मोहन मरकाम – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Fri, 14 Jul 2023 08:10:44 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 मोहन मरकाम के शपथ ग्रहण के बाद अब मंत्रियों के विभागों में भी होगा फेरबदल https://samacharpacheesa.com/?p=7323 Fri, 14 Jul 2023 08:10:43 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7323 रायपुर। छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम के इस्तीफे के बाद आज पूर्व पीसीसी चीफ मोहन मरकाम ने मंत्री पद की शपथ ली। राज्यपाल ने उन्हें पद और गोपनियता की शपथ दिलाई। प्रदेश कांग्रेस संगठन और कैबिनेट में फेरबदल के बाद अब मंत्रियों के विभागों में भी बदलाव हो सकता है। सीएम भूपेश बघेल ने इसे लेकर बहुत पहले ही संकते दे चुके हैं।
वहीं कुछ मंत्रियों को नए विभागों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा है कि डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव को स्वास्थ्य विभाग के साथ ही ऊर्जा विभाग का दायित्व भी सौंपा जा सकता है। मंत्री रवींद्र चौबे से कृषि विभाग लेकर शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। वहीं सीनियर मंत्री ताम्रध्वज साहू को कृषि विभाग दिया जा सकता है। दूसरी ओर नए मंत्री बने मरकाम को आदिम जाति कल्याण विभाग मिलने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक, इस संबंध में आज शाम तक नोटिफिकेशन जारी किया जा सकता है।

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मोहन मरकाम ने ली मंत्री पद की शपथ https://samacharpacheesa.com/?p=7320 Fri, 14 Jul 2023 08:06:17 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7320 रायपुर। पीसीसी चीफ के पद से हटाए जाने के बाद कोंडागांव विधायक मोहन मरकाम को भूपेश सरकार में मंत्री बनाया गया है। विधायक मोहन मरकाम को राजभवन में राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन ने मंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण के दौरान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित मंत्री और विधायक मौजूद रहे। गुरुवार को राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम के इस्तीफे के बाद मोहन मरकाम को मंत्री बनाया गया है।
जानिए कौन हैं मरकाम-मोहन मरकाम वर्तमान में कोंडागांव विधायक हैं। उनका जन्म एक किसान परिवार में कोंडागांव जिले के टेंडमुण्डा गांव में 15 सितंबर 1967 को हुआ था। खास बात यह है कि मोहन मरकाम ने शासकीय सेवा के रूप में शिक्षाकर्मी वर्ग 1 और शिक्षाकर्मी वर्ग 2 के रूप में भी काम किया है। उन्होंने कुछ दिनों तक भारतीय जीवन बीमा निगम में विकास अधिकारी और भारतीय स्टेट बैंक लाइफ में सीनियर एजेंन्सी मैनेजर के रूप में भी काम किया, लेकिन राजनीति में आने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी।
मोहन मरकाम का सियासी सफर- 1990 में महेंद्र कर्मा की मौजूदगी में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ली थी। 1993, 1998, 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से टिकट की दावेदारी की लेकिन टिकट नहीं मिली। साल 2008 में मरकाम को पहली बार कोंडागांव सीट से चुनावी मैदान में लता उसेंडी के सामने उतारा गया लेकिन उन्हें 2771 वोट से हार का सामना करना पड़ा था। 2013 के चुनाव में पार्टी ने उन्हें फिर चुनावी मैदान में उतारा। इस चुनाव में भी मरकाम हार गए। 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर मोहन मरकाम पर भरोसा जताया और इस बार उन्होंने भाजपा की लता उसेंडी को भारी मतों से हराया।
