भारतीय जनता पार्टी – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 25 Jul 2023 07:10:09 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 इंडिया का नामकरण तीसरे मोर्चे की ताकत https://samacharpacheesa.com/?p=7515 Tue, 25 Jul 2023 07:10:08 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7515 क्या जन्म के साथ ही नए अवतार वाले इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलायंस यानी इंडिया के नाम को लेकर विपक्ष के नेता असहज होने लगे हैं? क्या यह असहजता इतनी बढ़ेगी कि एक बार फिर से यह तीसरे मोर्चे की वजह बन जायेगी? यह सच है कि संयुक्त प्रजातांत्रिक गठबंधन यानी संप्रग का अंग्रेजी नामकरण इंडिया हिंदी पट्टी के नेताओं को कम लुभा रहा है। क्या यही एक वजह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बुजुर्ग लालू प्रसाद के साथ फाइनल बैठक से पहले ही बेंगलुरु से रवाना हो गए? इनकी तरह ही उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अपने चाचा प्रो. रामगोपाल के साथ गठबंधन के ऐलान वाली प्रेस कांफ्रेंस से पहले मंच से नदारद रहे। भारतीय जनता पार्टी को आगामी लोकसभा चुनाव में घेरने के लिए संयुक्त विपक्षी गठबंधन की यह दूसरी बैठक दक्षिण के राज्य कर्नाटक में थी। इसलिए यहां गठबंधन का अंग्रेजी नाम इंडिया रख पाना संभव हुआ। इस पर पड़ोसी तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश व बंगाल समेत पूर्वोत्तर राज्यों के नेताओं का तत्काल कोई ऐतराज उभरकर सामने नहीं आया। शायद यह विपक्षी एकता की पटना वाली पहली बैठक में संभव नहीं हो पाता। अंग्रेजी वाले नाम को लेकर हिंदी समर्थक नेताओं की असहजता स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में स्व. मुलायम सिंह की पूरी राजनीति प्रखर हिंदी समर्थक के बल पर खड़ी थी। कांग्रेस संग किसी चुनावी एलायंस की गंभीर पहल से बचते रहे अखिलेश यादव को इंडिया नाम कितना पसंद आया यह आने वाले दिनों में नजऱ आएगा। नाम को लेकर खड़ा होने वाला विवाद बढ़ा तो तत्काल इसका असर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में देखने को मिलेगा। ये तीनों राज्य इसी साल चुनावी परीक्षा से गुजरने वाले हैं और भाषाई लिहाज से हिंदी समर्थक हैं। गठबंधन के इस नए अवतार का नामकरण कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किया है इसलिए यह मुमकिन नहीं कि इस पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपनी कोई इतर राय रख पाएं। मगर यह पैबंद गठबंधन में शामिल किसी गैर कांग्रेसी नेता पर कतई लागू नहीं होता है। जहां तक बात एकमत होने की है तो यह समाजवादी पृष्ठभूमि के जनता परिवार वाले नेताओं पर कतई लागू नहीं होती। वैचारिक समाजवादियों को लेकर मशहूर प्रहसन है कि ये इक_ा होते ही बिखरने के लिए हैं। संप्रग की जगह इंडिया को जिन राज्यों में दिक्कत हो सकती है उसमें 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश, 40 सीटों वाला बिहार शामिल है। यानी कुल 120 सीटें हैं। इसी तरह अंग्रेजी नाम से असहज राज्यों में राजस्थान की 25, मध्य प्रदेश की 29 और छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटें यानि कुल 65 सीटें हैं। प्रखर भारतीय अस्मिता वाले राज्य तेलंगाना से लोकसभा की 17 सीटें हैं। बिहार से लगे हिंदीभाषी राज्य झारखंड से 14, हरियाणा से 10, दिल्ली से 7, उत्तराखंड से 5, हिमाचल से 4 सीटों के मतदाता संप्रग की जगह इंडिया वाले नामकरण से कैसे लुभाए जाएंगे इस चुनौती से एकजुटता में दरार को आशंका बनी रहेगी।
