कांग्रेस पार्टी – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Sat, 15 Jul 2023 07:02:48 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 भ्रष्टाचार पर आमने सामने की राजनीति https://samacharpacheesa.com/?p=7341 Sat, 15 Jul 2023 07:02:47 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7341 छत्तीसगढ़ में चुनाव निकट है, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं। केंद्र में स्थिति अलग है, भाजपा आज भी कांग्रेस के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को 9 साल बाद भी मुद्दा बनाए हुए हैं। शुक्रवार को एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुए कोयला घोटाले के आरोपी कांग्रेस पार्टी के सांसद और उनके पुत्र को कोर्ट ने दोषी ठहराया है। लेकिन विपक्ष के पास अभी केंद्र सरकार के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं है। छत्तीसगढ़ में विचित्र स्थिति है, कांग्रेस पार्टी की सरकार है और डॉ. रमन सिंह सरकार पर अभी भी कांग्रेस के नेता भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है। यह समझ से परे है कि सरकार की ताकत कांग्रेस के पास है। प्रशासनिक अमला है, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करने वाली व्यवस्था है, कोर्ट है, सब कुछ है लेकिन सरकार कारवाई नहीं कर पा रही है। ऐसी बात नहीं है कि भूपेश सरकार कुछ करना नहीं चाहती, 2018 दिसंबर में सरकार बनने के बाद एक के बाद एक जांच टीम एसआईटी का गठन किया है। लेकिन पौने पांच साल के बाद भी एसआईटी की टीम किसी आरोप को साबित नहीं कर पाई है। दूसरी ओर प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं, कोयला में परिवहन परमिट के नाम पर अवैध वसूली का घोटाला 500 करोड़ से ऊपर का है। शराब घोटाला तो अपने आप में अनोखा है। कोई सरकार पर अपने खजाने में आने वाले राजस्व की चोरी करने जा आरोप तो निराला ही है। ये आरोप कोई हवा में नहीं हैं बल्कि प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने बकायदा जांच करके कोर्ट में जो चलन प्रतीत किया है उसमें पूरा विवरण दिया है। जब भी इस प्रकार के भ्रष्टाचार का उल्लेख भाजपा करती है तो कांग्रेस पार्टी के नेता भाजपा सरकार के समय भ्रष्टाचार की दुहाई देने लगते हैं मानो पिछली सरकार पर आरोप लगाने से वर्तमान सरकार को घोटाले करने का परमिट मिल जाता है। अपने घोषणा पत्र में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने कांग्रेस पार्टी ने मजबूत लोक आयोग बनाने का संकल्प लिया था जिसकी सीमा में मुख्यमंत्री भी आते हैं लेकिन सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना तो दूर जो आरोप खुद कांग्रेस लगाती थी, उन पर कार्यवाही करने में सरकार अक्षम है। लगता है छत्तीसगढ़ की राजनीति में भ्रष्टाचार का मुद्दा केवल आरोप प्रत्यारोप तक सीमित रहेगा। इन्हीं कारणों से जनता के मन में राजनेताओं के बारे में धारणा बनती जा रही है कि सभी भ्रष्ट होते हैं। ऐसा विचार फिर समाज में भ्रष्टाचार को मान्यता दे देता है जैसे कि प्रशासन में अधिकायिों और कर्मचारियों को मान्यता मिली हुई है। नेता भी अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं लड़ेगा तो इस नासूर का ईलाज कौन करेगा?