साल 2018 में बंपर जीत के बाद कांग्रेस ने पीसीसी के तत्कालीन अध्यक्ष भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया, और फिर मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ के मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस के वह पहले आदिवासी अध्यक्ष बने। संवैधानिक प्रावधान के अनुसार छत्तीसगढ़ के मंत्रिमंडल की सदस्य संख्या मुख्यमंत्री सहित 13 से अधिक नहीं हो सकती। मोहन मरकाम को मिलाकर अब राज्य मंत्रिमंडल की वर्तमान सदस्य संख्या 13 हो गई है।

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मोहन मरकाम को जलील करके निकाला गया – नेताम https://samacharpacheesa.com/?p=7296 Thu, 13 Jul 2023 08:27:52 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7296 रायपुर। कांग्रेस अध्यक्ष पद से बुरी तरह अपमानित करके प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम को निकाला जाना निंदनीय है। यह इसलिए भी और अधिक निंदनीय है क्योंकि वे कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने का काम कर रहे थे। प्रदेश की जनता विशेषकर आदिवासी, पिछड़ों के हक का हिस्सा लूट लेने का वे विरोध करते रहे थे। दुखद यह है कि कांग्रेस की न तो भारत के संविधान में आस्था है न ही पार्टी में संविधान है। मरकाम कांग्रेस के संविधान के तहत प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए ही पार्टी चला रहे थे, उनके आदेश के विरुद्ध संविधानेत्तर आदेश निकाल देना, अन्य तरह से भी लगातार अपमानित करना, अपनी टीम तक उन्हें नहीं बनाने देना, फ़ोटो तक उनका नहीं छपने देना कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की हत्या है। इसे सहन नहीं किया जाना चाहिये। कांग्रेस में केवल शराब घोटाले का सिंडिकेट ही नहीं है बल्कि वह अपने इतिहास की तरह ही इंडिकेट और सिंडिकेट में बंट गया है। उक्त बातें भाजपा के वरिष्ठ नेता राम विचार नेताम ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहीं।
नेताम ने कहा कि मरकाम के अपमान से समाज में फैले आक्रोश को मैनेज करने उन्हें मंत्री पद का झुनझुना थमाने की कोशिश है। टी. एस. सिंहदेव की तरह ही इस झुनझुना का उनके लिए क्या उपयोग होगा आखिर? जो भी विभाग उन्हें दिये जायेंगे, उसे समझने में ही नये मंत्री के रूप में उन्हें काफी समय लगेगा। ऐसे में उन्हें मंत्री पद की शपथ दिला कर वास्तव में उन्हें उस भ्रष्टाचार कैबिनेट का हिस्सा बना देने की साजिश है जिस कैबिनेट के भ्रष्टाचार का वह विरोध कर रहे थे। कांग्रेस के कका पूरी तरह अब मोहन पक्ष के लिये धृतराष्ट्र बन गये हैं। छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में कांग्रेस की सरकार ने भ्रष्टाचार करने के लिए जिला निर्माण समिति बना रखी है जिसके अध्यक्ष जिले के कलेक्टर होते हैं और उनके द्वारा करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार कांग्रेस की सरकार द्वारा कराए जा रहे हैं इन समितियों में बिना टेंडर के भी कार्य किए जा रहे हैं यह सरगुजा से लेकर बस्तर तक बड़ा भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है ज्यादातर माइनिंग के राशि इसी माध्यम से खर्च हो रहे हैं।

