किसानों – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Fri, 21 Jul 2023 08:32:02 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 किसानों को सहकारी समितियों ने जो बीज बांटा, 40-50 फीसदी से भी कम हो रहा उसका अंकुरण, किसान निराश https://samacharpacheesa.com/?p=7462 Fri, 21 Jul 2023 08:32:01 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7462 गौरेला पेंड्रा मरवाही। छत्तीसगढ़ सरकार एवं बीज निगम द्वारा आदिवासी सेवा सहकारी समितियों में किसानों के लिए उपलब्ध कराए गए उन्नत किस्म के बीज किसानों के लिए बेकार साबित हो रहे हैं, खेतों में रोपा लगाने के पहले किसानों द्वारा तैयार की जाने वाली धान की नर्सरी में यह बीज जम ही नहीं रहे हैं। जो भी क्षेत्रों में जम रहे हैं उनका प्रतिशत भी 40 से 50 प्रतिशत ही है ऐसे में समय व्यतीत होने के साथ किसानों को खेती में नुकसान होने का डर सता रहा है।
मानसून की बारिश होने के पहले ही किसान धान की फसल के लिए खेतों को तैयार करना शुरू कर देते हैं। वहीं, बारिश होने के पहले उन्नत किस्म के बीज खरीदते हैं ज्यादातर किसान छत्तीसगढ़ शासन बीज निगम द्वारा सहकारी समितियों में आपूर्ति किए गए उन्नत किस्म के बीजों का ही चयन करते हैं क्योंकि इन बीजों की उत्पादन क्षमता के साथ-साथ रोगों से लडऩे की क्षमता परंपरागत बीजों से अधिक होती है। पर इस बार पेंड्रा मरवाही क्षेत्र में सहकारी समितियों द्वारा उपलब्ध कराए गए उन्नत किस्म के बीज जिसमें 1010 किस्म का धान शामिल है, जिसे क्षेत्र के लोग बहुतायत में बोते हैं। जब इस बार किसान 1010 किस्म के धान बीज की नर्सरी तैयार करने के लिए उसे खेतों में बोया गया तब इन बीजों का अंकुरण 40 से 50 प्रतिशत ही हुआ जबकि कुछ किसानों के खेतों में इसका अंकुरण और भी कम रहा।
जिसकी वजह से किसान अब दोहरी मार झेलने को विवश हैं क्योंकि जहां एक तरफ उनके द्वारा बोले गए बीज बेकार साबित हो रहे हैं तो वहीं धान बुवाई का समय भी तेजी से बीतता जा रहा है। अब किसान को मजबूरी में अधिक उपजाऊ रोपा पद्धति को छोड़कर सुखी बुआई करना होगा पर इसमें किसानों को धान के उत्पादन का नुकसान तो होगा ही साथ ही खेती के लिए नए बीजों का भी करना पड़ेगा। वही इस पद्धति से धान लगाने पर रोग लगने का खतरा भी अधिक होता है। यही हाल खुले बाजार से खरीदे गए इस किस्म के धान का भी है खुले बाजार से खरीदे गए किसान भी इन बीजों के कम अंकुरण से परेशान हैं।
धान के अच्छे उत्पादन के लिए किसान अधिक मूल्य पर सहकारी समितियों से उन्नत किस्म के बीज खरीदता है ताकि उसकी फसल रोगमुक्त हो एवं उत्पादन भी अच्छा हो पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। हालांकि, इस पूरे मामले की जानकारी कृषि विभाग के पास भी है उन्होंने कुछ किसानों के बीज का सैंपल भी लिया है। लगभग 80 सैंपल में से 10 सैंपल की रिपोर्ट आई है विभाग का कहना है कि रिपोर्ट पॉजिटिव है पर फिर भी उसे बाकी रिपोर्ट का इंतजार है। पर किसानों को अब जो नुकसान हो रहा है इसकी भरपाई करने के लिए विभाग के पास भी कोई कार्य योजना नहीं है।
छत्तीसगढ़ शासन कृषि विभाग एवं बीज निगम की जिम्मेदारी है कि किसानों को उन्नत किस्म के बढिय़ा बीज को उपलब्ध कराएं। लेकिन किसान जिस तरह घटिया बीजों को पाकर इस बार परेशान हुए हैं उससे स्पष्ट है कि बीज निगम ने अपना काम कितनी शिद्दत से किया है। अब किसानों को होने वाले नुकसान के संबंध में विभाग एवं सरकार को संज्ञान लेने की आवश्यकता है ताकि किसान इस तरह के नुकसान की भरपाई हो सके।