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असली शराब पीने से होने वाली मौतें https://samacharpacheesa.com/?p=6943 Fri, 19 May 2023 08:22:32 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6943 प्रदेश में शराब लगातार एक राजनीतिक विषय बना हुआ है, 2018 के पहले डॉ. रमन सरकार में शराब की समस्या पर विधानसभा में चर्चा होती थी। ऐसी रिपोर्ट आती रहीं जिसमें कहा गया छत्तीसगढ़ शराब पीने में अव्वल राज्य है। दूसरी ओर सरकार ने शराब की पूर्ण बंदी के स्थान पर आंशिक बंदी का रास्ता निकाला और पहले 500 की आबादी और उसके बाद 1000 की आबादी वाले गांवों में शराब की दुकानें बंद कर दी गई। इसका असर यह हुआ कि कोचिए गांव में जाकर शराब का अवैध कारोबार करने लगे। भारत माता वाहिनी का गठन किया गया, गुलाबी गैंग की महिलाओं ने शराबियों के खिलाफ हाथ में लाठी लेकर मोर्चा खोल दिया। कुल मिलाकर शराब की सामाजिक बुराई को देखते हुए इस पर अंकुश लगाने की मांग महिलाओं की ओर से आती रही क्योंकि वे ही इस नशे की सबसे ज्यादा भुक्तभोगी हैं। माहौल को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में पूर्ण शराबबंदी का वादा किया। सरकार बनी लेकिन चार साल के बाद शराबबंदी करने में सरकार हिचक रही है। एक तरफ एक समिति का गठन किया गया है जिसकी अब तक कोई रिपोर्ट नहीं मिल पाई है दूसरी ओर मुख्यमंत्री स्पष्ट यह कह रहे हैं कि प्रदेश में सरकार शराबबंदी नहीं करेगी। इसके लिए तर्क यह दिया जा रहा है कि शराबबंदी के बाद नशे के आदी नकली शराब पियेंगे और उनकी मौत होगी। इसका उदाहरण कोरोना काल में लॉकडाउन के समय शराब नहीं मिलने के कारण स्पिरिट या सेनेटाइजर पीने से हुई दो लोगों की मृत्यु को बताया जा रहा है। लेकिन शराब नहीं मिलने से कितने शराब के आदी इस नशे से दूर हो गए थे, इसकी कोई रिपोर्ट सरकार के पास नहीं होगी? इससे इतर जो अपराध और दुर्घटनाओं में मौतें असली शराब पीने के कारण हो रही है, क्या सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड है? समाचार पत्र में शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब शराब पीने के लिए पैसे के लिए, शराब पीने के बाद नशे में लड़ाई होने के कारण हत्याओं की खबरें नहीं छपती। एक बेटे ने अपने माता-पिता और दादी की हत्या शराब की लेट के चलते कर दी। क्या यह मौतें शराब के कारण नहीं हो रही हैं। सरकार पर 2000 करोड़ रूपए के शराब घोटाले के आरोप लग रहे हैं, ये आरोप राजनीतिक नहीं बल्कि प्रवर्तन निदेशालय ईडी की छानबीन के बाद कोर्ट में हलफनामा देते हुए हुए लगाए गए हैं। इस बात पर सरकार पीठ थपथपा सकती है कि शराब से आबकारी राजस्व बढ़ रहा है। लेकिन इस कमाई के पीछे कितने परिवार का दर्द छुपा है, उसका आंकलन कौन करेगा? सरकार को चाहिए कि शराबबंदी न सही, शराब के कारोबार, बिक्री की मात्रा को नियंत्रित तो करे।