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मोहन मरकाम की छुट्टी दीपक बैज प्रदेशाध्यक्ष https://samacharpacheesa.com/?p=7292 Thu, 13 Jul 2023 07:03:30 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7292 कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आखिरकार बदल दिए गए। मोहन मरकाम के स्थान पर बस्तर के सांसद दीपक बैज को प्रदेश का नया कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया है। वैसे तो इस बात की अटकलें पहले से लगाई जा रही थी कि मोहन मरकाम की बदला जाएगा लेकिन पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित बैठक में जब टी एस सिंहदेव को उप मुख्यमंत्री बनाने के निर्णय के साथ अध्यक्ष का फैसला नहीं हुआ तो लगा विधानसभा चुनाव तक मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा जाएगा। अब अचानक दीपक बैज के मान की घोषणा कर दी गई। अध्यक्ष बदलने के निर्णय से केंद्रीय संगठन ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की बात पर मुहर लगा दी है। इस बात की चर्चा तो साल भर पहले से चल रही थी कि मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच पटरी बैठ नहीं रही है। पूर्व प्रदेश प्रभारी की उपस्थिति में संगठन और सत्ता के बीच तालमेल के अभाव को लेकर बहस भी हो गई थी। मुख्यमंत्री बैठक के बीच में चले गए थे। इसके बाद लगातार मोहन मरकाम ने संगठन पर मुख्यमंत्री को हावी होने नहीं दिया। प्रदेश महामंत्री प्रभारी चंद्रशेखर शुक्ला को अचानक हटाकर अमरजीत चावला को प्रभार सौंप दिया था, इस निर्णय से भी संगठन की गुटबाजी को हवा मिली। मुख्यमंत्री सहित कई नेता प्रदेशाध्यक्ष के निर्णय से खुश नहीं थे। जब ढ़ाई ढ़ाई साल का प्रकरण चल रहा था, विधायक भूपेश बघेल का समर्थन दिल्ली जा रहे थे तब भीमोहन मरकाम ने अपने को तटस्थ रखते हुए दिल्ली नहीं गए थे। जब कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन हुआ था उस समय भी समितियों की सूची को लेकर मतभेद उभरे थे। पिछले दिनों मोहन मरकाम ने संभागीय प्रभारियों की नियुक्ति कर दी थी जिसे प्रदेश प्रभारी शैलजा ने खारिज कर दिया। प्रदेश प्रभारी ने संगठन महामंत्री अमरजीत चावला के स्थान पर रवि घोष को प्रभारी महामंत्री बनाने का निर्णय लिया। लेकिन प्रभारी के आदेश को प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम ने खारिज कर दिया था। तब से मोहन मरकाम के अध्यक्ष की कुर्सी पर तलवार लटक रही थी। हालांकि मोहन मरकाम के अध्यक्ष पद का कार्यकाल समाप्त हो चुका था लेकिन चुनाव करीब होने के कारण लग रहा था, वे बदले नहीं जायेंगे। अब मोहन मरकाम को हटाएंजने के बाद कांग्रेस संगठन में फिर मतभेद बढ़ेंगे। स्ववभाविक तौर पर नए अध्यक्ष मोहन मरकाम को टीम को बदलना चाहेंगे। ऐसा हुआ तो नेताओं के घटक में नाराजगी बढ़ेगी। चुनावके पहले बस्तर संभाग में कांग्रेस का एक और मरकाम गुट तैयार हो गया है। नाराज मोहन मरकाम कोंडागांव से अपना विधानसभा चुनाव लडेंगे तो इस पर भी गुटबाजी का असर हो सकता है।

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नंदकुमार साय की नई राजनीतिक पारी https://samacharpacheesa.com/?p=6810 Tue, 02 May 2023 08:42:32 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6810 भारतीय जनता पार्टी में संगठन में कुछ ऐसे नियम बनाएं हैं जो भारत की स्वतंत्रता के बाद की राजनीति की दृष्टि से हटकर है। एक निर्णय यह लिया गया है कि भाजपा में सक्रिय राजनीति करने की आयु सीमा 75 वर्ष तय कर दी गई है। इस आयु सीमा पार महत्वकांक्षा पाले अनेक भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के मन में उपेक्षा किए जाने की टीस है। कांग्रेस पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दल भाजपा पर अपने वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हैं। ऐसा ही आरोप