भारत – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 25 Mar 2025 02:31:42 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 भारत को भारत बनाएं, इंडिया नहीं https://samacharpacheesa.com/?p=8141 Tue, 10 Oct 2023 06:52:05 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=8141 भारत केवल भारत के नाम से ही जाना जाए, वह इंडिया शब्द से मुक्ति पाए, यह हर राष्ट्र प्रेमी की इच्छा है । जब सिलोन श्रीलंका हो सकता है, बर्मा म्यांमार हो सकता है, तो हम इंडिया का नाम बदलकर भारत क्यों नहीं रख सकते । संविधान में संशोधन करना ही चाहिए । लेकिन उसके लिए बड़ी संकल्प-शक्ति की ज़रूरत होगी । देर-सबेर शायद ऐसा हो भी जाए । इंडिया शब्द से हम जितनी जल्दी हम मुक्ति पाएंगे, उतनी जल्दी हम एक स्वाभिमानी राष्ट्र बन सकेंगे। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूँ। भारत को भारत कर देने भर से भारत महान नहीं होगा। उसे इस दिशा में आगे भी बढऩा होगा। शहरों की झुग्गियां खत्म हों। गांव का किसान समृद्ध हो। उसकी फसल के भंडार की उन्नत व्यवस्था हो। गाँव सर्वसुविधायुक्त हों।
आर्थिक समृद्धि का मतलब शहरों के बड़े-बड़े भवन नहीं, झुग्गीमुक्त शहर और समृद्धि गांव का विकास होना चाहिए। गांधी जी ने जिस अंत्योदय की बात कही, उसकी सफलता ही भारत को समृद्ध राष्ट्र बनाएगी। देश के अंतिम आदमी के उदय से भारत का उदय होगा।
जब भारत भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाएगा, जब भारत की पुलिस ईमानदार हो जाएगी, जब प्रतिरोध में उठी कलम का दमन नहीं होगा, जब किसानों और छात्रों की आत्महत्या की खबरें आना बंद हो जाएंगी, जब बलात्कार की घटनाएं एकदम न्यून हो जाएंगी,जब अपराधी को तुरंत कड़ी सजा मिलेगी, जब भ्रष्ट अफसर फौरन बर्खास्त होंगे, जब भ्रष्ट नेताओं को वापस बुलाने का सच्चा अधिकार मिलेगा, जब मेडिकल इंजीनियरिंग कॉलेज में निशुल्क प्रवेश मिलेगा, जब इस देश की राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाएगी, जब इस देश में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो जाएगा; तभी मेरा भारत महान भारत, श्रेष्ठ भारत और विश्व गुरु भारत बनेगा, ऐसा मैं सोचता हूँ।
मुझे यह भी लगता है कि जब तक हमारे देश के नेता नहीं सुधरेंगे, सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों में सुधार नहीं होगा, तब तक भारत का संपूर्ण विकास संभव नहीं। हम सब ने देखा है कि कैसे हमारे जनप्रतिनिधियों को हमारी व्यवस्था महान बनने पर तुली रहती है । उनके आगे-पीछे ऐसा आडंबरी सुरक्षा कवच तैयार कर दिया जाता है कि जनता के बीच से चुना हुआ आदमी यकायक जनता से बहुत दूर हो जाता है, या कर दिया जाता है। इसमें हमारे प्रशासन की बहुत बड़ी भूमिका रहती है। जिला प्रशासन की, जिसमें पुलिस भी शामिल है। साधारण मंत्री हो या मुख्यमंत्री हो, उसकी ऐसी सुरक्षा की जाती है कि मत पूछिए । राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तक तो बात समझ में आती है, मगर छोटे-छोटे मंत्रियों के आगे पीछे भी पुलिस वालों का रेला दिखाई देता है। यह लोकतंत्र का अभिशाप ही है। हमारे जनप्रतिनिधि सत्ता पाते ही राजसी ठाटबाट के साथ जीवन यापन करने लगते हैं, जबकि विश्व के अनेक बड़े नेता सत्ता में रहते हुए भी सादगी के साथ रहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी सामान्य नागरिक की तरह जीवनयापन करना पसंद करते हैं। जबकि हमारे यहां सेवानिवृत्त नेता भी वीआईपी ट्रीटमेंट चाहता है। वह सत्ता में रहते हुए इतनी दौलत कमा लेता है कि उसके बाद का पूरा जीवन भी किसी राजा-महाराजा से कम नहीं होता। जनप्रतिनिधियों को, मंत्रियों को बड़े-बड़े बंगले रहने के लिए दिए जाते हैं और मुख्यमंत्री राज्यपाल के भवन तो किसी राजमहल से काम नहीं होते। दूसरी ओर हमारे मजदूर- किसान छोटे से कमरे में तमाम तरह असुविधाओं के बीच रहते हैं। मैंने दुनिया के कुछ देशों की यात्राएं की हैं। मैंने यह पाया है कि वहां मजदूरों को रहने के लिए पक्के मकान दिए जाते हैं । उन्हें भरपूर वेतन और अन्य सुविधा दी जाती है।