विपक्षी एकता की इस दूसरी बैठक से बिहार के नेताओं को कुछ ज्यादा ही उम्मीदें थीं। शायद इसलिए भी ज्यादा निराशा मिली। उम्मीद की वजह विपक्षी एकता के अग्रणी नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा से जुड़ी रही। गठबंधन के नए नामकरण की बजाय उनको लग रहा था कि इस बैठक में विपक्षी गठबंधन के संयोजक के नाम पर सहमति बनेगी। नीतीश कुमार स्वयं संयोजक के उम्मीदवार थे। राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी चाह रहे थे कि नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का ऑफर मिले। इससे बेटे तेजस्वी यादव के बिहार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता निकलेगा। मगर इस पर कोई निर्णायक घोषणा ही नहीं हुई। यही वजह है कि तीनों ने नाराज होकर विपक्ष के मंच से लोगों को संबोधित करने के आयोजकों के ऑफर को टाल दिया। साथ ही प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले बेंगलुरु छोड़ दिया। आयोजकों ने संयोजक बनाने के निर्णय पर पहुंचने के लिए ग्यारह नेताओं की कमेटी बनाने का फैसला लिया है। इंडिया की यह कमेटी महाराष्ट्र में होने वाली अगली बैठक में अपना निर्णय सुनाएगी। इस हाई पावर कमेटी के समक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबले के लिए विपक्ष से भावी प्रधानमंत्री के चेहरे के नाम पर विमर्श करने का दायित्व भी सौंपा गया है।
अंदरखाने की खबर है कि जनता परिवार के नेताओं ने कमेटी गठन की रणनीति को मेज़बान कांग्रेस का अडिय़ल और टालमटोल भरा रवैया माना है। बंगलुरू से जनता परिवार के नेताओं में उभरा यह विवाद ही तीसरे मोर्चा के गठन की वजह बन सकती है। वैसे भी बिहार में भाजपा विरोध में खड़े सत्तारूढ़ जनता दल यू और राजद में विलय की आशंका बार बार जताई जा रही है। इस विलय में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल, ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल आदि के शामिल होने का शिगूफा एकबार फिर से छोड़ा जा रहा है। वैसे भी पुराने जनता दल परिवार के घटकों को फिर एक होने की बात पुरानी है। मुलायम सिंह के दिनों में ही नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी जनता दल यू का समाजवादी पार्टी के साथ विलय करने का फैसला कर रखा था। वह अपनी पार्टी निशान तीर को छोड़ नए दल के किसी नए निशान पर चुनाव लडऩे की बात तब भी कर चुके थे, जब 2014 में उन्हें विपक्ष से प्रधानमंत्री पद का भावी उम्मीदवार होने की संभावना दिखी थी। मगर गैर कांग्रेसी दलों में कांग्रेस को साथ लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा संभव नहीं हो पाया तो विलय का प्रस्ताव किनारे रख लिया गया। राजनीति संभावनाओं का खेल है। इसी संभावना में नीतीश कुमार एक बार फिर साल भर से राजग यानी एनडीए के खिलाफ खड़े हैं। संप्रग जब इंडिया बन गया और नए नाम से जब इसकी पहली बैठक में नीतीश कुमार समेत जनता परिवार के नेताओं को अपेक्षित तवज्जो नहीं मिली है, तो विदेशी भाषा के विरोध के नाम पर ही सही तीसरे मोर्चे के गठन की गुंजाइश पैदा हो रही है। इस गुंजाइश में नीतीश की अगुआई में लालू, अखिलेश, नवीन पटनायक, जयंत, चौटाला आदि नेता फिट बैठते नजर आ रहे हैं।

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भ्रष्टाचार पर आमने सामने की राजनीति https://samacharpacheesa.com/?p=7341 Sat, 15 Jul 2023 07:02:47 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7341 छत्तीसगढ़ में चुनाव निकट है, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं। केंद्र में स्थिति अलग है, भाजपा आज भी कांग्रेस के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को 9 साल बाद भी मुद्दा बनाए हुए हैं। शुक्रवार को एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुए कोयला घोटाले के आरोपी कांग्रेस पार्टी के सांसद और उनके पुत्र को कोर्ट ने दोषी ठहराया है। लेकिन विपक्ष के पास अभी केंद्र सरकार के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं है। छत्तीसगढ़ में विचित्र स्थिति है, कांग्रेस पार्टी की सरकार है और डॉ. रमन सिंह सरकार पर अभी भी कांग्रेस के नेता भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है। यह