लगाकर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता नंदकुमार साय अपनी 50 साल की राजनीतिक यात्रा में भाजपा की गाड़ी को छोड़ कांग्रेस पार्टी की सवारी कर ली है। रविवार अचानक उनके इस्तीफे की खबर आई और अगले दिन सुबह मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेशाध्यक्ष मोहन मरकाम की उपस्थिति में कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ले ली। इस निर्णय से कई तरह के राजनीतिक सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि साय के पार्टी छोडऩे से भाजपा को क्या नुकसान और कांग्रेस में शामिल होने से कांग्रेस को क्या फायदा मिलेगा। पहली बात यह कि नंदकुमार साय जिस पीढ़ी के राजनेता वे अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। दूसरी बात श्री साय ने अपना आखिरी लोकसभा चुनाव 2004 में लड़े थे। इसके बाद 2009 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था। इसका मतलब है कि नंदकुमार साय लगभग 19 वर्षों से चुनावी राजनीति से बाहर है. इस बीच नई पीढ़ी राजनीति और मतदाता के रुप में खड़ी हो चुकी हैं। इसलिए नंदकुमार साय की राजनीतिक पहचान लगभग लुप्तप्राय है, मतलब आगामी चुनाव में श्री साय के भाजपा छोडऩे और कांग्रेस में शामिल का कोई ज्यादा असर नहीं पडऩे वाला। इधर नंदकुमार साय ने पार्टी में उपेक्षा की बात कही है। पहली बात तो यह कि 2021 में 75 वर्ष पूरा कर लेने के बाद वे केवल मार्गदर्शक की भूमिका में हो सकते हैं। दूसरी बार 2020 से पहल इनकी संसदीय यात्रा 1977 से प्रारंभ होती है जब वे पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। तब से लेकर 2016 तक वे लगातार चुनावी राजनीति के केंद्र में रहे। तीन बार लोकसभा के चुनाव और एक बार राज्यसभा के निर्वाचित हो चुके हैं। वहीं, तीन बार विधानसभा के लिए भी निर्वाचित हुए हैं। जितना श्रेय उनकी राजनीतिक यात्रा में उनको मिली जीत है, उतनी बार ही वे चुनाव भी हारे हैं। 1984, 1991 और 1998 में वे लोकसभा का चुनाव हारे हैं तथा 1980 और 2003 में विधानसभा का चुनाव हारे हैं। अब अगर उनके चुनाव लडऩे की यात्रा को देखे तो पार्टी ने उनको टिकट देने में कभी कोताही नहीं बरती। जैसे 1980 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद 1984 में लोकसभा का टिकट दिए, जिसे वे हार गए इसके बावजूद 1985 में विधानसभा का टिकट मिली। इसी तरह 1998 में लोकसभा का चुनाव हारने के बाद उसी साल विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत कर आए। वे 2003 में अजीत जोगी से चुनाव हारे तो 2004 में उन्हें लोकसभा का टिकट मिला और जीतकर सांसद बने। इस प्रकार जिस पार्टी ने उनके राजनीतिक कद को महत्व दिया उसे अचानक छोड़ देना उनके लिए भी बहुत मुश्किल निर्णय रहा होगा.

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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन फिर मुरली बजाएंगे या …? https://samacharpacheesa.com/?p=5196 Wed, 14 Dec 2022 07:12:48 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5196 हिमांचल प्रदेश के चुनाव निपटने के पहले एक चर्चा हमारे प्रदेश में चली थी कि क्या मोहन मरकाम प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाएंगे या रहेंगें ? इसी बीच मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को हिमांचल प्रदेश में चुनाव ऑब्ज़र्वर के रूप में नियुक्त कर दिया गया वे वहां व्यस्त हो गए। छतीसगढ़ के इस भावी परिवर्तन की चर्चा लगभग बंद सी हो गई। संगठन में बदलाव का इंतजार कर रहे लोगों