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फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य की चर्चा https://samacharpacheesa.com/?p=6169 Thu, 09 Feb 2023 06:02:21 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6169 प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्र की भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए यूपीए के 9 साल और मोदी सरकार के 9 साल के बीच न्यूनतम समर्थन मूल्य की बढ़ोतरी की तुलना की। उन्होंने अपने ट्वीट में बताया कि यूपीए के 9 साल की सरकार में एमएसपी 134 प्रतिशत बढ़ा। जबकि मोदी सरकार के 9 साल में यह बढ़ोतरी मात्र 55 फीसदी है। वैसे तो आर्थिक विषयों को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए। लेकिन पूरी दुनिया में आर्थिक विचारधारा के नाम पर ही राजनीति चल रही है। कई बार ऐसे आर्थिक विषयों पर भी राजनेता अपनी पीठ थपथपाते है जिनसे बड़ी संख्या में गरीबों का कोई भला नहीं होता लेकिन देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाती है। यह बात सही है कि मनमोहन सिंह सरकार के समय फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी। अभी प्रदेश सरकार किसानों के धान को 2600 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीद रही है। इसका मतलब है केंद्र सरकार के समर्थन मूल्य से 600 रुपए अधिक का मूल्य किसानों को मिल रहा है। लेकिन डॉ मनमोहन सिंह सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया क्या उससे किसानों की समस्या समाप्त हो गई? अगर ऐसा होता तो उसी साल में देश के हजारों किसान आत्महत्या क्यों करते? दरअसल हमारे देश में सभी किसानों को एक परिभाषा से आंकलन करते है जबकि देश हो या छत्तीसगढ़ 60 फीसदी किसान ऐसे है जिनका औसत खेत का रकबा एकड़ के करीब है। इस एकड़ के रकबे में फसल उत्पादन करने की अपनी सीमा है। ऐसे में समर्थन मूल्य कितना भी बढ़ा लें छोटे किसानों की गरीबी दूर नहीं होने वाली। न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर अब तक की सरकारों ने जो किया है उससे बड़े किसानों को ही फायदा मिला है। छत्तीसगढ़ में भी राजीव गांधी न्याय योजना के तहत 9 हजार रुपए प्रति एकड़ सरकार दे रही है उससे 20-30 एकड़ से अधिक के किसानों को तो एक मुश्त फायदा हो रहा है। एक-दो एकड़ वाले किसान को इसमें कुछ मिलता नहीं और जो मिलता है वह फसल का मूल्य बढऩे के फलस्वरुप कृषि लागत में बढ़ोतरी होती है उसमें बराबर हो जाता है। अर्थशास्त्र का नियम है जब आप एक आवश्यक वस्तु का मूल्य बढ़ाएंगे तो अन्य वस्तुओं का मूल्य भी बढ़ जाता है। ऐसा होने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का लाभ महंगाई के कारण छोटे किसानों को नहीं मिलता। ऐसा ही डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के समय हुआ। समर्थन मूल्य तो बढ़ा लेकिन बीज, खाद, कीटनाशक सहित साबुन, तेल, दाल, शक्कर की कीमत बढऩे से किसानों के पास कुछ बचा नहीं। राजनीतिक नारा देना अलग बात है और किसानों का कल्याण करना इससे अलग है।

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धान खरीदी में बना रिकॉर्ड https://samacharpacheesa.com/?p=5769 Wed, 18 Jan 2023 05:40:42 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5769 छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है क्योंकि उत्तरी पाट और दक्षिण के पठार के बीच स्थित मैदानी क्षेत्र में मुख्यत: धान की फसल ली जाती है। राज्य निर्माण के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी मानते थे कि धान की खेती करने वाला क्षेत्र आर्थिक रुप से पिछड़ा हुआ होता है। 2006-07 में जब दूसरी हरित क्रांति के तहत पूर्वोत्तर राज्यों को केंद्रित किया गया इसके बाद धान के उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि होती चली गई। 2006-07 में प्रदेश में धान का कुल उत्पादन 54 लाख मीट्रिक टन होता था और प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन, 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास है। धान का उत्पादन बढ़ते-बढ़ते 2016-17 में 01 लाख 31 हजार टन को पार कर गया। जैसे-जैसे धान का उत्पादन बढ़ा वैसे-वैसे सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद भी बढ़ती गई। 2016-17 में लगभग 70 लाख टन धान की खरीदी की गई थी। 2018 के बाद जब से भूपेश बघेल की सरकार आई है और किसानों को धान की कीमत के साथ राजीव गांधी न्याय योजना के तहत् 9 हजार रुपए प्रति एकड़ की सब्सिडी मिल रही है। धान उत्पादन के प्रति किसानों का आकर्षण बढ़ गया है और यह लगातार बढ़ रहा है। इस खरीफ मौसम में मंगलवार को धान खरीदी का आंकड़ा 100 लाख टन को पार कर गया है। इसका मतलब है कि 100 लाख टन से अधिक धान की पैदावार हुई होगी। एक तरफ सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा किसानों को पैसे दे रही है वहीं धान खरीदी के बाद लगभग 92 लाख टन धान की मिलिंग कराकर केंद्र सरकार को दे दिया जाएगा। लेकिन बाकी बची धान और खरीदी की पूरी प्रक्रिया में सरकार को सैकड़ों करोड़ का नुकसान होता है। दूसरी ओर प्रदेश के 70 प्रतिशत छोटी और लघु किसानों को भी धान की बढ़ी हुई कीमत मिलने के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार नहीं हो रहा है। धान उत्पादक किसानों को चाहिए कि वे अन्य फसल भी लें लेकिन इसके लिए सरकार को भी धान के इतर फसल लेने वालों किसानों को विशेष सहयोग करना होगा। अच्छी कीमत की चाह में किसान कोदो, कुटकी, मोटे अनाज, दलहन और तिलहन को छोड़कर केवल धान का उत्पादन कर रहे है। इससे कृषि उत्पादन का संतुलन बिगड़ रहा है और किसान व राज्य दोनों को लंबी दूरी तक फायदा नहीं मिलने वाला है। समय रहते सरकार को धान खरीदी में रिकॉर्ड बनाने के बजाय प्रदेश की कृषि को संतुलित और आर्थिक स्थिति को समृद्ध करने वाली नीति बनानी चाहिए।

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