छतीसगढ़ – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Wed, 06 Dec 2023 06:32:09 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 बड़ी चुनौतियों के साथ भाजपा की वापसी https://samacharpacheesa.com/?p=9211 Wed, 06 Dec 2023 06:32:08 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=9211 छतीसगढ़ में पहली बार हिदुत्व की राजनैतिक स्थापना कवर्धा व साजा विधानसभा सीट पर साफ साफ देखी गई। अब यह सनातनी धारा इस धरा पर और तेजी से बहेगी यह दिखाई देने लगा है। इन क्षेत्रों के साथ अब यह सुगबुगाहट सम्पूर्ण छतीसगढ़ में चल पड़ेगी इसकी पूरी संभावना बन गई है। अगले चुनाव के पहले बल्कि यूं कहें कि लोक सभा के चुनाव में सनातन धर्म का जागरण तेजी से स्थानीय सनातनियों को जगा देगा तो अतिशियोक्ति नहीं होगी। कवर्धा की घटना के बाद बेमेतरा के साजा विधानसभा क्षेत्र में भूवनेश्वर साहू की हत्या को सांप्रदायिक रंग में देखा गया,इसका असर बेमेतरा ,नवागढ़ की विधानसभा के साथ छतीसगढ़ के अन्य कुछ विधानसभाओं में भी दिखाई दिया है। इस बार इस विधा को पुराने विधायक पूर्व मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल ने भी एक मौके में तब्दील कर बेहतर ढंग से भुनाया और अभूतपूर्व सफलता हासिल भी की। पहले माना ये जाता था कि इस शांति के टापू पर सीधे सादे लोग रहते हैं ,उनके बीच नफरत व विभेद की व जातिभेद की राजनीति असर नहीं करती और हर चुनाव में यह दिखाई भी देता था। लेकिन इस बार कवर्धा व साजा बेमेतरा के रास्ते भाजपा का हिन्दू कार्ड प्रभाव डाल गया है। लगता था धर्मांतरण,हिदुत्व का एजेंडा नहीं चलेगा लेकिन ना सिर्फ चल गया बल्कि दिखने लगा है कि स्थापित होने लगा है। आगामी चुनाव में यह मुद्दा अब बडा मुद्दा रहेगा यह भी स्पष्ट संभावना बन गई है।
देश के दिग्गज बुद्धिजीवियों को भी भाजपा की यह आंतरिक मारक रणनीति समझ नहीं आई। सभी का आंकलन था कि कमोबेश कांग्रेस सत्ता पर लौट आएगी,सरकार बचा लेगी। क्या खुफिया विभाग ,क्या बुद्धिजीवी,क्या पत्रकार सभी परिणाम से चकित हैं। अब यही लोग कहते हैं कि शायद अपनी ग्रामीण योजनाओं के प्रभाव को असरदार मान कर कांग्रेस के मुखिया आत्ममुग्ध हो गए। वे अपने प्रदेश के अन्य शीर्ष नेताओं के मिजाज को व उनकी आंतरिक नाराजी को समझ नहीं पाए या समझना नहीं चाहा। इससे हुआ यह कि सभी सिर्फ अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों में ही सिमट गये। सारा भार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने ऊपर ले लिया। लोगों को साफ समझ आ गया कि नेतागण एक नहीं है। हमारा भला कर पाएंगे या आपसी द्वंद इनमें बढ़ेगा। बस यहीं जनता असहज हो गई और विकल्प खोजने लगी ,अच्छा विकल्प भाजपा ही नजर आया। मोदी की व्यक्तिगत गारंटी भूपेश बघेल के सामूहिक घोषणा पत्र पर भारी पड़ गई। रही सही कसर महतारी वंदन योजना में 1000 प्रति शादीशुदा देने के लिए भरवाए गए लाखों फॉर्म ने पूरी कर दी। जैसे जैसे फॉर्म भरवाए गए वैसे वैसे वोट प्रतिशत भाजपा के खाते में बढ़ते गया,परिणाम में सुनामी दिखाई दे गई।बड़ी संख्या में महिलाओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। युवाओं की भी नाराजी वोटों के रुझान में दिखाई दे रही हैं,किसानों ने जरूर कांग्रेस कहें या भूपेश पर भरोसा जताया है यह दिख रहा है,लेकिन इसमें भी मोदी की गारंटी में किसानों के लिए किए 20 वायदों ने सेंध मारी है, यह दिख रहा है। कुल जमा 35 सीटों में से धमतरी व भिलाईनगर के अतिरिक्त सभी सीट ग्रामीण इलाके की ही जीती है। जहां जहां स्थानीय प्रशासन में कांग्रेस के मेयर हैं लगभग सभी जगह मात मिली है। यानी यह दर्शाता है कि निगम के कार्य व वहां का नेतृत्व करने वाले नेताओं से लोगों की नाराजी रही। खास कर नजर डालें तो रायपुर