इंडिया – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Thu, 07 Sep 2023 06:43:37 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 संविधान सभा में बताए थे भारत के मायने https://samacharpacheesa.com/?p=7967 Thu, 07 Sep 2023 06:43:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7967 इंडिया बनाम भारत की चर्चा इस वक्त देश में सबसे ज्यादा हो रही है। अब जब चर्चा हो रही है कि क्या आधिकारिक रूप से देश का नाम बदलने वाला है। ऐसे में देश का संविधान लिखने वाली सभा की एक पर हुई बहस के बारे में जानना भी जरूरी होगा। जो बेहद दिलचस्प थी। संविधान का अनुच्छेद एक कहता है इंडिया, यानी भारत, राज्यों का एक संघ होगा। हालांकि, मूल मसौदे में भारत नाम का कोई जिक्र नहीं था। दरअसल, चार नवंबर 1948 को संविधान सभा में संविधान का मसौदा पेश किया गया था। यह मसौदा डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा तैयार किया गया था। लगभग एक साल बाद 17 सितंबर 1949 को अंबेडकर ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें पहले उप खंड में भारत नाम के संशोधन में बदलाव का सुझाव दिया गया। 18 सितंबर 1949 को आजाद देश को एक के बजाय दो नाम देने के प्रस्ताव के बारे में सदस्यों के बीच भारी असहमति देखने को मिली थी। प्रारंभिक प्रावधान पर संविधान सभा में इंडिया और भारत के बीच संबंध पर काफी चर्चा हुई। सदस्यों ने कई संशोधनों का सुझाव दिया लेकिन किसी को भी स्वीकार नहीं किया गया। अंबेडकर के बाद ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता एचवी कामथ ने पहले उप खंड के हिस्से को भारत या अंग्रेजी में इंडिया से बदलने का प्रस्ताव करते हुए पहला संशोधन पेश किया। कामथ यह प्रस्ताव आयरिश संविधान से प्रेरणा लेते हुए सामने लेकर आए थे। इसी चर्चा में कांग्रेस के एक अन्य सदस्य कमलापति त्रिपाठी भी जुड़े। कमलापति ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत को इंडिया से अधिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कमलापति ने संशोधन प्रस्ताव पर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। इस दौरान उन्होंने कहा, आज देश के नाम को लेकर एक संशोधन हमारे सामने है, मुझे खुशी होती अगर प्रारूप समिति ने इस संशोधन को किसी अलग रूप में प्रस्तुत किया होता। यदि इंडिया दैट इज भारत के अलावा किसी अन्य अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया गया होता तो मैं सोचता हूं, यह इस देश की प्रतिष्ठा और परंपराओं के अधिक अनुरूप होता और वास्तव में इससे इस संविधान सभा का भी अधिक सम्मान होता। यदि दैट इज शब्द आवश्यक होते तो, जो प्रस्ताव हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है उसमें भारत दैट इज इंडिया शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित होता। मेरे मित्र कामथ ने यह संशोधन पेश किया है कि ‘भारत जैसा कि इसे अंग्रेजी भाषा में इंडिया कहा जाता है का प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रारूप समिति ने इसे स्वीकार कर लिया था यदि वह अब भी इसे स्वीकार करती है तो यह हमारी भावनाओं और हमारे देश की प्रतिष्ठा के प्रति सराहनीय विचार होगा। हमें इसे स्वीकार करने में बहुत खुशी होती।

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इंडिया और भारत पर्यायवाची शब्द https://samacharpacheesa.com/?p=7959 Wed, 06 Sep 2023 07:02:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7959 राजनीतिक गलियारों में कहा यही जा रहा है कि आने वाले संसद के विशेष सत्र में देश को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ भारत कहे जाने वाले प्रस्ताव को पास कराया जा सकता है। लेकिन संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि देश के संविधान में इंडिया, दैट इज भारत का पहले से ही जिक्र है। इसलिए इंडिया और भारत यह दोनों नाम संविधान में दर्ज हैं और एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। संविधान विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में