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नंदकुमार साय की नई राजनीतिक पारी https://samacharpacheesa.com/?p=6810 Tue, 02 May 2023 08:42:32 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6810 भारतीय जनता पार्टी में संगठन में कुछ ऐसे नियम बनाएं हैं जो भारत की स्वतंत्रता के बाद की राजनीति की दृष्टि से हटकर है। एक निर्णय यह लिया गया है कि भाजपा में सक्रिय राजनीति करने की आयु सीमा 75 वर्ष तय कर दी गई है। इस आयु सीमा पार महत्वकांक्षा पाले अनेक भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के मन में उपेक्षा किए जाने की टीस है। कांग्रेस पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दल भाजपा पर अपने वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हैं। ऐसा ही आरोप लगाकर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता नंदकुमार साय अपनी 50 साल की राजनीतिक यात्रा में भाजपा की गाड़ी को छोड़ कांग्रेस पार्टी की सवारी कर ली है। रविवार अचानक उनके इस्तीफे की खबर आई और अगले दिन सुबह मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेशाध्यक्ष मोहन मरकाम की उपस्थिति में कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ले ली। इस निर्णय से कई तरह के राजनीतिक सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि साय के पार्टी छोडऩे से भाजपा को क्या नुकसान और कांग्रेस में शामिल होने से कांग्रेस को क्या फायदा मिलेगा। पहली बात यह कि नंदकुमार साय जिस पीढ़ी के राजनेता वे अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। दूसरी बात श्री साय ने अपना आखिरी लोकसभा चुनाव 2004 में लड़े थे। इसके बाद 2009 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था। इसका मतलब है कि नंदकुमार साय लगभग 19 वर्षों से चुनावी राजनीति से बाहर है. इस बीच नई पीढ़ी राजनीति और मतदाता के रुप में खड़ी हो चुकी हैं। इसलिए नंदकुमार साय की राजनीतिक पहचान लगभग लुप्तप्राय है, मतलब आगामी चुनाव में श्री साय के भाजपा छोडऩे और कांग्रेस में शामिल का कोई ज्यादा असर नहीं पडऩे वाला। इधर नंदकुमार साय ने पार्टी में उपेक्षा की बात कही है। पहली बात तो यह कि 2021 में 75 वर्ष पूरा कर लेने के बाद वे केवल मार्गदर्शक की भूमिका में हो सकते हैं। दूसरी बार 2020 से पहल इनकी संसदीय यात्रा 1977 से प्रारंभ होती है जब वे पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। तब से लेकर 2016 तक वे लगातार चुनावी राजनीति के केंद्र में रहे। तीन बार लोकसभा के चुनाव और एक बार राज्यसभा के निर्वाचित हो चुके हैं। वहीं, तीन बार विधानसभा के लिए भी निर्वाचित हुए हैं। जितना श्रेय उनकी राजनीतिक यात्रा में उनको मिली जीत है, उतनी बार ही वे चुनाव भी हारे हैं। 1984, 1991 और 1998 में वे लोकसभा का चुनाव हारे हैं तथा 1980 और 2003 में विधानसभा का चुनाव हारे हैं। अब अगर उनके चुनाव लडऩे की यात्रा को देखे तो पार्टी ने उनको टिकट देने में कभी कोताही नहीं बरती। जैसे 1980 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद 1984 में लोकसभा का टिकट दिए, जिसे वे हार गए इसके बावजूद 1985 में विधानसभा का टिकट मिली। इसी तरह 1998 में लोकसभा का चुनाव हारने के बाद उसी साल विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत कर आए। वे 2003 में अजीत जोगी से चुनाव हारे तो 2004 में उन्हें लोकसभा का टिकट मिला और जीतकर सांसद बने। इस प्रकार जिस पार्टी ने उनके राजनीतिक कद को महत्व दिया उसे अचानक छोड़ देना उनके लिए भी बहुत मुश्किल निर्णय रहा होगा.

