लोकसभा चुनाव – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 25 Jul 2023 07:10:09 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 इंडिया का नामकरण तीसरे मोर्चे की ताकत https://samacharpacheesa.com/?p=7515 Tue, 25 Jul 2023 07:10:08 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7515 क्या जन्म के साथ ही नए अवतार वाले इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलायंस यानी इंडिया के नाम को लेकर विपक्ष के नेता असहज होने लगे हैं? क्या यह असहजता इतनी बढ़ेगी कि एक बार फिर से यह तीसरे मोर्चे की वजह बन जायेगी? यह सच है कि संयुक्त प्रजातांत्रिक गठबंधन यानी संप्रग का अंग्रेजी नामकरण इंडिया हिंदी पट्टी के नेताओं को कम लुभा रहा है। क्या यही एक वजह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बुजुर्ग लालू प्रसाद के साथ फाइनल बैठक से पहले ही बेंगलुरु से रवाना हो गए? इनकी तरह ही उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अपने चाचा प्रो. रामगोपाल के साथ गठबंधन के ऐलान वाली प्रेस कांफ्रेंस से पहले मंच से नदारद रहे। भारतीय जनता पार्टी को आगामी लोकसभा चुनाव में घेरने के लिए संयुक्त विपक्षी गठबंधन की यह दूसरी बैठक दक्षिण के राज्य कर्नाटक में थी। इसलिए यहां गठबंधन का अंग्रेजी नाम इंडिया रख पाना संभव हुआ। इस पर पड़ोसी तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश व बंगाल समेत पूर्वोत्तर राज्यों के नेताओं का तत्काल कोई ऐतराज उभरकर सामने नहीं आया। शायद यह विपक्षी एकता की पटना वाली पहली बैठक में संभव नहीं हो पाता। अंग्रेजी वाले नाम को लेकर हिंदी समर्थक नेताओं की असहजता स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में स्व. मुलायम सिंह की पूरी राजनीति प्रखर हिंदी समर्थक के बल पर खड़ी थी। कांग्रेस संग किसी चुनावी एलायंस की गंभीर पहल से बचते रहे अखिलेश यादव को इंडिया नाम कितना पसंद आया यह आने वाले दिनों में नजऱ आएगा। नाम को लेकर खड़ा होने वाला विवाद बढ़ा तो तत्काल इसका असर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में देखने को मिलेगा। ये तीनों राज्य इसी साल चुनावी परीक्षा से गुजरने वाले हैं और भाषाई लिहाज से हिंदी समर्थक हैं। गठबंधन के इस नए अवतार का नामकरण कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किया है इसलिए यह मुमकिन नहीं कि इस पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपनी कोई इतर राय रख पाएं। मगर यह पैबंद गठबंधन में शामिल किसी गैर कांग्रेसी नेता पर कतई लागू नहीं होता है। जहां तक बात एकमत होने की है तो यह समाजवादी पृष्ठभूमि के जनता परिवार वाले नेताओं पर कतई लागू नहीं होती। वैचारिक समाजवादियों को लेकर मशहूर प्रहसन है कि ये इक_ा होते ही बिखरने के लिए हैं। संप्रग की जगह इंडिया को जिन राज्यों में दिक्कत हो सकती है उसमें 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश, 40 सीटों वाला बिहार शामिल है। यानी कुल 120 सीटें हैं। इसी तरह अंग्रेजी नाम से असहज राज्यों में राजस्थान की 25, मध्य प्रदेश की 29 और छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटें यानि कुल 65 सीटें हैं। प्रखर भारतीय अस्मिता वाले राज्य तेलंगाना से लोकसभा की 17 सीटें हैं। बिहार से लगे हिंदीभाषी राज्य झारखंड से 14, हरियाणा से 10, दिल्ली से 7, उत्तराखंड से 5, हिमाचल से 4 सीटों के मतदाता संप्रग की जगह इंडिया वाले नामकरण से कैसे लुभाए जाएंगे इस चुनौती से एकजुटता में दरार को आशंका बनी रहेगी।