समझ से परे है कि सरकार की ताकत कांग्रेस के पास है। प्रशासनिक अमला है, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करने वाली व्यवस्था है, कोर्ट है, सब कुछ है लेकिन सरकार कारवाई नहीं कर पा रही है। ऐसी बात नहीं है कि भूपेश सरकार कुछ करना नहीं चाहती, 2018 दिसंबर में सरकार बनने के बाद एक के बाद एक जांच टीम एसआईटी का गठन किया है। लेकिन पौने पांच साल के बाद भी एसआईटी की टीम किसी आरोप को साबित नहीं कर पाई है। दूसरी ओर प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं, कोयला में परिवहन परमिट के नाम पर अवैध वसूली का घोटाला 500 करोड़ से ऊपर का है। शराब घोटाला तो अपने आप में अनोखा है। कोई सरकार पर अपने खजाने में आने वाले राजस्व की चोरी करने जा आरोप तो निराला ही है। ये आरोप कोई हवा में नहीं हैं बल्कि प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने बकायदा जांच करके कोर्ट में जो चलन प्रतीत किया है उसमें पूरा विवरण दिया है। जब भी इस प्रकार के भ्रष्टाचार का उल्लेख भाजपा करती है तो कांग्रेस पार्टी के नेता भाजपा सरकार के समय भ्रष्टाचार की दुहाई देने लगते हैं मानो पिछली सरकार पर आरोप लगाने से वर्तमान सरकार को घोटाले करने का परमिट मिल जाता है। अपने घोषणा पत्र में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने कांग्रेस पार्टी ने मजबूत लोक आयोग बनाने का संकल्प लिया था जिसकी सीमा में मुख्यमंत्री भी आते हैं लेकिन सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना तो दूर जो आरोप खुद कांग्रेस लगाती थी, उन पर कार्यवाही करने में सरकार अक्षम है। लगता है छत्तीसगढ़ की राजनीति में भ्रष्टाचार का मुद्दा केवल आरोप प्रत्यारोप तक सीमित रहेगा। इन्हीं कारणों से जनता के मन में राजनेताओं के बारे में धारणा बनती जा रही है कि सभी भ्रष्ट होते हैं। ऐसा विचार फिर समाज में भ्रष्टाचार को मान्यता दे देता है जैसे कि प्रशासन में अधिकायिों और कर्मचारियों को मान्यता मिली हुई है। नेता भी अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं लड़ेगा तो इस नासूर का ईलाज कौन करेगा?

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अजय चंद्राकर भाजपा आरोप पत्र समिति के संयोजक,प्रेम प्रकाश पांडेय और ओपी चौधरी सदस्य https://samacharpacheesa.com/?p=7236 Mon, 10 Jul 2023 08:32:56 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7236 रायपुर। भारतीय जनता पार्टी ने अपने आरोप पत्र समिति तैयार की है। इस समिति में अजय चंद्राकर को संयोजक, प्रेम प्रकाश पांडे और ओपी चौधरी को सदस्य बनाया गया है। प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अरुण साव की ओर से प्रदेश स्तरीय समिति की घोषणा की गई है । 

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राष्ट्रीय नेताओं ने बदले वातावरण https://samacharpacheesa.com/?p=7214 Sat, 08 Jul 2023 07:07:35 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7214 भारतीय जनता पार्टी लगातार चुनावी मोड में रहती है। एक चुनाव खत्म हुआ नहीं कि दूसरे की तैयारी शुरू हो जाती है, परिणाम चाहे जो भी हो। अभी कर्नाटक चुनाव में पराजय के इस साल के अंत में चार बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने को है, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और छत्तीसगढ़। इनमें केवल मध्यप्रदेश में ही भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, लेकिन पार्टी की तैयारी पूरे जोश से शुरू हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय नेताओं का लगातार आगमन हो रहा है, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा के बाद शुक्रवार को प्रधानमंत्री की आमसभा राजधानी रायपुर में हुई। कई घंटे की लगातार बारिश से लगा कि कार्यक्रम में लोग कैसे आएंगे? लेकिन प्रधानमंत्री को देखने और