हमारे देश में तो अनेक चुने हुए प्रतिनिधियों के यहां मुफ़्त का राशन पानी पहुंचता रहता है। यही हालत अनेक अफसरों की है। हर त्यौहार पर या किसी अवसर विशेष पर उनके घर मुफ्त में तरह-तरह की चीज पहुँचती रहती है। एक और उदाहरण देखिए आँखें खोल देने वाला। स्विट्जरलैंड की घटना है। एक महिला तीन-चार बैग उठाकर ट्रेन में चढऩे के लिए आगे बढ़ रही थी, तो उनका सहयोग करने के लिए एक सज्जन ने उनके दो बैग उठा लिए। महिला ट्रेन में चढ़ी तो एक खाली सीट पर जाकर बैठ गई । तभी टिकटचेकर वहां आया । उसने महिला से कहा कि यह विकलांगों के लिए आरक्षित सीट है । इतना सुनते ही महिला ने माफी मांगी और चुपचाप खड़ी हो गई । जानते हैं वह महिला कौन थी? वह स्विट्जरलैंड की उस समय की राष्ट्रपति थीं। मिशेलिन कालमी रे ।क्या हम अपने देश में ऐसी किसी घटना की कल्पना कर सकते हैं। एक घटना मुझे भी याद आ रही है । जब अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर सेवा निवृत्त हुए तो वह गांव जाकर खेती करने लगे थे। जिस दिन ऐसा दृश्य देखेंगे, तभी समझें कि भारत महान भारत बनने की ओर अग्रसर है।

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मोदी की अंतरराष्ट्रीय नीति में 3 सूत्रीय कॉकटेल https://samacharpacheesa.com/?p=8016 Thu, 14 Sep 2023 06:46:14 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=8016 जी20 की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारत का डंका दुनियाभर की चौपालों पर बज रहा है। जी0 समिट में सभी देशों की सहमति से घोषणापत्र भी जारी किया गया। इसे भारत की बड़ी कूटनीतिक और राजनयिक जीत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आम सहमति की संभावना जब न के बराबर लग रही थी तब भारत की कोशिशें रंग अफ्रीका का आना लाई। यह भारत के बढ़ते कद को दिखाता है। यह दिखाता है कि विश्व को साथ लाने में भारत की भूमिका काफी अहम है। विदेश सेवा के भारतीय राजनयिकों, सदस्य देशों के साथ कई महीनों की कड़ी मेहनत और 3 सितंबर से रात भर जागने वाले पांच लोगों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि सहमति बनाने में कामयाबी हासिल हो पाई। टीम मोदी ने चाणक्य नीति को चरितार्थ कर दिया। युद्ध और शांति काल में विदेश नीति का पुराना और आजमाया हुआ ग्रंथ चाणक्य का अर्थशास्त्र है। चाणक्य की साम, दाम, दंड, भेद वाली नीति से तो आप सभी वाकिफ हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सिद्धांत भी बड़े काम के हैं। इसमें जो रणनीतियाँ शामिल हैं उनमें शामिल हां, संधि (ट्रीटी), विग्रह (संधि तोडऩा और युद्ध शुरू करना), आसन (तटस्थता), यना (युद्ध के लिए मार्च की तैयारी), सामश्रय (समान लक्ष्य रखने वालों के साथ हाथ मिलाना) और अंत में द्वैदभाव (दोहरी नीति यानी एक दुश्मन से कुछ समय के लिए दोस्ती और दूसरे से दुश्मनी)। संधि (शांति स्थापित करना) की नीति इस नियम पर आधारित है कि जब किसी राज्य को अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ता है, तो उसे जीवित रहने के लिए शांतिपूर्ण समझौते पर बातचीत करने का प्रयास करना चाहिए। यदि शांति स्थापित करने के सिद्धांत का विश्लेषण किया जाए तो इसे कई ऐतिहासिक शांति संधियों के संदर्भ में समझा जा सकता है। कौटिल्य संधि के अन्य रूपों, काल संधि (अस्थायी गठबंधन) या स्थावर संधि (स्थायी गठबंधन) की भी बात करते हैं, जिसमें एक छोटा राज्य अधिक शक्तिशाली सहयोगी को सेवा प्रदान करके और शक्तिशाली लोगों के साथ गठबंधन में रहकर रहने का सौदा कर सकता है। कौटिल्य कहते हैं कि अगर राजा को लगे कि दुश्मन की सेना की ताकत समान है और जंग लडऩे का मतलब है दोनों तरफ तबाही का खुला निमंत्रण को ऐसी परिस्थिति में समझौता यानी तटस्थ रहकर शांति का प्रयास आवश्यक है। जवाहर लाल नेहरू ने कौटिल्य की आसन नीति अपनाई जिसका परिणाम ती गुटनिरपेक्षता और मोदी ने कौटिल्य की संधि, आसन और सामरस्य नीति का कॉकटेल तैयार किया। नई दिल्ली ने अपने घोषणापत्र के जरिए चीन को भी अपरोक्ष रूप से साधा। लेकिन इसमें कहीं भी लद्दाख या एलएसी का जिक्र नहीं था और न ही अरुणाचल प्रदेश में उसकी हरकतों का उल्लेख था। लेकिन इस घोषणापत्र में परोक्ष रूप से वो सब था जो भारत चाहता था।

