसी भी विषय पर सवाल पूछ सकती है और सवाल पूछे भी है तो उस पर आपत्ति क्यों होना चाहिए। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को खंडित करना क्या सरकार के लिए उचित होगा? पूरे प्रकरण में एक बात तय है कि आरक्षण का विधेयक नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में जनजाति और पिछड़े वर्ग को लाभ देने के लिए लाया गया है और संभावना यह है कि मामला न्यायालयीन प्रक्रियाओं में उलझेगा। कोशिश यही होगी जैसे-तैसे चुनाव तक मामले को लटकाया जाए।

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प्रदेश में आरक्षण पर गैरजरुरी विवाद https://samacharpacheesa.com/?p=5317 Tue, 20 Dec 2022 06:33:58 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5317 छत्तीसगढ़ में पिछले तीन महिनों से आरक्षण को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। वैसे तो इसकी शुरुआत 2019 से हो गयी थी,जब भूपेश सरकार ने अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का कोटा 27 प्रतिशत बढ़ाते हुए एक अध्यादेश जारी किया था। इस अध्यादेश को उच्च न्यायालय ने रद्द कर विस्तृत आंकड़ों सहित आरक्षण संबंधी कानून बनाने की बात कही थी। इधर सितम्बर महिने में 2011 से जारी अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण सहित कुल 58 प्रतिशत आरक्षण के कोटे को उच्च न्यायाय ने खारिज कर दिया। इसके बाद दोष सरकार पर आ गया कि चूंकि मामले को न्यायालय में सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया इसलिए जनजाति वर्ग के लिए आरक्षण का प्रतिशत वापस 32 से कम होकर 20 प्रतिशत हो गया। प्रदेश भर में आंदोलन होने लगा। इससे परेशान प्रदेश सरकार ने विशेष अधिवेशन बुलाकर विधानसभा में एक विधेयक पारित किया और इस विधेयक अनुसूचित जनजाति वर्ग को 32 प्रतिशत का कोटा बहाल करते हुए पिछड़े वर्ग को भी 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। इस कारण प्रदेश में कुल आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर 76 प्रतिशत हो गया। विधेयक पारित होने के बाद भी आरक्षण को लेकर बहस खत्म नहीं हो रही। राज्यपाल ने इस विधेयक पर अभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं और उन्होंने सरकार से कुछ सवाल भी पूछे हैं। आरक्षण को लेकर कांग्रेस पार्टी राज्यपाल पर भी राजनीति करने का आरोप लगाने लगी है। इन तमाम परिस्थिति के लिए अहम सवाल है यह है कि विधानसभा में पारित विधेयक का हश्र क्या होगा? अगर राज्यपाल विधेयक पर हस्ताक्षर कर भी देती है तो क्या यह मामला न्यायालय में नहीं जाएगा? और जब पूर्व में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण को जब न्यायालय ने खारिज किया है तो फिर 76 प्रतिशत को अनुमति कैसे मिलेगी। यह सवाल महत्वपूर्ण है और इसलिए युवाओं की चिंता जायज है जो आरक्षण की बहस के चलते परेशान है। परेशान इसलिए है क्योंकि उन्हें शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश नहीं मिल पा रहा है। परेशान इसलिए है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया थम गई है, नई भर्तियां नहीं हो रही है। एक अहम बात यह है कि जब संवैधानिक व्यवस्था में यह स्पष्ट है कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता तो फिर सरकार न्यायालय में इसे कैसे स्थापित करेगी। कुल मिलाकर प्रदेश में आरक्षण को लेकर जो बहस चल रही है उसमें समाज के वंचित वर्ग को लाभ पहुंचाने की मंशा कम और चुनाव में लाभ लेने की मंशा अधिक दिखाई दे रही है।

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