कर्नाटक विधानसभा चुनाव – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Thu, 25 May 2023 08:08:18 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाना चाहिए https://samacharpacheesa.com/?p=6983 Thu, 25 May 2023 08:08:17 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6983 कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम से कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों की एकता को बल मिला है। राज्य में कांग्रेस की यह सबसे बड़ी जीत कही जा सकती है क्योंकि उसे 1989 के बाद से सबसे अधिक 42.9 प्रतिशत वोट मिला है, वहीं भाजपा ने 36 प्रतिशत वोट ही प्राप्त किया है। कांग्रेस की तरफ से सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने से जनता ने उसे शानदार बहुमत देकर भाजपा को एक सबक देने की कोशिश की है। कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय की बैटिंग करके कांग्रेस के पुराने चरित्र को बदलने का प्रयास किया है। ऐसा नहीं है कि ऐसा इस चुनाव से शुरू किया गया है, बल्कि इसकी नींव रायपुर में कांग्रेस के 85वें अधिवेशन में अनुसूचित जाति, आदिवासी, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के लिए कांग्रेस प्रतिनिधियों और सभी पदों पर 50 फीसदी आरक्षण की घोषणा के रूप में पड़ी थी। इस मुद्दे को तब और बल मिला, जब ‘मोदी सरनेमÓ वाले बयान पर राहुल गांधी को सूरत की अदालत ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अपमान करने का दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनायी, जिससे उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द हो गयी। भाजपा ने राहुल गांधी पर ओबीसी के अपमान को लेकर हमले किये और इसी हमले को कांग्रेस ने कर्नाटक में सियासी हथियार बनाया। राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं में जातिगत जनगणना की मांग कर ‘जितनी आबादी, उतना हकÓ की वकालत कर इस नारे को असमानता से जोडऩे का सफल प्रयास किया। ठीक ऐसा ही नारा समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया देते थे- ‘पिछड़ा पावे सौ में साठÓ यानी राजनीति में हिस्सेदारी हो या संसाधनों पर अधिकार, पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी 60 फीसदी होनी चाहिए। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम का नारा था- ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। सामाजिक न्याय और समता के सवाल एक बार पुन: राष्ट्रीय राजनीति के विमर्श बदल रहे हैं। सामाजिक न्याय और जातिगत जनगणना के मुद्दे पर नीतीश कुमार देश के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे हैं। बिहार में हो रहे जातिगत सर्वेक्षण को पटना उच्च न्यायालय ने रोक दिया है, लेकिन जातिगत जनगणना के मुद्दे ने संपूर्ण विपक्ष को एक मंच पर लाने का काम अवश्य किया है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर लडऩे की जमीन भी कर्नाटक चुनाव ने तैयार कर दी है। इन मुद्दों के सूत्रधार नीतीश कुमार हैं। विभिन्न राज्यों के लगभग एक दर्जन से अधिक क्षेत्रीय पार्टियां जातिगत जनगणना कराने की मांग लंबे समय से कर रही हैं। इनमें डीएमके, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जेडीयू आदि प्रमुख हैं। देश में 1931 से अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की जाति की गणना होती आ रही है, इसलिए शेष जातियों की गणना भी बहुत जरूरी है। यदि कोई जाति सामाजिक संरचना में वंचना का शिकार है, तो उसे मुख्यधारा में लाने के लिए अतिरिक्त अवसर मुहैया कराया जाना चाहिए। ओबीसी वर्ग में कई जातियों को लंबे समय से सामाजिक अन्याय का शिकार होना पड़ा है।