बदलाव तकरीबन नामुमकिन जैसा ही है। वहीं देश के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोर पकडऩे लगी है कि इंडिया को आधिकारिक तौर पर भारत पुकारे जाने से क्या भारतीय जनता पार्टी को कोई बड़ा सियासी लाभ मिल सकता है या नहीं। दरअसल राष्ट्रपति की ओर से 9 सितंबर को जी-20 कार्यक्रम के दौरान भारत मंडपम में आयोजित होने वाले डिनर के निमंत्रण पत्र में द प्रेसिडेंट ऑफ भारत की ओर से न्योता भेजा गया है। इसी निमंत्रण पत्र पर छपे भारत शब्द को लेकर अब सियासत होने लगी है। राजनीतिक पार्टियों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार देश के नाम पर भी हमला कर रही है। कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने कहा कि जब संविधान के अनुच्छेद एक में कहा गया है भारत जो की इंडिया था वह राज्यों का संघ है, तो उसमें इंडिया शब्द को क्यों हटाया जा रहा है। हालांकि कांग्रेस के नेता शशि थरूर कहते हैं कि जब संविधान में इंडिया और भारत दोनों का जिक्र है, तो इसमें संवैधानिक तौर पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस नाम को लेकर सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से भी बाकायदा भारत के समर्थन में ट्वीट और बयान दिए जा रहे हैं। हालांकि संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि इंडिया और भारत के नाम को लेकर किसी तरीके का कोई संवैधानिक विवाद नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है, इंडिया जो कि भारत है, राज्यों का एक संघ होगा। यह पहला मौका नहीं है जब भारत का नाम इस तरह से इस्तेमाल किया गया। ऐसे पहले भी कई मौके आए जब इंडिया की जगह पर भारत के नाम का जिक्र हुआ। जब संविधान में इसका जिक्र है कि फिर इस तरीके के निमंत्रण पर होने वाले विवाद का मतलब महज सियासी ही माना जा सकता है। भारत और इंडिया एक दूसरे के पर्यायवाची ही हैं। इसलिए यह कहना कि इंडिया की जगह पर भारत का नाम इस्तेमाल किया गया, वह किसी बहुत बड़े फेरबदल के संकेत हैं, ऐसा कानूनी रूप से संभव नहीं नजर आ रहा है और सियासी रूप से भी इसकी संभावना न के तौर पर दिख रही है। पासपोर्ट पर भी रिपब्लिक ऑफ इंडिया अंग्रेजी में दर्ज होता है, जबकि हिंदी में भारत का गणराज्य लिखा होता है।

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क्या इंडिया नाम रखकर विपक्ष ने तोड़ा कानून https://samacharpacheesa.com/?p=7454 Fri, 21 Jul 2023 07:14:03 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7454 विपक्षी दलों ने अपने गठबंधन को इंडिया नाम देकर एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। इस नाम को भारत के आधिकारिक नाम का दुरुपयोग बताते हुए दिल्ली के बाराखंबा थाने में 26 विपक्षी दलों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। लेकिन कानूनविदों की राय है कि चूंकि इंडिया शब्द को किसी संस्था या राजनीतिक दल के आधिकारिक नाम के तौर पर उपयोग नहीं किया गया है, इससे कोई आर्थिक लाभ लेने की कोशिश नहीं की गई है, और इसका कहीं रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराया जाना है, सर्वोच्च न्यायालय या चुनाव आयोग में इसे गैर कानूनी नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, यह किसी संस्था (यहां भारत देश) के नाम का उपयोग कर लोगों को भ्रम में डालने का मामला बन सकता है। भारतीय दंड संहिता के आधार पर यह गैरकानूनी और दंडात्मक है। इस मामले में इन राजनीतिक दलों पर कार्रवाई की जा सकती है। इन राजनीतिक दलों के द्वारा इंडिया की ओर से सोशल मीडिया में किए गए पोस्ट साक्ष्य के रूप में उपयोग किये जा सकते हैं। विपक्षी दलों के द्वारा इंडिया शब्द का उपयोग किसी भी तरह गैरकानूनी नहीं है। इस नाम का न तो कहीं रजिस्ट्रेशन कराया गया है, और न ही इससे कोई आर्थिक लाभ लेने की कोशिश की गई है, ऐसे में इसे अपराध नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि लोग अपना या अपनी संस्था का नाम भारत या हिंदुस्तानी रख लेते हैं। लेकिन यह अपराध नहीं है। वहीं, सर्वोच्च न्यायालय के