भूपेश सरकार – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Fri, 21 Jul 2023 08:23:22 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 मानसून सत्र का आज आखिरी दिन, अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में होगी चर्चा https://samacharpacheesa.com/?p=7457 Fri, 21 Jul 2023 08:23:21 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7457 रायपुर। छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार के वर्तमान कार्यकाल का आखिरी सत्र आज पूरा होगा। मानसून सत्र के अंतिम दिन सारे सरकारी काम-काज पूरे किए जाएंगे। सत्र के चौथे दिन शुक्रवार को विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में चर्चा होगी। इससे पहले तीसरे दिन विपक्षी भाजपा विधायकों की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर गुरुवार को चर्चा नहीं हो सकी। आज 32 ध्यानाकर्षण लगे हैं वहीं प्रश्नकाल के दौरान रेडी-टू-ईट फूड, आदिवासियों के रीति-रिवाजों के संरक्षण, गौठान और शिक्षा जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

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मोहन मरकाम ने ली मंत्री पद की शपथ https://samacharpacheesa.com/?p=7320 Fri, 14 Jul 2023 08:06:17 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7320 रायपुर। पीसीसी चीफ के पद से हटाए जाने के बाद कोंडागांव विधायक मोहन मरकाम को भूपेश सरकार में मंत्री बनाया गया है। विधायक मोहन मरकाम को राजभवन में राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन ने मंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण के दौरान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित मंत्री और विधायक मौजूद रहे। गुरुवार को राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम के इस्तीफे के बाद मोहन मरकाम को मंत्री बनाया गया है।
जानिए कौन हैं मरकाम-मोहन मरकाम वर्तमान में कोंडागांव विधायक हैं। उनका जन्म एक किसान परिवार में कोंडागांव जिले के टेंडमुण्डा गांव में 15 सितंबर 1967 को हुआ था। खास बात यह है कि मोहन मरकाम ने शासकीय सेवा के रूप में शिक्षाकर्मी वर्ग 1 और शिक्षाकर्मी वर्ग 2 के रूप में भी काम किया है। उन्होंने कुछ दिनों तक भारतीय जीवन बीमा निगम में विकास अधिकारी और भारतीय स्टेट बैंक लाइफ में सीनियर एजेंन्सी मैनेजर के रूप में भी काम किया, लेकिन राजनीति में आने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी।
मोहन मरकाम का सियासी सफर- 1990 में महेंद्र कर्मा की मौजूदगी में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ली थी। 1993, 1998, 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से टिकट की दावेदारी की लेकिन टिकट नहीं मिली। साल 2008 में मरकाम को पहली बार कोंडागांव सीट से चुनावी मैदान में लता उसेंडी के सामने उतारा गया लेकिन उन्हें 2771 वोट से हार का सामना करना पड़ा था। 2013 के चुनाव में पार्टी ने उन्हें फिर चुनावी मैदान में उतारा। इस चुनाव में भी मरकाम हार गए। 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर मोहन मरकाम पर भरोसा जताया और इस बार उन्होंने भाजपा की लता उसेंडी को भारी मतों से हराया।
साल 2018 में बंपर जीत के बाद कांग्रेस ने पीसीसी के तत्कालीन अध्यक्ष भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया, और फिर मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ के मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस के वह पहले आदिवासी अध्यक्ष बने। संवैधानिक प्रावधान के अनुसार छत्तीसगढ़ के मंत्रिमंडल की सदस्य संख्या मुख्यमंत्री सहित 13 से अधिक नहीं हो सकती। मोहन मरकाम को मिलाकर अब राज्य मंत्रिमंडल की वर्तमान सदस्य संख्या 13 हो गई है।

