राजनीति – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Sat, 05 Aug 2023 06:43:50 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 राजनीति का अखाड़ा नहीं संसद https://samacharpacheesa.com/?p=7699 Sat, 05 Aug 2023 06:43:49 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7699 भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर, पर लगता है कि उसकी गरिमा और महत्ता का ध्यान उन्हें ही नहीं है, जो उसके माननीय सदस्य हैं। विपक्ष के हंगामे या अनुपस्थिति में कुछ जरूरी सरकारी विधेयक पारित करने के अलावा देश हित में कोई महत्वपूर्ण चर्चा संसद अपने मानसून सत्र में अभी तक नहीं कर पाई है। स्वाभाविक सवाल होगा कि क्यों, पर जवाब उतना सरल नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में दो ही पक्ष होते हैं : सत्तापक्ष और विपक्ष, और दोनों की सकारात्मक भूमिका से ही संसद चल सकती है, पर जब-जब संसदीय गतिरोध पर सवाल उठते हैं, दोनों एक-दूसरे पर उंगलियां उठाने लगते हैं। ग्रीष्मकाल से वर्षा ऋतु आ गई, लेकिन छोटा-सा खूबसूरत पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर मैतेई और कुकी जातीय हिंसा की आग में अभी भी जल रहा है। मणिपुर इस आग में जल तो मई से रहा है, पर सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों ही उस समय कर्नाटक की सत्ता के लिए चुनावी जंग में व्यस्त थे। दूसरे, संसद के बजट सत्र में एक-दूसरे पर निशाना साधने के लिए उनके तरकश में और तमाम राजनीतिक तीर थे। फिर अब मणिपुर को हिंसा की आग में जलते हुए अढ़ाई महीने से ज्यादा हो गया है, और उसकी तपिश अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से लेकर दूसरे देशों की संसद तक में भारतीय छवि को झुलसा चुकी है। सो, इसी साल होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करने का दोनों ही पक्षों को यह अनुकूल अवसर लगता है। इसीलिए विपक्ष मणिपुर हिंसा पर नियम 267 के तहत चर्चा और प्रधानमंत्री के बयान के लिए अड़ा रहा, जबकि पक्ष नियम 176 के तहत चर्चा और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा जवाब के लिए ही तैयार था। दोनों ही पक्षों के अपने-अपने तर्क हो सकते हैं, पर जब एक राज्य हिंसा की आग में जल रहा है, दो मणिपुरी महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने और उनसे बलात्कार का वीडियो वायरल होकर देश को दुनिया में शर्मसार कर चुका है, तब संसद में चर्चा को नियम के विवाद में उलझा कर क्या संदेश देना चाहते थे? अगर संसद सीमावर्ती राज्य के ऐसे संवेदनशील हालात पर भी चर्चा नहीं करती और बजट समेत महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा ही पारित कर दिए जाते हैं, तब जन मानस में देर-सवेर यह स्वाभाविक सवाल उठेगा ही कि यह संसद किसकी खातिर है, किसके लिए है? अब विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव के मास्टर स्ट्रोक के बाद संसद में चर्चा भी होगी और उसका जवाब भी प्रधानमंत्री को ही देना होगा। फिर इस संसदीय गतिरोध से क्या हासिल हुआ? मानसून सत्र में मणिपुर पर संसद के इस मौन से भी बड़े और प्रासंगिक सवाल उसके कामकाज को लेकर उठने लगे हैं।

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भ्रष्टाचार पर आमने सामने की राजनीति https://samacharpacheesa.com/?p=7341 Sat, 15 Jul 2023 07:02:47 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7341 छत्तीसगढ़ में चुनाव निकट है, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं। केंद्र में स्थिति अलग है, भाजपा आज भी कांग्रेस के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को 9 साल बाद भी मुद्दा बनाए हुए हैं। शुक्रवार को एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुए कोयला घोटाले के आरोपी कांग्रेस पार्टी के सांसद और उनके पुत्र को कोर्ट ने दोषी ठहराया है। लेकिन विपक्ष के पास अभी केंद्र सरकार के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं है। छत्तीसगढ़ में विचित्र स्थिति है, कांग्रेस पार्टी की सरकार है और डॉ. रमन सिंह सरकार पर अभी भी कांग्रेस के नेता भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है। यह समझ से परे है कि सरकार की ताकत कांग्रेस के पास है। प्रशासनिक अमला है, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करने वाली व्यवस्था है, कोर्ट है, सब कुछ है लेकिन सरकार कारवाई नहीं कर पा रही है। ऐसी बात नहीं है कि भूपेश सरकार कुछ करना नहीं चाहती, 2018 दिसंबर में सरकार बनने के बाद एक के बाद एक जांच टीम एसआईटी का गठन किया है। लेकिन पौने पांच साल के बाद भी एसआईटी की टीम किसी आरोप को साबित नहीं कर पाई है। दूसरी ओर प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं, कोयला में परिवहन परमिट के नाम पर अवैध वसूली का घोटाला 500 करोड़ से ऊपर का है। शराब घोटाला तो अपने आप में अनोखा है। कोई सरकार पर अपने खजाने में आने वाले राजस्व की चोरी करने जा आरोप तो निराला ही है। ये आरोप कोई हवा में नहीं हैं बल्कि प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने बकायदा जांच करके कोर्ट में जो चलन प्रतीत किया है उसमें पूरा विवरण दिया है। जब भी इस प्रकार के भ्रष्टाचार का उल्लेख भाजपा करती है तो कांग्रेस पार्टी के नेता भाजपा सरकार के समय भ्रष्टाचार की दुहाई देने लगते हैं मानो पिछली सरकार पर आरोप लगाने से वर्तमान सरकार को घोटाले करने का परमिट मिल जाता है। अपने घोषणा पत्र में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने कांग्रेस पार्टी ने मजबूत लोक आयोग बनाने का संकल्प लिया था जिसकी सीमा में मुख्यमंत्री भी आते हैं लेकिन सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना तो दूर जो आरोप खुद कांग्रेस लगाती थी, उन पर कार्यवाही करने में सरकार अक्षम है। लगता है छत्तीसगढ़ की राजनीति में भ्रष्टाचार का मुद्दा केवल आरोप प्रत्यारोप तक सीमित रहेगा। इन्हीं कारणों से जनता के मन में राजनेताओं के बारे में धारणा बनती जा रही है कि सभी भ्रष्ट होते हैं। ऐसा विचार फिर समाज में भ्रष्टाचार को मान्यता दे देता है जैसे कि प्रशासन में अधिकायिों और कर्मचारियों को मान्यता मिली हुई है। नेता भी अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं लड़ेगा तो इस नासूर का ईलाज कौन करेगा?

