भाजपा-कांग्रेस – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Sat, 12 Aug 2023 07:26:37 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 आदिवासी मतदाताओं पर लगेगा चुनावी दांव https://samacharpacheesa.com/?p=7798 Sat, 12 Aug 2023 07:26:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7798 चुनावी राज्यों में भाजपा-कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे को मात देने की कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन इसी बीच छत्तीसगढ़ की खबर दोनों दलों के लिए कुछ चिंता पैदा करने वाली है। आदिवासी समुदाय के नेता अरविंद नेताम ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर छत्तीसगढ़ की सभी आदिवासी सीटों और कुछ अन्य सीटों पर चुनाव लडऩे का फैसला कर लिया है। सर्व आदिवासी समाज मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित सीटों पर भी चुनाव लडऩे पर विचार कर सकता है। यदि ऐसा हुआ तो इन सभी चुनावी राज्यों के चुनाव में एक नया समीकरण पैदा हो जाएगा जो भाजपा-कांग्रेस दोनों को ही नुकसान पहुंचा सकता है। मध्य प्रदेश में आदिवासी मतदाताओं का रुझान भाजपा-कांग्रेस में बंटा हुआ है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इन पर काफी हद तक कब्जा कर लिया था। छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव में भाजपा का जादू चला था तो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा का लगभग सफाया कर दिया था। उसने सबसे ज्यादा आदिवासी सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार भी कांग्रेस का आदिवासी सीटों पर दावा मजबूत माना जा रहा था, लेकिन उसके बागी नेता अरविंद नेताम ने पार्टी की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। यदि सर्व आदिवासी समाज ने आदिवासी समुदाय के मतदाताओं के एक हिस्से को आकर्षित किया तो भाजपा-कांग्रेस के समीकरण बदल सकते राजस्थान में कांग्रेस आदिवासी बहुल सीटों पर कब्जा करने की पूरी कोशिश कर रही है। राहुल गांधी ने आदिवासी समुदायों के लिए विशेष योजनाओं की शुरूआत कर उन्हें कांग्रेस की ओर आकर्षित करने का काम किया है। उन्होंने आदिवासियों को देश का असली मूल निवासी बताकर उनकी भावनाओं को अपने साथ जोडऩे का काम किया है। वहीं, भाजपा भी गुजरात से सटे आदिवासी इलाकों में बड़े नेताओं की मौजूदगी कराकर उन्हें अपने साथ जोडऩे की कोशिश कर रही है। राज्य के निर्माण के बाद लगातार दूसरी बार सत्ता में आने की दावेदारी कर रही भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) ने भी आदिवासी मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश की है। आदिवासी दिवस पर बीआरएस नेता के. कविता ने कहा है कि उनकी सरकार आदिवासी हितों के लिए पूरी तरह तैयार है। समान नागरिक संहिता से आदिवासी समुदाय के पारंपरिक रीति-रिवाजों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार राज्य के आदिवासी समुदाय के लोगों के हितों की पूरी तरह रक्षा करेगी। समान नागरिक संहिता से आदिवासी समाज को प्रभावित न होने देने का दावा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय के लिए 29 सीटें और राजस्थान में 25 सीटें आरक्षित हैं। तेलंगाना की 119 सीटों में से 12 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं।

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आदिवासी क्षेत्र में शराबबंदी एक बड़ी चुनौती, सांसत में सरकार https://samacharpacheesa.com/?p=6554 Thu, 16 Mar 2023 06:01:09 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6554 शराबबंदी छत्तीसगढ़ सरकार की गले की फांस बन गई है। भाजपा-कांग्रेस के सदस्य अच्छी तरह जानते हैं कि आदिवासी बाहुल्य छतीसगढ़ प्रदेश में इसे लागू करना कोई खेल नहीं। यह बहुत ही पेचीदा मामला है। यदि बिना सोचे समझे ,नोटबन्दी की तरह शराबबंदी की गई तो उसके परिणाम जनता के साथ सरकार को भी भुगतने पड़ेंगें। आदिवासी क्षेत्र के लोग शराब बंदी को किस तरह लेंगें। इस बारे में व्यापक सर्वे की जरूरत है। आदिवासी जन के शादी ब्याह,धार्मिक कार्य में शराब का अपना महत्व होता है। यह मामला उनकी भावना व आस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। इसे हसीं में नहीं लिया जा सकता।