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वनवासी या आदिवासी विकास तो हो https://samacharpacheesa.com/?p=6618 Thu, 23 Mar 2023 06:09:28 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6618 विधानसभा में जनजातीय विकास से जुड़े कुछ मामले चर्चा में आए। पहला विषय तेंदूपत्ता संग्राहकों को मिलने वाले लाभ से संबंधित था। भारतीय जनता पार्टी ने एक स्थगन प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें वन क्षेत्रों में तेंदूपत्ता तोडऩे वाले श्रमिकों को समय पर मजदूरी नहीं मिलने का मुद्दा उठाया गया। इस मामले में यह भी जानकारी आई कि वर्तमान भूपेश सरकार ने तेंदूपत्ता तोड़ाई का पारिश्रमिक 2500 रुपए प्रति मानक बोरा से बढ़ाकर 4000 रुपए कर दिया है। लेकिन उससे तेंदूपत्ता तोडऩे वालों को जो लाभ मिलता था, वह कम हो गया है। विधानसभा में डॉ. रमन सिंह ने बताया कि 2017 में 17 लाख मानक बोरे तेंदूपत्ता का संग्रहण होता था और पारिश्रमिक व बोनस को मिलाकर 2017 में एक हजार 117 करोड़ रुपए का भुगतान हुआ, वहीं भूपेश सरकार ने वर्ष 2021 में 13 लाख मानक बोरा का संग्रहण किया और पारिश्रमिक व बोनस मिलाकर कुल 630 करोड़ रुपए का भुगतान किया। इस हिसाब से पारिश्रमिक बढ़ाने के बावजूद तेंदूपत्ता तोडऩे वालों को ज्यादा पैसा नहीं मिल रहा है। पिछले 4 वर्षों से प्रदेश की अर्थव्यवस्था की दूरी जनता के जेबों में अधिकाधिक पैसा डालने पर टिकी हुई है। भूपेश सरकार मानती है कि प्रति क्विंटल धान का पैसा राजीव गांधी न्याय योजना के तहत किसानों की जेब में जा रहा है, गोबर खरीदने का पैसा भी गांव के लोगों की जेब में जा रहा है, यह पैसा प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है। दुनिया के एक बड़े अर्थशास्त्री थे कीन्स जिन्होंने लोगों के हाथों पैसा पहुंचाकर अर्थव्यवस्था बढ़ाने का सिद्धांत 1920 के दशक में दिया था। अब 2020 के दशक में यह सिद्धांत छत्तीसगढ़ में लागू हो रहा है। सवाल उठता है कि तेंदूपत्ता तोडऩे वालों की जेब में ज्यादा पैसा क्यों नहीं जा रहा है। विधानसभा में चर्चा के दौरान मंत्री कवासी लखमा ने इस बात पर आपत्ति की कि जनजातीय समुदाय के लिए वनवासी शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। हालांकि विधायक धर्मजीत सिंह ने स्पष्ट किया कि सरकार ने अपने जवाब में भी वनवासी शब्द का उल्लेख कर रही है। यह विषय जनजातीय समाज के बीच में बहुत तेजी से चर्चा में है कि उनके लिए वनवासी शब्द का प्रयोग न किया जाए। यही प्रश्न संविधान सभा में भी चर्चा के दौरान उठा था और आखिर में यह तय हुआ कि अनुसूचित जनजातीय शब्द का प्रयोग किया जाएगा। तब से लेकर आज तक शब्द भले ही बदल गए हों, लेकिन वन क्षेत्रों में रहने वाले वनवासी हो या आदिवासी या जनजातीय इनकी आर्थिक स्थिति सुधर नहीं पाई है। शब्द बदल लेने से आर्थिक और सामाजिक स्थिति नहीं बदलती उस समाज को मुख्यधारा में जोडऩे के लिए संबंधित प्रयास की आवश्यकता है।

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घोटाले के खिलाफ कार्रवाई पर उठते सवाल https://samacharpacheesa.com/?p=6402 Wed, 22 Feb 2023 08:13:04 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6402 भारतीय जनता पार्टी बार-बार प्रदेश की भूपेश सरकार पर आरोप लगाती है कि छत्तीसगढ़ को ईडी और सीडी मामले ने बदनाम कर दिया है। पिछले लगभग 3 वर्षों से प्रदेश के बड़े अधिकारियों, कारोबारियों और नेताओं पर छापा मारने का एक लंबा सिलसिला है। इसकी शुरुआत 2020 में हुई थी जब प्रदेश के उच्च अधिकारियों के घर पर आयकर विभाग ने दबिश देकर सर्वे किया था। इस कार्रवाई में कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल सहित बड़ी मात्रा में दस्तावेज जब्त कर विभाग अपने साथ ले गया। उसके बाद प्रदेश में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की एन्ट्री हुई। अभी जब अखिल भारतीय कांग्रेस का बड़ा अधिवेशन रायपुर में होने वाला है उसके ठीक पहले ईडी ने प्रदेश के 12 कांग्रेस नेताओं के ठिकानों पर छापा मारा है। इस घटना ने पूरे देश में एक राजनीतिक सनसनी पैदा कर दी है। दिल्ली से लेकर रायपुर तक कांग्रेस पार्टी ईडी की कार्यवाही को राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगाते हुए कांग्रेस पार्टी के महाधिवेशन में व्यवधान उत्पन्न करने का षडय़ंत्र बताया। यह बात सही है जब किसी राष्ट्रीय पार्टी का एक अति महत्वपूर्ण महाधिवेशन होने जा रहा हो जिसमें पूरे देश से दिग्गज कांग्रेसी नेता आ रहे हों उसके ठीक पहले इस कार्यक्रम की तैयारी में जुटे नेताओं के ठिकानों पर छापा मारना समय की दृष्टि से सही नहीं है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि अगर राजनीतिक निर्देश के आधार पर ईडी कार्रवाई कर रही है तो कम से कम किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यक्रम के पहले छापेमारी नहीं की जाती। इससे ऐसा लगता है कि छापेमारी का निर्णय ईडी के अधिकारी ले रहे है जो राजनीति के महत्व को नहीं समझते। अगर ईडी के पास पुख्ता सबूत और जानकारियां है तो छापा मारने के लिए कांग्रेस पार्टी के महाधिवेशन के संपन्न हो जाने की प्रतीक्षा भी कर सकते थे। इस कार्रवाई के बाद कांग्रेस पार्टी भी आक्रमक मूड में आ गई है। पहले तो जिन नेताओं के ठिकानों पर छापेमारी की गई वहां कांग्रेस कार्यकर्ता बड़ी संख्या में पहुंच कर विरोध जताने लगे तो दूसरी ओर मंगलवार को ईडी के कार्यालय का कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने घेराव किया। इधर मुख्यमंत्री सहित पार्टी के नेता ईडी की कार्रवाई के खिलाफ बयान भी दे रहे है। मुख्यमंत्री सवाल उठा रहे है कि ईडी की कार्यवाही कांग्रेस पार्टी और गैर भाजपाई दलों के नेताओं के खिलाफ ही क्यों हो रही है। उन्होंने भाजपा के नेताओं की काली कमाई की ओर भी उंगली उठाई है जिसके खिलाफ ईडी कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। वैसे इस बात में दम तो है क्योंकि देशभर के भाजपा के नेताओं ने भी जब मौका मिला तो मोटी कमाई की है। लेकिन आंकड़े के मुताबिक पिछले 8 वर्षों में ईडी ने 5 हजार से अधिक छापामार की है जिसमें से 90 प्रतिशत गैर भाजपाई दल के नेता है। लेकिन प्रदेश में ईडी की कार्रवाई के बाद एक दर्जन से ज्यादा अधिकारी और कारोबारी गिरफ्तार है और उनके खिलाफ में कोर्ट में चालान भी प्रस्तुत किया जा चुका है। इन दस्तावेजों में ईडी ने बहुत स्पष्टतौर पर अधिकारियों, कारोबारियों और नेताओं के बीच कोयले के कारोबार में कथित अवैध लेनदेन का साक्ष्य सहित विवरण किया है। इसी आधार पर गिरफ्तार किए गए अधिकारियों को कोर्ट से जमानत नहीं मिल रही है। इसका मतलब है कि कोयले के कारोबार में सैकड़ों करोड़ रुपए का अवैध लेनदेन तो हुआ है। अब दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हों तो भ्रष्टाचार पर नकेल कैसे डाल सकेंगे? इसका मतलब है कि ईडी की कार्रवाई सही है और इस कार्रवाई में 540 करोड़ रुपए के घोटाले को भी कोई झूठला नहीं रहा है। बात केवल छापे के समय और चिन्हित राजनीतिक पार्टी और नेताओं को लेकर सवाल खड़े हो रहे है। ईडी की जांच अब उस स्तर तक पहुंच चुकी है जब कोयला सहित शराब और अन्य कारोबार में हुई गड़बडिय़ों का खुलासा होगा और कई अधिकारी, कारोबारी और प्रमुख नेता जांच के लपेटे में आएंगे। यह तो स्पष्ट हो गया है कि इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार और ईडी की कार्रवाई प्रमुख मुद्दा बनने जा रहा है। इसके साथ राजनीतिक कटुता भी बढ़ रही है जो बयान की मर्यादाओं को लांघ रही है।

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केंद्र सरकार की योजनाओं का प्रदेश में हाल बुरा https://samacharpacheesa.com/?p=6296 Thu, 16 Feb 2023 06:55:58 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6296 केंद्र में भाजपा की सरकार ने और राज्य में कांग्रेस पार्टी की, दोनों सरकारों को बनाने में जनता के मतों का योगदान है। लोकसभा हो या विधानसभा जनता अपनी सरकार को देश-प्रदेश के विकास और जनता के कल्याण करने के लिए चुनती है। प्रदेश में भूपेश बघेल की सरकार ने पिछले 4 वर्षों में गांव, गरीब, किसान के लिए अनेक योजनाएं संचालित की है। इसी प्रकार केंद्र सरकार भी राज्यों के लिए अनेक योजनाएं बनाती है जिसे लागू करने की जिम्मेदारी