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टीएस बाबा को उपमुख्यमंत्री बनाने की राजनीति https://samacharpacheesa.com/?p=7185 Tue, 04 Jul 2023 06:45:53 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7185 त्रिभुवनेश्वर शरण सिंह देव यानी टीएस बाबा ने आखिर चुनाव से चार माह पहले डिप्टी सीएम पद स्वीकार कर लिया। निश्चित ही हाईकमान के साथ उनकी कोई गंभीर बात हुई होगी। अन्यथा वह वैराग्य की मुद्रा में आ गए थे। कांग्रेस को भी लगा होगा कि सरगुजा की 24 सीट पर अगर इंजिन बैठ गया तो जहाज आसमान में उड़ाए रखना मुश्किल है। सिंहदेव अगर डी शिवकुमार की तरह रहे होते तो साढ़े चार साल भी पूरी ठसक से गुजारते। टीएस बाबा के बारे में आमतौर पर लोगों में यही धारणा (परसेप्शन) है कि वह सरगुजा के राजपरिवार से आते हैं। काफी धनी-मानी व्यक्ति हैं। उनके पिता मदनेश्वर शरण सिंह देव मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव रहे। वह अर्जुन सिंह के परम मित्र थे। उनकी मां देवेंद्र कुमारी सिंहदेव स्थापित नेता थीं। उनकी बहन आशा सिंह भी हिमाचल की बड़ी नेता हैं। लिहाजा जो उन्हें नहीं जानते, वे निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि वह किसी बड़े महल में रहते होंगे, जहां बहुत सारे दरबान खड़े होंगे। उन तक पहुंचना मुश्किल काम होगा। छत्तीसगढ़ में समाजवादी आंदोलन भी काफी प्रभावी रहा और समाजवादी लोग राजपरिवारों के खिलाफ आग उगलते आए हैं। राजनीति में भी टीएस सिंह देव की जब भी मुखालिफत की गई तो उन्हें राजपरिवार का सदस्त कहकर नकारात्मक छवि बनाने के प्रयास हुए। अपनी सहजता और सरलता का राज एक बार टीएस ने खुद बताया। उनका कहना था कि उनके पिता मध्य प्रदेश के बड़े अफसर थे। छत्तीसगढ़ तो उन दिनों मध्य प्रदेश में ही हुआ करता था। लेकिन जब वह अपने पिता के साथ दौरों पर निकलते तो लोग हाथ देकर उनकी गाड़ी को रोकते। आदिवासी उन्हें रोकते। उनके पिता चीफ सेक्रट्री होते हुए भी उन लोगों के पास रुकते, उनकी बातें सुनते और जो भी मदद संभव होती, वह करते थे। इस तरह टीएस देखते कि उनके पिता सबसे कमजोर आदमी को भी कितना महत्व देते। यहीं से टीएस में सरलता के इस गुण ने जन्म लिया। वह सरलता आज भी बरकरार है। पढऩे के लिए वह जो किताबें चुनते हैं, वे भी असाधारण होती हैं। जब वह नेता प्रतिपक्ष थे, वह अमेरिका के जाने माने बायोलाजिस्ट सिद्धार्थ मुखर्जी एक पुस्तक पढ़ रहे थे। मैं हैरान रह गया। मेरे लिए यह कल्पना से परे है कि जमीनी राजनीति में सक्रिय कोई व्यक्ति ऐसे वैज्ञानिक रुझान का संवर्द्धन करना जानता हो। छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव की जुगलबंदी ने कांग्रेस को असाधारण जीत दिलाने में अहम भूमिका अदा की थी, यह एक ऐसा तथ्य है कि भूपेश बघेल का सबसे कट्टर समर्थक भी नकार नहीं सकता। अजित जोगी इन दोनों के मुखर विरोधी थे। दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि अजित जोगी को कांग्रेस से बाहर निकाले बिना, कांग्रेस को सत्ता में नहीं लाया जा सकता। इसलिए जैसे ही अजित जोगी के बेटे अमित जोगी ने एक बड़ी गलती की, दोनों ने मौका चूका नहीं। जोगी ने एक अलग पार्टी बनाई, जो भाजपा को मिलने वाले 7 प्रतिशत वोट झटक ले गई। कांग्रेस असाधारण जनमत से सत्ता में आ गई। सरकार बनने के बाद दोनों की जुगलबंदी जैसे 180 डिग्री पर घूम गई थी। सिंहदेव के समर्थक या तो खुले समर्थन से बच रहे थे या अपने आपको विपक्ष की तरह समझने लगे थे। चुनाव के ठीक पहले कुमारी शैलजा के छत्तीसगढ़ आने के बाद कांग्रेस को अहसास हुआ होगा कि धरातल का कुछ हिस्सा खिसका है। उसके लिए बहुत जरूरी है कि असंतोष को रोका जाए। सिंहदेव को भी राजनीतिक वैराग्य से बचाने के प्रयास जरूरी लगे होंगे। उत्तर तलाशने योग्य सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि उप मुख्यमंत्री बनाना एक प्रतीकात्मक समारोह है या कागजी खानापूरी है या अधिकारों के बंटवारे का समझौता है। यह तय है कि उत्तर के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

