टिकट – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Sat, 26 Aug 2023 06:55:46 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 कांग्रेस के विधायकों के टिकट पर निर्भर नतीजे https://samacharpacheesa.com/?p=7887 Sat, 26 Aug 2023 06:55:45 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7887 अभी हाल ही में सी वोटर और एबीपी न्यूज की सर्वे रिपोर्ट आई है इसके बाद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता थोड़े नर्वस हैं और यह कहते नजर आ रहे हैं कि कहीं 2013 वाली स्थिति न हो जाए। 2013 में कांग्रेस की सरकार आते-आते रह गई थी जबकि उस समय तमाम परिस्थितियां कांग्रेस के बिलकुल अनुकूल थी। मतगणना के दौरान एक समय लगने लगा था कि कांग्रेस की सरकार बन ही जायेगी लेकिन अति आत्मविश्वास के कारण कांग्रेस सत्ता में आते आते रह गई। पुराने और जमीनी कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मानना है कि उस समय सर्वे रिपोर्ट को अनदेखा किया गया था। जिन विधायकों के खिलाफ माहौल था और जिनका टिकट काटा जाना चाहिए था उनका टिकट नहीं काटा गया और अंतत: उनके कारण कांग्रेस प्रदेश में पिछड़ गई। बताया जाता है कि उस समय 17 विधायकों के खिलाफ एंटी इनकैंबम्सी की बात सर्वे रिपोर्ट में आई थी और इनके चेहरे बदलने का सुझाव दिया गया था लेकिन तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष इस बात पर अड़ गए थे कि सिटिंग विधायकों की टिकट नहीं कटना चाहिए। नतीजतन तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष समेत कई विधायकों की हार हो गई थी और तमाम अनुकूल परिस्थितियां भी कांग्रेस की सत्ता वापसी नहीं करा पाई थी। फिलहाल 2023 का दृश्य भी ऐसा ही दिख रहा है। प्रदेश में सरकार के खिलाफ कोई माहौल नहीं, गांव से लेकर शहर तक चुनाव को लेकर कोई उत्साह भी नहीं क्योंकि बदलाव की बात होती नहीं दिख रही है। प्रदेश में हो रहे अब तक के तमाम सर्वे रिपोर्ट भी यही बताते हैं कि फिर से कांग्रेस की सरकार आ सकती है लेकिन सीटें कम हो रही है। हालिया एक सर्वे में भी यह कहा गया कि सरकार की वापसी ज्यादा लोग चाहते हैं लेकिन काम से कम 36 विधायकों से नाराजगी है। कांग्रेस के आंतरिक सर्वे में भी 33 विधायकों के परफॉर्मेंस पर सवाल उठाया गया था और उनको क्षेत्र में स्थिति ठीक करने की हिदायत भी दी गई थी। बताया जाता है कि अभी भी 22 विधायक ऐसे हैं जिनपर हार का खतरा है, इसलिए यह कयास भी लगाए जा रहे हैं कि इनकी टिकट काटी जा सकती है। प्रदेश में 23 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां हर 5 साल के बाद स्थानीय लोगों ने विधायक बदल दिया है। इनमे से 17 विधानसभा क्षेत्र में 2003 से ही यह स्थिति है जबकि 6 विधानसभा क्षेत्र, जिनका निर्माण 2008 में हुआ है उनकी भी यही प्रवृति दिखाई देती है। किसी भी सिटिंग एमएलए का टिकट काटना किसी पार्टी के लिए आसान नहीं होता खासकर यदि वह पार्टी कांग्रेस हो। पार्टी को डर होता है कि कहीं वह बागी न बन जाए या चुनाव में अधिकृत प्रत्याशी को डैमेज न कर दे। अब कांग्रेस नेतृत्व 20 सिटिंग एमएलए का टिकट काटने का साहस कर पाएगी या नहीं यह तो समय बताएगा।

]]>
टिकट की चाह में ठगा गए भाजपाई, दे दिए लाखों रूपए https://samacharpacheesa.com/?p=7272 Wed, 12 Jul 2023 07:24:49 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7272 रायपुर। विधानसभा चुनाव लडऩे के इच्छुक भाजपा नेताओं के साथ ठगी का मामला सामने आने से पार्टी में खलबली मच गई है कि ऐसा भी होने लगा है लेकिन इसमें पार्टी का कोई लेना देना नहीं हैं। अनजान लोगों के चक्कर में वे लोग फंसे जो ऐन-केन सर्वे सूची में नाम जुड़वाकर अपनी ब्रांडिंग दिल्ली में करना चाहते हैं। कुछ लोगों ने लाखों रूपए दे दिए अब उन्हे पता चला कि वे ठगा गए तो होश उड़ गए,पार्टी के अंदर बाहर किरकिरी हो रही है सो अलग। पार्टी नेताओं ने मामले से पल्ला झाड लिया है।