वकील संजीव उनियाल ने कहा कि एंब्लेम एक्ट में यह साफ कहा गया है कि राज्य के नाम या प्रतीकों का किसी व्यक्ति या निजी संस्था के द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता। ऐसे में विपक्षी दलों का इंडिया का नाम उपयोग करना गलत है। सर्वोच्च न्यायालय भी इस मामले को सही नहीं कह सकता। भारतीय दंड संहिता में किसी व्यक्ति या संस्था के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था का नाम का छद्म रूप से उपयोग करना दंडनीय अपराध है। इससे लोगों को भ्रम हो सकता है और वे किसी बहकावे में आ सकते हैं। ऐसे में इसे अपराध माना गया है। जिस तरह किसी भी व्यक्ति के द्वारा अपना या अपनी संस्था का नाम सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग या नीति आयोग रखने की छूट नहीं मिल सकती क्योंकि इससे लोगों को भ्रम हो सकता है, और इसका दुरुपयोग हो सकता है, उसी प्रकार इंडिया या भारत रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि, इस संदर्भ में इंडिया की हर स्पेलिंग के बाद पूर्ण विराम का उपयोग किया गया है, इसे पूरी तरह इंडिया के नाम का दुरुपयोग नहीं कहा जा सकता। इसका एक संस्था या राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत न कराना भी इसके बचाव का एक कारण हो सकता है। लेकिन इस मामले में छद्म नाम का उपयोग कर लोगों को भ्रमित करने का मामला बन सकता है और इस कारण विपक्षी दलों की परेशानी बढ़ सकती है।

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पार्टी बदली, गठबंधन बदला, नाम- नारा बदला https://samacharpacheesa.com/?p=7432 Thu, 20 Jul 2023 07:06:25 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7432 लोकसभा चुनाव 2024 के लिए तैयारियों का बिगुल बज गया है। नेताओं ने पार्टियां बदलना शुरू कर दिया है, पार्टियों ने गठबंधन बदलना शुरू कर दिया है और गठबंधनों ने नाम और नारे बदलना शुरू कर दिया है। हम आपको बता दें कि कांग्रेस ने 2004 में जिस संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानि यूपीए की स्थापना की थी उसका नाम बदल कर इंडिया कर दिया गया है। इस इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस विरोधी आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस भी शामिल हो गयी हैं। एक तरफ विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों की संख्या 26 तक पहुँच गयी है तो दूसरी और देश में पहली बार गठबंधन सरकार के प्रयोग को सफल बनाने वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल दलों की संख्या 39 तक पहुँच गयी है। अब, आगामी लोकसभा चुनावों को एनडीए बनाम इंडिया करार दिया जा रहा है। इंडिया गठबंधन वाले टैगलाइन दे रहे हैं- जीतेगा भारत तो दूसरी ओर एनडीए कह रहा है कि आजादी के शताब्दी वर्ष तक हमें विकसित, आत्मनिर्भर और मजबूत भारत बनाना है। यानि एक तरफ सिर्फ इंडिया है तो दूसरी ओर विकसित और आत्मनिर्भर भारत। आप जरा गौर करेंगे तो यह भी पाएंगे कि इस समय नेताओं, राजनीतिक पार्टियों और गठबंधनों की जोरदार तरीके से रि-ब्रांडिंग हो रही है, यानि आपको नये कलेवर में पुराना माल ही परोसा जा रहा है। जमाना बदला है तो राजनीतिक दलों ने भी अपना अंदाज बदला है इसीलिए आपको आजकल नेता बाइक ठीक करते, खेत में धान रोपते, गली के बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते, गरीब के बच्चों को गोद में उठाते, ढाबे पर खाना खाते और मेट्रो ट्रेन या अन्य सार्वजनिक परिवहन के साधनों में आम यात्रियों के साथ यात्रा करते हुए दिख जाएंगे। आलीशान जिंदगी जीने वाले सभी नेताओं का प्रयास है कि अपने को गरीब और वंचितों के बीच का ही दिखाया जाये ताकि चुनावों के समय मतदाता ध्यान रखे कि अमुक नेता तो हमारे जैसा ही है इसलिए यदि उसे सत्ता मिली तो वह हमारा ध्यान रखेगा। जरा बेंगलुरु में हुई विपक्ष की बैठक को देखिये। उस बैठक में देश के गरीबों, वंचितों और शोषितों के हित में मिलकर काम करने का निर्णय लिया गया। लेकिन गरीबों, वंचितों, शोषितों के बारे में चिंता करने के लिए बेंगलुरु आने के लिए सभी नेताओं ने चार्टर्ड प्लेन का इस्तेमाल किया। एनडीए की बैठक को देखेंगे तो यह भी राष्ट्रीय राजधानी के एक बड़े पांच सितारा होटल में हुई। इन बैठकों का खर्च भी लाखों रुपए में आया होगा। बात यदि पार्टियों और गठबंधनों के नये रंग-रूप की करें तो इससे भले इन नेताओं, पार्टियों और गठबंधनों को लाभ हो जाये लेकिन जनता के लिए कुछ नहीं बदलने वाला है। क्योंकि पार्टी या गठबंधन का नाम भले बदल जाये नेता तो वही रहेंगे। और जब नेता वही रहेंगे तो उनकी नीयत भी वही रहेगी। जब नीयत वही रहेगी तो देश की नियति भी वही रहेगी।