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आर्थिक कॉरिडोर से गरीबों को क्या मिलेगा? https://samacharpacheesa.com/?p=8006 Wed, 13 Sep 2023 07:28:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=8006 भारत ने जी20 का सफल आयोजन कर पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा दी है। इंडिया, मिडिल ईस्ट से लेकर यूरोप तक जाने वाले रेल-समुद्री यातायात कॉरिडोर के निर्माण पर सदस्य देशों की सहमति को इस बैठक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है कि इस कॉरिडोर के बनने से यूपी-बिहार या तमिलनाडु और केरल के सुदूर इलाकों में काम करने वाले किसानों-गरीबों को इससे क्या लाभ मिलेगा? एपीडा के आंकड़ों के अनुसार भारत ने वर्ष 2022-23 में 13,185 करोड़ रुपये मूल्य की फल-सब्जियों का निर्यात किया था। इसमें 6219 करोड़ रुपये से ज्यादा के फल और 6965 करोड़ रुपये से अधिक की सब्जियां शामिल थीं। प्रोसेस्ड फूड और दालों को मिलाकर यह आंकड़ा 18 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा था। भारत आम, केला और पपीता जैसे फलों के उत्पादन में दुनिया में नंबर एक पर है, लेकिन इसके बाद भी हमारी फलों-सब्जियों के निर्यात में वैश्विक हिस्सेदारी एक फीसदी से भी कम है। इसका बड़ा कारण यह है कि हमारे देश में फलों-सब्जियों को रखने और उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए अच्छी गुणवत्ता की और सस्ती दरों पर उपलब्ध कोल्ड स्टोरेज चेनों की भारी कमी है। वैश्विक व्यापार के लिए यह कमी और ज्यादा हो जाती है। फलों-सब्जियों के देरी से बाजार में पहुंचने से व्यापारियों को भारी नुकसान होने की संभावना लगातार बनी रहती है। चूंकि, कहा जा रहा है कि इस कॉरिडोर के निर्माण से यूरोपीय बाजारों में पहुंचने वाले फलों-सब्जियों के पहुंचने में 40 फीसदी का समय कम लगेगा, इससे भारतीय उत्पादों के यूरोपीय बाजार तक पहुंचने में इनके न खराब होने की दर बढ़ जाएगी। इसका सीधा लाभ भारतीय किसानों को मिलेगा। यूरोप भारत के कुल कारोबार का तीसरा सबसे बड़ा साझीदार है। वर्ष 2021 में भारत के कुल व्यापार का लगभग 10.8 फीसदी व्यापार यूरोपियन यूनियन के साथ हुआ था। अमेरिका के 11.6 फीसदी और चीन के 11.4 फीसदी की व्यापारिक हिस्सेदारी होने के बाद भी यूरोप भारत के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका बड़ा कारण है कि भारत यूरोपीय देशों को कृषि उत्पादों, फलों-सब्जियों, कपड़ों और दवाओं का निर्यात करता है, जिसके कारण उसका निर्यात पक्ष यूरोप में बहुत संतुलित है, जबकि चीन से भारत ज्यादातर वस्तुएं आयात करता है और व्यापारिक असंतुलन बुरी तरह चीन के पक्ष में झुका हुआ है। भारतीय उत्पादकों से यूरोप के बाजारों तक पहुंचने में अलग-अलग देशों की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अभी 30 से 45 दिन तक का समय लगता है। जबकि अनुमान है कि मुंबई से शुरू होने वाले 6000 किलोमीटर लंबे इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर बनने से यह समय 12 से 15 दिन तक कम हो जाएगा। समय के साथ खराब होने वाले कृषि, फल-सब्जी और डेयरी उत्पादों के संदर्भ में यह समय बहुत महत्त्वपूर्ण है।

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निर्गुट से जी-20 शिखर सम्मेलन तक भारत https://samacharpacheesa.com/?p=7981 Sat, 09 Sep 2023 07:07:29 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7981 भारत आगामी 9-10 सितंबर को होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए तैयार है। जी-20 देशों के राष्ट्राध्यक्षों के अलावा भारत के निमंत्रण पर बांग्लादेश, नाइजीरिया, मॉरीशस वगैरह देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भी सम्मेलन में विशेष अतिथि के रूप में शिरकत करेंगे। इससे पहले इतना भव्य आयोजन 1983 में राजधानी दिल्ली में हुआ था। तब दिल्ली में 7-12 मार्च, 1983 को निर्गुट सम्मेलन का आयोजन हुआ था। उसमें दर्जनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों समेत 140 देशों के नुमाइंदों ने भाग लिया था। इसके अलावा अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और मौरिस मिटर्रैंड वगैरह के संदेश भी सरकार को मिले। तब कहा गया था कि इतना विशाल सम्मेलन कभी कहीं नहीं हुआ। उसमें क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो, पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक, फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (पीएलओ) के नेता यासर अराफात भी पधारे थे। ये सब अशोक होटल में ठहरे थे। तब सुरक्षा कारणों के चलते कास्त्रो और अराफात के चेहरों से मिलते-जुलते तीन-तीन और व्यक्ति भी अशोक होटल