राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Wed, 05 Jul 2023 07:00:35 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 नीतीश का नंबर भी आयेगा https://samacharpacheesa.com/?p=7195 Wed, 05 Jul 2023 07:00:28 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7195 महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अंदर मची उठापटक के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में जनता दल युनाइटेड और झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा को पार्टी में टूट का खतरा सताने लगा है। ऐसा ही डर कुछ और छोटी पार्टियों को भी है। लेकिन सबसे ज्यादा घबराहट जनता दल युनाइटेड खेमे में देखी जा रही है। जनता दल युनाइटेड की यह घबराहट स्वाभाविक भी है क्योंकि उसने भाजपा को जो धोखा दिया था उसका जवाब अब तक नहीं दिया है। दरअसल महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष रहे अमित शाह को चुनाव परिणाम बाद उद्धव ठाकरे ने धोखा दे दिया था। यही नहीं, हाल ही में शरद पवार भी यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि चुनाव परिणाम के बाद वह भाजपा के साथ सरकार बनाने को राजी हो गये थे हालांकि तीन-चार दिनों में ही उन्होंने पलटी मार ली थी। इस तरह से शरद पवार ने भी अमित शाह को धोखा दिया था। सही समय आने पर शरद पवार की पार्टी में बगावत हो गयी। स्थिति यह हो गयी है कि अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के संस्थापक शरद पवार भाजपा से लड़ाई लडऩे की बजाय अपनी पूरी शक्ति अपनी पार्टी पर कब्जा बनाये रखने में लगाते रहेंगे। इसलिए महाराष्ट्र के घटनाक्रम को देखते हुए अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लग रहा है कि उन्हें भी राजनीतिक सबक सिखाये जाने का समय आ चुका है। हम आपको याद दिला दें कि साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान जनता के बीच नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए वोट मांगा था। यही नहीं, प्रधानमंत्री की दी गयी जुबान की लाज रखते हुए ही भाजपा ने अपनी पार्टी के ज्यादा विधायक होने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना दिया था। लेकिन नीतीश कुमार ने जब पिछले साल भाजपा को सरकार से बाहर कर विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल से हाथ मिला लिया था तबसे वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। देखा जाये तो नीतीश कुमार ने केंद्र की सत्ता से मोदी सरकार को हटाने के लिए पूरी जान लगा रखी है। हालांकि जबसे नीतीश साथ छोड़ कर गये हैं तबसे प्रधानमंत्री ने उनके खिलाफ कुछ नहीं कहा है। लेकिन अब माना जा रहा है कि भाजपा जदयू को कोई बड़ा राजनीतिक सबक सिखा सकती है। दरअसल इसका मौका खुद जदयू ही भाजपा को दे रही है। लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे पास आ रहे हैं, वैसे-वैसे मोदी के नाम पर पिछला चुनाव जीते जदयू सांसदों की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं और वह पाला बदलने की कोशिशों में लगे हैं। इसके साथ ही जिस तरह नीतीश ने पिछले दिनों तेजस्वी यादव को भविष्य का नेता बताया था उसको देखते हुए जदयू के कई विधायकों के मन में भी बेचैनी है। इसीलिए पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कह रहे हैं कि जदयू में बिखराव होने वाला है। हालांकि जदयू अध्यक्ष ललन सिंह कह रहे हैं कि हमारी पार्टी एकजुट है और बिहार में ऑपरेशन लोटस सफल नहीं हो सकता। देखना होगा कि बिहार में आने वाले दिनों में राजनीतिक घटनाक्रम क्या रहता है? यह भी देखना होगा कि क्या विपक्ष की अगली बैठक से पहले ही जनता दल युनाइटेड में बगावत का बिगुल बजता है। इस बात की आशंका इसलिए है क्योंकि विपक्ष की पिछली बैठक से पहले जीतन राम मांझी की पार्टी ने बिहार में सत्तारुढ़ महागठबंधन को झटका देते हुए सरकार से अलग होकर एनडीए का दामन थाम लिया था। बहरहाल, अब खबर है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की कवायद को गति देने के लिए प्रमुख विपक्षी पार्टियों की आगामी बैठक 17 और 18 जुलाई को बेंगलुरु में होगी। हम आपको याद दिला दें कि कांग्रेस समेत 15 से अधिक विपक्षी दलों ने गत 23 जून को पटना में बैठक की थी जिसमें उन्होंने भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लडऩे और आगे बढऩे को लेकर प्रतिबद्धता जताई थी। विपक्षी दलों की अगली बैठक ऐसे समय होने जा रही है जब महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दो फाड़ हो गई है।