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आदिपुरुष फिल्म पर विवाद के मायने https://samacharpacheesa.com/?p=7116 Tue, 20 Jun 2023 07:49:26 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7116 अभी बॉलीवुड के साथ ग्रह नक्षत्रों की का तालमेल ठीक से मेल नहीं खा रहा है। एक तरफ एक के बाद एक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो रही है तो दूसरी ओर फिल्म के दृश्यों, डायलॉग और कथानक को लेकर विवाद खड़े हो रहे हैं। अभी केरल स्टोरी का विवाद थमा नहीं था कि 500 करोड़ से अधिक के खर्च से बनी फिल्म आदिपुरूष को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। पिछले शुक्रवार को फिल्म परदे पर रिलीज़ हुई, और उसी दिन से प्रभु राम, हनुमान और सीता के चरित्र, पहनावे और डायलॉग का विरोध हो रहा है। टेलीविजन पर चर्चा हो रही है, इस मामले में कांग्रेस, भाजपा और वामदलों की राय लगभग एक जैसी है। बहुत सालों के बाद पूरा देश किसी मुद्दे पर एकजुट हुआ है जबकि इस फिल्म को लेकर विवाद को कुछ बढ़ा चढ़ा कर बताया जा रहा है। यह समझ में नहीं आया की रामायण की कथानक पर बनी फिल्म में प्रभु राम की कहानी को दर्शाया गया, इस फिल्म का भारतीय जनता पार्टी क्यों विरोध कर रही है? इसे सनातन धर्म के विरुद्ध क्यों प्रचारित किया जा रहा है? फिल्म की कहानी में नाटकीयता है, यह किसी भी कहानी पर फिल्म बनाने के लिए जरूरी है। कुछ लोगों को घटनाओं की श्रृंखला पर भी आपत्ति हो सकती है क्योंकि सीमित समय में पूरी कथा बताने के लिए निर्देशक की मजबूरी भी होती है। कुछ को कहानी की सत्यता पर भी संदेह है। प्रारंभ में ही निर्माता ने स्पष्ट कर दिया है कि फिल्म आदिपुरुष वाल्मीकि रचित रामायण पर आधारित है। समाज में रामकथा की लोकप्रियता तुलसीदास कृत रामचरित मानस के पाठन के कारण अधिक है। वातविकता यह है कि दोनों रचनाओं में घटनाएं और तथ्यों में बहुत अंतर है। टेलीविजन पर प्रसारित रामानंद सागर का धारावाहिक रामायण मुख्य रूप से रामचरित मानस पर आधारित था। लोगों के मानसपटल पर वही कथा है। अब आदिपुरुष की तुलना करने पर दर्शकों को अंतर लग सकता है। इससे ज्यादा आश्चर्य तो इस बात पर है की कांग्रेस पार्टी को यह फिल्म प्रभु राम के चरित्र के विरुद्ध लग रहा है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तो इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगे हैं।कांग्रेस का राम के प्रति भक्ति को देखकर भाजपा भी परेशान है। फिल्म को देखने बाद ऐसा आपत्तिजनक कुछ भी नहीं लगा, अगर आप फिल्म देखने के मूड से जा रहे हैं। डायलॉग में कुछ वाक्यों में हल्कापन जरूर है लेकिन पूरे देश में भाषा को लेकर हल्कापन देखा जा रहा है, इसलिए बहुत अटपटा नहीं लगता। जब विरोध हो रहा है तो पटकथा लेखक ने डायलॉग को परिवर्तित करने की घोषणा भी की है।

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परिसीमन की आहट दक्षिण में घबराहट https://samacharpacheesa.com/?p=7054 Fri, 09 Jun 2023 08:26:31 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7054 भाषा और संस्कृति के रूप में दक्षिण भारत का उत्तर भारत से विरोध बहुत पुराना है किन्तु अब इसमें राजनीति का तड़का भी लगने वाला है। दरअसल, नए संसद भवन के उद्घाटन के बाद यह संभावना जताई जा रही है कि 2026 में प्रस्तावित परिसीमन के चलते संसद में दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों की अपेक्षा कम हो जाएगा। संभावना जताई जा रही है कि 2026 में परिसीमन किया जा सकता है। वैसे भी जनसंख्या के आधार पर लोकसभा की सीटों की संख्या वर्तमान में अप्रासंगिक है और इसमें बढ़ोतरी समय की मांग है किन्तु यही जनसंख्या अनुपात अब दक्षिण भारत के राज्यों के लिए गले की फांस बन गया है। पिछले चार दशक में हिंदीभाषी राज्यों में जनसंख्या बढ़ी है जबकि दक्षिण भारत के राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतर कार्य हुआ है। ऐसे में जनसंख्या अनुपात के आधार पर परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों में लोकसभा सीटें हिंदीभाषी राज्यों की अपेक्षा कम बढ़ेंगी। इसी कारण दक्षिण भारत के राज्यों में अभी से विरोध के स्वर प्रबल होने लगे हैं। दक्षिण भारत के नेताओं का मानना है कि बेहतर स्वास्थ्य, उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसरों की अधिकता के बावजूद संसद में उनका प्रतिनिधित्व न बढऩा उनके साथ अन्याय है। हालांकि संभावित परिसीमन के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार सदन में 550 से अधिक निर्वाचित सदस्य नहीं हो सकते। फिर अभी 2021 की जनगणना भी नहीं हुई है। यदि परिसीमन आवश्यक है तो सरकार को पहले जनगणना करानी पड़ेगी। यदि 2021 की जनगणना नहीं होती है तो वह 2011 