भारतीय संविधान – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 20 Jun 2023 07:53:10 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 भारतीय दंड संहिता को लोकतांत्रिक करने की जरूरत https://samacharpacheesa.com/?p=7119 Tue, 20 Jun 2023 07:53:10 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7119 18 जून को श्री सुदर्शन प्रेरणा नामक संस्था ने रायपुर में सर्वोच्च न्यायालय के लोकप्रिय अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय का व्याख्यान रखा था.ये आजकल काफी चर्चित हो गए है. ख़ास के अपनी जनहित याचिकाओं को लेकर। चाहे बाबा विश्वनाथ के मामले में हो या धर्मांतरण को लेकर। टीवी चैनलों में इनको सुनते हुए संतोष होता है कि कोई तो है, जो सनातन मुद्दों को लेकर लड़ रहा है. रायपुर में इनके व्याख्यान का विषय था, रामराज्य और भारतीय संविधान . इनके व्याख्यान को सुनते हुए मेरी तरह शायद सभी ने महसूस किया होगा कि हम बेशक आजदी का अमृत महोत्सव मना चुके है, लेकिन सही मायने में भारत का अपना संविधान कहाँ लागू कर सके हैं? आज भी हम दुनिया के कुछ देशो के संविधान की जूठन ही तो चाट रहे हैं. मैकाले नामक अंग्रेज ने अपनी शिक्षा नीति इस देश पर थोप कर इस देश को बर्बाद किया, हम आज़ादी के बाद उस नीति पर ही चलते रहे यानी अँग्रेज़ी हमारे जीवन का हिस्सा बनी रही। मैकाले ने भारतीय दंड संहिता (सन 1860 ) बनाई, यह देश आज़ादी के बाद से उसी संहिता को आत्मसात करके चल रहा है. एक भी धारा न कम हुई, न बढ़ी। सोचिए, हम ऐसे देश में रह रहे हैं जो गुलाम होकर आज़ाद होने के बावजूद उन्ही धाराओं के आधार पर चल रहा है, जो धाराएं आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे क्रांतिकारियों के दमन के लिए बनाई गई थी. उसी का तो दुष्परिणाम है कि आज भी आज़ाद भारत में जब प्रदर्शनकारियों का दमन करना होता है, तो मैकाले की धाराओं का इस्तेमाल करके आंदोलनकारियों को जेल भेज दिया जाता है। धारा 144 क्या है पांच लोग एक साथ एकत्र नहीं हो सकते, वरना कड़ी कारऱ्वाई की जाएगी। पहले भी की जाती रही और आज भी की जाती रही। आज़ाद भारत में लोग प्रदर्शन नहीं कर सकते। किसी मुख्यमंत्री या मंत्री के घर का घेराव नहीं कर सकते , सड़क जाम कर दी जाती है। जुलूस नि निकालने वालो पर लाठी चार्ज होता है. आज़ाद देश में कभी-कभी गोली भी दागी जाती है। यह सब देख कर मेरे जैसा व्यक्ति सोचने पर बाध्य होता है कि यह कैसे आज़ादी ? और कहाँ है रामराज्य ? यह तो केवल एक आदर्श कल्पना भर है, जो कभी साकार नहीं हो सकती इसलिए कि हमारे जनप्रतिनिधि खुद नहीं चाहते कि रामराज्य आए. सरकार किसी भी दल की हो, सबका चरित्र एक जैसा है। सब चोर चोर मौसेरे भाई की तरह है। ऐसा लगता है, हमारी राजनीतिक पार्टियों का आपस में मौन अनुबंध है की पाँच साल तुम जीमो और उसके बाद हम जीमेंगे। देश की जनता को अच्छे से ठग सकेगा, वह राज करेगा, चाहे केंद्र में या राज्यों में. यही कारण है की जो भी सरकार विराजमान होती है वह मैकाले की दंड संहिता नहीं बदलती, उसे लोकतांत्रिक नहीं करती। लोग आखिर सड़कों पर उत्तर कर प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते? इसके लिए पुलिस की अनुमति की ज़रूरत क्यों? पुलिस को केवल सूचना देनी चाहिए, अनुमति किस बात की? उसके बाद उसका काम है कि वह कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जुलूस के साथ रहे. इसलिए यह आवश्यक है कि आज़ाद देश के हिसाब से धारा 144 में परिवर्तन हो और उसमे अनुमति की जगह सूचना मात्र देने का प्रावधान किया जाए. जितने भी लोग चाहें, प्रदर्शन कर सकते है. लेकिन शर्त यही रहे कि वे शांतिपूर्वक प्रदर्शन