और विज्ञान भवन में घूम रहे थे। यह सब इसलिए किया जा रहा था ताकि इन्हें किसी भी संभावित हमलों से बचाया जा सके। निर्गुट सम्मेलन का आयोजन विज्ञान भवन में हुआ था। बहरहाल, अब जी-20 सम्मेलन के दौरान विज्ञान भवन कहीं नहीं है। तब भी नई दिल्ली को एक तरह से सील कर दिया गया था। पर तब बैंक, सरकारी दफ्तर और स्कूल-कॉलेज खुले रहे थे। निर्गुट सम्मेलन में भाग लेने के लिए आने वाले राष्ट्राध्यक्षों की कारों के काफिले एयरपोर्ट से शांतिपथ, तीन मूर्ति, साउथ एवेन्यू, विजय चौक, मदर टेरेसा क्रिसेंट, सरदार पटेल मार्ग, पंचशील मार्ग, सफदरजंग रोड और विज्ञान भवन के आसपास रहे थे। इस बार काफिले प्रगति मैदान तक जाएंगे क्योंकि वहां पर बने भारत मंडपम में ही जी-20 सम्मेलन का आयोजन होना है। बहरहाल, जी-20 सम्मेलन का आयोजन उस समय हो रहा है जब भारत संसार की आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। 1983 से 2023 का भारत एकदम अलग है। कुछ समय पहले भारत ब्रिटेन को पीछे छोड़कर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। अब अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी की ही अर्थव्यवस्था आज के दिन भारत से बड़ी है। हमारी प्रगति की रफ्तार को देखकर यह कहा जा सकता है कि हम जल्दी ही जापान और जर्मनी को भी मात दे देंगे। हम दुनिया के आईटी सेक्टर की सबसे बड़ी ताकत हैं। निश्चित रूप से जी-20 शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन से सारे संसार में भारत की प्रतिष्ठा और बढ़ेगी।

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संविधान सभा में बताए थे भारत के मायने https://samacharpacheesa.com/?p=7967 Thu, 07 Sep 2023 06:43:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7967 इंडिया बनाम भारत की चर्चा इस वक्त देश में सबसे ज्यादा हो रही है। अब जब चर्चा हो रही है कि क्या आधिकारिक रूप से देश का नाम बदलने वाला है। ऐसे में देश का संविधान लिखने वाली सभा की एक पर हुई बहस के बारे में जानना भी जरूरी होगा। जो बेहद दिलचस्प थी। संविधान का अनुच्छेद एक कहता है इंडिया, यानी भारत, राज्यों का एक संघ होगा। हालांकि, मूल मसौदे में भारत नाम का कोई जिक्र नहीं था। दरअसल, चार नवंबर 1948 को संविधान सभा में संविधान का मसौदा पेश किया गया था। यह मसौदा डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा तैयार किया गया था। लगभग एक साल बाद 17 सितंबर 1949 को अंबेडकर ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें पहले उप खंड में भारत नाम के संशोधन में बदलाव का सुझाव दिया गया। 18 सितंबर 1949 को आजाद देश को एक के बजाय दो नाम देने के प्रस्ताव के बारे में सदस्यों के बीच भारी असहमति देखने को मिली थी। प्रारंभिक प्रावधान पर संविधान सभा में इंडिया और भारत के बीच संबंध पर काफी चर्चा हुई। सदस्यों ने कई संशोधनों का सुझाव दिया लेकिन किसी को भी स्वीकार नहीं किया गया। अंबेडकर के बाद ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता एचवी कामथ ने पहले उप खंड के हिस्से को भारत या अंग्रेजी में इंडिया से बदलने का प्रस्ताव करते हुए पहला संशोधन पेश किया। कामथ यह प्रस्ताव आयरिश संविधान से प्रेरणा लेते हुए सामने लेकर आए थे। इसी चर्चा में कांग्रेस के एक अन्य सदस्य कमलापति त्रिपाठी भी जुड़े। कमलापति ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत को इंडिया से अधिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कमलापति ने संशोधन प्रस्ताव पर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। इस दौरान उन्होंने कहा, आज देश के नाम को लेकर एक संशोधन हमारे सामने है, मुझे खुशी होती अगर प्रारूप समिति ने इस संशोधन को किसी अलग रूप में प्रस्तुत किया होता। यदि इंडिया दैट इज भारत के अलावा किसी अन्य अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया गया होता तो मैं सोचता हूं, यह इस देश की प्रतिष्ठा और परंपराओं के अधिक अनुरूप होता और वास्तव में इससे इस संविधान सभा का भी अधिक सम्मान होता। यदि दैट इज शब्द आवश्यक होते तो, जो प्रस्ताव हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है उसमें भारत दैट इज इंडिया शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित होता। मेरे मित्र कामथ ने यह संशोधन पेश किया है कि ‘भारत जैसा कि इसे अंग्रेजी भाषा में इंडिया कहा जाता है का प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रारूप समिति ने इसे स्वीकार कर लिया था यदि वह अब भी इसे स्वीकार करती है तो यह हमारी भावनाओं और हमारे देश की प्रतिष्ठा के प्रति सराहनीय विचार होगा। हमें इसे स्वीकार करने में बहुत खुशी होती।