की जनगणना को आधार मानकर परिसीमन करा सकती है किन्तु इससे भी दक्षिण भारत के राज्यों के साथ अन्याय होगा। लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों की सीमाओं के पुनर्निर्धारित कार्य को परिसीमन कहा जाता है जिसका उद्देश्य है परिवर्तित जनसंख्या का समान प्रतिनिधित्व तय करना। उक्त प्रक्रिया के चलते लोकसभा में अलग-अलग राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या तथा विधानसभाओं की कुल सीटों की संख्या में परिवर्तन आ सकता है। संविधान के अनुसार किसी राज्य को आवंटित लोकसभा सीटों की संख्या और राज्य की जनसंख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों के लिए एक समान होना चाहिए किन्तु इसी प्रावधान के चलते जनसंख्या नियंत्रण में फिसड्डी रहने वाले उत्तर भारत के राज्यों को संसद में अधिकाधिक सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है। जबकि परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाले दक्षिण भारत के राज्यों को अपनी सीटें कम बढऩे का अंदेशा है। इस परिस्थिति को भांपते हुए इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान संविधान में संशोधन कर परिसीमन को वर्ष 2001 तक के लिए स्थगित कर दिया था। यद्यपि लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों की संख्या में परिवर्तन पर रोक को वर्ष 2001 की जनगणना के बाद हटा दिया जाना था किन्तु पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा एक अन्य संशोधन द्वारा इसे वर्ष 2026 तक के लिये स्थगित कर दिया गया। इस रोक को इस आधार पर उचित ठहराया गया कि 2026 तक देश में समान जनसंख्या अनुपात हो जाएगा जिससे दक्षिण भारत के राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व उत्तर भारत के राज्यों के बराबर होगा।

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ऐसे हैं पशुपालन मंत्री! https://samacharpacheesa.com/?p=7036 Tue, 06 Jun 2023 08:08:23 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7036 यह अजब कि़स्म की उलटबासी का भयावह समय है। पशुपालन मंत्री ही फुल बेशर्मी के साथ बयान दे रहा है कि गाय भी काटी जानी चाहिए!हद है। कर्नाटक सरकार के पशुपालन मंत्री टी व्यंकटेश ने पिछले दिनों कहा कि जब बैल, भैंस काटे जा सकते हैं तो गाय क्यों नहीं काटी जा सकती? इसलिए अब ये महोदय पिछली भाजपा सरकार के समय बनाए गए पशुवध रोकथाम और पशु संरक्षण कानून को बदलने वाली है। ये फरमाते हैं कि गौशाला के लिए राज्य के पास धन की कमी है। कोई बड़ी बात नहीं है कि अब कांग्रेस की सरकार आई है, तो गौ वध की छूट मिल भी जाए। पिछली सरकार ने गो हत्या को सख्ती के साथ रोका था, अधिनियम बना कर। आश्चर्य होता है कि कभी गौवंश की पूँछ पकड़कर राजनीति की नैया पार करने वाली कांग्रेस गाय को लेकर गंभीर क्योंनहीं रही। एक दौर था, जब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी और फिर गाय कर साथ दूध पीता बछड़ा हुआ करता था। उसी कांग्रेस ने 7 नवम्बर,1966 को दिल्ली में गौ प्रेमियों पर निर्ममतापूर्वक गोलियां दागी थीं, जिसमें अनेक गोभक्तों और संतो की मौत हो गई थी। देशभर के हजारों गौ भक्त दिल्ली में एकत्र हुए थे और गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर जुलूस निकाल रहे थे। उन निहत्थे गौ भक्तों को शहीद कर दिया गया था। यह तो चरित्र रहा है। अब अगर कर्नाटक का पशुपालन मंत्री गो हत्या की छूट देने की बात कर रहा है,तो कोई बड़ी बात नहीं कि बहुत जल्दी ऐसा अधिनियम बन भी जाए। यह कितनी गजब बात है कि पशुपालन मंत्री पशुओं के संरक्षण की बात नहीं कर रहा और उनकी हत्या को जायज ठहरा रहा है। कायदे की बात तो यह है कि न तो बैल कटने चहिए, न भैंसें कटनी चाहिए। किसी भी जीव की हत्या नहीं होनी चाहिए। आज देश के अनेक राज्यों में कसाईखाने आबाद हैं, जहां गाय बैल, भैंस सब कट रहे हैं । गायों को बीमार बताकर उनकी हत्या की जा रही हैं। मैं यह सुनकर, पढ़कर चकित और व्यथित हो जाता हूँ कि भारत देश गौ मांस के निर्यात के मामले में काफी आगे है। यह दुख की बात है। शर्म की भी। वह भी भाजपा के शासन काल में!! यह दो साल पहले का आंकड़ा है कि अपना देश साढ़े बयालीस लाख मीट्रिक टन (बीफ) मांस निर्यात करके विश्व का पांचवे नम्बर का देश बन चुका था। अब तो आंकड़ा और बढ़ गया होगा। गाय गंगा की पूजा करने वाली सरकार को बीफ निर्यात पर रोक लगानी चाहिए। भले