विपक्षी एकता की इस दूसरी बैठक से बिहार के नेताओं को कुछ ज्यादा ही उम्मीदें थीं। शायद इसलिए भी ज्यादा निराशा मिली। उम्मीद की वजह विपक्षी एकता के अग्रणी नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा से जुड़ी रही। गठबंधन के नए नामकरण की बजाय उनको लग रहा था कि इस बैठक में विपक्षी गठबंधन के संयोजक के नाम पर सहमति बनेगी। नीतीश कुमार स्वयं संयोजक के उम्मीदवार थे। राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी चाह रहे थे कि नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का ऑफर मिले। इससे बेटे तेजस्वी यादव के बिहार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता निकलेगा। मगर इस पर कोई निर्णायक घोषणा ही नहीं हुई। यही वजह है कि तीनों ने नाराज होकर विपक्ष के मंच से लोगों को संबोधित करने के आयोजकों के ऑफर को टाल दिया। साथ ही प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले बेंगलुरु छोड़ दिया। आयोजकों ने संयोजक बनाने के निर्णय पर पहुंचने के लिए ग्यारह नेताओं की कमेटी बनाने का फैसला लिया है। इंडिया की यह कमेटी महाराष्ट्र में होने वाली अगली बैठक में अपना निर्णय सुनाएगी। इस हाई पावर कमेटी के समक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबले के लिए विपक्ष से भावी प्रधानमंत्री के चेहरे के नाम पर विमर्श करने का दायित्व भी सौंपा गया है।
अंदरखाने की खबर है कि जनता परिवार के नेताओं ने कमेटी गठन की रणनीति को मेज़बान कांग्रेस का अडिय़ल और टालमटोल भरा रवैया माना है। बंगलुरू से जनता परिवार के नेताओं में उभरा यह विवाद ही तीसरे मोर्चा के गठन की वजह बन सकती है। वैसे भी बिहार में भाजपा विरोध में खड़े सत्तारूढ़ जनता दल यू और राजद में विलय की आशंका बार बार जताई जा रही है। इस विलय में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल, ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल आदि के शामिल होने का शिगूफा एकबार फिर से छोड़ा जा रहा है। वैसे भी पुराने जनता दल परिवार के घटकों को फिर एक होने की बात पुरानी है। मुलायम सिंह के दिनों में ही नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी जनता दल यू का समाजवादी पार्टी के साथ विलय करने का फैसला कर रखा था। वह अपनी पार्टी निशान तीर को छोड़ नए दल के किसी नए निशान पर चुनाव लडऩे की बात तब भी कर चुके थे, जब 2014 में उन्हें विपक्ष से प्रधानमंत्री पद का भावी उम्मीदवार होने की संभावना दिखी थी। मगर गैर कांग्रेसी दलों में कांग्रेस को साथ लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा संभव नहीं हो पाया तो विलय का प्रस्ताव किनारे रख लिया गया। राजनीति संभावनाओं का खेल है। इसी संभावना में नीतीश कुमार एक बार फिर साल भर से राजग यानी एनडीए के खिलाफ खड़े हैं। संप्रग जब इंडिया बन गया और नए नाम से जब इसकी पहली बैठक में नीतीश कुमार समेत जनता परिवार के नेताओं को अपेक्षित तवज्जो नहीं मिली है, तो विदेशी भाषा के विरोध के नाम पर ही सही तीसरे मोर्चे के गठन की गुंजाइश पैदा हो रही है। इस गुंजाइश में नीतीश की अगुआई में लालू, अखिलेश, नवीन पटनायक, जयंत, चौटाला आदि नेता फिट बैठते नजर आ रहे हैं।