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इंडिया और भारत पर्यायवाची शब्द https://samacharpacheesa.com/?p=7959 Wed, 06 Sep 2023 07:02:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7959 राजनीतिक गलियारों में कहा यही जा रहा है कि आने वाले संसद के विशेष सत्र में देश को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ भारत कहे जाने वाले प्रस्ताव को पास कराया जा सकता है। लेकिन संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि देश के संविधान में इंडिया, दैट इज भारत का पहले से ही जिक्र है। इसलिए इंडिया और भारत यह दोनों नाम संविधान में दर्ज हैं और एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। संविधान विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में बदलाव तकरीबन नामुमकिन जैसा ही है। वहीं देश के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोर पकडऩे लगी है कि इंडिया को आधिकारिक तौर पर भारत पुकारे जाने से क्या भारतीय जनता पार्टी को कोई बड़ा सियासी लाभ मिल सकता है या नहीं। दरअसल राष्ट्रपति की ओर से 9 सितंबर को जी-20 कार्यक्रम के दौरान भारत मंडपम में आयोजित होने वाले डिनर के निमंत्रण पत्र में द प्रेसिडेंट ऑफ भारत की ओर से न्योता भेजा गया है। इसी निमंत्रण पत्र पर छपे भारत शब्द को लेकर अब सियासत होने लगी है। राजनीतिक पार्टियों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार देश के नाम पर भी हमला कर रही है। कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने कहा कि जब संविधान के अनुच्छेद एक में कहा गया है भारत जो की इंडिया था वह राज्यों का संघ है, तो उसमें इंडिया शब्द को क्यों हटाया जा रहा है। हालांकि कांग्रेस के नेता शशि थरूर कहते हैं कि जब संविधान में इंडिया और भारत दोनों का जिक्र है, तो इसमें संवैधानिक तौर पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस नाम को लेकर सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से भी बाकायदा भारत के समर्थन में ट्वीट और बयान दिए जा रहे हैं। हालांकि संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि इंडिया और भारत के नाम को लेकर किसी तरीके का कोई संवैधानिक विवाद नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है, इंडिया जो कि भारत है, राज्यों का एक संघ होगा। यह पहला मौका नहीं है जब भारत का नाम इस तरह से इस्तेमाल किया गया। ऐसे पहले भी कई मौके आए जब इंडिया की जगह पर भारत के नाम का जिक्र हुआ। जब संविधान में इसका जिक्र है कि फिर इस तरीके के निमंत्रण पर होने वाले विवाद का मतलब महज सियासी ही माना जा सकता है। भारत और इंडिया एक दूसरे के पर्यायवाची ही हैं। इसलिए यह कहना कि इंडिया की जगह पर भारत का नाम इस्तेमाल किया गया, वह किसी बहुत बड़े फेरबदल के संकेत हैं, ऐसा कानूनी रूप से संभव नहीं नजर आ रहा है और सियासी रूप से भी इसकी संभावना न के तौर पर दिख रही है। पासपोर्ट पर भी रिपब्लिक ऑफ इंडिया अंग्रेजी में दर्ज होता है, जबकि हिंदी में भारत का गणराज्य लिखा होता है।

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अब कांग्रेस जी-20 शिखर सम्मेलन से तकलीफ https://samacharpacheesa.com/?p=7880 Fri, 25 Aug 2023 07:04:32 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7880 भारत को जबसे जी-20 की अध्यक्षता मिली है तबसे विपक्ष के कुछ नेता बहुत परेशान हैं। खासकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश बहुत ज्यादा तकलीफ में नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर वक्तव्य, हर उपलब्धि, हर फैसले और हर नीति पर कटाक्ष करने से नहीं चूकने वाले जयराम रमेश मोदी विरोध में कभी कभी बहुत आगे निकल जाते हैं। जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर आजादी के अमृत काल को देश ने धूमधाम से मनाया लेकिन जयराम रमेश ने अमृत काल को अमरूद काल बता दिया। भारत को विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही गयी तो जयराम रमेश ने कह दिया कि इसमें सरकार को क्या करना है, भारत अपने आप ही तीसरी अर्थव्यवस्था बन जायेगा। देखा जाये तो भारत की हर कामयाबी को कम करके आंकने और भारत की हर उपलब्धि का श्रेय गांधी परिवार को देने के लिए जयराम रमेश इतने आतुर रहते हैं कि उन्होंने कांग्रेस में बड़े से बड़े नेताओं को पीछे छोड़ दिया है। अब जयराम रमेश के निशाने पर जी-20 शिखर सम्मेलन है। शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आने वाले विश्व नेताओं की आवभगत के लिए जो प्रबंध किये जा रहे हैं उससे भारत के आतिथ्य सत्कार का ही गुणगान विश्व भर में होने वाला है। लेकिन जयराम रमेश इस सबसे बहुत चिंतित हैं क्योंकि उन्हें यह अच्छा नहीं लगेगा कि शानदार आयोजन के लिए विश्व नेता मोदी की पीठ थपथपाएं। जयराम रमेश को लग रहा है कि मोदी इस सबका फायदा चुनावों में ले लेंगे। जयराम रमेश को लगता है कि मोदी को चुनावों में जी-20 का फायदा मिला तो वह कहीं फिर से प्रधानमंत्री ना बन जायें। दरअसल जयराम रमेश के इस पूरे डर के पीछे कारण यह है कि उनका खुद का कॅरियर दांव पर लगा हुआ है। जयराम रमेश जानते हैं कि यदि 2024 में कांग्रेस फिर चुनाव हारी तो सबसे पहले पार्टी के नेता उन पर ही गाज गिरायेंगे इसलिए वह हर रोज कोई ना कोई मुद्दा निकाल कर लाते हैं और प्रयास करते हैं कि इससे मोदी विरोध को हवा दी जा सके। जहां तक जी-20 के आयोजन से चुनावी लाभ होने की बात है तो जयराम रमेश को अपनी चिंता दूर करनी चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि जी-20 के विभिन्न समूहों की बैठकें देशभर में आयोजित की गयीं। जिस भी शहर में यह बैठकें हुईं वहां की राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने मेहमानों की आवभगत में पलक-पांवड़े बिछा दिये और बैठक को हर मायने में सफल बनाया। जी-20 समूहों की बैठकों को सफल बनाने में कांग्रेस शासित राज्य भी पीछे नहीं रहे। इसलिए सवाल उठता है कि बैठक के सफल होने का फायदा वहां सत्ता में मौजूद पार्टी को मिला या देश को? कश्मीर में जी-20 पर्यटन समूह की सफल बैठक हुई। इसका फायदा कश्मीर को मिला या प्रधानमंत्री मोदी को?

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भारत की आजादी विभाजन की त्रासदी https://samacharpacheesa.com/?p=7823 Wed, 16 Aug 2023 06:59:34 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7823 संसार में भारत अकेला ऐसा देश है जिसका इतिहास यदि सर्वोच्च गौरव से भरा है तो सर्वाधिक दर्द से भी। यह गौरव है पूरे संसार को शब्द, गणना और ज्ञान विज्ञान से अवगत कराने का। और दर्द है निरंतर आक्रमणों और अपनी धरती के हुये विभाजन का। बीते ढाई हजार वर्षों में 24 और 1873 से 1947 के बीच केवल सत्तर सालों में सात विभाजन हुये । अंतिम विभाजन करोड़ो लोगों के बेघर होने और लाखों निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या के साथ हुआ। आज स्वतंत्र भारत का जो स्वरूप और सीमा हम देख रहे हैं उसका भूगोल अतीत के गौरव का दस प्रतिशत भी नहीं है । वैदिक संस्कृति से आलोकित इस भूभाग का नाम कभी जंबूद्वीप था। जिसका स्मरण आज भी पूजन संकल्प में होता है जंबूद्वीपे भरत खंडे आर्यावर्ते.. पर यह अब केवल इतिहास की पुस्तकों तक ही सिमिट गया। समय के साथ भारत कभी आर्यावर्त है तो कभी भारतवर्ष भी रहा। हिमालय इसके मध्य में था। यदि हम बहुत पुरानी बात न करें केवल 1876 के बाद की बात करें तो 1876 से 1947 के बीच कै कुल इकहत्तर वर्षों में भारत के कुल सात विभाजन हुये और भारत का दो तिहाई हिस्सा पराया हो गया। अफगानिस्तान, श्रीलंका, म्यामार आदि सब इसी अवधि में भारत से अलग हुये। इसकी भूमिका 1857 की क्रान्ति से बन गई थी। अंग्रेजों के शासन का सिद्धांत “बाँटों और राज करो” था। इसलिए उन्होंने विशाल भारतीय साम्राज्य को बांटना आरंभ किया और चारों ओर बफर स्टेट बनाना आरंभ किया। 1876 में अफगानिस्तान को भारत से अलग किया, 1906 में भूटान को, 1935 में श्रीलंका को, 1937 में वर्मा यनि म्यांमार और 1947 पाकिस्तान के रूप में भारत की धरती पर एक नये देश का उदय हुआ। जो 1971 में विखंडित होकर पाकिस्तान के भीतर से बंगलादेश का उदय हुआ। 