ही उसे खरबों का नुकसान हो जाए। उस नुकसान की भरपाई टैक्स लगा कर की जा सकती है। लेकिन शायद ही ऐसा हो। सत्ता का चरित्र अजब किस्म का होता है। शराब की बुराई करने वाली सरकार की नाक के नीचे जम कर बिकती है शराब। ऐसे पाखंडी समय में हम केवल भड़ास निकाल सकते हैं। हाय हाय कर सकते हैं पर गाय को, गौ वंश को बचा नहीं सकते। किसी भी समाज के चरित्र को समझने के लिए यह देखना पर्याप्त होता है कि वह अपने पशुओं के साथ कैसा बर्ताव करता है। कुछ कहने की आवश्यकता नहीं कि आज पशुओं के साथ किस तरह की क्रूरताएँ हो रही हैं। अब तो हमारी मानसिकता इस स्तर पर पतित हो चुकी है कि अगर कोई मनुष्य गम्भीर रूप से बीमार है तो क्यों न उसे इंजेक्शन देकर मार दिया जाए। मनुष्य की सम्वेदना धीरे धीरे मरती चली जा रही है। आए दिन हम खबरें पढ़ते रहते है। यह कि नवजात का शव मिला।…एक मां ने अपनी बच्ची को नाले में फेंक कर मार डाला।… बेटे ने बाप की हत्या कर दी। .. पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या कर दी।..या पति ने पत्नी के टुकड़े टुकड़े कर दिए।..आदि-आदि। पता नहीं अभी और कितना विनाश देखेंगे हम लोग!

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मध्यवर्ग से राजनीतिक पार्टियों की बेरूखी https://samacharpacheesa.com/?p=6997 Sat, 27 May 2023 08:34:51 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6997 देश की राजनीति में मध्यवर्ग का बड़ा योगदान माना जाता रहा है। मुल्क की सियासत का नैरेटिव तय करने और उसे दिशा देने में इस तबके को सबसे बड़ा फैक्टर माना जाता है। पहले कई मौकों पर मध्यवर्ग ने इसे साबित भी किया है। लेकिन पिछले कुछ अरसे से यह अपनी सियासी पूंजी गंवाता हुआ दिख रहा है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हाल के दिनों में मध्यवर्ग किसी की भी प्राथमिकता में नहीं दिख रही है। आखिर इस ट्रेंड के पीछे क्या वजह है? जानकार जल्दबाजी में इसे लेकर कोई राय नहीं बनाना चाहते, लेकिन इतना वे भी मानते हैं कि इधर राजनीतिक दलों की ओर से पेश किए जाने वाले सियासी मेन्यू में मध्यवर्ग के स्वाद का खयाल नहीं रखा जा रहा है। उदारीकरण के बाद नब्बे के दशक से मध्यवर्ग का राजनीति में दखल बढ़ा है। खासकर नैरेटिव बनाने में इस तबके की सबसे अहम भूमिका मानी जाने लगी थी। लेकिन यह बात भी सामने आई कि पिछले कुछ वर्षों में इस तबके को सरकार से अपेक्षा के मुताबिक सौगात नहीं मिली। वैसे इस बारे में सरकार का दावा है कि मध्यवर्गीय लोग उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहे हैं। लेकिन मध्यवर्गीय लोग शायद ही इससे इत्तेफाक रखें। सच यह भी है कि मध्यवर्ग की अनदेखी की वजह हालिया सियासी नतीजे भी हो सकते हैं। बजट से लेकर चुनावी वादों तक, हाल के दिनों में आए तमाम राजनीतिक परिणामों में यह बात समान रूप से दिखी कि राजनीतिक दल गरीब और किसानों पर अधिक फोकस करते रहे हैं। गांव की आबादी उनकी प्राथमिकता में रही है। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनावों में गांव में रहने वाले लोग, गरीब और किसान राजनीतिक दिशा तय करने में कहीं अधिक भूमिका निभाते रहे हैं। 2014 के बाद मोदी सरकार ने इनके लिए कई योजनाएं लॉन्च कीं और इस तबके के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ी भी है। सरकार ने इन पर लगातार फोकस किया। केंद्र के अधिकतर संसाधन किसान सम्मान निधि और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं के संचालन में गए। इसका सियासी लाभ भी उन्हें मिला। लेकिन इस हिसाब से मध्यवर्ग को सौगातें नहीं मिलीं। यह भी सही है कि सीमित आर्थिक संसाधनों में सरकार हर तबके को खुश नहीं रख सकती। वह भी तब, जब पिछले कुछ वर्षों से देश की आर्थिक दशा वैसी मजबूत नहीं रही। वैसे इसका एक और पहलू है। सत्ता पक्ष का यह तर्क है कि केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में कई ऐसे कदम उठाए, जिनका अप्रत्यक्ष लाभ मध्यवर्ग को मिला है। सरकार से जुड़े एक सीनियर नेता ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत काम किया गया। सड़क और रेल सेवा बेहतर की गई। इन तमाम चीजों से सबसे अधिक लाभ मध्यवर्गीय आबादी को ही होता है। उनका तर्क था कि मिडल क्लास को सीधा लाभ देने से बेहतर है उसे बेहतर संसाधन उपलब्ध कराना। सरकार ऐसा कर रही है और उसका लाभ भी इस वर्ग को मिल रहा है। उधर, विपक्ष ने भी गरीब और गांव में रहने वालों पर ही फोकस किया और उन्हें चुनावों में मुफ्त की चीजें देने का एलान किया। इसका लाभ भी उसे मिला। ऐसे में संदेश यह भी गया कि दोनों पक्ष इस सोच के साथ आगे बढ़े कि मध्यवर्ग और शहरी आबादी को कुछ समय के लिए नाराज करने का राजनीतिक जोखिम लिया जा सकता है।