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रायपुर मेें कांग्रेस का महाधिवेशन https://samacharpacheesa.com/?p=6468 Tue, 28 Feb 2023 05:56:24 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6468 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद कांग्रेस पार्टी का छत्तीसगढ़ में पहला अधिवेशन रायपुर में संपन्न हुआ। देशभर से हजारों की संख्या में पार्टी के बड़े नेता रायपुर आए और पार्टी की भूत, वर्तमान और भविष्य पर चिंतन-मनन किया। आयोजन की दृष्टि से कांग्रेस महाधिवेशन सफल रहा। पहली सफलता तो सुव्यवस्थित एवं भव्य आयोजन को लेकर रही तो दूसरी सफलता कांग्रेस पार्टी अपने संविधान में संशोधन कर 2 दिनों में 6 प्रस्ताव पारित किया जिससे पार्टी को इस वर्ष अनेक राज्यों में होने वाले चुनाव और आगामी वर्ष लोकसभा के महत्वपूर्ण चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं को दृष्टि मिली। इस सफलता के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कद भी राष्ट्रीय स्तर पर निश्चित बढ़ा होगा। तमाम सफलताओं के बीच में 2-3 बातों पर गौर करने की जरुरत है। पहली बात तो यह कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी गई। इस लड़ाई में वैचारिक स्पष्टता थी जिसके आधार पर स्वतंत्रता के बाद संविधान में प्रावधान किए गए। संविधान सभा की चर्चा हो रही थी तब जनजातीय, सामाजिक समरसता, मौलिक अधिकार को लेकर लंबी बहस हुई थी। देश की राजनीति 1950 से लेकर 1990 तक कांग्रेस पार्टी के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। पं. जवाहर लाल नेहरु ने समाजवादी दृष्टिकोण के साथ मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति बनाई जिसे 1991 में पी.व्ही. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने बदलकर उदारीकरण की नीति अपना ली। पिछले 70 वर्षों के दौरान राष्ट्रीय महत्व की दृष्टि से जिस प्रकार की नीति पर कांग्रेस चलती रही उस दृष्टि में एक बदलाव रायपुर के अधिवेशन में पारित 6 प्रस्तावों में देखा जा सकता है। मसलन, कृषि संबंधी प्रस्ताव को लेकर कृषि ऋण की वसूली, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि उपज की खरीदी और कृषि मजदूरों के हितों की रक्षा को लेकर जो प्रावधान किए गए है वह छत्तीसगढ़ से प्रेरित लगते है। देशभर में किसानों को न्याय योजना के तहत प्रति एकड़ 10 हजार रुपए सब्सिडी देने की बात प्रस्ताव में कही गई है। जो पार्टी 70 में से 50 वर्षों तक सरकार में रही वह किसानों और खेती की बदहाली को दुरुस्त करने के लिए न्याय योजना की बात करें तो मान लेना चाहिए कि अब तक भारत की कृषि नीति असफल रही है। इसी तरह सामाजिक प्रस्ताव में जनजातीय धर्म को जनगणना में अलग स्थान देने की मांग को स्वीकार करना व जातीय जनगणना का वादा करना भी कांग्रेस पार्टी की पिछले 70 वर्ष की सामाजिक नीति में बदलाव है। यह बदलाव किसी भी हाल में चुनाव जीतने और सरकार बनाने के लिए किया गया है, ऐसा लगता है।

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प्रदेश कांग्रेस संगठन में अंदरुनी कलह https://samacharpacheesa.com/?p=6215 Sat, 11 Feb 2023 05:50:54 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6215 कांग्रेस पार्टी के लिए संगठन के भीतर कलह होना या बड़े नेताओं की गुटबाजी के कारण विवाद होना कोई नई बात नहीं है। यही आश्चर्य का विषय है कि 2018 के विधानसभा चुनाव के समय पार्टी एकजुट होकर कैसे लड़ी? 