राज्य की होती है। ज्यादातर केंद्र सरकार की योजनाओं में जो खर्च होता है उसका बड़ा हिस्सा केंद्र की ओर से मिलता है और राज्य को भी एक हिस्सा का योगदान करना पड़ता है। नरेन्द्र मोदी की सरकार का लक्ष्य है आगामी कुछ वर्षों में देश के हर व्यक्ति का अपना घर हो और उसके घर तक नल की पाइप लाईन बिछ जाए जिससे उसे पानी मिल सके। प्रधानमंत्री ग्रामीण एवं शहरी आवास योजना और जल जीवन मिशन के तहत केंद्र सरकार ने जो लक्ष्य निर्धारित किए है उसे पाने में छत्तीसगढ़ प्रदेश बहुत पीछे नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर पिछले 2 वर्षों से विधानसभा के भीतर और बाहर प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। अभी प्रदेश में सभी विधायकों के निवास को घेरने का अभियान चल रहा है। एक आंकड़े के मुताबिक जब से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार की बनी है तब से प्रधानमंत्री आवास योजना का काम ठप्प पड़ा है। भाजपा के शासनकाल में 2016-17 से लेकर 2018-19 तक साढ़े सात लाख से अधिक आवास का निर्माण किया गया और लोगों को मिल भी गया। 2020-21 में केंद्र सरकार ने प्रदेश के लिए डेढ़ लाख आवास स्वीकृत किए थे जो अभी तक बन नहीं पाए है, इसके बाद के 2 साल तक प्रदेश सरकार के द्वारा निर्धारित हिस्सा जमा नहीं करने पर कोई आवास निर्माण स्वीकृत नहीं किया गया है। भाजपा का आरोप है कि प्रदेश में 16 लाख आवास का निर्माण भूपेश सरकार की लापरवाही के कारण नहीं हो सका है। यही हाल जल जीवन मिशन का भी है। जब से मिशन शुरु हुआ है उसके बाद से लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने इस मिशन को लेकर केवल गड़बडिय़ां ही सामने आ रही है। 2021-22 में देश में जल जीवन मिशन का लाभ पहुंचाने में छत्तीसगढ़ देश के 31वें पायदान पर था। इस साल भी लक्ष्य से बहुत दूर है। जगह-जगह से पाइप लाईन खरीदी से लेकर टंकी निर्माण तक भ्रष्टाचार और प्रक्रिया में बड़ी-बड़ी गड़बड़ी करने की खबरें आती रहती है। सवाल है कि केंद्र सरकार की योजनाओं के काम जनता के लिए आवश्यक है वे पूरे क्यों नहीं हो रहे है? क्या राज्य सरकार के पास पैसे की कमी है, लापरवाही है या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता? जो भी है नुकसान जनता का है।

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प्रदेश में बन रहा गोबर का पेंट https://samacharpacheesa.com/?p=5417 Sat, 24 Dec 2022 06:09:14 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5417 छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने अनेक योजनाएं संचालित कर रही है। गोबर खरीदने की योजना एक चुनौतीपूर्ण किन्तु महत्वपूर्ण है। खरीदे गए गोबर से वर्मी कम्पोस्ट सहित अन्य उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करने में लगी महिला स्वसहायता समूह की भी आर्थिक स्थिति सुधारने की मंशा है। वैसे तो देश स्वतंत्र होने के बाद ही विकेंद्रीकृत ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली नीति बनाने की आवश्यकता थी। स्वतंत्रता के बाद पं. नेहरु ने अपनी मिश्रित अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों की स्थापना पर अधिक जोर दिया और गांधी के ग्रामीण उद्योगों की अवधारणा को दरकिनार कर दिया गया। स्वतंत्रता के पहल प्रसद्धि गांधीवादी जेसी कुमार अप्पा गांधीवादी अर्थनीति एक पुस्तक लिखकर देश की भावी अर्थनीति की रुपरेखा प्रस्तुत की थी। लेकिन स्वतंत्र भारत में वह नीति चली नहीं। यह अच्छी बात है जब पूरी दुनिया उदारीकरण, वैश्वीकरण और बड़े उद्योग घरानों को बढ़ावा दे रही है, वहीं छत्तीसगढ़ में ग्रामीण अर्थनीति को लेकर प्रदेश सरकार सोच रही है। अभी प्रदेश में बन रहे गोबर के पेंट की बड़ी चर्चा हो रही है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के गोबर पेंट से सभी शासकीय भवनों के रंगरोगन को अनिवार्य करने के निर्णय की प्रशंसा की। इस बात से प्रदेश सरकार उत्साहित है। होना भी चाहिए क्योंकि प्रदेश सरकार की किसी कार्य को राष्ट्रीय