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तब धान-नान अब गोबर- गौठान-गौशाला पर भी आरोप, हे प्रभु! https://samacharpacheesa.com/?p=6977 Wed, 24 May 2023 07:52:00 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6977 छतीसगढ़ में गोबर गौठान की राजनीति गर्माने लगी है। देश का पहला राज्य होगा जिसमें गोबर में भी विपक्षी दल ने घोटाला खोजने का काम शुरू कर दिया है। भाजपा ने यह बीड़ा सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष यानी चुनावी वर्ष में बड़ी शिद्दत से उठा लिया है। पूरे प्रदेश की हर विधानसभा में यह एक अभियान की तरह चल रहा है। बड़े छोटे सभी नेता कार्यकर्ता रोज एक या उससे अधिक गौठान में जा रहे हैं। कह रहे हैं कि यहां कोई व्यवस्था नहीं है,सब गड़बड़ी है। अखबारों में उनकी खिंचाई फ़ोटो के साथ समाचार भाजपा नेताओं के हवाले से छप रहे हैं। 1300 करोड़ के घोटाले का आंकलन भी कर लिया गया। आरोप भी इसी आंकड़े के साथ छतीसगढ़ सरकार पर चिपका दिया गया। मजेदार बात यह है कि साढ़े चार साल बाद ये आरोप चुनावी वर्ष में लगाए जा रहे हैं। कितना असर डालेंगें या नहीं डालेंगें इसका अनुमान लगाना भी अभी मुश्किल है। जानकर लोगों का कहना है कि देर हो गई है। यही काम भाजपा को दो वर्ष पहले ही शुरू कर लेना था। अब जनता इसे बहुत अधिक गंभीरता से लेगी, एसी संभावना जरा कम लगती है। कहा गया कि भाजपा की आदर्श संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के “कुछ” सदस्य गोबर गौठान व गौवंश की रक्षा के लिए वर्तमान सरकार को धन्यवाद देने सशरीर सीएम हॉउस गए। उन्होंने सीएम से भेंटकर उन्हें सीधे इस कार्य के लिए बधाई दी थी। आरएसएस संस्था में एक बात तो है कि अच्छे को अच्छा व बुरे को बुरा बोलने का साहस है। जो सही करे वो उसे सही कह देते हैं। विचारों व संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित यह संस्था सही काम व बुरा काम में अपने पराए का भेद नहीं करती।अब ऐसा क्या हो गया कि इस चुनावी वर्ष में गौठान का काम खराब हो गया। शायद चार साल ठीक रहा होगा, इसलिए विपक्ष चुप रहा होगा। एकाध बार विधानसभा में किंचित प्रश्नोत्तरी में विरोध दर्ज जरूर किया गया ,लेकिन इतनी गंभीरता से नहीं लिया गया , जिसकी चर्चा प्रदेश में या अखबारों में हुई हो। जो सद्गुण किसी सेवा भावी संस्था में होता है वह सदगुण राजनीति में नहीं होता। भाजपा ने जो तरीका अपनाया है, हमें तो लगता है कि यह फार्मूला कारगर भी हो सकता है। वह तब होगा जब जहां जहां गौठानों में बेहतर काम हो रहा है, उसकी तारीफ भी की जाए। साथ ही जहां खराब हो रहा है, वहां की आलोचना सकारात्मक ढंग से सरकार की आंख खोलने की शैली में हो। ताकि सरकार उस पर ध्यान दे सके, आम जनता पर असर भी हो। यह काम दो साल पहले किया जाता तो बहुत असर पड़ता। लोग कहते हैं कि विपक्ष अपनी सही भूमिका निभा रहा है। सकरात्मक प्रयास के बाद भी अगर अब तक खराबी वाले गौठानों में स्थिति नही सुधरती, तो आज के हो रहे प्रयासों में वजन होता। राजनीति के आसपास रहने वालों व उसे समझने वालों का मत है कि अनेक मुद्दों पर राजनीति करने के बाद विपक्ष ने समझ लिया कि शांति के टापू छतीसगढ़ में ये उग्र सोच वाले मुद्दे कम प्रभाव डाल रहे हैं। कर्नाटक चुनाव ने नया मुद्दा दिया है। सरकार का भ्रष्टाचार। विपक्ष ने कांग्रेस को इसी मुद्दे पर जब कर्नाटक के चुनाव जीतते देखा तो छतीसगढ़ में अपनी रणनीति बदल दी। अब भ्रष्टाचार मुद्दा बनाया है। जनता के सामने सरकार को बदनाम करने का साधन खोजना शुरू किया गया। ध्यान गोबर-गौठान पर आकर टिक गया है। रणनीति सही है। गोबर-गौठान पर सवाल उठा कर विपक्ष सही खेल खेल रहा है। देर से ही सही विपक्ष ने अब वर्तमान सरकार के गांव-गरीब-किसान व ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधार की सटीक राजनीति पर वार करना प्रारम्भ किया है। सफलता संदिग्ध भले ही हो पर रणनीति तो सटीक है। अखबारों में प्रचार का ढंग बदलना होगा। अपने नेताओं के खुद के बयानों व फ़ोटो के अखबारों में छपने का प्रभाव कम पड़ेगा। आये दिन टीवी डिबेट में आपको