ही देख लें , सातों सीटों पर पहली बार भाजपा काबिज हुई है। कांग्रेस के मेयर रहते शहर में यह स्थिति क्यों बनी इसके कारण जानने समझने की जरूरत है। बहरहाल भाजपा ने बहुमत की सरकार बनाने का रास्ता तैयार कर लिया है। आजकल में मुख्यमंत्री कौन होगा यह स्पष्ट हो जाएगा। भारी भरकम योजनाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी अब भाजपा पर आ गई है। पहले ही महीने धान खरीदी का अपने ही कार्यकाल का दो साल का बकाया बोनस 25 दिसम्बर को ही देने का वायदा पूरा करना है। साथ ही इसीमाह से महतारी वंदन योजना की तहत प्रति शादीशुदा महिला को 1000 रुपये उनके खाते में डालने का वायदा हर हाल में पूरा करना है।धान की खरीदी 3100 में 21 क्विंटल प्रति एकड़ करनी है। एकमुश्त भुगतान करना है। यह तत्काल करने योग्य वायदे हैं। लोगों की नजर इन्हीं विषयों पर है कि यह वायदा सही तरीके से पूरा होता है या नहीं ? बाकी वायदों में समय सीमा तय नहीं है। इसके लिए समय का इन्तजार करने जनता तैयार भी होगी।

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चुनौती खड़ी करती भाजपा, सतर्क कांग्रेस https://samacharpacheesa.com/?p=8149 Wed, 11 Oct 2023 06:41:57 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=8149 चुनावी प्रचार प्रसार के बीच आचार संहिता अब लागू हो गई।राष्ट्रीय चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में चुनाव तिथियों की घोषणा की औपचारिकता पूरी कर दी है। छतीसगढ़ में 7 व 17 नवंबर को मतदान होगा। 11 नवम्बर से 20 नवम्बर नामांकन भरे जाएंगे। भाजपा ने अब तक दो चरणों में प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है। दूसरी सूची वही आई जो लीक हुई थी। इसे लेकर अरुण साव से लेकर छोटे बड़े नेता साफ झूठ बोल रहे थे कि कोई सूची बनी ही नहीं है तो लीक का क्या सवाल ? आखिर बगैर एक शब्द इधर उधर हुए वही की वही लिस्ट फिर से अखबारों में इस तरह छपी मानों कोई नई सूची आ गई हो। दूसरी सूची 64 प्रत्याशियों की निकली जिसमें पूरी ईमानदारी से 23 नए नाम सामने आए हैं। पहली सूची 21 प्रत्याशियों की आई थी उसमें 19 नए चेहरे होने का दावा था। यानी कुल 85 सीटों में 42 नए नामों को जगह दी गई है। इनमें वे कोई भी चेहरे नहीं हैं जिनकी हवा में चर्चा हो रही थी। जिन्हें लोग बड़े प्यार से दूसरी लाइन के नेता कहते थे। उनकी जगह दरी उठाने वाले कार्यकर्ताओं को तवज्जो दी गई है। कहते हैं जीतने वाले प्रत्याशी को टिकट दी गई है। यह कैसे पहचान की गई कि ये लोग जीताऊ प्रत्याशी साबित होंगे ? यह कोई भी समझ नहीं पा रहा है। शायद यही नाराजी सूची लीक होने का कारण भी बनी होगी ,सबको यही आशंका है। लोग कहते हैं कि भाजपा कब से इतनी कमजोर पड़ गई है कि सूची लीक के दोषियों पर कुछ भी कर पाने में अक्षम दिखाई दे रही है।
खैर यह तो एक बात हुई कि अनेक लोग इस सूची से भीतर ही भीतर अब भी उबल रहे है यह उबाल बाहर आ पायेगा या हमेशा की तरह सब शांत जाएगा। यह देखना होगा। दूसरी बात यह भी है कि सूची देख कर कांग्रेस सकते में है जो सोचा था वह नहीं हुआ। 42 नए अनजान चेहरे ने उनके लिए नई तरह की चुनौती खड़ी कर दी है। लगभग सारी सूची में नाम तय होने के बाद फिर से कवायद करनी पड़ेगी कि कौन किसके सामने कमजोर पड़ सकता है ? कौन मजबूत होगा ? कांग्रेस के सामने यह चुनौती तो भाजपा ने खड़ी कर ही दी। अब कांग्रेस कवायद करने में जुट गई है। पहले तो मन बना था कि पितृपक्ष के बाद सूची दी जाए लेकिन वर्तमान स्थिति में एक दो दिन में सूची जारी करने की मजबूरी बन गई है। वह भी संशोधनों के साथ। सुना गया था कि इस बार अपने वर्तमान 71 विधायकों में से 63 विधायकों को पुन: टिकट दिया जाए वही चेहरे रीपीट किये जायें,यह विचार किया गया था। 