2003-2018 के बीच ज्यादातर चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार के पीछे बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई बहुत हद तक जिम्मेदार थी। पूर्व प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के पहले सभी बड़े नेताओं को एकसूत्र में पिरो दिया था। लेकिन सरकार बनने के बाद जब मोहन मरकाम प्रदेश के अध्यक्ष बने उसके बाद सत्ता और संगठन के बीच मनमुटाव शुरु हो गया है। अभी कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी संगठन महामंत्री अमरजीत चावला को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस शिकायत के बाद जारी किया गया है जिसमें रायपुर में हो रहे कांग्रेस पार्टी के अखिल भारतीय महाधिवेशन के आयोजन समिति में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम का नाम कर दिया गया था। पिछले दिनों भानुप्रतापपुर में हुए उपचुनाव के दौरान अरविन्द नेताम ने सर्वआदिवासी समाज के उम्मीदवार के पक्ष में बयान दिया था। स्वाभाविक है कि यह पार्टी विरोधी गतिविधि में आता है लेकिन दो माह बीत गए कांग्रेस पार्टी ने उनके पार्टी विरोधी गतिविधि के कारण कोई नोटिस जारी नहीं किया गया। इसका मतलब है कि अरविन्द नेताम अभी भी कांग्रेस पार्टी के नेता है। दूसरी ओर उनकी वरिष्ठता और केंद्र में मंत्री होने के व पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के निकट होने के कारण केंद्र के बड़े कांग्रेसी नेता उनका सम्मान करते है। नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी हरियाणा से आई कुमारी शैलजा का भी अरविन्द नेताम के प्रति सम्मान है। संभव है कि यह आयोजन समिति में अरविन्द नेताम का नाम शामिल करने की पहल स्वयं प्रदेश प्रभारी ने की हो। इस आधार पर प्रभारी संगठन महामंत्री अमरजीत चावला ने जो सूची जारी कि उसमें अरविन्द नेताम का नाम आ गया। दूसरी ओर इस घटना के कारण संगठन के भीतर अध्यक्ष मोहन मरकाम और प्रभारी महामंत्री के विरोधियों को उनके खिलाफ माहौल बनाने का एक अवसर मिल गया। केंद्रीय नेतृत्व से भी तो प्रदेश अध्यक्ष की भी शिकायत की गई थी। लेकिन नोटिस अरविन्द नेताम और अमरजीत चावला के नाम जारी किया गया है। यह घटना कांग्रेस पार्टी में सत्ता और संगठन के बीच वर्चस्व की लड़ाई की ओर इशारा करता है। चुनाव के पहले सत्ता और संगठन की यह लड़ाई पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है। कांग्रेस पार्टी को एकजुट बनाए रखने के लिए समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी प्रदेश प्रभारी महासचिव की है।

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टी.एस. सिंहदेव का राजनीतिक भविष्य https://samacharpacheesa.com/?p=5369 Thu, 22 Dec 2022 05:51:23 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5369 2022 का साल विदा होने को है, जैसे ही कैलेण्डर 2023 का चढ़ेगा वैसे छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव का वातावरण बनने लगेगा। राज्य बनने के बाद पहली बार चुनाव जीतकर सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी के लिए आगामी चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए नहीं कह सकते है क्योंकि 15 साल के लंबे शासन के लिए एंटी-इनकमबैंसी माहौल के चलते 2018 का विधानसभा का चुनाव जितना कांग्रेस जीती नहीं उससे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी चुनाव हारी है। अब 2023 का चुनाव कांग्रेस पार्टी को जीतना होगा। जिस प्रकार का बहुमत 2018 में मिला वह तो 1990 के बाद ऐतिहासिक ही रहा, इसलिए फिर वही चमत्कार होगा इसकी संभावना कम है। पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत के पीछे जो भी कारण रहे उसमें एक बड़ा कारण पार्टी के सभी बड़े नेताओं का एकजुट होकर चुनाव लडऩा था। सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री कोई एक ही बनता है। इसलिए वरिष्ठ नेताओं के बीच में अनबन और गुटबाजी सामान्य बात है। कांग्रेस पार्टी के लिए तो यह और अधिक सामान्य है। पिछले चुनाव के बाद 4 वरिष्ठ नेताओं को खुश करने का प्रयास किया गया। डॉ. चरणदास महंत विधानसभा के अध्यक्ष बन गए, भूपेश बघेल के मंत्रिमंडल में टी.