स्तर स्वीकार्यता जो मिली है। लेकिन इससे आत्ममुग्ध होकर चुप नहीं बैठा जा सकता। अगर गोबर से पेंट बनाकर महिला स्वसहायता समूहों को आर्थिक रुप से सक्षम बनाना है तो समूहों की महिलाओं के तकनीकी और व्यवसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी होगी। दूसरी ओर गोबर से पेंट केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बना रहा। खादी ग्रामोद्योग आयोग की मदद से अनेक राज्यों में गोबर से पेंट बनाए जा रहे है। सरकार स्वसहायता समूहों को संरक्षण देकर उन्हें लाभ पहुंचा सकती है लेकिन पेंट के उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों को बढ़ाकर आम जनता को इसके प्रति आकर्षित किया जा सकता है। जब जनता बाजार से यह पेंट खरीदेगी तब इस कार्य को सफलता मिलेगी। केवल सरकारी संरक्षण से व्यापार या उद्योग ज्यादा दिन नहीं चल सकता। उनका हश्र वैसे ही होता है जैसे पं. नेहरु के काल में बने सार्वजनिक उपक्रमों का हो रहा है।

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प्रदेश में आरक्षण पर गैरजरुरी विवाद https://samacharpacheesa.com/?p=5317 Tue, 20 Dec 2022 06:33:58 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5317 छत्तीसगढ़ में पिछले तीन महिनों से आरक्षण को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। वैसे तो इसकी शुरुआत 2019 से हो गयी थी,जब भूपेश सरकार ने अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का कोटा 27 प्रतिशत बढ़ाते हुए एक अध्यादेश जारी किया था। इस अध्यादेश को उच्च न्यायालय ने रद्द कर विस्तृत आंकड़ों सहित आरक्षण संबंधी कानून बनाने की बात कही थी। इधर सितम्बर महिने में 2011 से जारी अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण सहित कुल 58 प्रतिशत आरक्षण के कोटे को उच्च न्यायाय ने खारिज कर दिया। इसके बाद दोष सरकार पर आ गया कि चूंकि मामले को न्यायालय में सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया इसलिए जनजाति वर्ग के लिए आरक्षण का प्रतिशत वापस 32 से कम होकर 20 प्रतिशत हो गया। प्रदेश भर में आंदोलन होने लगा। इससे परेशान प्रदेश सरकार ने विशेष अधिवेशन बुलाकर विधानसभा में एक विधेयक पारित किया और इस विधेयक अनुसूचित जनजाति वर्ग को 32 प्रतिशत का कोटा बहाल करते हुए पिछड़े वर्ग को भी 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। इस कारण प्रदेश में कुल आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर 76 प्रतिशत हो गया। विधेयक पारित होने के बाद भी आरक्षण को लेकर बहस खत्म नहीं हो रही। राज्यपाल ने इस विधेयक पर अभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं और उन्होंने सरकार से कुछ सवाल भी पूछे हैं। आरक्षण को लेकर कांग्रेस पार्टी राज्यपाल पर भी राजनीति करने का आरोप लगाने लगी है। इन तमाम परिस्थिति के लिए अहम सवाल है यह है कि विधानसभा में पारित विधेयक का हश्र क्या होगा? अगर राज्यपाल विधेयक पर हस्ताक्षर कर भी देती है तो क्या यह मामला न्यायालय में नहीं जाएगा? और जब पूर्व में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण को जब न्यायालय ने खारिज किया है तो फिर 76 प्रतिशत को अनुमति कैसे मिलेगी। यह सवाल महत्वपूर्ण है और इसलिए युवाओं की चिंता जायज है जो आरक्षण की बहस के चलते परेशान है। परेशान इसलिए है क्योंकि उन्हें शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश नहीं मिल पा रहा है। परेशान इसलिए है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया थम गई है, नई भर्तियां नहीं हो रही है। एक अहम बात यह है कि जब संवैधानिक व्यवस्था में यह स्पष्ट है कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता तो फिर सरकार न्यायालय में इसे कैसे स्थापित करेगी। कुल मिलाकर प्रदेश में आरक्षण को लेकर जो बहस चल रही है उसमें समाज के वंचित वर्ग को लाभ पहुंचाने की मंशा कम और चुनाव में लाभ लेने की मंशा अधिक दिखाई दे रही है।

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