कांग्रेस के प्रवक्तागण छाती ठोक कर चुनौती दे रहे हैं कि हम चलते हैं आपके साथ , अगर कहीं भी घोटाला साबित हुआ तो वे इस्तीफा दे देंगे। उनकी चुनौती स्वीकार कर उन्हें बुलाइये उनके साथ जाकर दिखाइए कि कहां 1300 करोड़ की गड़बड़ी है। पत्रकारों को भी साथ ले जाइए आपके बयानों से नहीं जब स्वस्फूर्त अखबार नवीस देखेंगें और प्रतिनिधि के नजरिये से छपेगा तो ज्यादा सही व जनप्रभावी होगा। अन्यथा प्रदेश की जनता तो रोज आप लोगों के भ्रष्टाचार के आरोप प्रत्यारोपों को देख-सुन कर कन्फ्यूज़ हो ही रही है। सोचती है कि दोनों ही बेईमान हैं ,तो आखिर ईमानदार है कौन? एक खतरा भी है कि अगर जनता ने अपने मानस पटल पर यह बैठा लिया कि सभी अगर एक ही शैली से शासन चलाते हैं तो भ्रष्टाचार तो सामान्य बात हुई। तब क्या होगा जरा गंभीरता से सोचें।

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केंद्र में सरकार और राज्य की राजनीति https://samacharpacheesa.com/?p=6833 Thu, 04 May 2023 09:42:33 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6833 भारतीय संविधान का चरित्र परिसंघात्मक है, इसका मतलब है केंद्र और राज्य दो इकाइयां स्वायत्त रूप से सत्ता चलाएंगे। इस आधार पर केंद्र के राजनीतिक संगठन और राज्य के संगठन अलग अलग होंगे, अभी संगठन तो स्वायत्त हो नहीं सकते इसलिए राष्ट्रीय पार्टियों की अखिल भारतीय संगठन और राज्य की इकाइयां मिल कर काम करती हैं। इस प्रकार सताता और संगठन के दो केंद्र बिंदु बनते हैं, केंद्र और राज्य। भले ही दोनों स्वायत्त होने का दावा करने हैं लेकिन केंद्र का नियंत्रण भरपूर होता है। आज की स्थिति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टी हैं, डोना के राष्ट्रीय स्तर पर संगठन की रचना है लेकिन पार्टी के संगठन का व्यवहार सत्ता के साथ बदल जाता है। अगर केंद्र में पार्टी की सत्ता है तो राज्य की सत्ता हो या संगठन केंद्र के नियंत्रण में कार्य करते हैं। अभी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में केंद्र की सरकार है, इसलिए किसी भी राज्य में भाजपा की सरकार हो या संगठन केंद्र सरकार के निर्देश पर काम करते हैं। इस प्रवृत्ति से राज्य के संगठन पर प्रतिकूल असर भी पड़ता है। जैसे छत्तीसगढ़ में जब 2003 से 2013 तक डॉ. रमन सिंह की सरकार थी तब केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी। ऐसे में प्रदेश सरकार अपने विवेक से कार्य करती थी और चुनाव के समय राज्य संगठन स्वविवेक से निर्णय कर लेते थे। जैसे ही 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तब से प्रदेश की भाजपा सरकार और संगठन केंद्र के निर्देशों पर निर्भर हो गया। इससे प्रदेश का संगठन कमजोर होता चला गया। ऐसा ही कांग्रेस के साथ भी हुआ जब केंद्र और राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकारें हुआ करती थी। अब जो संगठनात्मक नुकसान कांग्रेस को भुगतना पड़ा वही स्थिति अब भाजपा की बन रही है। इस रवैए का असर केवल केंद्र और राज्य नहीं बल्कि इसके नीचे के स्तर पर भी दिखाई देता है। जैसे छत्तीसगढ़ में जब नगरीय निकाय के चुनाव हुए थे तब स्थानीय संगठन के बजाय प्रदेश सरकार और संगठन चुनाव लडने लगे थे, यही हाल अभी उत्तरप्रदेश में हो रहे नगरीय निकाय के चुनाव में देखना को मिल रहा है। इससे जिला और निचले स्तर की संगठन इकाइयां कमजोर होती हैं और राज्य संगठन पर निर्भरता बढ़ती जाती है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हो रहा है, लेकिन ज्यादातर भूमिका मोदी सरकार के मंत्रियों और राष्ट्रीय अध्यक्ष की दिखाई दे रही है। ऐसा सभी राज्यों में होता रहा जबकि केंद्र में सरकार न हो तो राज्य का संगठन ज्यादा जिम्मेदार और मेहनतकश होते हैं। 2018 में भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत को भी इस तर्क की कसौटी पर कस कर देख सकते हैं।

