धान – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Thu, 09 Feb 2023 06:02:21 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य की चर्चा https://samacharpacheesa.com/?p=6169 Thu, 09 Feb 2023 06:02:21 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6169 प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्र की भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए यूपीए के 9 साल और मोदी सरकार के 9 साल के बीच न्यूनतम समर्थन मूल्य की बढ़ोतरी की तुलना की। उन्होंने अपने ट्वीट में बताया कि यूपीए के 9 साल की सरकार में एमएसपी 134 प्रतिशत बढ़ा। जबकि मोदी सरकार के 9 साल में यह बढ़ोतरी मात्र 55 फीसदी है। वैसे तो आर्थिक विषयों को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए। लेकिन पूरी दुनिया में आर्थिक विचारधारा के नाम पर ही राजनीति चल रही है। कई बार ऐसे आर्थिक विषयों पर भी राजनेता अपनी पीठ थपथपाते है जिनसे बड़ी संख्या में गरीबों का कोई भला नहीं होता लेकिन देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाती है। यह बात सही है कि मनमोहन सिंह सरकार के समय फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी। अभी प्रदेश सरकार किसानों के धान को 2600 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीद रही है। इसका मतलब है केंद्र सरकार के समर्थन मूल्य से 600 रुपए अधिक का मूल्य किसानों को मिल रहा है। लेकिन डॉ मनमोहन सिंह सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया क्या उससे किसानों की समस्या समाप्त हो गई? अगर ऐसा होता तो उसी साल में देश के हजारों किसान आत्महत्या क्यों करते? दरअसल हमारे देश में सभी किसानों को एक परिभाषा से आंकलन करते है जबकि देश हो या छत्तीसगढ़ 60 फीसदी किसान ऐसे है जिनका औसत खेत का रकबा एकड़ के करीब है। इस एकड़ के रकबे में फसल उत्पादन करने की अपनी सीमा है। ऐसे में समर्थन मूल्य कितना भी बढ़ा लें छोटे किसानों की गरीबी दूर नहीं होने वाली। न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर अब तक की सरकारों ने जो किया है उससे बड़े किसानों को ही फायदा मिला है। छत्तीसगढ़ में भी राजीव गांधी न्याय योजना के तहत 9 हजार रुपए प्रति एकड़ सरकार दे रही है उससे 20-30 एकड़ से अधिक के किसानों को तो एक मुश्त फायदा हो रहा है। एक-दो एकड़ वाले किसान को इसमें कुछ मिलता नहीं और जो मिलता है वह फसल का मूल्य बढऩे के फलस्वरुप कृषि लागत में बढ़ोतरी होती है उसमें बराबर हो जाता है। अर्थशास्त्र का नियम है जब आप एक आवश्यक वस्तु का मूल्य बढ़ाएंगे तो अन्य वस्तुओं का मूल्य भी बढ़ जाता है। ऐसा होने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का लाभ महंगाई के कारण छोटे किसानों को नहीं मिलता। ऐसा ही डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के समय हुआ। समर्थन मूल्य तो बढ़ा लेकिन बीज, खाद, कीटनाशक सहित साबुन, तेल, दाल, शक्कर की कीमत बढऩे से किसानों के पास कुछ बचा नहीं। राजनीतिक नारा देना अलग बात है और किसानों का कल्याण करना इससे अलग है।

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जेब में पैसा और शराब की बिक्री https://samacharpacheesa.com/?p=5795 Thu, 19 Jan 2023 05:48:28 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5795 प्रदेश में कांग्रेस सरकार को चार साल पूरे हो गए है लेकिन 2018 चुनाव के पहले कांग्रेस द्वारा जारी किए जनघोषणा पत्र के कई महत्वपूर्ण वादे पूरे नहीं हुए। इनमें शराबबंदी प्रमुख है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बार-बार यह कहते है कि धान की अच्छी कीमत देकर वे किसानों की जेब में पैसा डाल रहे है। यह बात सही भी है क्योंकि समर्थन मूल्य से लगभग प्रति क्विंटल 600 रुपए अधिक किसानों को मिल रहा है। लेकिन क्या जेब में पैसा डालने वाले नारे से सरकार का उद्देश्य पूरा हो जाता है। अर्थव्यवस्था का एक सिद्धांत है कि लोगों की जेब में जब पैसा आता है तो वस्तुएं की कीमतें बढ़ जाती है। यह तो अर्थशास्त्रियों के लिए शोध का विषय है कि किसानों की जेब में पैसा डालने का महंगाई पर कितना असर पड़ा। यह भी शोध होना चाहिए कि 4 वर्षों में 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से जो कीमत किसानों को मिल रही है उससे किसान समुदाय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कितना विकास हुआ। एक बात जो तय है कि जब जनता के हाथ में पैसा आता है तो उसका दुरुपयोग भी करते है। प्रदेश में शराब की बढ़ती खपत और सरकार को उत्पाद शुल्क से मिलने वाले राजस्व में उत्तरोतर बढ़ोत्तरी इस बात को साबित करती है। वर्ष 2006-07 में राज्य के उत्पाद शुल्क से 706 करोड़ रुपए की आय होती थी जिसमें 256 करोड़ देशी शराब और 243 करोड़ विदेशी शराब की बिक्री से मिलते थे। जब 1 रुपए किलो चावल की योजना चली उसके बाद से 2017-18 तक शराब की बिक्री से सरकार को होने वाली आय 4 हजार 53 करोड़ हो गई। इसमें देशी शराब लगभग 2 हजार करोड़ रुपए और विदेशी शराब से 1हजार 26 करोड़ रुपए की आय बढ़ी। इसका मतलब है कि 1 रुपए किलो चावल से जो आर्थिक लाभ हुआ उससे देशी शराब की बिक्री 10-11 वर्षों में 9 गुना हो गई। अब जब किसानों को धान की अच्छी कीमत मिल रही है तो राज्य में उत्पाद शुल्क से आय 6 हजार करोड़ के आसपास पहुंच गई है। 2020-21 में यह 4 हजार 635 करोड़ रुपए थी। रोचक बात यह है कि देशी शराब से आय 2017-18 की तुलना में कम होकर 15 सौ 74 करोड़ हो गई। जबकि विदेशी शराब से प्रदेश की आय 2017-18 की तुलना में 6 सौ करोड़ रुपए से अधिक बढ़ गई। इसका मतलब है कि लोग अब विदेशी शराब ज्यादा पी रहे है। अब सरकार शराबबंदी कर देती तो संभव है गांव की समृद्धि और अधिक दिखाई देती। शराब के बढ़ते कारोबार से महिलाएं परेशान है, अपराध बढ़ रहे है। किसानों की जेब में पैसा डालने के इस दुष्प्रभाव पर सरकार को चिंतन करना चाहिए।

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