कुछ जातियां सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से इतनी कमजोर हैं कि उनकी स्थिति दलित जातियों से भी अधिक खराब है। अत्यंत पिछड़ी जातियों के संदर्भ में मंडल आयोग के एकमात्र दलित सदस्य एलआर नाइक के असहमति नोट को पुन: देखने की जरूरत है, जिसमें उन्होंने ओबीसी आरक्षण को दो बराबर प्रमुख भागों में बांटने का सुझाव दिया था। उनका मानना था कि ओबीसी के अंदर एक खेतिहर वर्ग है और दूसरा वर्ग उन जातियों का है, जो कारीगरी, शिल्पकारी, बागवानी कर जीवनयापन करती हैं। ये जातियां अधिकांशत: भूमिहीन हैं और नब्बे के दशक में वैश्वीकरण के बाद इनकी स्थिति और बदतर होती गयी क्योंकि बाजार और तकनीक ने इनकी रोजी-रोटी की संभावनाओं को लगभग शून्य कर दिया। यही कारण है कि अब तक 10 राज्यों ने ओबीसी आरक्षण को दो या दो से अधिक भागों में बांटने की जरूरत समझी। इससे उन राज्यों में अति पिछड़ी जातियों की राजनीतिक एवं शैक्षणिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। इनमें प्रमुख रूप से तमिलनाडु और बिहार हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कर्पूरी मॉडल को लागू कर अति पिछड़ी जातियों को एक नयी राजनीतिक दिशा प्रदान की है।
भाजपा के लगातार चुनाव जीतने का प्रमुख कारण अति पिछड़ी जातियां हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अवश्य कर्नाटक में ओबीसी के हित में होने वाली नीतियों की पहचान कर ली और सामाजिक न्याय के मुद्दों को उछाल कर तमाम क्षेत्रीय दलों को लोकसभा चुनाव एक साथ लडऩे का आत्मविश्वास पैदा कर दिया है, लेकिन कांग्रेस अभी भी इन अति पिछड़ी जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल से अनभिज्ञ नजर आ रही है। क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस को अति पिछड़ी जातियों के समावेशी प्रतिनिधित्व के सवालों पर सोचने की जरूरत है तथा कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाते हुए क्षेत्रीय पार्टियों को उचित स्थान देने की जरूरत है ताकि भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में हराया जा सके।

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कर्नाटक के नतीजों से सबक https://samacharpacheesa.com/?p=6889 Tue, 16 May 2023 07:35:07 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6889 कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम ने किसी को चौंकाया नहीं, यहां तक कि एग्जिट पोल के नतीजे भी बता रहे थे कांग्रेस की बढ़त है। यह बात जरूर है की कांग्रेस को 136 सीटें मिल जायेंगी ऐसा नहीं लग रहा था। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए 113 का आंकड़ा बहुमत के लिए चाहिए। पिछले चुनाव में भाजपा ने 104 सीटें जीतकर भी सरकार नहीं बना पाई थी। जद एस और कांग्रेस ने मिलकर भाजपा से सत्ता छीन ली थी लेकिन कुछ समय बाद 16 कांग्रेस और जद एस के विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और भाजपा की सरकार बन गई। इस बार भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ और कांग्रेस को बड़ा फायदा हुआ और जनता दल एस को जनता ने नकार दिया। इस चुनाव के परिणाम ने कई सबक राजनेताओं को सिखाया है। पहला तो यह कि जनता के मुद्दों को छोड़कर अगर इधर उधर की बात करेंगे तो मीडिया में स्थान भले ही मिल जाय, वोट नहीं मिलेंगे। इस चुनाव में जिन 16 विधायकों ने इस्तीफा देकर भाजपा की सरकार बनने में मदद की थी, जनता ने उनको भी हरा दिया। इस प्रकार दलबदल का खेल करने वालों को सबक मिलेगी। कांग्रेस को जो ज्यादा सीटें मिली या भाजपा केवल 65 पर सिमट गई इसके पीछे जनता दल का कमजोर प्रदर्शन रहा। ऐसा लगता है बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में आने के बाद चुनाव में बजरंगबली प्रचार के केंद्र में आ गए थे। इस मुद्दा के गरमाने से अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण हुआ, जेडीएस का अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस की ओर चला गया जिसके कारण परिणाम एकतरफा कांग्रेस के पक्ष में चला गया। यह भाजपा की उम्मीदों के विपरीत रहा। इस चुनाव में भाजपा सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया गया, 40त्न कमीशन वाली सरकार के नाम से कांग्रेस आने प्रचार किया। अब मुद्दों को देखें तो छह माह बाद छत्तीसगढ़ में भी चुनाव होने हैं, ऐसे में भ्रष्टाचार यहां भी मुद्दा बना तो कांग्रेस को जवाब देना मुश्किल होगा। कर्नाटक चुनाव में भी जनता को अधिकाधिक रेवड़ी बांटने की घोषणा की गई थी, यह भी निश्चित तौर पर चुनाव में मतदाताओं में प्रभावी रहा। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में जो घोषणाओं की थी और आगामी चुनाव में किसान, धान और गोबर का मुद्दा भी चलेगा। इन मुद्दों पर भाजपा को भी गौर करना होगा।

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