शायद कांग्रेस के घोषणापत्र बनाने वाले लोगों को महिलाओं पर हुए सर्वे में शराब की सामाजिक बुराइयों का दर्द महसूस हुआ होगा। इसी कारण इस मुद्दे पर सभी भावना में बह गए होंगे। इसके सभी पहलुओं को जानते समझते भी 15 साल के राजनैतिक वनवास को समाप्त करना भी तो जरूरी था। इसीलिए ही वोट पॉलिटिक्स के दबाव में घोषणा पत्र में यह मुद्दा शामिल किया गया होगा। लगा होगा कि 4 साल में हम प्रदेश में इसका सकारात्मक सामूहिक विचार विमर्श करके कोई ना कोई हल निकाल लेंगें। पर ऐसा हो नहीं पाया। ये तो मानना ही पड़ेगा कि कोरोना व प्रारम्भिक दौर में ही अनेक स्थानीय निकायों व पंचायतों के चुनाव ने इस सरकार के हाथ पैर बांध दिये। दो से ढाई साल तो यूं ही समस्यायों का सामना करने में निकल गए। ढाई साल आते ही कुछ और समस्या खड़ी हुई जिसने एक बार तो लगा कि सुनामी का रूप ले लेगी। सुनामी चली भी लेकिन कुछ ऐसा उच्च स्तरीय राजनैतिक दांव खेला गया। अंतत: सब ठीक हो गया। ठीक होते होते भी एक साल गद्दी बचाने के इस ढाई -ढाई साल के संघर्ष ने एक साल बर्बाद कर दिया। साढे तीन साल यूं ही बीत गए। सभी वायदों पर विचार संभव नहीं हो पाया। अब शराबबंदी की बात फिर उठने लगी। भाजपाईयों ने इसे महत्वपूर्ण मुद्दा बना लिया है। शराबबंदी के लिए सरकार के खिलाफ बड़ी घेराबंदी करनी शुरू कर दी है। घेरने लायक मुद्दा है भी।
टीवी चैनलों में डिबेट चलने लगे,भाजपा प्रवक्तागण हमलावर हैं। कांग्रेस को सूझ नहीं रहा कि आखिर कहें तो क्या कहें ? अब सच को स्वीकार करना शुरू कर दिया गया। कहा जाने लगा है कि यह विषय बहुत गंभीर है। अति संवेदनशील मुद्दा है। यूं ही हड़बड़ी में मानव जीवन से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। यह भी जोर देकर कहा रहे हैं कि हम शराब बंदी करेंगें जरूर। इस राह में हम हल्के हल्के कदम रखते हुए शराबबंदी की ओर अग्रसर हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता अपनी अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन सरकार के बचाव के लिए कर रहे हैं। भाजपा के प्रवक्ता भी अपनी पूरी ताकत के साथ सरकार का झूठा वायदा या झूठ बोलने वाली सरकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने में जुट गए हैं। सरकार का कहना है हमने अधिकांश काम कर दिया है। शराबबंदी के वायदे को भी पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। भाजपा को कोई एक भी मुद्दा नहीं मिल रहा है। इसीलिए अपने कार्यकाल में शराब के व्यापार का सरकारीकरण करने वाली 15 साल की सरकार के सदस्यों को सिर्फ शराब सूझ रही है। इनकी पार्टी की सरकार ने शराब का व्यापार 5500 करोड़ तक पहुंचाने का काम किया था। चाहते तो इस व्यापार का राजस्व धीरे धीरे कम कर सकते थे,नहीं किया। हमने करने का संकल्प लिया है। हमें ये हताश कर रहे हैं। हम शराबबंदी में भविष्य में आने वाली सारी परेशानियों का अध्ययन कर लेना चाहते हैं। शराबबंदी के बाद जो सामने आ सकती हैं। इसलिए हमने कमेटी बनाई है वो पूरी गंभीरता से उन राज्यों में जाकर अध्ययन कर रही है, जहां शराबबंदी की गई है। देखा गया कि उन राज्यों में राजस्व भी गया और शराब अभी भी उपलब्ध हो जाती है। बहुत सी अन्य बातों का भी अध्ययन किया गया। सबक यह मिला है कि जल्दबाजी में इस गंभीर विषय पर निर्णय लेना ठीक नहीं। यह भी कि हम अपनी बात पर कायम हैं। हम जागरूकता पैदा करने कार्यक्रम चलाए जाने पर सोच रहे हैं। अंतत: हम शराबबंदी कर ही देंगें। इधर भाजपा का कहना है कांग्रेस ने घोषणा पत्र में पूर्ण शराबबंदी की बात की थी। अब किंतु- परंतु का क्या मतलब ? लगता है आने वाले चुनाव तक यह मुद्दा कई रूप बदलेगा। भाजपा धर्मांतरण,हिदुत्व,कानून व्यवस्था,हिन्दू-मुस्लिम, आवास योजना के बाद शराबबंदी को सबसे बड़ा मारक मुद्दा मान कर चल रही है।इन्ही मुद्दों के रास्ते सत्ता में लौटना चाहती है। देखना यह होगा कि प्रदेश की जनता इसे किस रूप में समझ रही है। पूरे परिदृश्य पर नजर डाले व बुद्धिजीवियों की माने तो कुछ बातें साफ दिखाई पड़ रहीं हैं। यह कि दबाव में आकर अगर जल्दबाजी में कुछ कर दिया गया तो सरकार को आदिवासियों का कोप भाजन बनना पड़ सकता है। प्रदेश की 44 विधानसभाओं में आधी आबादी आदिवासियों की है।वे शराबबंदी को किस रूप में लेंगें,इसे समझना जरूरी है। भाजपा इसका किस रूप में और कितना लाभ उठाती है यह तो समय बताएगा। यह तय होगया है कि भाजपा द्वारा चुनाव तक यह मुद्दा जिंदा रखा जाएगा। कांग्रेस इसका निदान का रास्ता किस तरह निकालेगी यह देखना दिलचस्प होगा।

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