एस. सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू वरिष्ठ मंत्री के रुप में शामिल हुए। ये तीनों मंत्री को पार्टी हाईकमान ने समकक्ष माना था तभी तो सबसे पहले शपथ लेने वालों में ये तीन मंत्री शामिल थे। ढाई साल तक सब कुछ ठीक चलता रहा। जून 2021 में जैसे ही ढाई वर्ष पूरे हुए मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने ढाई साल मुख्यमंत्री का मुद्दा छेड़ दिया। इसके बाद तो मामला दिल्ली तक पहुंच गया और इस बीच कांग्रेस पार्टी के विधायकों ने अपने मंत्री टी.एस. सिंहदेव के खिलाफ में गंभीर आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया। तब से लेकर आज तक एक बात तो तय है कि टी.एस. सिंहदेव और मुख्यमंत्री के बीच में व्यवहार सामान्य नहीं है। ऐसा लगता है टी.एस. सिंहदेव हिमाचल प्रदेश चुनाव के कारण कुछ समय तक शांत बैठे थे क्योंकि उनकी बहन आशा कुमारी हिमाचल प्रदेश में चुनाव लड़ रही थीं और मुख्यमंत्री पद की दावेदार भी थीं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हिमाचल प्रदेश के प्रभारी थे और हिमाचल में कांग्रेस पार्टी अच्छे बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही लेकिन आशा कुमारी चुनाव हार गईं। अब ऐसा लगता है कि टी.एस. सिंहदेव फिर से मुखर होंगे और ऐसा उन्होंने अपनी राजनीतिक भविष्य के फैसले को लेकर मीडिया के सामने जो बात कही उससे भी स्पष्ट होता है। चुनाव के पहले वे कांग्रेस में रहकर चुनाव लड़ेंगे या कांग्रेस के बाहर रहकर, यह देखने वाली बात होगी। हालांकि बाबा आचार-विचार से कांग्रेसी है और इस भावना को उन्होंने समय-समय पर उजागर भी किया है।

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भूपेश सरकार के चार साल https://samacharpacheesa.com/?p=5269 Sat, 17 Dec 2022 05:53:45 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5269 छत्तीसगढ़ प्रदेश में भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार को 4 साल पूरे हो गए। सरकार ने इस दिन को छत्तीसगढ़ गौरव दिवस के रुप में मनाने का निर्णय लिया है। राज्य बनने के बाद लगातार 3 बार चुनाव हारने के कारण 15 साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी है। इसलिए पार्टी में भी उत्साह है और सरकार में भी। इस सरकार के 4 साल के कार्यकाल की समीक्षा करें तो कोरोना संक्रमण के कारण जो सालभर लॉकडाउन और भय का वातावरण रहा उसने सरकार के कामकाज को प्रभावित किया। इधर सरकार बनने के बाद भूपेश मंत्रिमंडल ने गांव, ग्रामीण और किसान को केंद्र में रखकर नीतियां और कार्यक्रम बनाया। किसानों को धान का 2500 रुपए प्रति क्विंटल से अधिक का मूल्य मिलना इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। धान का अधिक समर्थन मूल्य भारत के किसी राज्य में नहीं दिया जा रहा है। भले ही इस मदद के बावजूद सीमांत और छोटे किसानों की जिंदगी में कोई बहुत फर्क नहीं पडऩे वाला फिर भी किसानों की जेब में पैसे पहुंचाने का काम इस सरकार ने किया। गोबर खरीदने और उससे जैविक खाद बनाकर किसानों को बेचने का कार्यक्रम भी अनोखा ही है। एक तरफ गोबर बेचकर गौ-पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है वहीं गोबर खाद का खेतों में उपयोग कर जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह सरकार किसानों को रिझाने में तो सफल रही है लेकिन विकास के काम जिसमें स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं है। विपक्ष भारतीय जनता पार्टी ने पत्रकार वार्ता कर सरकार के ऊपर अनेक आरोप मढ़े है, जिनमें कानून की बिगड़ती व्यवस्था, भ्रष्टाचार का बढऩा और प्रदेश में भारी-भरकम कर्ज लेने के कारण वित्तीय स्थिति गड़बड़ाने के आरोप प्रमुख है। यह बात कुछ हद तक सही है कि