सुनने पार्टी कार्यकर्ता और आम जनों की ऐसी ऐतिहासिक भीड़ जुटी कि भाजपा के नेताओं में नया जोश भर गया। प्रधानमंत्री का रायपुर आना केन्द्र सरकार का अनेक निर्माण कार्यों का उद्घाटन और लोकार्पण करने के लिए भी था। इसके बाद आमसभा में श्री मोदी ने प्रदेश की भाजपा सरकार पर जमकर हमला बोला। प्रदेश में लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों पर उन्होंने कहा कि कोई भ्रष्टाचारी बच नहीं पाएगा। उन्होंने अगले चुनाव के लिए नारा भी देकर गए, बदलबो, बदलबो, भ्रष्ट कांग्रेस सरकार ला ए बार बदलबो…। प्रदेश को दो दिन पहले ही गृह मंत्री अमित शाह चुनाव की योजना के संबंध में बैठक करने रायपुर आए थे, उनके साथ स्वास्थ्य मंत्री डॉ. मनसुख मांडवीय भी आए, हालांकि रायपुर एम्स में उनका कार्यक्रम था लेकिन वे गृहमंत्री के साथ भाजपा नेताओं की बैठक में भी रहे। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में भी रहे और उसके बाद यह घोषणा हो गई कि उन्हें केंद्र ने छत्तीसगढ़ में चुनाव का सह प्रभारी नियुक्त किया गया है। अब इस नियुक्ति के बाद प्रदेश में भाजपा के चुनावी बिगुल फूंक दिया है। इधर कांग्रेस भी पीछे नहीं है। संगठन स्तर पर बूथ स्तर पर बैठकों का दौर जारी है। कुछ दिन पूर्व दिल्ली में संगठन की बैठक हुई जिसमें स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव को प्रदेश का उप मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया है। राज्यपाल ने इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी है। अब तक भूपेश बघेल के नेतृत्व में सरकार चल रही थी, अब सिंहदेव के उप मुख्यमंत्री बनने के बाद क्या अधिकारों का भी बंटवारा हो पाएगा? टी एस सिंहदेव पार्टी से सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद से नाराज चल रहे थे, पार्टी के विधायकों ने उनका कई बार अपमान भी किया। नाराज सिंहदेव ने अपने एक विभाग से इस्तीफा भी दे दिया था। माना जा रहा है कि उनको मना लेने से कांग्रेस के लिए सरगुजा में स्थिति बेहतर होगी। वैसे चुनाव आते आते अभी समीकरण कई बार बदलेंगे। प्रधानमंत्री के प्रवास से उत्साहित पार्टी को अपना संवेग बनाए रखना होगा।

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आदिपुरुष फिल्म पर विवाद के मायने https://samacharpacheesa.com/?p=7116 Tue, 20 Jun 2023 07:49:26 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7116 अभी बॉलीवुड के साथ ग्रह नक्षत्रों की का तालमेल ठीक से मेल नहीं खा रहा है। एक तरफ एक के बाद एक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो रही है तो दूसरी ओर फिल्म के दृश्यों, डायलॉग और कथानक को लेकर विवाद खड़े हो रहे हैं। अभी केरल स्टोरी का विवाद थमा नहीं था कि 500 करोड़ से अधिक के खर्च से बनी फिल्म आदिपुरूष को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। पिछले शुक्रवार को फिल्म परदे पर रिलीज़ हुई, और उसी दिन से प्रभु राम, हनुमान और सीता के चरित्र, पहनावे और डायलॉग का विरोध हो रहा है। टेलीविजन पर चर्चा हो रही है, इस मामले में कांग्रेस, भाजपा और वामदलों की राय लगभग एक जैसी है। बहुत सालों के बाद पूरा देश किसी मुद्दे पर एकजुट हुआ है जबकि इस फिल्म को लेकर विवाद को कुछ बढ़ा चढ़ा कर बताया जा रहा है। यह समझ में नहीं आया की रामायण की कथानक पर बनी फिल्म में प्रभु राम की कहानी को दर्शाया गया, इस फिल्म का भारतीय जनता पार्टी क्यों विरोध कर रही है? इसे सनातन धर्म के विरुद्ध क्यों प्रचारित किया जा रहा है? फिल्म की कहानी में नाटकीयता है, यह किसी भी कहानी पर फिल्म बनाने के लिए जरूरी है। कुछ लोगों को घटनाओं की श्रृंखला पर भी आपत्ति हो सकती है क्योंकि सीमित समय में पूरी कथा बताने के लिए निर्देशक की मजबूरी भी होती है। कुछ को कहानी की सत्यता पर भी संदेह है। प्रारंभ में ही निर्माता ने स्पष्ट कर दिया है