71 सीटों की गिनती में यह 85 प्रतिशत हो रहा है। यानी मौजूद विधायकों में 85 प्रतिशत को फिर रीपीट किया जाए। अब भाजपा की दूसरी सूची के बाद कुछ फिर से विचार की स्थिति बन गई है। आज मंथन भी शुरू हो गया। लाभ हानि का आंकलन हो रहा है। चुन लिए गए नामों में फेर बदल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस की सूची में किसको बदल दिया गया यह खबर तो पता नहीं चल पायेगी। क्योंकि अब तक सूची आंतरिक रूप से बनी हुई थी। अब बाहर आएगी वही सही नाम माने जायेंगें। यह हल्ला नहीं हो सकेगा कि मेरा नाम था काट दिया गया। फिर भी सूची आने के बाद डैमेज कंट्रोल की जरूरत जरूर पड़ेगी,यह तय माना जा रहा है। जहां भाजपा में दूसरी लाइन के नामधारी नेता मायूस हुए हैं , वैसे ही जिन लोगों को टिकट की पूरी आशा बन गई है वे कांग्रेसी क्या रंग दिखाएंगें , यह देखने वाली बात होगी। विरोध दोनों ही दलों में होगा । यह है भी स्वाभाविक प्रक्रिया। लोगों को बड़ी बेसब्री से कांग्रेस की लिस्ट का इंतजार है। यह मान रहे हैं कि 8-9 मौजूदा विधायकों का टिकट कटना तय माना जा रहा था। अब की परिस्तिथि में कितने बदलते हैं या 63 मौजूद विधायक टिकट पा लेंगे। कटती है तो किसकी कटती है। यह जानने लोग उत्सुक हैं। जिन पांच विधानसभाओं की टिकट भाजपा ने रोकी हैं, उनमें जिन लोगों को टिकट का वायदा देकर भाजपा में लाया गया है उनका सपना पूरा होता है या नहीं ? यह देखना भी अभी बाकी है।

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तब धान-नान अब गोबर- गौठान-गौशाला पर भी आरोप, हे प्रभु! https://samacharpacheesa.com/?p=6977 Wed, 24 May 2023 07:52:00 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6977 छतीसगढ़ में गोबर गौठान की राजनीति गर्माने लगी है। देश का पहला राज्य होगा जिसमें गोबर में भी विपक्षी दल ने घोटाला खोजने का काम शुरू कर दिया है। भाजपा ने यह बीड़ा सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष यानी चुनावी वर्ष में बड़ी शिद्दत से उठा लिया है। पूरे प्रदेश की हर विधानसभा में यह एक अभियान की तरह चल रहा है। बड़े छोटे सभी नेता कार्यकर्ता रोज एक या उससे अधिक गौठान में जा रहे हैं। कह रहे हैं कि यहां कोई व्यवस्था नहीं है,सब गड़बड़ी है। अखबारों में उनकी खिंचाई फ़ोटो के साथ समाचार भाजपा नेताओं के हवाले से छप रहे हैं। 1300 करोड़ के घोटाले का आंकलन भी कर लिया गया। आरोप भी इसी आंकड़े के साथ छतीसगढ़ सरकार पर चिपका दिया गया। मजेदार बात यह है कि साढ़े चार साल बाद ये आरोप चुनावी वर्ष में लगाए जा रहे हैं। कितना असर डालेंगें या नहीं डालेंगें इसका अनुमान लगाना भी अभी मुश्किल है। जानकर लोगों का कहना है कि देर हो गई है। यही काम भाजपा को दो वर्ष पहले ही शुरू कर लेना था। अब जनता इसे बहुत अधिक गंभीरता से लेगी, एसी संभावना जरा कम लगती है। कहा गया कि भाजपा की आदर्श संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के “कुछ” सदस्य गोबर गौठान व गौवंश की रक्षा के लिए वर्तमान सरकार को धन्यवाद देने सशरीर सीएम हॉउस गए। उन्होंने सीएम से भेंटकर उन्हें सीधे इस कार्य के लिए बधाई दी थी। आरएसएस संस्था में एक बात तो है कि अच्छे को अच्छा व बुरे को बुरा बोलने का साहस है। जो सही करे वो उसे सही कह देते हैं। विचारों व संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित यह संस्था सही काम व बुरा काम में अपने पराए का भेद नहीं करती।