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साय प्रकरण; राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं https://samacharpacheesa.com/?p=6825 Wed, 03 May 2023 08:56:48 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6825 राजनीति के क्षेत्र का एक बड़ा नाम नंद कुमार साय अब अपने नए घर में प्रवेश कर गए हैं। पुराना घर उन्हें अब खंडहर सा लगने लगा था। उनकी कल्पना के भूत उन्हें वहां डराने लगे थे। वहां उनका दम घुटने लगा था। घुटेगा भी क्यों नहीं , जब तक ताजपोशी रही तब तक ये भूत अँधेरों में छुपे रहे। सामने आने की हिम्मत नहीं की। तब सताने का तो प्रश्न ही नहीं था। अब कुर्सी खाली है, तो कथित भूत उनका अपमान करने लगे। उनके राजनैतिक भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा कर उन्हें परेशान करने लगे। बड़े मंच पर बिना सलाह मशविरे , राजनीति के उनकी तुलना में एक नाटे कद के नेता ने कह दिया कि जब तक कांग्रेस को सरकार से हटा नहीं देंगें, तब तक साय बाल नहीं कटाएंगें। बुरा तो लगना ही था। हमारे प्यारे दुलारे बालों को बलि चढ़ाने वाले तुम कौन हो भाई ? समझ गए यह उनसे पूछे बिना घोषणा किया जाना अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें नीचा दिखाने का व अपमान करने का प्रयास है। पार्टी के कद्दावर नेता थे नंदकुमार साय। लंबे समय से खाली बैठे थे। पार्टी में कोई तवज्जो नहीं। बैठकों में बुलावा नहीं। कोई सुझाव सलाह नहीं। सोचिए अटल बिहारी बाजपेयी जैसे कद्दावर नेता के साथ सहज काम करने वाले किसी नेता की यह हालत हो जाये तो वो क्या सोचेगा ? और आखिर करेगा क्या ? हर कोई आडवाणी-मुरली मनोहर नहीं हो सकते। डॉ.रमनसिंह सरकार के कार्यकाल में अपनी घोर उपेक्षा के कारण यदा कदा पार्टी को आंख दिखाने वाले बयान देकर ही संतुष्टि करनी पड़ती थी। सनसनी फैलती थी मान मनौवल के बाद राजनीतिक तूफान शांत हो जाता था। यह भी सच है कि वे मान भी जल्दी जाते थे। वे गांव गरीब व आदिवासियों के हित की राजनीति को ही असल जनसेवा मानते हैं। अब आरएसएस व भाजपा के बाद घोर विरोधी पार्टी रही कांग्रेस में आ गए तो अपनी व्यथा बताने के साथ जो बात कही वह बड़ी महत्वपूर्ण बात है। यह कहा कि वे मुख्यमन्त्री भूपेश बघेल द्वारा प्रदेश के लिए किये जा रहे कार्यों से बहुत प्रभावित हैं। नरवा-गरुवा-घुरूवा-बाड़ी जैसी ग्रामीणों की सेवा की कल्पना के कायल हैं। इसीलिए वे जनसेवा के लिए भूपेश का नेतृत्व स्वीकार रहे हैं। पूरा जीवन आरएसएस व भाजपा जैसी अपने सिद्धांतों व नीतियों से समझौता नहीं करने वाली संस्थाओं से निष्ठा के साथ जुड़े रहे। उनका मोहभंग कोई तात्कालिक घटना नहीं है ,निश्चित रूप से लंबी सोच विचार के बाद लिया गया गंभीर निर्णय है। यही कारण है कि जब डैमेज कंट्रोल के लिए भाजपा के दिग्गज उनके निवास के द्वार पर पहुंचे तो साय के परिवार ने भी उनकी कोई मदद नहीं की। साय से किसी की बात नहीं कराई। साफ है कि घर बदलने का निर्णय पक्का था,उसमें कोई फेरबदल करने व भावनाओं का आधार शेष नहीं था। लगता है इतना अपमान महसूस किया गया था कि उन्हें इस दौर में भाजपा द्वारा उनको समय समय पर विधायक,सांसद,राज्यसभा सांसद, अविभाजित मध्यप्रदेश का प्रदेश अध्यक्ष, बहुत ही विषम परिस्थितियों में छतीसगढ़ का प्रथम नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने का एहसान भी याद नहीं आया। वर्तमान अपमान के घाव का दर्द कुछ ज्यादा ही भारी पड़ा। इतना भारी की पुराने घर की दीवारें भी उनको सताने व डराने लगी। घर भी जेल के विशेष सेल की तरह डरावना लगा। दम घुटने लगा तत्काल ताजी हवा की जरूरत महसूस हुई। हल ढूंढना शुरू हुआ। राजनीति का ऑक्सीजन दिल्ली जाने पर मिला,रास्ता बना। जब तक पुराने घर के साथी कुछ समझ पाएं,अचानक धमाका कर दिया। कल तक जिसे कोसते रहे उसका दामन थाम लिया। सही कहा है राजनीति में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। राजनीति ही एकमात्र मंच है जहां विरोधी भी दोस्त होते हैं। दुश्मन भी अगले ही क्षण दोस्त हो सकते हैं। यहाँ वोट की स्वार्थी राजनीति को प्राथमिकता में रखा जाता है। बाकी सब कृत्य दूध- भात होता है। इसी राजनीति में नंदकुमार साय को अपने साथ जोड़ कर भूपेश बघेल ने सटीक दांव खेल कर बहती नदी की धारा के रुख को पलटने का काम किया है। भाजपा इस दांव से हतप्रभ हुई है। इसकी भरपाई नहीं हो सकती। भविष्य में आदिवासी राजनीति में नया परिवर्तन दिखाई दे सकता है। कांग्रेस के लिए कल का दिन दोनों हाथ में लड्डू जैसा प्रसंग रहा है। एक तो आदिवासी कद्दावर नेता साथ आये ,दूसरा सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की रोक को बहाल कर दिया। इन दोनों लड्डूवों की कितनी मिठास कांग्रेस के चुनावी दौर में घुलेगी यह देखने की बात है।चुनावी दौर की उलट पलट में और कौन कौन दोस्त-दुश्मन का खेल खलेंगें यह देखना है। देंखें आगे आगे होता है क्या ?

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