कि फिल्म आदिपुरुष वाल्मीकि रचित रामायण पर आधारित है। समाज में रामकथा की लोकप्रियता तुलसीदास कृत रामचरित मानस के पाठन के कारण अधिक है। वातविकता यह है कि दोनों रचनाओं में घटनाएं और तथ्यों में बहुत अंतर है। टेलीविजन पर प्रसारित रामानंद सागर का धारावाहिक रामायण मुख्य रूप से रामचरित मानस पर आधारित था। लोगों के मानसपटल पर वही कथा है। अब आदिपुरुष की तुलना करने पर दर्शकों को अंतर लग सकता है। इससे ज्यादा आश्चर्य तो इस बात पर है की कांग्रेस पार्टी को यह फिल्म प्रभु राम के चरित्र के विरुद्ध लग रहा है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तो इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगे हैं।कांग्रेस का राम के प्रति भक्ति को देखकर भाजपा भी परेशान है। फिल्म को देखने बाद ऐसा आपत्तिजनक कुछ भी नहीं लगा, अगर आप फिल्म देखने के मूड से जा रहे हैं। डायलॉग में कुछ वाक्यों में हल्कापन जरूर है लेकिन पूरे देश में भाषा को लेकर हल्कापन देखा जा रहा है, इसलिए बहुत अटपटा नहीं लगता। जब विरोध हो रहा है तो पटकथा लेखक ने डायलॉग को परिवर्तित करने की घोषणा भी की है।

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केंद्र में सरकार और राज्य की राजनीति https://samacharpacheesa.com/?p=6833 Thu, 04 May 2023 09:42:33 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6833 भारतीय संविधान का चरित्र परिसंघात्मक है, इसका मतलब है केंद्र और राज्य दो इकाइयां स्वायत्त रूप से सत्ता चलाएंगे। इस आधार पर केंद्र के राजनीतिक संगठन और राज्य के संगठन अलग अलग होंगे, अभी संगठन तो स्वायत्त हो नहीं सकते इसलिए राष्ट्रीय पार्टियों की अखिल भारतीय संगठन और राज्य की इकाइयां मिल कर काम करती हैं। इस प्रकार सताता और संगठन के दो केंद्र बिंदु बनते हैं, केंद्र और राज्य। भले ही दोनों स्वायत्त होने का दावा करने हैं लेकिन केंद्र का नियंत्रण भरपूर होता है। आज की स्थिति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टी हैं, डोना के राष्ट्रीय स्तर पर संगठन की रचना है लेकिन पार्टी के संगठन का व्यवहार सत्ता के साथ बदल जाता है। अगर केंद्र में पार्टी की सत्ता है तो राज्य की सत्ता हो या संगठन केंद्र के नियंत्रण में कार्य करते हैं। अभी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में केंद्र की सरकार है, इसलिए किसी भी राज्य में भाजपा की सरकार हो या संगठन केंद्र सरकार के निर्देश पर काम करते हैं। इस प्रवृत्ति से राज्य के संगठन पर प्रतिकूल असर भी पड़ता है। जैसे छत्तीसगढ़ में जब 2003 से 2013 तक डॉ. रमन सिंह की सरकार थी तब केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी। ऐसे में प्रदेश सरकार अपने विवेक से कार्य करती थी और चुनाव के समय राज्य संगठन स्वविवेक से निर्णय कर लेते थे। जैसे ही 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तब से प्रदेश की भाजपा सरकार और संगठन केंद्र के निर्देशों पर निर्भर हो गया। इससे प्रदेश का संगठन कमजोर होता चला गया। ऐसा ही कांग्रेस के साथ भी हुआ जब केंद्र और राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकारें हुआ करती थी। अब जो संगठनात्मक नुकसान कांग्रेस को भुगतना पड़ा वही स्थिति अब भाजपा की बन रही है। इस रवैए का असर केवल केंद्र और राज्य नहीं बल्कि इसके नीचे के स्तर पर भी दिखाई देता है। जैसे छत्तीसगढ़ में जब नगरीय निकाय के चुनाव हुए थे तब स्थानीय संगठन के बजाय प्रदेश सरकार और संगठन चुनाव लडने लगे थे, यही हाल अभी उत्तरप्रदेश में हो रहे नगरीय निकाय के चुनाव में देखना को मिल रहा है। इससे जिला और निचले स्तर की संगठन इकाइयां कमजोर होती हैं और राज्य संगठन पर निर्भरता बढ़ती जाती है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हो रहा है, लेकिन ज्यादातर भूमिका मोदी सरकार के मंत्रियों और राष्ट्रीय अध्यक्ष की दिखाई दे रही है। ऐसा सभी राज्यों में होता रहा जबकि केंद्र में सरकार न हो तो राज्य का संगठन ज्यादा जिम्मेदार और मेहनतकश होते हैं। 2018 में भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत को भी इस तर्क की कसौटी पर कस कर देख सकते हैं।