अब ऐसा क्या हो गया कि इस चुनावी वर्ष में गौठान का काम खराब हो गया। शायद चार साल ठीक रहा होगा, इसलिए विपक्ष चुप रहा होगा। एकाध बार विधानसभा में किंचित प्रश्नोत्तरी में विरोध दर्ज जरूर किया गया ,लेकिन इतनी गंभीरता से नहीं लिया गया , जिसकी चर्चा प्रदेश में या अखबारों में हुई हो। जो सद्गुण किसी सेवा भावी संस्था में होता है वह सदगुण राजनीति में नहीं होता। भाजपा ने जो तरीका अपनाया है, हमें तो लगता है कि यह फार्मूला कारगर भी हो सकता है। वह तब होगा जब जहां जहां गौठानों में बेहतर काम हो रहा है, उसकी तारीफ भी की जाए। साथ ही जहां खराब हो रहा है, वहां की आलोचना सकारात्मक ढंग से सरकार की आंख खोलने की शैली में हो। ताकि सरकार उस पर ध्यान दे सके, आम जनता पर असर भी हो। यह काम दो साल पहले किया जाता तो बहुत असर पड़ता। लोग कहते हैं कि विपक्ष अपनी सही भूमिका निभा रहा है। सकरात्मक प्रयास के बाद भी अगर अब तक खराबी वाले गौठानों में स्थिति नही सुधरती, तो आज के हो रहे प्रयासों में वजन होता। राजनीति के आसपास रहने वालों व उसे समझने वालों का मत है कि अनेक मुद्दों पर राजनीति करने के बाद विपक्ष ने समझ लिया कि शांति के टापू छतीसगढ़ में ये उग्र सोच वाले मुद्दे कम प्रभाव डाल रहे हैं। कर्नाटक चुनाव ने नया मुद्दा दिया है। सरकार का भ्रष्टाचार। विपक्ष ने कांग्रेस को इसी मुद्दे पर जब कर्नाटक के चुनाव जीतते देखा तो छतीसगढ़ में अपनी रणनीति बदल दी। अब भ्रष्टाचार मुद्दा बनाया है। जनता के सामने सरकार को बदनाम करने का साधन खोजना शुरू किया गया। ध्यान गोबर-गौठान पर आकर टिक गया है। रणनीति सही है। गोबर-गौठान पर सवाल उठा कर विपक्ष सही खेल खेल रहा है। देर से ही सही विपक्ष ने अब वर्तमान सरकार के गांव-गरीब-किसान व ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधार की सटीक राजनीति पर वार करना प्रारम्भ किया है। सफलता संदिग्ध भले ही हो पर रणनीति तो सटीक है। अखबारों में प्रचार का ढंग बदलना होगा। अपने नेताओं के खुद के बयानों व फ़ोटो के अखबारों में छपने का प्रभाव कम पड़ेगा। आये दिन टीवी डिबेट में आपको कांग्रेस के प्रवक्तागण छाती ठोक कर चुनौती दे रहे हैं कि हम चलते हैं आपके साथ , अगर कहीं भी घोटाला साबित हुआ तो वे इस्तीफा दे देंगे। उनकी चुनौती स्वीकार कर उन्हें बुलाइये उनके साथ जाकर दिखाइए कि कहां 1300 करोड़ की गड़बड़ी है। पत्रकारों को भी साथ ले जाइए आपके बयानों से नहीं जब स्वस्फूर्त अखबार नवीस देखेंगें और प्रतिनिधि के नजरिये से छपेगा तो ज्यादा सही व जनप्रभावी होगा। अन्यथा प्रदेश की जनता तो रोज आप लोगों के भ्रष्टाचार के आरोप प्रत्यारोपों को देख-सुन कर कन्फ्यूज़ हो ही रही है। सोचती है कि दोनों ही बेईमान हैं ,तो आखिर ईमानदार है कौन? एक खतरा भी है कि अगर जनता ने अपने मानस पटल पर यह बैठा लिया कि सभी अगर एक ही शैली से शासन चलाते हैं तो भ्रष्टाचार तो सामान्य बात हुई। तब क्या होगा जरा गंभीरता से सोचें।

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चुनाव आते जाते रहेंगे, छत्तीसगढ़ी सद्भाव तो मत बिगाड़ो https://samacharpacheesa.com/?p=6797 Wed, 26 Apr 2023 07:34:09 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6797 उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अब छतीसगढ़ में बुलडोजर के दम पर चुनाव वैतरणी पार लगाना चाहती है छतीसगढ़ भाजपा। आज तक देखा गया है कि छतीसगढ़ के भाजपा के राजनेता शांत स्वभाव के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। मगर यह देखने में आ रहे हैं कि ये शांत स्वाभाव के नेता 2023 व 2024 के आने वाले चुनाव के लिए बेहद आक्रामक व कड़े बयान देने लगे हैं। अभी तक इन्होंने जो भी मुद्दे उठाए उनमें देखा जाए तो धर्मांतरण का मुद्दा एक चर्चित अल्पसंख्यक कौम के विरुद्ध जहर भरने व समाज को दो भाग में बांटने का प्रयास माना गया। कवर्धा-बीरनगांव-नारायणपुर ऐसे कांड को हिन्दू पक्ष के साथ खड़े होकर अपने स्पष्ट हिदुत्व के एजेंडे को बल दिया गया। इसमें भी लोगों ने माना कि यह बांटने का प्रयास ही है। पहले कहा गया था कि हम स्थानीय 15 साल की भाजपा सरकार के विकास