मुद्दे – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 17 Jan 2023 05:52:41 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 आरक्षण-धर्मान्तरण के मुद्दे उलझे https://samacharpacheesa.com/?p=5746 Tue, 17 Jan 2023 05:52:41 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5746 2023 के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव होने को है। इसकी तैयारी में सभी राजनीतिक पार्टियां जुट गई है। ऐसा लगता है कि आगामी विधानसभा चुनाव के मुद्दे भी लगभग तय होते जा रहे है। मैदानी क्षेत्र में तो धान खरीदी की कीमत बड़ा मुद्दा बनेगी तो प्रदेश के उत्तर और दक्षिण में जनजाति क्षेत्र के लिए आरक्षण और धर्मान्तरण बड़ा मुद्दा बन सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान वाले कानून को निरस्त करने के उच्च न्यायालय के फैसले पर स्टे देने से मना कर दिया। अब इस मामले की सुनवाई 22 मार्च को होगी। इधर छत्तीसगढ़ विधानसभा ने पिछले कानून से आगे बढ़ते हुए 76 प्रतिशत का आरक्षण विधेयक पारित किया हुआ है, जिस पर अभी तक राज्यपाल की अनुमति नहीं मिली। अब एक विचित्र स्थिति बनती दिख रही है। अगर सर्वोच्च न्यायालय ने 58 प्रतिशत को खारिज कर दिया तो 76 प्रतिशत आरक्षण वाला विधेयक का क्या होगा? क्योंकि 58 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए विधानसभा ने ही विधेयक पारित किया था। एक और संभावना यह है कि अगर सर्वोच्च न्यायालय ने 58 प्रतिशत आरक्षण को स्वीकृत कर लिया तो फिर 76 प्रतिशत आरक्षण विधेयक का क्या होगा? यह बात तो सभी जानकार समझ रहे है कि मामला धर्मान्तरण का हो या आरक्षण का। यह एक संवेदनशील भावनात्मक मुद्दा है जिस पर राजनीति जमकर हो रही है। दोनों ही विषय जनजाति समुदाय के हित से जुड़ा हुआ है और दोनों विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश है। आरक्षण का मुद्दा युवाओं को परेशान किए हुए है क्योंकि इसके लागू नहीं होने से प्रदेश में नई भर्ती रुकी हुई है और पुरानी भर्ती प्रक्रियाओं के परिणाम अटके हुए है। यह सरकार के लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि युवाओं को रोजगार उपलब्ध नहीं होने से उनकी नाराजगी चुनाव में झेलनी पड़ सकती है। दूसरी ओर धर्मान्तरण का मुद्दा भी बस्तर संभाग के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों से जनजाति समुदाय इसाई धर्म में धर्मान्तरित लोगों को लेकर नाराज है और कई घटनाएं भी हो चुकी है। एक बार कांग्रेस पार्टी को समझनी होगी कि ये दो मुद्दे समय रहते नहीं सुलझे तो इसका खामियाजा न केवल उत्तर और दक्षिण छत्तीसगढ़ के जनजाति सीटों पर भुगतना होगा बल्कि प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में भी इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। दोनों ही मुद्दे समाज को अस्थिर और अशांत करने वाले है इसलिए समाज के सौहाद्र्र को बनाए रखने के लिए दोनों मुद्दों का समाधान जरुरी है।

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धर्मांतरण-आरक्षण पर तनाव है, आगे चुनाव है ना https://samacharpacheesa.com/?p=5627 Wed, 04 Jan 2023 06:01:43 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5627 राहत इंदौरी के शेर की लाइन है ‘सरहदों पर तनाव है क्या ? जरा पता करो चुनाव है क्या? इसी तर्ज में 2023 के चुनाव का आगाज होना शुरू हो आया है। जैसे जैसे समय खिसकेगा वैसे वैसे यह तनाव बढ़ते बुखार की तरह बढऩे लगेगा।दोनों दल अपने अपने एजेंडे पर खेलना तेजी से प्रारंभ कर चुके हैं। धर्मांतरण का जिन्न कवर्धा के बाद अब फिर नारायणपुर की घटना के सहारे बोतल से बाहर निकल गया है। विधंसबह चल रही है। तनाव तो बढऩा ही था। आज सदन में बढा भी है। इसीलिए यह शेर याद भी आया और सटीक बैठ भी रहा है। विधानसभा आज़ दूसरे दिन भी आरक्षण व धर्मांतरण के मुद्दे पर गरम रही। 70 पर 14 भारी पड़ गए। या यूं भी कह सकते हैं कि 70 पे तीन याने बृजमोहन अग्रवाल-अजय चंद्राकर-शिवरतन की तिकड़ी ही भारी पड़ जाती है। विधान सभा में प्रचलित शब्द ध्वनि की बात करें तो 70 की ध्वनि पर 3 या कह लें कि 14 की ध्वनि तेज निकलती है। 70 की आवाज के बीच 14 की गूंज अधिक सुनाई पड़ती है। आज तो आरक्षण का साथ धर्मांतरण भी जुड़ गया यानी करेला वो भी नीम चढ़ा। लोग कहने लगे हैं कि लगता है अब भाजपा का चुनावी रथ अपने पहिये घुमाना शरू करने लगा है। कांग्रेस भी कोई कमी नहीं करना चाहती। सरकार के मुख्य मंत्री भूपेश बघेल आंदोलनों -प्रदर्शन-संघर्षशीलता का प्रतीक हैं। अपनी युवा अवस्था से आंदोलनों का बड़ा अनुभव रखते हैं। प्रदर्शन और उनकी राजनैतिक समझ को भी लोगों ने देख लिया है। सीडी कांड में जमानत नहीं ली, जेल जाने का निर्णय लिया। इसी संघर्ष के रास्ते सरकार में पहुंच गए। मुख्य मंत्री बन गए। सरकार में भी अब उन्हें आंदोलन का वो जुनून कभी कभी आ जाता है। आज आरक्षण के मामले में राज्यपाल को घेरने के साथ भाजपा को भी कठघरे में लाने का काम किया। राज्यपाल के पद को भी जनता के सामने खड़ा करने का प्रयास किया। संविधानिक पद की गरिमा खुद मुख्यमंत्री की मौजूदगी में धूमिल होता दिखा। हजारों की बड़ी संख्या में उपस्थिति कार्यकर्ताओं ने दी। इनमें आम आदमी की कितनी मौजूदगी थी यह तो प्रमाणित नहीं किया जा सकता। लोगों के बीच यह संदेश जरूर चला गया कि संवैधानिक पद को भी घेरे में लिया जा सकता है। इस पद पर आसीन व्यक्ति के अच्छे बुरे कामों की सार्वजनिक व्याख्या की जा सकती है। यह अलग बात है कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है इसकी समीक्षा कौन और कैसे करेगा। प्रदेश में हुए इस विवाद से एक और संदेश भी जा रहा है कि राज्यपाल जैसे गरिमामयी पद की भूमिका तेजी से विवेक के निर्णय की ओर बढ़ रही है। कहीं राज्यों के हाल दिल्ली की सरकार की तरह तो नहीं हो जाएंगे। जिसे चुनती जनता है , पर अधिक अधिकार नियुक्त राज्यपाल का होता है। कहीं यह राज्यपालों की भूमिकाएं बदलने का समय तो नहीं आ गया ?

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