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नंदकुमार साय की नई राजनीतिक पारी https://samacharpacheesa.com/?p=6810 Tue, 02 May 2023 08:42:32 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6810 भारतीय जनता पार्टी में संगठन में कुछ ऐसे नियम बनाएं हैं जो भारत की स्वतंत्रता के बाद की राजनीति की दृष्टि से हटकर है। एक निर्णय यह लिया गया है कि भाजपा में सक्रिय राजनीति करने की आयु सीमा 75 वर्ष तय कर दी गई है। इस आयु सीमा पार महत्वकांक्षा पाले अनेक भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के मन में उपेक्षा किए जाने की टीस है। कांग्रेस पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दल भाजपा पर अपने वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हैं। ऐसा ही आरोप लगाकर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता नंदकुमार साय अपनी 50 साल की राजनीतिक यात्रा में भाजपा की गाड़ी को छोड़ कांग्रेस पार्टी की सवारी कर ली है। रविवार अचानक उनके इस्तीफे की खबर आई और अगले दिन सुबह मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेशाध्यक्ष मोहन मरकाम की उपस्थिति में कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ले ली। इस निर्णय से कई तरह के राजनीतिक सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि साय के पार्टी छोडऩे से भाजपा को क्या नुकसान और कांग्रेस में शामिल होने से कांग्रेस को क्या फायदा मिलेगा। पहली बात यह कि नंदकुमार साय जिस पीढ़ी के राजनेता वे अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। दूसरी बात श्री साय ने अपना आखिरी लोकसभा चुनाव 2004 में लड़े थे। इसके बाद 2009 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था। इसका मतलब है कि नंदकुमार साय लगभग 19 वर्षों से चुनावी राजनीति से बाहर है. इस बीच नई पीढ़ी राजनीति और मतदाता के रुप में खड़ी हो चुकी हैं। इसलिए नंदकुमार साय की राजनीतिक पहचान लगभग लुप्तप्राय है, मतलब आगामी चुनाव में श्री साय के भाजपा छोडऩे और कांग्रेस में शामिल का कोई ज्यादा असर नहीं पडऩे वाला। इधर नंदकुमार साय ने पार्टी में उपेक्षा की बात कही है। पहली बात तो यह कि 2021 में 75 वर्ष पूरा कर लेने के बाद वे केवल मार्गदर्शक की भूमिका में हो सकते हैं। दूसरी बार 2020 से पहल इनकी संसदीय यात्रा 1977 से प्रारंभ होती है जब वे पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। तब से लेकर 2016 तक वे लगातार चुनावी राजनीति के केंद्र में रहे। तीन बार लोकसभा के चुनाव और एक बार राज्यसभा के निर्वाचित हो चुके हैं। वहीं, तीन बार विधानसभा के लिए भी निर्वाचित हुए हैं। जितना श्रेय उनकी राजनीतिक यात्रा में उनको मिली जीत है, उतनी बार ही वे चुनाव भी हारे हैं। 1984, 1991 और 1998 में वे लोकसभा का चुनाव हारे हैं तथा 1980 और 2003 में विधानसभा का चुनाव हारे हैं। अब अगर उनके चुनाव लडऩे की यात्रा को देखे तो पार्टी ने उनको टिकट देने में कभी कोताही नहीं बरती। जैसे 1980 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद 1984 में लोकसभा का टिकट दिए, जिसे वे हार गए इसके बावजूद 1985 में विधानसभा का टिकट मिली। इसी तरह 1998 में लोकसभा का चुनाव हारने के बाद उसी साल विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत कर आए। वे 2003 में अजीत जोगी से चुनाव हारे तो 2004 में उन्हें लोकसभा का टिकट मिला और जीतकर सांसद बने। इस प्रकार जिस पार्टी ने उनके राजनीतिक कद को महत्व दिया उसे अचानक छोड़ देना उनके लिए भी बहुत मुश्किल निर्णय रहा होगा.