ने समझ लिया कि हिमांचल प्रदेश के परिणाम आने के बाद ही अब कुछ संभव है। जैसे ही हिमांचल के परिणाम आये और वहां कांग्रेस की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ वैसे ही चर्चा चल पड़ी कि अब प्रदेश संगठन में बदलाव हो सकता है। हिमांचल में भूपेश बघेल के छतीसगढ़ मॉडल के प्रचार ने जादू कर दिया। राजनीति में कद व पद का बड़ा महत्व माना जाता है। पद तो पहले से ही बड़ा है ही, भूपेश बघेल को हिमांचल के चुनाव की सफलता ने और वहां मुख्यमंत्री के चयन करवाने में उनकी भूमि का के चलते उनका राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में कद भी और बढ़ गया है, यह मानने वालों की बड़ी संख्या है। छतीसगढ़ में जीत के बाद 2018 में कौन बनेगा मुख्यमंत्री की कवायद में बाजी मारने वाले भूपेश बघेल ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। प्रदेश के बड़े बड़े दिग्गजों को पीछे छोड़ते हुए वे काफी आगे बढ़ गए। अनेक उतार चढ़ाव देखते हुए वे आज राष्ट्र व राज्य में अच्छी प्रतिष्ठा पा चुके हैं। आज की स्थिति में छतीसगढ़ का कोई भी निर्णय भूपेश बघेल को छोड़ कर करने की बात असंभव सी लगने लगी है। हर मायनों व प्रत्येक फ्रेम में कांग्रेस हाई कमान की नजर में भूपेश बघेल ने अपना अग्रणी स्थान बना लिया है। अब उन्हें पहले की तरह हाई कमान के पास तक पहुंचने के लिए किसी बिचौलिए या माध्यम की कोई जरूरत नहीं रहती है। वे जो बात हाई कमान तक पहुंचना चाहते हैं। जिस भाषा व मायनों में पहुंचना चाहते हैं, स्वयं पहुंचा सकते हैं। इस बदली राजनैतिक परिस्थितियों में प्रदेश का निर्णय एकतरफा हाई कमान कर ले, यह लगता नहीं है। यह भी सच है कि इन दिनों में मोहन मरकाम ने भी हाई कमान से अपनी नजदीकियां कायम की हैं। जिस तरह भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी ने उनको महत्व दिया वह भी बड़ा महत्वपूर्ण है। प्रदेश अध्यक्ष आदिवासी समाज से हैं। उन्हें हटाया गया तो आदिवासी समाज का सदस्य ही अध्यक्ष बनेगा यह राजनैतिक विश्लेषकों की राय है। मरकाम ने प्रदेश अध्यक्ष रहते बहुत काम किया है। खास कर बस्तर क्षेत्र में माहौल बनाने का काम किया है, मेहनत की है। यह माना जा रहा है कि इन बातों को भी प्रदेश अध्यक्ष का चयन करते समय विचार में रखना होगा। एक बात और कि दोनों दलों की प्रारम्भिक चुनावी कवायद देख कर यह लगभग दिखाई देने लगा है कि आने वाले चुनाव में ओबीसी व आदिवासी वर्ग पर दलों का मुख्य लक्ष्य केंद्रित होगा। भाजपा ने दो बड़े पदों पर प्रदेश में संबसे अधिक जनसंख्या होने के आधार पर ओबीसी कार्ड खेला है। दोनों पदों पर अरुण साव व नारायण चन्देल के रूप में ओबीसी नेताओं को तवज्जो दी है। दोनों ने मेहनत भी करना शुरू कर दिया है। अब कांग्रेस में उम्मीद की जा रही है कि संगठन में बदलाव होगा। यह भी साफ दिखाई दे रहा है कि किसी भी नियुक्ति के निर्णय में अबकी बार भूपेश बघेल की मर्जी का सबसे बड़ा रोल रहेगा। हाई कमान भी चुनावी वर्ष के पूर्व कोई जोखिम नहीं उठाना चाहेगी। दोनों ही बातें अपनी अपनी जगह प्रभाव डालेंगी। देखने वाली बात होगी कि मोहन मरकाम ही रिपीट होते है या भूपेश बघेल की पसंद का कोई नेता इस पद पर काबिज होगा। चुनावी टिकट वितरण के दौर में प्रदेश अध्यक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके मद्दे नजर मुख्य मंत्री व प्रदेश अध्यक्ष का तालमेल बहुत महत्वपूर्ण तथ्य होता है। मुख्यमंत्री कभी नहीं चाहेंगे कि प्रदेश अध्यक्ष ऐसा हो जिसके बीच तालमेल का हो।

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