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पार्टी बदली, गठबंधन बदला, नाम- नारा बदला https://samacharpacheesa.com/?p=7432 Thu, 20 Jul 2023 07:06:25 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7432 लोकसभा चुनाव 2024 के लिए तैयारियों का बिगुल बज गया है। नेताओं ने पार्टियां बदलना शुरू कर दिया है, पार्टियों ने गठबंधन बदलना शुरू कर दिया है और गठबंधनों ने नाम और नारे बदलना शुरू कर दिया है। हम आपको बता दें कि कांग्रेस ने 2004 में जिस संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानि यूपीए की स्थापना की थी उसका नाम बदल कर इंडिया कर दिया गया है। इस इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस विरोधी आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस भी शामिल हो गयी हैं। एक तरफ विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों की संख्या 26 तक पहुँच गयी है तो दूसरी और देश में पहली बार गठबंधन सरकार के प्रयोग को सफल बनाने वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल दलों की संख्या 39 तक पहुँच गयी है। अब, आगामी लोकसभा चुनावों को एनडीए बनाम इंडिया करार दिया जा रहा है। इंडिया गठबंधन वाले टैगलाइन दे रहे हैं- जीतेगा भारत तो दूसरी ओर एनडीए कह रहा है कि आजादी के शताब्दी वर्ष तक हमें विकसित, आत्मनिर्भर और मजबूत भारत बनाना है। यानि एक तरफ सिर्फ इंडिया है तो दूसरी ओर विकसित और आत्मनिर्भर भारत। आप जरा गौर करेंगे तो यह भी पाएंगे कि इस समय नेताओं, राजनीतिक पार्टियों और गठबंधनों की जोरदार तरीके से रि-ब्रांडिंग हो रही है, यानि आपको नये कलेवर में पुराना माल ही परोसा जा रहा है। जमाना बदला है तो राजनीतिक दलों ने भी अपना अंदाज बदला है इसीलिए आपको आजकल नेता बाइक ठीक करते, खेत में धान रोपते, गली के बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते, गरीब के बच्चों को गोद में उठाते, ढाबे पर खाना खाते और मेट्रो ट्रेन या अन्य सार्वजनिक परिवहन के साधनों में आम यात्रियों के साथ यात्रा करते हुए दिख जाएंगे। आलीशान जिंदगी जीने वाले सभी नेताओं का प्रयास है कि अपने को गरीब और वंचितों के बीच का ही दिखाया जाये ताकि चुनावों के समय मतदाता ध्यान रखे कि अमुक नेता तो हमारे जैसा ही है इसलिए यदि उसे सत्ता मिली तो वह हमारा ध्यान रखेगा। जरा बेंगलुरु में हुई विपक्ष की बैठक को देखिये। उस बैठक में देश के गरीबों, वंचितों और शोषितों के हित में मिलकर काम करने का निर्णय लिया गया। लेकिन गरीबों, वंचितों, शोषितों के बारे में चिंता करने के लिए बेंगलुरु आने के लिए सभी नेताओं ने चार्टर्ड प्लेन का इस्तेमाल किया। एनडीए की बैठक को देखेंगे तो यह भी राष्ट्रीय राजधानी के एक बड़े पांच सितारा होटल में हुई। इन बैठकों का खर्च भी लाखों रुपए में आया होगा। बात यदि पार्टियों और गठबंधनों के नये रंग-रूप की करें तो इससे भले इन नेताओं, पार्टियों और गठबंधनों को लाभ हो जाये लेकिन जनता के लिए कुछ नहीं बदलने वाला है। क्योंकि पार्टी या गठबंधन का नाम भले बदल जाये नेता तो वही रहेंगे। और जब नेता वही रहेंगे तो उनकी नीयत भी वही रहेगी। जब नीयत वही रहेगी तो देश की नियति भी वही रहेगी।

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भविष्य की राजनीतिक राह तय करेगा 2023 https://samacharpacheesa.com/?p=7022 Fri, 02 Jun 2023 07:28:03 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7022 नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 2014 में सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने हाल ही में अपने कार्यकाल के नौ साल पूरे किए। भाजपा सरकार के नौ साल की सफलता का इस साल होने वाले 9 राज्यों के विधानसभा चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, ये देखना दिलचस्प होगा। इसके साथ 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव भी भाजपा के कार्यकाल का मूल्यांकन करेंगे। हाल ही में इन 9 राज्यों में से एक राज्य कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और पार्टी प्रमुख ने कई रैलियां की। अंतिम दिनों में तो पार्टी ने अपनी हिंदूवादी छवि को सामने रखकर जय बजरंगबली का नारा तक लगवाया। लेकिन, बात जमी नहीं और भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। 2018 में जिस निर्वाचित कांग्रेस सरकार को भाजपा ने ऑपरेशन लोटस के तहत हासिल किया था, वापस कांग्रेस को सौंपना पड़ी। गौर करने वाली बात है कि पिछले साल उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अपनी हिंदू वादी छवि और भगवान श्रीराम के नाम पर सत्ता में वापसी की थी। लेकिन, कर्नाटक में बजरंगबली का नारा लगवाने के बावजूद पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इसका सीधा सा मतलब है, कि अब मतदाता हिंदुत्व की लहर पर सवार नहीं है। केंद्र की जगह राज्य के मुद्दे और वहां की परिस्थितियों और अपनी समस्याओं को देखकर ही वो वोट देता है। प्रधानमंत्री और पार्टी केंद्र में अपने 9 साल के राज्य शासन के दौरान किए गए तमाम कार्यों को जनता तक पहुंचाने में जुटे हैं। लेकिन, इस साल होने वाले 9 राज्यों के चुनाव, जिनमें कर्नाटक का परिणाम आ चुका है और शेष रहे मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय,नागालैंड और मिजोरम के चुनाव होना बाकी है। वहां के चुनाव नतीजे अगले लोकसभा चुनाव के लिए चुनौती बनेंगे या भाजपा का रास्ता साफ करेंगे, ये अभी देखना है। लेकिन, कर्नाटक से हुआ इसका आगाज भाजपा के लिए सुखद नहीं रहा। इससे पहले 2022 के अंत में हुए चुनावों में जहां भारतीय जनता पार्टी को अपने शासित एक राज्य हिमाचल प्रदेश से हाथ धोना पड़ा था। इस साल की शुरुआत में उसने अपने शासित एक राज्य कर्नाटक को भी खो दिया। जिन राज्यों में चुनाव होना है, उनमें छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, तो तेलंगाना में टीआरएस की सरकार। इन्हीं तीनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी चुनौती है। यहां शासित सरकारों पर अपना कब्जा करने की। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में भी 2018 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त खानी पड़ी थी। लेकिन, कांग्रेस से बगावत करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों के बल पर यहां शिवराज सिंह चौहान दोबारा सत्ता पर काबिज हो गए। कांग्रेसी यहां अपनी सरकार को पुन: हथियाने के लिए जोड़-तोड़ में जुटी है। वह भी उस समय, जब यहां शासित भारतीय जनता पार्टी सरकार में अंदरुनी कलह जोरों पर है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व कैलाश जोशी के पुत्र और सरकार में मंत्री रहे दीपक जोशी का भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर कांग्रेस में शामिल होना और कई भाजपाई नेताओं के पार्टी छोडऩे के कयासों के बीच कांग्रेस, गुटबाजी के बावजूद सरकार में आने को लालायित है। वहीं कर्नाटक के पड़ोसी राज्य तेलंगाना में भी जहां टीआरएस की सरकार है विधानसभा चुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावनाएं है।