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जेपी नड्डा 20 फरवरी को कर्नाटक के उडुपी में पार्टी के 3 कार्यक्रमों में होंगे शामिल https://samacharpacheesa.com/?p=6327 Fri, 17 Feb 2023 10:27:30 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6327 नईदिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा सोमवार को कर्नाटक के उडुपी में जिला स्तरीय बूथ समिति सम्मेलन और दो अन्य कार्यक्रमों में भाग लेने वाले हैं। सूत्रों के मुताबिक, नड्डा ब्यंदूर में मेगा व्हीकल जत्था में हिस्सा लेने के बाद मुल्लिकट्टे में जनसभा करेंगे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कर्नाटक के उडुपी जाएंगे। वह उडुपी में सुबह 10 बजे जिला स्तरीय बूथ समिति के सम्मेलन में भाग लेंगे और बाद में दोपहर 2 बजे बिंदूर में मेगा वाहन जत्थे में भाग लेंगे और दोपहर 2.30 बजे मुल्लिकत्ते में एक जनसभा करेंगे। आगे उन्होंने कहा कि उडुपी कार्यक्रम में 1,111 बूथ समितियों के सदस्य शामिल होंगे। जिले की 1,111 बूथ समितियों के सदस्य उडुपी में कार्यक्रम में शामिल होंगे और उनकी भागीदारी के लिए आवश्यक व्यवस्था की जाएगी।
विशेष रूप से, पार्टी के शीर्ष नेता अक्सर पार्टी कार्यकर्ताओं के विश्वास को बढ़ाने के लिए ऐसी बैठकों में भाग लेते हैं, क्योंकि उन्हें नड्डा के कार्यक्रम से पहले अपने कर्तव्यों को पूरा करने का निर्देश दिया गया है ताकि हर कोई उनके साथ बातचीत करने के लिए इसमें शामिल हो सके। विधान सभा के सभी 224 सदस्यों का चुनाव करने के लिए अप्रैल-मई में कर्नाटक विधानसभा चुनाव होने हैं। जुलाई 2018 में नेतृत्व परिवर्तन करके, कर्नाटक एकमात्र दक्षिणी राज्य है जहां भाजपा सत्ता में है। तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को लाया गया।

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झीरम घाटी हत्याकांड की जांच पर जांच https://samacharpacheesa.com/?p=6193 Fri, 10 Feb 2023 07:44:23 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6193 देश की राजनीति में 25 मई 2013 को झीरम घाटी में कांग्रेस पार्टी के काफिले पर हुआ हमला अभूतपूर्व और ऐतिहासिक था। माओवादी के इस हमले में तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा सहित 28 नेता शहीद हो गए थे। इस घटना के तत्काल बाद डॉ रमन सरकार ने हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया था। इस बात को 10 वर्ष होने आए है लेकिन जांच पूरी नहीं हो सकी है और इसलिए इस हत्याकांड में शामिल हत्यारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। वैसे तो न्यायिक जांच के समानांतर तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनआईए जांच भी शुरु कराई थी जिसने अपनी रिपोर्ट 2014 में दे दी थी। इस रिपोर्ट में घटना से संबंधित तथ्य और शामिल आरोपियों के नाम भी दर्ज है। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने एनआईए की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। उनका आरोप है कि एनआईए ने इस हत्याकांड की जांच में गंभीरता नहीं दिखाई और अनेक साक्ष्य और गवाहों पर गौर नहीं किया। दरअसल मामले की जांच तो एक विषय है लेकिन प्रदेश में झीरम घाटी कांड एक राजनीतिक विषय बनकर रह गया है। हत्याकांड के तत्काल बाद इसके पीछे की साजिशों को लेकर राजनेताओं पर भी उंगलियां उठीं। लेकिन कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं हुआ। तब से लेकर अब तक कांग्रेस पार्टी तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार को झीरम घाटी का दोषी मानती है। एनआईए की रिपोर्ट को खारिज करने के बाद न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा की रिपोर्ट भी नवम्बर 2021 में राजभवन को दे दी गई। आयोग ने 8 वर्षों तक सुनवाई करने साक्ष्य एकत्र करने के बाद 4,184 पृष्ठ की रिपोर्ट राज्यपाल अनुसुइया उइके को सौंपी गई थी। इस रिपोर्ट पर भी कांग्रेस पार्टी की सरकार को आपत्ति थी और इस प्रक्रिया को परंपराओं के विरुद्ध बताते हुए नवम्बर 2021 को भूपेश सरकार ने एक नया जांच आयोग बिठा दिया जिसमें 2 न्यायाधीशों को नियुक्त किया गया। 