मामला यह है कि केंद्रीय मंत्री अमित शाह के सर्वे में नाम जुड़वाने के नाम पर नेताओं से लाखों रुपये वसूल लिए गए। भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो दिल्ली के कुछ युवाओं ने फेसबुक पर अमित शाह और उनके पीए के साथ तस्वीर दिखाई। उसके बाद उन युवाओं ने अपना खेल शुरू किया। सर्वे सूची में नाम शामिल करने के लिए किसी से पांच लाख तो किसी से आठ लाख रुपये वसूल लिए।
ठगी के शिकार वह नेता हुए हैं, जिनकी सक्रियता इंटरनेट मीडिया पर ही नजर आती है। क्षेत्र में पार्टी के कार्यक्रम और अन्य अभियान में उनकी उपस्थिति शून्य रहती है। इसमें राजधानी रायपुर के दो युवा नेता हैं। एक जिला पंचायत सदस्य हैं, जबकि एक युवा मोर्चा की जिला कार्यकार्यकारिणी में है। एक नेता कांकेर जिले के हैं, जो पेशे से इंजीनियर हैं और पार्टी के बड़े नेताओं के इर्द-गिर्द अक्सर पाए जाते हैं। ऐसे ही गरियाबंद, महासमुंद और धमतरी के एक-एक नेता का नाम सामने आ रहा है, जिनसे पैसे वसूले गए हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से इस तरह की ठगी को लेकर सवाल किया गया तो उन्होने पूरी तरह से पल्ला झाड़ लिया।

]]>
भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग https://samacharpacheesa.com/?p=6780 Fri, 21 Apr 2023 08:21:09 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6780 भाजपा ने कर्नाटक के लिए जारी अपनी 189 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में ही ये संकेत दे दिए थे कि इस बार वह सत्ता में वापसी के लिए सोशल इंजीनियरिंग का दांव आजमाएगी। पार्टी के सभी 224 उम्मीदवारों की लिस्ट सामने आने के बाद यह और साफ हो गया है कि दिग्गज नेताओं की नाराजगी के बाद भी वह विभिन्न जातियों को साथ लेकर चलने की कोशिश करेगी और बड़ी जीत की राह तलाश करेगी। पार्टी ने 64 लिंगायत उम्मीदवारों को टिकट देकर उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिश की है, तो 45 वोक्कालिगा उम्मीदवारों को टिकट देकर कुमारस्वामी के वोट बैंक में भी सेंधमारी करने की कोशिश की है। उसने ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय को भी पर्याप्त भागीदारी देकर उन्हें अपने साथ जोडऩे की कोशिश कर एक संपूर्ण समाज समावेशी पार्टी होने का संदेश दिया है। उसे इसका लाभ मिल सकता है। लिंगायत समुदाय भाजपा के साथ पारंपरिक रूप से जुड़ा हुआ है और बीएस येदियुरप्पा जैसे दिग्गज लिंगायत नेताओं के साथ होने से पार्टी को अनुमान है कि यह वर्ग इस बार भी उसके साथ बना रहेगा। इसी वर्ग से आने वाले जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी जैसे नेता अब कांग्रेस के टिकट पर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। भाजपा ने इन दिग्गज नेताओं को टिकट देने से इनकार कर दिया था। इन बागियों के कारण पार्टी को नुकसान होने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन भाजपा नेताओं का दावा है कि लिंगायत समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिए जाने के कारण बागी नेता बेअवसर हो जाएंगे और समुदाय का साथ उन्हें मिलता रहेगा। कर्नाटक में वोक्कालिगा दूसरा सबसे प्रभावी समुदाय माना जाता है। लगभग 15 फीसदी मतदाता वाला यह समुदाय अभी तक जेडीएस के साथ माना जाता है। लेकिन राज्य में अपने दम पर सत्ता में आने के लिए भाजपा इस वर्ग को अपने साथ जोडऩे की जीतोड़ कोशिश कर रही है। इसी रणनीति को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने इस वर्ग के 45 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। यदि इस किसान-मजदूर वर्ग का एक हिस्सा उसके साथ आ जाता है तो भाजपा की सत्ता की राह आसान हो सकती है। भाजपा एक रणनीति के अंतर्गत ओबीसी-दलित समुदाय को अपने साथ जोडऩे की कोशिश कर रही है। उसकी यह कोशिश केंद्र सरकारों के साथ-साथ राज्य सरकारों और पार्टी संगठन के स्तर पर भी देखने को मिल रहा है। इसी रणनीति पर चलते हुए पार्टी ने कर्नाटक में 37 दलित उम्मीदवारों को टिकट थमाया है, तो ओबीसी समुदाय के 32 लोगों को टिकट दिया है। अनुसूचित