करे। प्रदर्शन जनता का बुनियादी अधिकार है, लेकिन उनका कर्तव्य है कि वह शांतिपूर्ण भी रहे. अधिकार और कर्तव्य में संतुलन बना रहेगा, तभी कहा जाएगा कि यह रामराज्य है. अब समय आ गया है हम अपने संविधान का भारतीयकरण करें। हमारे प्राचीन ग्रंथों में अनेक महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ दी गई हैं. उसके अनुरूप व्यवस्था बने. नई शिक्षा नीति में भारतीयता की झलक दिखती है, लेकिन उसमे भी अभी काफी गुंजाइश है। यह विषय बहुत विस्तार की मांग करता है. भविष्य में इस पर और लिखूंगा। फिलहाल तो इतना ही

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केंद्र में सरकार और राज्य की राजनीति https://samacharpacheesa.com/?p=6833 Thu, 04 May 2023 09:42:33 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6833 भारतीय संविधान का चरित्र परिसंघात्मक है, इसका मतलब है केंद्र और राज्य दो इकाइयां स्वायत्त रूप से सत्ता चलाएंगे। इस आधार पर केंद्र के राजनीतिक संगठन और राज्य के संगठन अलग अलग होंगे, अभी संगठन तो स्वायत्त हो नहीं सकते इसलिए राष्ट्रीय पार्टियों की अखिल भारतीय संगठन और राज्य की इकाइयां मिल कर काम करती हैं। इस प्रकार सताता और संगठन के दो केंद्र बिंदु बनते हैं, केंद्र और राज्य। भले ही दोनों स्वायत्त होने का दावा करने हैं लेकिन केंद्र का नियंत्रण भरपूर होता है। आज की स्थिति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टी हैं, डोना के राष्ट्रीय स्तर पर संगठन की रचना है लेकिन पार्टी के संगठन का व्यवहार सत्ता के साथ बदल जाता है। अगर केंद्र में पार्टी की सत्ता है तो राज्य की सत्ता हो या संगठन केंद्र के नियंत्रण में कार्य करते हैं। अभी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में केंद्र की सरकार है, इसलिए किसी भी राज्य में भाजपा की सरकार हो या संगठन केंद्र सरकार के निर्देश पर काम करते हैं। इस प्रवृत्ति से राज्य के संगठन पर प्रतिकूल असर भी पड़ता है। जैसे छत्तीसगढ़ में जब 2003 से 2013 तक डॉ. रमन सिंह की सरकार थी तब केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी। ऐसे में प्रदेश सरकार अपने विवेक से कार्य करती थी और चुनाव के समय राज्य संगठन स्वविवेक से निर्णय कर लेते थे। जैसे ही 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तब से प्रदेश की भाजपा सरकार और संगठन केंद्र के निर्देशों पर निर्भर हो गया। इससे प्रदेश का संगठन कमजोर होता चला गया। ऐसा ही कांग्रेस के साथ भी हुआ जब केंद्र और राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकारें हुआ करती थी। अब जो संगठनात्मक नुकसान कांग्रेस को भुगतना पड़ा वही स्थिति अब भाजपा की बन रही है। इस रवैए का असर केवल केंद्र और राज्य नहीं बल्कि इसके नीचे के स्तर पर भी दिखाई देता है। जैसे छत्तीसगढ़ में जब नगरीय निकाय के चुनाव हुए थे तब स्थानीय संगठन के बजाय प्रदेश सरकार और संगठन चुनाव लडने लगे थे, यही हाल अभी उत्तरप्रदेश में हो रहे नगरीय निकाय के चुनाव में देखना को मिल रहा है। इससे जिला और निचले स्तर की संगठन इकाइयां कमजोर होती हैं और राज्य संगठन पर निर्भरता बढ़ती जाती है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हो रहा है, लेकिन ज्यादातर भूमिका मोदी सरकार के मंत्रियों और राष्ट्रीय अध्यक्ष की दिखाई दे रही है। ऐसा सभी राज्यों में होता रहा जबकि केंद्र में सरकार न हो तो राज्य का संगठन ज्यादा जिम्मेदार और मेहनतकश होते हैं। 2018 में भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत को भी इस तर्क की कसौटी पर कस कर देख सकते हैं।

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