कार्यों पर चुनाव में जायेंगें। उसके बाद फिर कहा कि हम प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के देश व्यापी जनहित के मुद्दों व उनकी सरकार के द्वारा किये गए विकास कार्यो व सुधार कार्यक्रमों के आधार पर चुनाव में जायेंगें। अचानक पिछले तीन महीने से अभियान चला कर भूपेश सरकार की कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाना शुरू किया गया। एक माहौल बनाने में भाजपा जुट गई। कह सकते हैं कि एक एक घटनाओं पर माहौल बनाया गया। कुछ आरोप सफल कुछ असफल हुए, पर माहौल तो बन ही गया। अब अपनी इस आंशिक सफलता के बाद भाजपा के नेताओं ने इसी योजना के अगले चरण की रणनीति के तहत एक धमाकेदार बयान देकर प्रदेश में तहलका मचा दिया। अपनी 15 साल की सरकार के विकास,धर्म अधर्म की बात उठाने के बाद,मोदी के विकास की बात करते हुए ,मोदी पर अपना विश्वास जताया अब अचानक अपराधियों पर बुलडोजर चलवाने की घोषणा कर जनता को आंदोलित करने का महत्वपूर्ण व प्रभावशाली प्रयास किया गया है। यहां मुख्य मंत्री भूपेश बघेल को बोलने का अवसर प्रदान भी कर दिया। वे चूके भी नहीं। उन्होने कह भी दिया कि भाजपा को नरेंद्र मोदी चुनाव जिताऊ नहीं दिख रहे हैं। अब योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व स्वीकार किया जा रहा है। अपनी अपनी रणनीति अपना अपना एजेंडा लेकर दोनों ही प्रमुख दल चल रहे हैं। कांग्रेस गांव – गरीब- किसान व भेंट मुलाकात के माध्यम से अपने आपको सफल मान कर अपना प्रचार कर रही है। भाजपा अभी भी किस वास्तविक मुद्दे पर डटेगी, हिंदुत्व-धर्मांतरण-कानून व्यवस्था-15 साल की रमन सरकार की उपलब्धियों-मोदी सरकार की उपलब्धियों-योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर संस्कृति अथवा अपने नए व कांग्रेस से कुछ आगे बढऩे के वायदे वाले घोषणापत्र,किस पर केंद्रित चुनाव लड़ेगी यह रणनीति कहीं भी स्पष्ट नहीं है। शायद यही भाजपा की असली रणनीति है। संभवत: इनसे अलग कोई बड़ा धमाका चुनाव के पहले वो कर देने के साथ पूरा पासा ही पलटने वाली है। प्रदेश में अभूतपूर्व रूप से लगातार ईडी व अन्य केंद्रीय एजेंसियों की मौजूदगी है। कोयले के बाद अब शराब पर उसकी कड़ी नजर व लगातार पूछताछ हो रही है। नेताओं व अधिकारियों पर शिकंजा कसने को भी चुनाव के नजरिये से देखा जा रहा है। कल ही कुछ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री से भेंट कर ईडी द्वारा प्रताडि़त करने की जानकारी दी गई है।
अब हम ताजा बयान पर चर्चा करें तो सरकार आने पर माफियाओं पर बुलडोजर चलवाने की बड़ी बात कहने को कैसे देखा जाए ? उत्तर प्रदेश में तो नामी गिरामी माफियाओं का गढ़ माना जाता है। अपराधियों व माफियाओं को राजनैतिक संरक्षण व उन्हें महत्व देकर चुनाव जीतने की प्रक्रिया भी वहीं ज्यादा अपनाई जाती है। ऐसी खबरें अक्सर अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। अभी हाल अतीक व उसके भाई और बेटे को गोली मारने की घटना हुई। इसके पहले भी अपराधियों को मुठभेड़ में मारने की घटना हुई। इसी स्तर के अनेक माफियाओं के घरों कार्यालयों पर बुलडोजर चला दिया गया। वहां अपराध एक बड़ा काम है। यही कारण है कि राजनैतिक दल भी इनसे मदद लेते व देते हैं। अब आप सोचें कि हमारे शांत छतीसगढ़ में कहां ऐसे माफिया हैं जो अपने द्वारा हत्या करवाए जाने को दर्शाते हैं। समाज पर दहशत फैला कर राज करने का प्रयास करते हैं। जिस तरह उत्तर प्रदेश में होता देखा जाता है। लेखक की नजर में तो ऐसा कोई माफिया इस छतीसगढ़ की धरती पर आज तक तो नहीं दिखा जो सरकारों को आंख दिखा सके। ऐसा कोई अपराधी विधायक या सांसद बना हो। अतीक अहमद जैसी गैंग बनाई हो,राजा भैया या उत्तर प्रदेश के अन्य माफियाओं की तरह की घटनाओं या हत्याओं को अंजाम दिया हो । आखिर किन पर चलेगा