पिछले 4 वर्षों में प्रदेश सरकार ने सीमा से ज्यादा कर्जा लिया है। लेकिन इस कर्ज का फायदा अगर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में नहीं हुआ तो भावी पीढ़ी को यह कर्ज भारी पड़ेगा। प्रदेश में आज भी गीरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। वनक्षेत्रों में रहने वाले जनजाति समाज और छोटे किसान की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए एक बड़ी योजना के साथ काम करने की आवश्यकता है। सरकार बनने के पहले कांग्रेस पार्टी ने जो जनघोषणा जारी किया था उसमें भी प्रदेश के सर्वांगीण विकास का रोडमैप है। क्या करें चुनाव 5 साल के लिए होते है और चुनाव लडऩा और जीतना ही राजनीति का मुख्य लक्ष्य है इसलिए लंबी सोच और बड़ी योजना बनते-बनते रह जाती है।

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस की नई प्रभारी https://samacharpacheesa.com/?p=5171 Tue, 13 Dec 2022 05:53:44 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5171 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के प्रभारी महासचिव पीएल पुनिया के स्थान पर हरियाणा की वरिष्ठ नेत्री कुमारी शैलजा को नियुक्त किया गया है। वैसे तो किसी राज्य में प्रभारी महासचिव का मुख्य कार्य पार्टी के केंद्रीय संगठन और राज्य संगठन के बीच तालमेल बनाना होता है। लेकिन जब किसी राज्य में सत्तारुढ़ पार्टी के महासचिव नियुक्त होते है तो सबसे पहले उन्हें राज्य के भीतर सत्ता और संगठन के बीच तालमेल बनाना पड़ता है। पीएल पुनिया 2018 विधानसभा के पहले जब प्रभारी महासचिव नियुक्त किए गए थे तब कांग्रेस पार्टी लगातार 3 चुनाव हारने के बाद सरकार बनाने की कोशिश में लगी हुई थी। उस समय पार्टी के कद्दावर नेता अजीत जोगी पार्टी छोड़कर जा चुके थे। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी के भीतर 4 बड़े चेहरे मौजूद थे, जिन पर आगामी चुनाव जीताने का दारोमदार था। प्रदेश के अध्यक्ष भूपेश बघेल थे और नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव। अन्य 2 नेताओं मेें कांग्रेस सरकार मंत्री रहे चरणदास महंत और तत्कालीन सांसद ताम्रध्वज साहू शामिल थे। पीएल पुनिया की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने प्रदेश के इन चारों चेहरों को बांधकर रखा और पूरे चुनाव के दौरान किसी के बीच कोई मतभेद जैसी खबरें सामने नहीं आई। कहा जा सकता है कि कांग्रेस संगठन को एकजुट रखकर नेताओं के बीच तालमेल बनाने में श्री पुनिया सफल रहे जिसका परिणाम 4 साल पहले देखने को मिला। अब चारों नेताओं में से एक वर्तमान में मुख्यमंत्री है अन्य दो उनके मंत्रिमंडल के सदस्य है तथा चरणदास महंत विधानसभा के अध्यक्ष है। पिछले कुछ समय से कांग्रेस की राजनीति में जो कुछ हो रहा है उससे एक बात तो स्पष्ट है कि पार्टी के इन चारों चेहरों में अब पहले वाला तालमेल और विश्वास नहीं है। इसलिए कुमारी शैलजा की पहली चुनौती कांग्रेस पार्टी परिवार को एकजुट कर बड़े नेताओं के बीच तालमेल बैठाना होगा। इधर भूपेश बघेल सरकार के 4 वर्ष पूरे हो गए है। इन 4 वर्षों में कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है जिन्हें लगता है कि सरकार आने के बाद उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। बड़ी संख्या में कार्यकर्ता असंतुष्ट है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं को मनाना और चुनाव के लिए उन्हें काम पर लगाना यह कुमारी शैलजा के लिए दूसरी चुनौती है। पीएल पुनिया प्रभारी के तौर पर जब छत्तीसगढ़ आए तो उनका लक्ष्य प्रदेश में सरकार बनाना था, वे इसमें सफल रहे। अब काग्रेस पार्टी सरकार में रहते जब चुनाव लड़ेगी तो उसे दोबारा जीत हासिल कराना कुमारी शैलजा की सबसे बड़ी चुनौती है।

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