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क्या एकजुट विपक्ष भाजपा को हरा पाएगा? https://samacharpacheesa.com/?p=6693 Sat, 01 Apr 2023 05:54:15 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6693 मल्लिकार्जुन खडग़े के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद विपक्षी एकता की संभावनाएं बढ़ी हैं। जो राजनीतिक दल राहुल गांधी को पसंद नहीं करते थे, वे भी अब मल्लिकार्जुन खडग़े की बुलाई बैठकों में आने लगे हैं। मल्लिकार्जुन खडग़े के घर पर हुई विपक्षी दलों की बैठक में 18 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया। लेकिन इन सारे राजनीतिक दलों की लोकसभा में हैसियत 144 सीटों की है। इनमें भी सिर्फ तीन दलों डीएमके, टीएमसी और जेडीयू की सीटें डबल डिजिट में है। बाकी सब सिंगल डिजिट वाले राजनीतिक दल हैं। लोकसभा में 9 सीटों वाली भारत राष्ट्र समिति और 4 सीटों वाली शरद पवार की एनसीपी को भी जोड़ लें तो कांग्रेस समेत इन सभी दलों की हैसियत 127 दलों की है। बाकी 12 दलों के सिर्फ 17 सांसद हैं। तीन पार्टियों का एक एक सांसद है, चार पार्टियों के सांसद ही नहीं हैं। सबसे पहले लोकसभा में 22 सीटों वाली वाईआरएस कांग्रेस, 12 सीटों वाला बीजू जनता दल और 10 सीटों वाली बहुजन समाज पार्टी। तीन सीटों वाली तेलुगु देशम पार्टी, 2 सीटों वाला अकाली दल। पचास सीटों के साथ ये पांच दल अभी तटस्थ हैं। जहां तक शिवसेना का सवाल है, तो शिवसेना के 19 में से 15 सांसद वापस भाजपा के साथ जा चुके हैं। उद्धव ठाकरे के साथ लोकसभा के चार और राज्यसभा के तीन सांसद बचे हैं, लेकिन उद्धव ठाकरे की बची-खुची शिव सेना ने भी वीर सावरकर के मुद्दे कांग्रेस का बायकाट कर दिया है। राहुल गांधी की राजनीति नासमझी के हर रोज नए सबूत सामने आ जाते हैं। खुद को गांधी बता कर और वीर सावरकर को माफी मांगने वाला बता कर राहुल गांधी ने उस उद्धव ठाकरे को भी नाराज कर लिया, जो भाजपा का साथ छोड़कर उनके साथ आए थे। यह जो 18 दलों का ढिंढोरा पीता जा रहा है, उसकी सच्चाई क्या है। क्या आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति पुरानी बातें भुलाकर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करेंगी। क्या समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी। ये चारों दल गैर भाजपा, गैर कांग्रेस की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 80 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है और दूसरी सूची भी जारी होने वाली है। इसी तरह तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कर्नाटक में कांग्रेस को हराने के लिए जेडीएस के पक्ष में प्रचार करने का एलान किया है, और जेडीएस मल्लिकार्जुन खडग़े की बुलाई बैठक में शामिल नहीं थी। जिस समय मल्लिकार्जुन खडग़े के घर पर बैठक चल रही थी, उसी समय ममता बनर्जी और कुमारस्वामी कर्नाटक में कांग्रेस को निपटाने की रणनीति बना रहे थे। इसलिए मल्लिकार्जुन खडग़े के घर पर हुई बैठक के 144 सांसदों में से तृणमूल कांग्रेस, बीआरएस और समाजवादी पार्टी के 35 सांसद निकाल दीजिए, यानी कुल मिला कर 109 लोकसभा सांसदों के दलों की बैठक थी, 35 सांसदों के दल सिर्फ सहानुभूति प्रकट करने गए थे।