बुलडोजर। दरअसल मसला चुनाव जीतने का है। दोनों दल रामराज लाने की कोशिश कर रहे हैं। एक जय श्रीराम के नारे के साथ राम को आस्था का केंद्र मान कर और दूसरा दल जयसियाराम के नारे के साथ राम का मामा बन कर अपनी राजनितई कर रहे हैं। ऐसी चिंता किसी की भी नहीं दिखती की रामराज में सबको एक नजर से देखा जाता था। यहां भी संत घासीदास को सभी दल पूजते है उनका कहना था कि मनखे मनखे एक समान , कबीर दास जी को मानने वाले यहां बहुत हैं। घृणा को कहीं भी स्थान नहीं देने व प्रेम सद्भाव से रहने का उन्होंने संदेश दिया। चुनाव आते जाते रहेंगे सद्भाव बिगड़ा तो यह शांति का टापू कैसा रूप लेगा चिंता इस बात की होनी चाहिए।

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कोयला व शराब छत्तीसगढ़ चुनाव के लिए बने अभिशाप https://samacharpacheesa.com/?p=6413 Thu, 23 Feb 2023 05:50:05 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6413 कोयला और शराब छतीसगढ़ के लिए वरदान के साथ अभिशाप बन गए प्रतीत हो रहे हैं। वरदान इसलिए हैं, कि इनके माध्यम से राजस्व की बड़ी आय सरकार के खजाने में आती है। अभिशाप इन मायनों में कि इस माध्यम से राजस्व के साथ निजी राजस्व वसूली के सुराग प्रवर्तन निदेशालय को मिले हैं। कोयला की जांच में अब तक अनेक आईएएस व शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे अन्य अधिकारी जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा दिए गए हैं। अनेकों पर नजर है। कल ही इनमें से छतीसगढ़ के 6 कांग्रेसी नेताओं पर ईडी ने हाथ डाला। पता चला है कि अब कोयला के साथ शराब की अवैध कमाई को भी ईडी ने लक्ष्य बना लिया है। छापा पडऩा कोई एतराज की बात नहीं है, क्योंकि माना जाता है कि ईडी देश की बेहद शक्तिशाली ,अधिकारों से सम्पन्न संस्था है। जब भी वह किसी पर हाथ डालेगी तो सबूत इक_े करने के बाद ही डालेगी। यह भी देखा गया है कि ईडी ने अब तक कि गई जांच या छापों में दो-तीन दिनों तक पूछताछ की है। कल के छापों कहें या जांच प्रक्रिया कहें तीन बजे रात तक सभी नेताओं के यहां सम्पन्न हो गई। पूछताछ के बाद फिलहाल तो सभी छोड़ दिये गए। छापों के दौरान कांग्रेस जनों ने सभी प्रताडि़त हो रहे नेताओं के निवास पर उपस्थिति देकर अपने तीखे तेवर भी दिखाए। ईडी पर उसका कुछ असर पड़ा हो ऐसा दिखाई तो नहीं दिया , लेकिन समझ में आया कि कांग्रेस जनों के तेवर व आक्रोश की तेजी देख कर भविष्य में कुछ अप्रिय घट जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। दरअसल कांग्रेस जनों के बीच तो यह सवाल पहले से है ही ,अब तो जनता के बीच भी यह चर्चा सुनी जाने लगी कि वाकई क्या बेईमानी सिर्फ कांग्रेसी ही कर रहे हैं ? क्या देश प्रदेश के सभी भाजपाई नेता दूध के धुले हुए हैं। कोई भी बेईमान नहीं हुआ ? क्या भाजपाई सरकारों वाले प्रदेशों में पूरी तरह रामराज्य वो भी 100 प्रतिशत ईमानदारी के साथ चल रहा है ? यह प्रश्न जनचर्चा में विचारों की ऊंचाई पर जरूर तैर रहा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद सीधा आरोप लगाकर ईडी की कार्यवाही पर शंका पैदा कर दी है । आरोप लगा कर कहा है कि क्या ईडी को डॉ.रमनसिंह सरकार के दौर का नान घोटाला, हेलीकाप्टर मामला ,धान घोटाला की जांच नहीं करनी चाहिए ? आरोप यह भी लगाया कि यहां जो भी किया जा रहा है, सब भाजपा की केंद्र सरकार व भाजपा के स्थानीय नेताओं के इशारे पर हो रहा है ? प्रमाण के रूप में उन्होंने कहा कि रमन सिंह ने प्रेस को दिए बयान में पहले दिन जो जो कहा दूसरे दिन हूबहू वही बात ईडी के अधिकारियों ने कही,ये क्या दर्शाता है ? क्या यह नहीं लगता कि ईडी के लिए रमनसिंह प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे हैं। पहले ही उस बात को कह देते हैं, जो ईडी को कल कहना है। लोगों में इस बात की भी भरपूर चर्चा है कि कहीं यह कांग्रेस के महाधिवेशन को अनिश्चितता में डालने का भाजपा का प्रयास तो नहीं। ठीक तीन दिन पहले कोष पर नियंत्रण रखने वाले कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल पर हाथ डालने के प्रयास को इसी नजरिये से देखा जा रहा है। कांग्रेस के नेताओं ने भी यही बात बार बार कही है। लोग इस दृष्टिकोण से सोच भी रहे हैं।