1857 की क्रांति भले असफल हो गई थी पर इसके बाद अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को सशक्त और स्थाई बनाने के अनेक उपाय किये। पुलिस आदि की व्यवस्था करके न केवल जाति धर्म और भाषा के नाम से विभाजन आरंभ किया अपितु देशात्मक सत्ता के रूप में विभाजन आरंभ किया। ताकि यदि किसी एक क्षेत्र में कमजोर होते हों तो दूसरे क्षेत्र की सेना से नियंत्रित कर सकें। इसीलिये उन्होंने भारत के विभाजन की शुरुआत की। 1876 में भारत का कुल क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग किलोमीटर था। जो धीरे-धीरे घटकर अब केवल 33 लाख वर्ग किलोमीटर रह गया। यनि यदि पुराने इतिहास की बात न करें केवल 1874 से 1947 के बीच की बात करें तो इसी अवधि में भारत का पचास लाख वर्ग किलोमीटर धरती पराई हो गयी। भारत का अंतिम विभाजन 14 अगस्त 1947 को हुआ। इसलिये भारत में 14 अगस्त अखंड भारत दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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यही मौका है! https://samacharpacheesa.com/?p=7736 Tue, 08 Aug 2023 06:48:38 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7736 जी हाँ, भारत के पास यही मौक़ा है कि वह पाकाधिकृत कश्मीर (पीओके)को भारत में शामिल करने के लिए वहां के आंदोलनकारियों का साथ दे। उनके पक्ष में संसद में चर्चा करे। पीओके के लोग भारत से उम्मीद कर रहे हैं कि वह उनको पाकिस्तान के बंधन से मुक्त कराने में मदद करेगा। वहां के लोग पाकिस्तान सरकार से परेशान हैं। महंगी बिजली, राशन के साथ साथ समय-समय पर उन पर अत्याचार भी होते हैं। यही स्थिति बलूचियों के साथ भी है। वे भी पाकिस्तान से मुक्ति चाहते है। बलूचियों के दमन की अनेक कहानियां समय -समय पर प्रकाश में आती रही हैं। अनेक बलूच नेता तो पलायन कर चुके हैं या जेलों में हैं। बलूच और पीओके के लोग समय समय पर अपनी मुक्ति के लिए आंदोलन करते रहे हैं। पाक ने हमारे जिस कश्मीर को अपने कब्जे में ले रखा है, वह भारत का ही है। इसे लेकर भारत को आक्रामक होना चाहिए। यह हम सबके लिए गर्व की बात है कि वहां के लोग भारत पर भरोसा कर रहे हैं कि वही हमें आज़ाद करा सकता है। उस मामले में क्या कूटनीति हो सकती है, इस पर विचार करके भारत को पीओके के लोगों का साथ देना ही चाहिए। भारत की पकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए कि वह अपना ज़बरदस्ती वाला अधिकार उफऱ् कब्जा छोड़ दे।संयुक्त राष्ट्र में भी भारत लगातार इस मुद्दे को उठाए। अभी एक बेहतर मौका है कि पीओके के लोग अपनी मुक्ति के लिए आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे समय में केंद्र सरकार को संसद में चर्चा करनी चाहिए और इस मसले पर विपक्ष की भी सत्ता पक्ष का साथ देना चाहिए। पर हमारे देश का दुर्भाग्य यह है कि आपसी राजनीतिक संघर्ष मतभेद से आगे बढ़ कर मनभेद तक जा पहुंचा है। वर्षो पहले संसद के 1994 में, दोनों सदनों में यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि पकिस्तान कश्मीर के कब्जे वाले स्थान को छोड़ दे। अब जब वहां आंदोलन हो रहा है, तो लोग भारत को उसके ही प्रस्ताव की याद भी दिलाते हुए कह रहे हैं कि हमारे आंदोलन का समर्थन करो. तो पक्ष-विपक्ष दोनों को इस मुद्दे पर चर्चा करके एक बार फिर प्रस्ताव पारित करके पकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र तक गुहार लगानी चाहिए। यह भारत की सम्प्रभुता पर सीधा प्रहार है मगर हम उदारवादी बन कर वर्षो से खामोश बैठे हुए हैं! हमारी ख़ामोशी देशवासियों को निराश करती है। जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने का ऐतिहासिक कार्य केंद्र सरकार ने किया, अब एक बार फिर पीओके की मुक्ति का कड़ा प्रस्ताव संसद में पारित होना ही चाहिए।अब तो भाजपानीति एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत भी है. इसके साथ ही कश्मीर से पलायन कर चुके पंडितों को दुबारा वहां बसने और उनकी सुरक्षा के समुचित बंदोबस्त पर भी गंभीरता के साथ विचार करके निर्णय लेने की आवश्यकता है। हमारे रक्षामंत्री कई बार पीओके की आज़ादी के लिए हुंकार तो भरते रहते हैं लेकिन अब ज़ुबानी जमाखर्च करने का समय नहीं है। इस मुद्दे पर हमे आक्रामक रुख अपनाना होगा। तभी पाकिस्तान पर दबाव बनेगा।

