बदलाव – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Fri, 14 Jul 2023 06:58:49 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 प्रदेश में तस्वीर कांग्रेस की https://samacharpacheesa.com/?p=7317 Fri, 14 Jul 2023 06:58:49 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7317 चुनावी साल में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में कई बदलाव किए हैं। जनवरी-फरवरी तक चल रहे इकतरफावाद पर लगाम लगाते हुए प्रदेश प्रभारी बदले, अप्रासंगिक हो रहे कद्दावार मंत्री को डिप्टी बनाकर फिर प्रासंगिक बनाया, अब दो बड़े बदलाव प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री के रूप में बैक टु बैक कर दिए गए। कांग्रेस जानती सरकार भले ही आंखें दिखाकर चला ली लेकिन चुनाव चुनाव की तरह ही लडऩे होंगे। परसेप्शन और जमीन का जब तक संतुलन नहीं होगा तब तक चुनाव जीते नहीं जा सकते। चेहरों पर चुनाव होने का फॉर्मूला तभी चलता है जब मैदान में भी काम दिखे। सिर्फ जन संपर्क कंपनियों के गढ़े चेहरों से काम नहीं चल सकता। पुरानी सरकार में डॉ. रमन सिंह के रूप में भाजपा के पास एक आजमाया हुआ चेहरा था, लेकिन 2017 से ही ऐसा लग रहा था कि अबकी बार सारा माहौल सिर्फ जन संपर्क कंपनियों का बनाया हुआ है, मैदान में गिल्लियां उड़ रही हैं। फिलवक्त बघेल सरकार के मामले में हालात भले उतने खराब नहीं, लेकिन बहुत अच्छे भी नहीं हैं। राजनीति में चुनाव ही आपकी दौड़ को नापने का जरिया हैं। ऐसे में 2023 में जिस तरह से भाजपा ने फोकस किया है उससे लगता है कांग्रेस को बेफिक्र नहीं होना चाहिए। हाल के बदलाव बताते हैं कांग्रेस बेफिक्र नहीं है। बस्तर में भाजपा ने समाज में घुले धर्मांतरण को जिस तरह से पकड़ा है वह उसे वहां बढ़त देता दिख रहा है। मैं यहां किन्हीं सर्वे एजेंसियों की फर्जी बातों पर विश्वास करने को नहीं कह रहा, लेकिन बहुत बारीकी से जन-मन को समझा जाए तो कांग्रेस इकतरफा जीत जैसी स्थिति में नहीं है। बस्तर को संभालने के लिए कांग्रेस ने 2 मंत्री उतार दिए हैं। एक प्रदेश अध्यक्ष भी मैदान में बनाए रखा है। कयासों पर जरा भी विश्वास करें तो एक और मंत्री वहां से बनाया जा सकता है। यानि अरविंद नेताम के सर्व आदिवासी समाज वाले प्रयोग और भाजपा के धर्मांतरण वाले तड़के को नकारते हुए भी कमतर नहीं आंका जा रहा। यही असल में चतुर राजनीतिक दल की पहचान है। सरगुजा में अधिकतम पर बैठी कांग्रेस मानती है अधिकतम को ही फिर से हासिल करना संभव नहीं है, लेकिन उपमुख्यमंत्री के रूपमें सिंहदेव की ताजपोशी सरगुजा में यहां के अधितकतम को बहुत कम नहीं होने देगी। सरगुजा से अब दो ही मंत्री हैं। इनमें एक उपमुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस मानती है 14 सीटों में दो मंत्री पर्याप्त हैं। पुरानी सरकारों में भी ऐसा ही ट्रेंड रहा है। छत्तीसगढ़ में 80 लाख आदिवासी आबादी में 54 लाख मतदाता हैं। इनमें से 2018 में कांग्रेस के खाते में 25 आदिवासी आरक्षित सीटें और लगभग 33 लाख वोट आए थे। भाजपा ने करीब 17 लाख आदिवासी वोट हासिल किए थे, जबकि जोगी की पार्टी ने भी लगभग 4 लाख वोट हासिल किए थे। कांग्रेस से सदन में 2018 में 28 आदिवासी विधायक थे, जो उपचुनाव के बाद बढ़कर 29 हो गए। भाजपा के घटकर 2 रह गए। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस आदिवासी वोटर्स को किसी हाल में खोना नहीं चाहती, क्योंकि 2019 में सारे लोग भाजपा में शिफ्ट हो गए थे, लेकिन आदिवासी वोटर्स में यह स्विच कम था। कांग्रेस ने इन्हीं वोटों के बूते पर दीपक बैज के रूप में एक सीट हासिल की है। हारती हुई कोरबा लोकसभा सीट को आदिवासी बाहुल्य पाली विधानसभा के इकतरफा टर्नआउट ने कांग्रेस की झोली में डाला है। बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग में छत्तीसगढ़ की 64 सीटें हैं। इन्हें लेकर भी कांग्रेस को रणनीति बनाना होगी। ओबीसी चेहरे के रूप में बघेल ताकतवर हैं। मंत्रियों में ताम्रध्वज, उमेश पटेल ओबीसी, रविंद्र चौबे, टीएस सिंहदेव, मो. अकबर सामान्य, शिव डहरिया, रुद्र गुरु एससी, कवासी लखमा, अनिला भेंडिया समेत 3 एसटी मंत्री हैं। निष्कर्ष में देखें तो कांग्रेस सरगुजा, बस्तर के समीकरणों को साधते हुए दिख रही है। बिलासपुर में कमजोर है, रायपुर में फिफ्टी-फिफ्टी दिख रही है, दुर्ग थोड़ा फेवरेबल है। इस तरह से कांग्रेस को अभी और बदलाव की जरूरत है। इनमें समग्रता में चुनाव लडऩा सबसे बड़ी नीति सिद्ध हो सकती है।

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कर्नाटक में महाराष्ट्र जैसा बदलाव https://samacharpacheesa.com/?p=7202 Thu, 06 Jul 2023 06:52:37 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7202 महाराष्ट्र में एनसीपी पर कब्जे को लेकर शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार की लड़ाई जारी है। इस बीच, कर्नाटक में भी सियासी उठापटक के दावे होने लगे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी ने दावा किया है कि एक महीने के अंदर महाराष्ट्र की तरह ही कर्नाटक में भी बड़ा उलटफेर होगा। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने भी कहा है कि कर्नाटक में कुछ भी हो सकता है। इसमें अब ज्यादा समय नहीं लगेगा। कुमारस्वामी और येदियुरप्पा के इस बयान ने सियासी गलियारे में खलबली मचा दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या सच में कर्नाटक में सरकार गिर सकती है? अगर हां तो ये कैसे होगा? 224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 113 का है। इस वक्त भाजपा के 66 और जेडीएस के 19 विधायक हैं। दोनों मिलकर भी कुल 85 के आंकड़े तक पहुंचेंगे। यह आंकड़ा 113 का काफी कम है। ऐसे में भाजपा और जेडीएस का गठबंधन होने कांग्रेस सरकार को कोई खास खतरा नहीं हैं। कुमारस्वामी और येदियुरप्पा दोनों ही महाराष्ट्र में एनसीपी की तरह कर्नाटक में कांग्रेस में फूट पडऩे का दावा कर रहे हैं। अगर ऐसा कुछ होता है तो सियासी उटलफेर संभव है। हालांकि, संख्याबल के लिहाज से ये महाराष्ट्र के मुकाबले कठिन होगा। कर्नाटक में कांग्रेस के पास 135 विधायक हैं। एक निर्दलीय विधायक ने भी अपना समर्थन दिया है। यहां सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी के पास 113 विधायकों का समर्थन चाहिए होता है। मतलब कांग्रेस के पास अभी बहुमत के आंकड़े से 23 सीटें अधिक हैं। महाराष्ट्र में जिस तरह का बिखराव शिवसेना के साथ हुआ वैसी टूट के लिए कम से कम 90 विधायकों को बागी खेमे में आना होगा। तभी बागी गुट के विधायक दल-बदल कानून से बच पाएंगे। 2018 में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी थी। कुमारस्वामी राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। एक साल बाद ही कांग्रेस और जेडीएस के कई विधायकों ने बगावत कर दी। बागी विधायकों के इस्तीफे की वजह से कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ गई थी। इसके बाद कुमारस्वामी को इस्तीफा देना पड़ा। और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। बागियों ने बाद में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। ज्यादातर को जीत मिली। साथ ही राज्य में भाजपा की सरकार बरकार रही। इस बार ऐसा कुछ होने के लिए बहुमत के आंकड़े को कम से कम 89 तक आना होगा। क्योंकि कांग्रेस के अलावा अन्य सभी दलों के विधायकों की संख्या 89 है। ऐसा तभी संभव है जब कांग्रेस के कम से कम 58 विधायक अफनी विधायकी से इस्तीफा दे दें।