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चाचा-भतीजे की लड़ाई सामने आई https://samacharpacheesa.com/?p=7133 Fri, 23 Jun 2023 07:02:13 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7133 महाराष्ट्र की राजनीति में अक्सर नये मोड़ आते रहते हैं या नये घटनाक्रम होते रहते हैं। आज की रिपोर्ट में हम बात करेंगे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में मचे नये तूफान की और महाराष्ट्र सरकार में शामिल एक मंत्री के सनसनीखेज दावे की। सबसे पहले बात करते हैं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की। अभी हाल ही में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने अपनी बेटी और सांसद सुप्रिया सुले को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर महाराष्ट्र की जिम्मेदारी सौंपी थी। पवार ने इसके साथ ही वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल को भी कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर उन्हें अन्य राज्यों की जिम्मेदारी दी थी। उस समय अजित पवार के बारे में कहा गया था कि वह महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद पर हैं इसलिए वह वही काम करते रहेंगे। पार्टी ने यह भी कहा था कि अजित पवार की राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में कोई भूमिका निभाने की इच्छा नहीं है और वह महाराष्ट्र की राजनीति ही करना चाहते हैं इसलिए वह नेता प्रतिपक्ष जैसी महत्वपूर्ण भूमिका में बने रहेंगे। उस दौरान अजित पवार ने खामोश मन से जिस तरह शरद पवार का निर्णय स्वीकारा था उससे माना गया था कि राकांपा में उत्तराधिकार के मुद्दे को हल कर लिया गया है। लेकिन अब जिस तरह से अजित पवार ने अपने मन की बात सामने रखी है उससे स्पष्ट हो गया है कि भतीजे को यह कतई मंजूर नहीं है कि चाचा के साथ मिलकर उन्होंने जिस पार्टी को खड़ा किया था उसकी कमान वह अपनी बेटी को दे दें। यह कुछ वैसा ही है जैसा कि शिवसेना में बाला साहेब ठाकरे के जमाने में देखने को मिला था। उस समय उनके भतीजे राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को शिवसेना की कमान सौंपे जाने का विरोध करते हुए कहा था कि जिस पार्टी को खड़ा करने के लिए उन्होंने अपना पसीना बहाया उसकी कमान एकतरफा रूप से अपने पुत्र को सौंपा जाना गलत है। अजित पवार ने अब जो कुछ कहा है उससे महाराष्ट्र की राजनीति में नया तूफान आ गया है। अजित पवार ने पार्टी नेतृत्व से अपील की है कि वह उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी से मुक्त कर दें और उन्हें पार्टी संगठन में कोई भूमिका सौंपें। मुंबई में आयोजित, राकांपा के 24वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में अजित पवार ने यह मांग रखी। ताजा अटकलों को हवा देने वाली एक टिप्पणी में अजित पवार ने यह भी कहा है कि मुझे बताया गया है कि मैं नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सख्त व्यवहार नहीं करता हूं। पहले भी इस तरह की अटकलें लगती रही हैं कि अजित पवार पार्टी छोड़ सकते हैं। जब पिछले दिनों शरद पवार ने एकाएक राकांपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था तब अजित पवार ने उनके इस्तीफे का स्वागत भी किया था लेकिन बाद में पार्टीजनों के मनाये जाने पर शरद पवार ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया था। अजित पवार पिछले विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा के साथ जाकर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले चुके हैं। हालांकि वह सरकार चल नहीं पाई थी और फिर बाद में वह पार्टी में लौट आये थे और उद्धव ठाकरे की सरकार में राकांपा कोटे से कैबिनेट मंत्री बने थे।

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राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खोने के बाद पवार https://samacharpacheesa.com/?p=6737 Wed, 12 Apr 2023 08:17:33 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6737 राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने भले ही राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खो दिया हो, लेकिन इसेस उसके गढ़ महाराष्ट्र में चुनावी रूप से कोई फर्क पडऩे की संभावना नहीं है, जहां एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार सभी को स्वीकार्य हैं। एनसीपी का गठन 1999 में हुआ था। 2000 में इसने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के नियमों के अनुरूप राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल किया। ईसीआई ने 2014 और 2019 में अपने चुनावी प्रदर्शन के आधार पर एनसीपी की राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रद्द कर दिया और पार्टी को अब केवल महाराष्ट्र और नागालैंड में राज्य पार्टी का दर्जा प्राप्त होगा। एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि हम चुनाव आयोग के फैसले को स्वीकार करते हैं। हम चुनाव आयोग के आदेश का अध्ययन करेंगे और फिर विस्तार से जवाब देंगे। महाराष्ट्र में एनसीपी की राजनीतिक गठजोड़ और सरकार बनाने या तोडऩे की क्षमता हमेशा से रही है। 