लोगों में यह भी चर्चा है कि ईडी को अपनी निष्पक्षता के लिए 2003 से अब तक के कार्यकाल में कोयले व शराब में किसने कितनी दलाली ली है। ? वे कौन लोग हैं? इस दिशा में काम करना चाहिए था तब कोई भी हल्ला होना संभव नहीं होता। ईडी को इस बात से क्या लेना देना है कि कोयला की दलाली या कमीशन खाने वाला भाजपा का है या कांग्रेस का? उसे सब पर हाथ डालना था। यह भी कि कोयले की दलाली व कमीशन का काम प्रदेश के गठन के दौर से लोग सुनते आ रहे हैं। चर्चा थी तो कुछ न कुछ सच्चाई भी होगी । किसी भी बात की यूं ही चर्चा नहीं होती। रमन सरकार के तीसरे कार्यकाल में रायगढ़ में हुए भाजपा के सम्मेलन में रमनसिंह ने भाजपाइयों से कथित रूप से कमीशन बंद करने की बात की थी। वो कौन से कमीशन की बात थी? यह भी सवाल उठ रहे हैं।
ईडी की कार्यवाही पर कोई कुछ नहीं कहना चाहता भ्रष्टाचार जिसने किया उसे सजा मिले,सब यही चाहते हैं। ईडी के तौर तरीके व एकतरफा दृष्टिकोण के कारण यह स्वाभाविक शंकाएं उभर रही हैं कि , यह केंद्र सरकार की कांग्रेस की प्रदेश सरकार से बदला लेने की अथवा आगामी चुनाव को मद्देनजर व महाधिवेशन को बाधा पहुंचने की कोशिश के सिवाय कुछ नहीं है। एक नेता के विरोध प्रदर्शन करने पर ईडी के अधिकारी ने कह भी दिया कि हम उपर के आदेश पर काम कर रहे हैं। अब यह ऊपर वाला कौन हैं ? उनके विभागीय आला अधिकरी या केंद्र सरकार के सम्बंधित मंत्रालय सम्हालने वाले केंद्रीय मंत्री ? जनता को जो समझना हो समझ ले।

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क्या हिंदुत्व-विरासत बन पायेगा चुनाव का विजयी नारा https://samacharpacheesa.com/?p=5773 Wed, 18 Jan 2023 05:45:33 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5773 लोग पहले ही कह रहे थे। कांग्रेस तो इस बात को खुल कर कह चुकी है। भाजपा छतीसगढ़ में भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच खाई खोदकर साम्प्रदायिक राजनीति की ओर ध्यान केंद्रित करेगी। सात राज्यों के अगले चुनावों में भाजपा के प्रचार के दौरान हिन्दू अचानक फिर खतरे में आ जायेगा। छतीसगढ़ व अन्य राज्यों में अपने इसी एजेंडे पर भाजपा ने अपना काम भी शुरू भी कर दिया है। छतीसगढ़ से इसकी शुरुवात नारायणपुर जिले से हो चुकी है। धर्मांतरण के मुद्दे को फिर एक बार हवा दी गई है। वहां लगी चिंगारी को चुनाव के पहले तक धीरे धीरे हवा देते हुए आग के रूप में तब्दील करने की तैयारी होगी। नेताओं के आरोप प्रत्यारोपों से तो यही प्रतीत होता है। प्रदेश सरकार को भी खुफिया विभाग ने इसी मुद्दे पर सतर्क किया है। कहीं भी कुछ भी घट सकता है। इस दल के अनुसांगिक संगठन के लोग टिड्डी दल की भांति फैल कर ,खास कर आदिवासी क्षेत्रों में अपने हिन्दू इतिहास व परम्पराओं को जीवित करने में जुट गए हैं। अभी इस मामले में कबीर के धाम के बाद नारायण की पुरी में मिली सफलता ने उत्साह दोगुना कर दिया है।