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कांग्रेस की कुर्बानी मजबूरी या बड़प्पन? https://samacharpacheesa.com/?p=7410 Wed, 19 Jul 2023 06:59:43 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7410 2024 चुनाव को लेकर सरगर्मियां लगातार बढ़ती जा रही है। चुनाव में 1 साल से भी कम का वक्त है। ऐसे में इसको लेकर राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। वर्तमान में देखें तो ऐसा लगता है कि आगामी चुनाव एनडीए बनाम विपक्षी एकता रहने वाला है जिससे इंडिया का नाम दिया जा रहा है। आज की बेंगलुरु की बैठक से कई बड़े संदेश भी निकले हैं। इस बैठक पर पूरे देश की नजर थी। बैठक में 26 दलों के प्रमुख शामिल हुए। बैठक के बाद कहीं ना कहीं लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्षी दलों के राजनीति साफ तौर पर दिखाई देने लगी है। आज की बैठक के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने एक ऐसा बयान दिया है जिसके बाद कांग्रेस की कुर्बानी के चर्चे हो रहे हैं। विपक्ष की बैठक में खरगे ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष और पार्टी नेता पुराने सहयोगियों से समझौता करने के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य दौड़ लगा रहे। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि कांग्रेस को सत्ता या प्रधानमंत्री पद में कोई दिलचस्पी नहीं। हमारा इरादा अपने लिए सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय की रक्षा करना है। खड़के के बयान से इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस ने पहले ही प्रधानमंत्री पद से अपनी दावेदारी छोड़ दी है? इसे कांग्रेस की कुर्बानी भी समझी जा रही है। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ने यह कुर्बानी दी या फिर आत्मसमर्पण किया? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भविष्य को देखते हुए कांग्रेस की ओर से यह राजनीतिक सौदेबाजी है। कांग्रेस फिलहाल विपक्षी दलों को अपने भरोसे में रखना चाहती है। कांग्रेस यह नहीं चाहती कि 2024 चुनाव से पहले विपक्षी एकता में किसी भी तरह का रोड़ा उत्पन्न हो। कांग्रेस को अच्छे से पता है कि मिल बैठकर बात कर लेने भर से ही सारे मसले का हल नहीं निकलेगा, गठबंधन की असली परीक्षा सीट बंटवारे को लेकर होगी। ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी की ओर से दावा किया जा रहा है कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत है वहां कांग्रेस को मैदान खाली कर देना चाहिए। भविष्य में सीटों के बंटवारे में अड़चन ना आए इसलिए अभी से ही कांग्रेस ने अपना नरम रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस को यह बात अच्छे से पता है कि अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी जैसे नेताओं से डील नरम रुख के आधार पर ही हो सकता है। तेवर रखने पर मामला बिगड़ सकता है। कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है। सभी राज्यों में इसकी मौजूदगी है। ऐसे में कांग्रेस को यह लगता है कि अगर वह सबसे ज्यादा सीट जीत जाती है तो प्रधानमंत्री पद उसके पास से कहीं और नहीं जाएगा। यही कारण है कि सीट शेयरिंग के फार्मूले को लेकर कांग्रेस थोड़ा नाम रख रही है। कांग्रेस ने अभी से ही यह कुर्बानी इसलिए भी देनी शुरू कर दी है ताकि क्षेत्रीय दल भी जरूरत पडऩे पर कांग्रेस के लिए कुर्बानी दे सकें।

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