जनजाति के लोगों को 18 टिकट देकर भाजपा ने उन्हें भी साधने की कोशिश की है। भाजपा ने कर्नाटक में केवल 10 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। दक्षिण भारत की दलित-ओबीसी केंद्रित राजनीति में दूसरे दलों की ओर से उसके ब्राह्मण नेतृत्व को लेकर हमेशा प्रश्न खड़े किए जाते रहे हैं। लेकिन इस सूची में भाजपा ने पूरी तरह ब्राह्मणों को अपनी प्राथमिकता सूची से बाहर कर दिया है। दूसरे समुदायों में इसका बेहतर संदेश गया तो लंबी अवधि में यह भाजपा के पक्ष में जा सकता है। उसका यह रुख उसे तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी ताकत प्रदान कर सकता है। भाजपा ने सबसे बड़ा दांव पुराने चेहरों को हटाकर नए चेहरों को अवसर देने के मामले में खेला है। पांच-छह बार विधायक रह चुके दिग्गज नेताओं की जगह नए चेहरों को मैदान में उतारा गया है। पार्टी को अनुमान है कि इन नए चेहरों के आगे एंटी इनकंबेंसी फैक्टर कमजोर हो सकता है, जिससे उसकी सत्ता में वापसी की राह आसान हो सकती है।

]]>
वर्तमान विधायकों का भविष्य https://samacharpacheesa.com/?p=5694 Thu, 12 Jan 2023 08:10:31 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5694 नए साल का कैलेण्डर दीवार पर लगते ही आगामी विधानसभा चुनाव की सरगर्मी शुरु हो गयी है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ने ही संगठन को सक्रिय कर दिया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक बयान में कहा कि जो विधायक अपने क्षेत्रों में काम नहीं करेंगे उनका टिकट कटेगा। लगभग इसी तरह की चर्चा भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी चल रही है। वैसे तो हर चुनाव में दोनों ही राजनीतिक पार्टियों ने अपने विधायकों के टिकट काट नए लोगों को मौका दिया है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 5 विधायकों का टिकट काटा था। जिनमें सबसे ज्यादा दुर्ग संभाग के विधायकों का टिकट कटा, जिनमें खुज्जी, मोहला-मानपुर और संजारी बालोद शामिल है। संयोग से तीनों ही विधानसभा सीट पर कांग्रेस जीतने में सफल रही। इसी प्रकार कोटा विधानसभा से डॉ रेणु जोगी का टिकट काटा था लेकिन यहां पर कांग्रेस के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे। इसी तरह 2018 में भाजपा ने भी अपने 14 विधायकों के टिकट काटे थे। इनमें से सभी नए उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं हो सके। सामान्यतौर पर ऐसा माना जाता है कि विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी को टिकट काट चेहरा बदल देने से दूर किया जा सकता है। हालांकि यह कोई स्थापित सत्य नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने तो 2008, 2013 और 2018 में बड़ी संख्या में विधायकों के टिकट काटे थे। लेकिन यह फार्मूला 2018 में नहीं चल पाया। भूपेश सरकार के 4 साल पूरे होने पर कुछ राजनीतिक सर्वेक्षण के परिणाम सामने आए हैं उनमें कांग्रेस के निर्वाचित 71 विधायकों में से लगभग आधे विधायकों की स्थिति अपने अपने क्षेत्रों में अच्छी नहीं है। इस लिहाज से विधायकों के प्रति नाराजगी कहीं कांग्रेस के लिए भारी न पड़े, कुछ टिकट तो काटने पडेंगे। लेकिन बड़ी संख्या में नए चेहरे उतारने से पार्टी में असंतोष बढ़ेगा। पिछले बार 5 संभाग में टिकट बांटते समय वहां के कांग्रेस नेताओं को विश्वास में लिया गया था। आगामी विधानसभा चुनाव में इस बात की अधिक संभावना है कि सरगुजा से लेकर बस्तर तक मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद से टिकट तय किए जाएंगे। इस कारण भी कई विधायकों के टिकट कट सकते है। भाजपा के अभी केवल 14 ही विधायक है लेकिन इसमें अधिकांश वरिष्ठ और कद्दावर नेता है। जैसे कि चर्चा है कि गुजरात फार्मूले के तर्ज पर विधायकों के टिकट काटे गए तो नए चेहरों को मौका मिलेगा। वैसे तो भाजपा कैडर आधारित अनुशासित पार्टी है लेकिन टिकट काटने से नेता नाराज हुए तो इसका खामियाजा भी पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।

]]>