11 नवम्बर को जारी आदेश में नए जांच आयोग के द्वारा 6 माह के भीतर जांच पूरी कर शासन को रिपोर्ट सौंपने की बात की गई थी। अब आयोग के गठन के बाद 6-6 माह के तीन कार्यकाल पूरे होने के आए, ऐसी स्थिति में शासन ने एक बार फिर इस जांच आयोग के कार्यकाल को अगस्त 2023 तक के लिए बढ़ा दिया गया है। अब सवाल यह है कि कांग्रेस पार्टी झीरम घाटी के सच को बाहर लाने में क्या वाकई गंभीर है? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस और उनके नेता ऐसी रिपोर्ट चाहते है जो किसी दल या व्यक्ति के खिलाफ हो, ऐसा नहीं होने पर जांच पर जांच कराई जा रही है।

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स्वामी की सांसद पुत्री संघमित्रा भी कर सकती हैं साइकिल की सवारी https://samacharpacheesa.com/?p=6155 Wed, 08 Feb 2023 07:57:27 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6155 लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी की सांसद और विवादित नेता स्वामी प्रसाद मौर्या की पुत्री संघमित्रा मौर्य का ‘पिता प्रेम’ उनकी सियासत पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। पिछले वर्ष विधान सभा चुनाव के समय बीजेपी की पार्टी लाइन से हटकर सपा नेता और अपने पिता स्वामी प्रसाद मार्या का समर्थन करना और अब स्वामी की रामचरितमानस पर विवादित टिप्पणी का साथ देना भाजपा आलाकमान को रास नहीं आ रहा है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने स्वामी की विवादित टिप्पणी पर पिता का समर्थन करने वाली संघमित्रा को साफ कह दिया है कि अब उन्हें तय करना होगा कि भविष्य में वह किसके साथ खड़ी होंगी। एक निजी चैनल से बात करते हुए चौधरी ने कहा कि संघमित्रा बीजेपी की सांसद हैं और 2019 में जनता ने उन्हें सांसद चुना है। हमारी पार्टी का हिस्सा हैं लेकिन अब आगे उन्हें तय करना है कि आगे उनकी लाइन क्या होगी। वहीं राजनीति के जानकार कहते हैं कि संघमित्रा को पता है कि अबकी बार उनको टिकट मिलना मुश्किल है, इसलिए वह नई राह तलाश रही हैं।
बता दें कि पिछले दिनों जब स्वामी प्रसाद मौर्या अपनी विवादित टिप्पणी के कारण चौतरफा घिरे थे तो उनकी बेटी और भाजपा सांसद संघ मित्रा ने पिता का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि पिता को पूरे ग्रंथ से नहीं बल्कि कुछ चौपाइंयों पर एतराज है, क्योंकि उन्होंने इसका अध्ययन किया है। गौरतलब हो संघ मित्रा ने पिता स्वामी प्रसाद मौर्य की टिप्पणी पर कहा था कि उनकी बातों पर विचार किया जाना चाहिए न कि विवाद खड़ा करना चाहिए। संघमित्रा ने अपने बयान में कहा था कि यदि किसी को इस लाइन पर संदेह है तो उस पर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि यह विषय विवाद या मीडिया में बैठकर बहस का नहीं बल्कि इस पर विद्वानों को विचार करना चाहिए। ताकि यह साफ हो सके कि चौपाई का वास्तविक अर्थ क्या है। हालांकि बाद में वह इस विवाद पर किनारा करती नजर आईं थी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि स्वामी मौर्य ने पिछले दिनों रामचरित मानस की कुछ पंक्तियों पर आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे प्रतिबंधित करने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि जो भी विवादित अंश इस ग्रंथ में संकलित हैं, उन्हें निकाला जाना चाहिए। तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस की एक चौपाई- ‘ढोल-गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ का जिक्र करते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा था कि इस तरह की पुस्तक को जब्त किया जाना चाहिए। महिलाएं सभी वर्ग की हैं, क्या उनकी भावनाएं आहत नहीं हो रहीं हैं। लब्बोलुआब यह है कि संघमित्रा को अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में टिकट कटने का अहसास हो गया है। इसीलिए वह पार्टी की लाइन से हटकर बयानबाजी कर रही हैं। हो सकता है कि संघमित्रा अगला लोकसभा चुनाव साइकिल पर चढ़कर लड़े, इसके लिए वह अभी से भूमिका तैयार करने में लगी हैं।

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