आग भड़का दी गई है। विस्तार होगा यह पूरी संभावना है। यही रिपोर्ट प्रदेश खुफिया विभाग ने सरकार को दी है। सरकार ने ज्यादा देरी न करते हुए 1987 से बोतल में कैद रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के जिन्न को फिर से बाहर निकाल कर जिलों के मुखियाओं के पास खुला छोड़ दिया है। जिन्न के लिए आदेश है कि जिसे भडकाते देखे, उसे अपने घेरे में ले लिया जाए। एक अजूबा जो किसी को समझ नहीं आ रहा है। शायद कभी समझ आएगा भी नहीं। धर्मांतरण तो मध्यप्रदेश शासन काल से आज तक निरंतर जारी है। देश में भी जारी है। कभी कम कभी ज्यादा यह शुरू ही रहता है। संविधान के अनुच्छेद 24-25 के द्वारा धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। उसमें लिखा गया है कि अंत:करण की और धर्म के अबाध रूप से मानने ,आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता- लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के रहते हुए,सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने ,आचरण करने,प्रचार करने का सामान हक होगा। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह दलील दी गई थी कि प्रचार करने के अंतर्गत धर्म परिवर्तन का अधिकार है। न्यायलय ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया। तब मध्यप्रदेश व उड़ीसा राज्य ने विधान पारित करके किसी व्यक्ति का बलपूर्वक ,कपटपूर्वक,या लालच देकर धर्म परिवर्तन करना दंडनीय अपराध बना दिया गया। इस अधिनियम को बाद में अरुणाचल प्रदेश ने भी अपनाया। दरअसल के .सी .नियोगी की अध्यक्षता में गठित समिति ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। कहा गया था कि ईसाई मिशनरी बल व कपट द्वारा धर्म परिवर्तन करने में लगे हुए हैं। इसी नियोगी कमेटी के रिपोर्ट को आधार बना कर राज्यों ने यह अधिनियम बनाए थे। वास्तव में देखा जाए तो धर्मांतरण राष्ट्रीय समस्या है और इस पर केंद्रीय कानून बनाना चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि केंद्र स्तर पर इसके प्रयास नहीं हुए। ओम प्रकाश त्यागी ने 1977 में इन अवांछित गतिविधियों को रोकने के लिए एक विधेयक लोक सभा में प्रस्तुत किया था। यदि यह विधेयक पारित हो जाता तो सम्पूर्ण भारत में लागू हो जाता। कुछ तत्वों ने इस विधेयक के विरुद्ध बहुत शोर मचाया। ऐसा लगा मानों ईसाई धर्म पर प्रतिबंध लगाया जा रहा हो। लोक सभा के विघटन के साथ ही यह विधेयक व्यपगत हो कर ठंडे बस्ते में चला गया। तब से आज तक यह मुद्दा हिंदुत्व जगाने के राजनैतिक साधन के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। लगता तो यही है कि कोई इस समस्या का स्थायी हल नहीं करना चाहता। हमारे छतीसगढ़ के निर्माण के बाद स्व.अजीत जोगी पर धर्मांतरण के मामले में सर्वाधिक हमले किये गए। भाजपा को फायदा भी हुआ। उसकी ऐसी सरकार बनी की 15 साल तक बनी रही। धर्मांतरण तो तब भी चलता रहा लेकिन 15 साल उसकी चर्चा से भाजपा ने पूरी तरह परहेज किया। क्यों किया ? 2018 में फिर कांग्रेस की सरकार आई है। बोतल से जिन्न रूपी मुद्दा बाहर निकाल लिया गया है। चर्चाएं फिर शुरू हो गईं हैं। तेजी से हवा में फैलाया जा रहा है। आश्चर्य तो इस बात का है कि भाजपा की 15 साल सरकार रही लेकिन किसी ने नहीं सोचा कि मध्यप्रदेश – उड़ीसा-अरुणाचल की तरह अपना इस पर कानून बना लिया जाए। केंद्र में अपनी सरकार है, केंद्रीय कानून बनवा लिया जाए। कांग्रेस व भाजपा दोनों ने ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस कह सकती है कि यह उनका एजेंडा ही नहीं है। कुल मिला कर जनता को यह समझ में आने लगा है कि धर्मांतरण का निदान कोई नहीं चाहता। लगता है कि सभी इस समस्या को जिंदा रखना चाहते हैं। समस्या रहेगी तो भाजपा को ही ज्यादा होगा। वर्ग भेद से हिदुत्व जागता है और भाजपा इसे जगा कर रखना भी चाहती है, हिदुत्व जागेगा, हिन्दू एक होगा। यही ध्रुवीकरण उसे सत्ता पर बनाए रखेगा। अब तो केंद्र ने भी कह दिया कि सात राज्यों के चुनाव जीतना जरूरी है। इसके लिए हिदुत्व व अपनी विरासत को बताना जरूरी है। चुनाव के केंद्र में यही मुद्दे होंगें। देखिए आगे आगे होता है क्या ?

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