82 वर्षीय शरद पवार के नेतृत्व में एनसीपी ने अभूतपूर्व राजनीतिक प्रयोग किए हैं। एनसीपी राज्य के नेताओं ने 2024 के विधानसभा चुनाव में 288 सीटों में से 100 सीटों का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। पार्टी समान विचारधारा वाली कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) को महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के बैनर तले एक साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। 1999 के बाद से इसकी संख्या के चुनावों के बावजूद केंद्र और राज्य दोनों में पवार का प्रभाव कम नहीं हुआ है। नतीजतन, न तो सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) और न ही विपक्षी दल कांग्रेस और शिवसेना राकांपा को खारिज कर रहे हैं। हालांकि कांग्रेस और भाजपा राष्ट्रीय स्वीकारिता के साथ दो मुख्यधारा के राजनीतिक दल हैं, लेकिन जब विधानसभा चुनावों की बात आती है तो महाराष्ट्र में एनसीपी का चुनावी आधार अभी भी कायम है। 1999 में एनसीपी ने अपने गठन के बाद पहले विधानसभा चुनावों का सामना किया और 22.60 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 58 सीटें जीतीं। कांग्रेस 75 सीटों और 27.20 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। शिवसेना ने 69 सीटें (17.33 फीसदी वोट शेयर) और बीजेपी ने 56 सीटें (14.54 फीसदी वोट शेयर) जीतीं। पांच साल बाद एनसीपी ने 18.75 प्रतिशत के वोट शेयर के साथ 71 सीटों पर जीत हासिल करते हुए कांग्रेस पार्टी के रूप में पछाड़ दिया। प्रमुख पार्टी होने के बावजूद, पवार ने मुख्यमंत्री पद कांग्रेस को सौंप दिया। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार 1999 से 2014 तक चली। 2014 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस और एनसीपी के लिए एक झटका था। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में, भाजपा 288 में से 122 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। अपने वैचारिक मतभेदों के बावजूद, राकांपा ने महाराष्ट्र में भाजपा को समर्थन देने का वादा किया। यह एक ओर एनसीपी के भीतर फूट से बचने की रणनीति थी। दूसरे, बड़ा उद्देश्य शिवसेना को भाजपा से दूर रखना था। हालाँकि भाजपा और शिवसेना ने एकजुट होकर गठबंधन सरकार बनाई, लेकिन इस कदम ने दोनों के बीच कलह के बीज बो दिए। पांच साल बाद, 2019 में, यह उद्धव ठाकरे के भाजपा से नाता तोडऩे और एमवीए सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और एनसीपी में शामिल होने के रूप में सामने आया। चाहे 1999 का कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन हो या 2019 का कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना गठबंधन राज्य की राजनीति में नए राजनीतिक क्रमपरिवर्तन और संयोजन को विकसित करने में पवार फैक्टर हमेशा से प्रभावी रहा है।

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जेल में मुझे प्रस्ताव मिला था, लेकिन मैंने समझौता नहीं किया : अनिल देशमुख https://samacharpacheesa.com/?p=6241 Mon, 13 Feb 2023 06:25:28 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6241 नागपुर। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता एवं महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने रविवार को दावा किया कि उन्हें जेल में ऐसा प्रस्ताव मिला था, जिसे यदि मान लेता तो महा विकास आघाड़ी के नेतृत्व वाली सरकार काफी पहले गिर गई होती। देशमुख धनशोधन मामले में 13 महीने जेल में थे और वह जमानत पर हैं। देशमुख को नवंबर 2021 में गिरफ्तार किया गया था और उन्हें पिछले साल 28 दिसंबर को जमानत पर रिहा किया गया।
देशमुख ने वर्धा के सेवाग्राम में नदी एवं वन संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली ग्राम सभाओं एवं गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के सामूहिक वन अधिकारों के राज्य-स्तरीय सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने दावा किया, ‘‘मुझे जेल में प्रस्ताव मिला था, जिसे मैंने खारिज कर दिया। अगर मैं समझौता कर लेता (प्रस्ताव स्वीकार कर लेता) तो महा विकास आघाड़ी के नेतृत्व वाली सरकार ढाई साल पहले ही गिर गई होती, लेकिन मैं न्याय में विश्वास करता हूं, इसलिए मैंने रिहा होने का इंतजार किया।

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