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महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोडऩा https://samacharpacheesa.com/?p=7278 Wed, 12 Jul 2023 07:45:25 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7278 भारत के जनांकिकी आंकड़ों के मुताबिक भारत की औसत आयु 28 वर्ष है और इस नाते युवा शक्ति इस देश को आगे ले जाने में अपना बड़ा योगदान दे सकती है। दुनिया भर में जनांकिकी को आर्थिक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। इस लिहाज से भारत में आर्थिक शक्ति की बड़ी संभावना है। जनांकिकी की तरक्की इस बात पर निर्भर करती है कि आधी आबादी की हिस्सेदारी कार्यक्षेत्र में कितनी है। इस दृष्टि में भारत में अभी महिलाओं की केवल 17 फीसदी आबादी कार्यक्षेत्र में है जबकि चीन की 40 प्रतिशत महिला आबादी कार्य कर रही है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें तो मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की ग्रामीण विकास योजनाओं से सीधे महिलाओं की बड़ी आबादी आर्थिक गतिविधियों में संलग्न हो गई है। इसका सबसे सुंदर उदाहरण गौठान और रीपा के माध्यम से आर्थिक गतिविधियां हैं। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की सरकार बनने के बाद स्व-सहायता समूहों की संख्या तेजी से बढ़ गई। दिसंबर 2018 के बाद से अब तक 13 लाख से अधिक महिलाएं इन समूहों से जुड़ चुकी हैं। इस तरह से कार्यशील आबादी की संख्या में तेजी से विस्तार आया है। इस बड़ी आबादी के कार्यशील गतिविधियों में लगे होने का अर्थव्यवस्था को लाभ तो होता लेकिन जब तक इनके लिए व्यवस्थित बाजार मुहैया नहीं कराया जाता तब तक यह लाभ प्रभावी नहीं हो पाते। छत्तीसगढ़ सरकार ने इनके लिए बाजार प्रदान किया। हर जिले में सी-मार्ट आरंभ किये गये। इन सी-मार्ट के माध्यम से हर क्षेत्र के खास उत्पादों को जगह मिली। उदाहरण के लिए बस्तर के दंतेवाड़ा में यदि भूमगादी समूह से जुड़ी कोई महिला जैविक चावल का विक्रय कर रही है तो उसके लिए बाजार केवल अपने आसपास के क्षेत्र तक नहीं है अपितु पूरा छत्तीसगढ़ और इसके बाहर भी बाजार उपलब्ध है। इसके साथ ही प्रशिक्षण का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। जब महिलाएं एसएचजी से जुड़ती हैं तो बैंकिंग गतिविधियों से भी जुड़ती हैं एकाउंटेंसी से भी परिचित होती हैं और मार्केट को भी समझ पाती हैं। इस तरह पूरी तरह से आर्थिक कार्यकलापों के लिए दक्ष बनाने अपने को तैयार कर पाती हैं। जब महिलाएं आर्थिक रूप से सक्षम हो रही हैं तो अपनी बेटियों को भी इस दिशा में तैयार कर रही हैं। छत्तीसगढ़ में स्कूल के अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर और महिलाओं में बढ़ी जागरूकता का प्रभाव स्कूलों में दर्ज संख्या से पता चलती है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 में 10 से अधिक साल तक पढ़ाई करने वाली लड़कियों की संख्या में 36.9 प्रतिशत वृद्धि हुई है। महिलाओं के आगे आने से आर्थिक रूप से सबल होने से उनकी सामाजिक स्थिति भी सशक्त हो रही है। मुख्यमंत्री से भेंट मुलाकात के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में जितनी संख्या में पुरुष हितग्राही अनुभव साझा करते हैं उतनी ही संख्या में महिला हितग्राही भी अपना अनुभव साझा करते हैं। इन सभाओं को देखकर महसूस होता है कि छत्तीसगढ़ का समाज सचमुच समतामूलक समाज है जहां महिलाओं और पुरुषों की कार्यक्षेत्र में बराबरी की भागीदारी हैं और दोनों ही मिलकर अपने प्रदेश के विकास की गाथा को गढ़ रहे हैं। महिलाएं परिवार की धुरी होती हैं और आर्थिक रूप से सक्षम होने की वजह से उनके पास भी परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की शक्ति आ गई है। चाहे बच्चों की पढ़ाई का मामला हों, उनके लिए ज्वैलरी खरीदी हो। वे निर्णय ले रही हैं। अपने सपनों को पूरा करने की जो शक्ति उनके भीतर आई है उससे उनके जीवन में खुशियां भी बढ़ी हैं। गौठानों में आजीविकामूलक गतिविधियों का ट्रेंड देखें तो यह साफ होता है कि महिलाएं लगातार अपनी आर्थिक गतिविधियों का विस्तार कर रही हैं। जिन समूहों की महिलाएं वर्मी कंपोस्ट तैयार करती थीं। उन्होंने मशरूम का उत्पादन आरंभ कर दिया। तेल पिराई का काम करने लगीं। इस तरह अपने आसपास की बाजार की जरूरतों को भांपते हुए अपना कार्य क्षेत्र बढ़ाया। छत्तीसगढ़ में उद्यमशील समाज के निर्माण में अब इन महिलाओं की अहम भूमिका हो गई है।

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