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लोकसभा चुनावों में जीत के लिए भाजपा के निशाने पर होंगे केजरीवाल https://samacharpacheesa.com/?p=5943 Sat, 28 Jan 2023 07:43:50 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5943 नईदिल्ली। लोकसभा चुनाव 2019 में दिल्ली की सभी सातों सीटों पर भाजपा की लड़ाई कांग्रेस से हुई थी। दिल्ली विधानसभा चुनावों में लगातार दो बार (2015 और 2020 में) शून्य पर सिमट गई कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2019 में गजब की वापसी की थी और वह सभी सीटों पर नंबर दो पर रही थी। लेकिन इस चुनाव परिणाम को एक तरफ रखते हुए भाजपा मान रही है कि अगले लोकसभा चुनाव में उसका मुख्य सामना आम आदमी पार्टी से होगा। इसे ध्यान रखते हुए पार्टी ने अब अरविंद केजरीवाल सरकार पर हमला करने की रणनीति बनाई है।
दिल्ली भाजपा के पंत मार्ग स्थित कार्यालय पर दो दिवसीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के शीर्ष नेताओं ने कार्यकर्ताओं को बताया कि किस प्रकार उन्हें नगर निगम चुनावों में आम आदमी पार्टी के सामने मिली मजबूती को बनाए रखना है और उन्हें बूथ स्तर तक केजरीवाल पर हमला करना है। इसके लिए दिल्ली सरकार की नाकामियों को जनता के बीच रखना है। साथ ही केंद्र सरकार के कार्यों को हर एक व्यक्ति तक पहुंचाना है। इसके लिए हर बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुखों के नेतृत्व में व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर केंद्र सरकार के कार्यों की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की बात कही गई है।
बैठक में उपस्थित भाजपा के एक नेता ने  बताया कि पार्टी यह मानती है कि अगले लोकसभा में उसका मुकाबला कांग्रेस से नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी से हो सकता है। इसका बड़ा कारण है कि इस बार कांग्रेस के पास शीला दीक्षित जैसा करिश्माई और चुंबकीय चेहरा मौजूद नहीं होगा, जिसका लाभ उसे 2019 के चुनावों के दौरान मिला था।
पार्टी नेता मानते हैं कि नगर निगम चुनाव के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता आम आदमी पार्टी से टूटकर कांग्रेस की तरफ गए हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह अपने इस कोर वोट बैंक के सहारे दिल्ली में वापसी कर सकती है, लेकिन भाजपा नेताओं का मानना है कि जब मुस्लिम मतदाताओं के सामने भाजपा को हराने की क्षमता में कौन उम्मीदवार या पार्टी है, यह प्रश्न आएगा तो मुस्लिम मतदाता आम आदमी पार्टी की ओर लौट सकता है। इससे आम आदमी पार्टी एक बार फिर मुकाबले में मजबूत हो सकती है।
कार्यकर्ता नहीं, कार्य प्रमुख
दिल्ली भाजपा प्रभारी बैजयंत पांडा ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा है कि जनता का वोट कार्यकर्ताओं के कारण कम और जनता के लाभ के लिए किए गए कार्यों के कारण ज्यादा आता है। लिहाजा कार्यकर्ताओं को केंद्र सरकार के कार्यों की जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचानी चाहिए।
हर मतदाता तक पहुंचें कार्यकर्ता
दिल्ली भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने कहा है कि कार्यकर्ता दिल्ली के हर एक मतदाता तक पहुंचें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों को ध्यान में रखते हुए पार्टी कार्यकर्ता हर समुदाय, हर वर्ग के हर मतदाता तक पहुंचें। चाहे वे भाजपा को वोट देते हों, या नहीं।
इसके लिए विशेष अभियान चलाकर दिल्ली के हर वार्ड के हर मतदाता तक पहुंचने की योजना बनाई जाएगी। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य दिल्ली की सभी सातों सीटों पर जीत दर्ज करना मात्र नहीं है, बल्कि वे जीत के अंतर को बढ़ाने के लिए काम करेंगे। भाजपा ने पिछली बार दिल्ली की सभी सीटों पर आधे से ज्यादा वोट शेयर हासिल कर एकतरफा जीत हासिल की थी।

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