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कांग्रेस की आर्थिक नीति में बदलाव https://samacharpacheesa.com/?p=6446 Sat, 25 Feb 2023 05:37:32 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6446 रायपुर में कांग्रेस पार्टी के 85वें महाधिवेशन हो रहा है। इस अधिवेशन में मुख्य 6 विषयों पर चर्चा की जाएगी एवं प्रस्ताव पारित किए जाएंगे। बैठक के पहले दिन देशभर के प्रदेश कांग्रेस की इकाई और राष्ट्रीय संगठन के पदाधिकारियों का जमावड़ा हुआ। पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी भी रायपुर पहुंचे। पहले दिन 6 विषय चिन्हित किए गए जिन पर अगले 2 दिनों तक चर्चा होगी और उन पर प्रस्ताव पारित किए जाएंगे। बैठक की जानकारी देते हुए प्रवक्ता जयराम रमेश ने बताया कि देश में कांग्रेस पार्टी अपने आर्थिक प्रस्ताव में निजीकरण का विरोध करेगी। खासकर सार्वजनिक उपक्रम को बेचने का विरोध किया जाएगा। आश्चर्य की बात है कि जिस कांग्रेस पार्टी ने आज से 32 साल पहले 1991 में नेहरुवादी आर्थिक नीति को पीछे छोड़ते हुए उदारीकरण और निजीकरण की नीति को आत्मसात किया था, अब वापस नेहरुवादी अर्थव्यवस्था की ओर लौट रही है। निजीकरण की शुरुआत 1993 में आज से 30 वर्ष पूर्व हुई थी। इसे विनिवेश की नीति कही गयी। 1993 से 2005 तक पहले कांग्रेस उसके बाद एनडीए की सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का सिलसिला प्रारंभ किया। 1991 की औद्योगिक नीति में ऐसे उद्योग जो केवल सरकार लगा सकती थी या जिनके लिए लाइसेंस लेना पड़ता था उस सूची को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में अब कांग्रेस पार्टी अगर पब्लिक सेक्टर की निजीकरण की बात कर रही है तो क्या 1991 में उदारीकरण नीति के तहत और पूरे सेक्टर को बढ़ावा देने और उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने की नीति की ओर भी लौटेगी? 1951 में जब पंचवर्षीय योजना प्रारंभ की गई थी तब पं. नेहरु ने समाजवादी दृष्टिकोण को सामने रखते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था को देश की तरक्की का आधार बनाया था। 1951 से 1991 तक पंचवर्षीय योजना के माध्यम से ही देश के विकास का खाका खींचा गया। 1991 में उदारीकरण की नीति आ जाने के बाद पंचवर्षीय योजनाओं का ज्यादा महत्व रह नहीं गया था। योजना आयोग देश में परिसंघीय व्यवस्था और उदारीकरण नीति के तहत आर्थिक विकास के लिए बाधा रहा। यही कारण था कि 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब एनडीए की सरकार बनी तो योजना आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर नीति आयोग का गठन किया गया। अब जब कांग्रेस पार्टी कॉर्पोरेट और निजीकरण का विरोध करने प्रस्ताव के माध्यम से करने जा रही है तो यह सवाल उठना जायज है कि क्या कांग्रेस भविष्य में पुन: योजना आयोग के गठन और पंचवर्षीय योजनाओं को प्रारंभ करेगी?

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