विधेयक – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 18 Apr 2023 08:42:39 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 प्रदेश में आरक्षण कोटे पर भ्रम https://samacharpacheesa.com/?p=6759 Tue, 18 Apr 2023 08:42:39 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6759 मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार ने प्रदेश में विभिन्न वर्गों को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने के लिए विधानसभा में एक विधेयक पारित कराया है। इस विधेयक के अनुसार अनुसूचित जनजाति वर्ग को 32 प्रतिशत, ओबीसी को 27, अनुसूचित जाति को 13 और ईडब्ल्यूएस को 4 प्रतिशत देने का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक अभी राज भवन से अनुमति की प्रतीक्षा में अटका हुआ है। इधर मुख्यमंत्री ने सोमवार को एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पारित आरक्षण संशोधन विधेयक को संविधान की 9वीं अनुसुची में शामिल किया जाए। इस प्रश्न के बाद आरक्षण कोटे को लेकर भ्रम और गहरा गया है। एक बात तो तय है कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव को 8 महीने का समय भी नहीं बचा है। ऐसी स्थिति में आरक्षण कोटे में बढोत्तरी का लाभ कांग्रेस पार्टी को चाहिए तो किसी हाल में विधेयक को स्वीकृत कराकर लागू कराना होगा। कांग्रेस को इस बात का भी भय है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव में नुकसान हो सकता है। गत वर्ष सितंबर में प्रदेश में लागू 58 प्रतिशत आरक्षण कोटा और तृतीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती के लिए अनुसुचित क्षेत्रों में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण के प्रावधान को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इस बात से प्रदेश के जनजातिय युवाओं में खासी नाराजगी हुई थी। यह नाराजगी कोटा नहीं बढऩे के कारण चुनाव में बरकरार रह सकती है। वैसे अभी पिछले छ: महीनों से नई भर्ती के लिए विज्ञापन शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश परीक्षा और अनेक संपन्न हुई परीक्षाओं के परिणाम पर रोक लगी हुई है। इस वजह से भी युवा परेशान और नाराज है। राज्यपाल आरक्षण विधेयक पर कोई निर्णय लेने से पहले सर्वोच्च न्यायालय में लंबित इस मामले की सुनवाई और निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे है। दूसरी ओर विधानसभा ने भी पारित आरक्षण कोटा कानून को संविधान की 9वीं अनुसुची में डालने का अशासकीय संकल्प पारित किया है। अब मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री को इस बारे में पत्र लिखना समझ से परे है। कुछ दिन पूर्व मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली गए थे और बताया गया कि दोनों के बीच अनेक विषयों पर बात भी हुई लेकिन प्रधान मंत्री से बात करते हुए क्या मुख्यमंत्री ने प्रदेश के आरक्षण विधेयक के संबंध में कोई चर्चा की थी क्या? देशभर में किसी भी राज्य को आरक्षण कोटा 50 प्रतिशत से अधिक करने की अनुमति नहीं है। मुख्यमंत्री ने पत्र में ईडब्ल्यूएस वर्ग को 10 प्रतिशत का कोटा देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आधार बनाकर प्रधानमंत्री से प्रदेश में कोटा बढ़ाने का अनुरोध किया है,जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने ईडब्ल्यूएस के 10 प्रतिशत कोटा को सामान्य वर्ग के अधीन रखा है। प्रदेश में अगर गरीबी बहुत ज्यादा है तो यह राज्य द्वारा गठित क्वंटीफायबल डेटा आयोग की रिपोर्ट में भी प्रकट हुई होगी, अगर ऐसा है तो पारित विधेयक में ईडब्ल्यूएस का कोटा केवल 4 प्रतिशत क्यों रखा गया? उसे 10 प्रतिशत किया जाना था। कुल मिलाकर प्रदेश में आरक्षण कोटे को लेकर राजनीति हो रही है और इससे युवा बेरोजगार भ्रम की स्थिति में है। इस भ्रम को दूर करना जरूरी है नहीं तो इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ सकता हैं।

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विधानसभा में कामकाज ठप https://samacharpacheesa.com/?p=5624 Wed, 04 Jan 2023 05:56:27 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5624 संसदीय लोकतंत्र में विधानसभा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। छत्तीसगढ़ विधानसभा का शीतकालीन सत्र दो हिस्सों में बंट गया जिसका पहला हिस्सा विशेष सत्र के रुप में 2 दिसम्बर को आहूत किया गया। एक लंबे अवकाश के बाद सोमवार 2 जनवरी से पुन: प्रारंभ हुआ। 1 माह पूर्व विधानसभा में आरक्षण का विधेयक पारित किया गया था जिस पर राज्यपाल की अनुमति नहीं मिल पायी है। इस मुद्दे पर सदन में जमकर हंगामा हो रहा है। पहले और दूसरे दिन बमुश्किल प्रश्नकाल ही संपन्न हो सका, जबकि विधानसभा की कार्य सूची में अनेक महत्वपूर्ण राजकीय कार्य का उल्लेख किया गया था। मंगलवार को 2 विधेयक सदन के पटल पर रखा जाना था जिसमें छत्तीसगढ़ जुआ प्रतिषेध विधेयक और अनाधिकृत विकास का नियमितीकरण का संशोधन विधेयक था। आरक्षण विषय पर हंगामा होने के कारण विधेयक प्रस्तुत नहीं किए जा सके। ध्यानाकर्षण पर भी चर्चा नहीं हो सकी। प्रश्नोत्तरी शांतिपूर्ण आज संपन्न हुआ। विधानसभा में विभिन्न विषयों पर चर्चा की जाती। राज्य में अनेक ऐसे मुद्दे है जिस पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। धर्मान्तरण को लेकर बस्तर जल रहा है। अगर इस पर फौरी तौर पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। इस विषय पर अगर विधानसभा में चर्चा हो तो इसके सुखद परिणाम निकल सकते है। वैसे तो विपक्ष ने प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था पर स्थगन लेकर आए थे लेकिन उसकी अनुमति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नहीं दी गई। इस विषय पर अगर स्थगन प्रस्ताव के जरिए चर्चा हो जाती तो समस्या की महत्वपूर्ण बिन्दु सामने आती। स्थगन पर जब चर्चा अस्वीकृत कर दी गई तब भाजपा के सदस्य गर्भगृह में आकर स्वमेव निलंबित हो गए। इन सब हंगामे के बीच में दिनभर के लिए सभा की कार्रवाई स्थगित कर दी गई। स्थगित तो इसलिए भी हो गयी क्योंकि कांग्रेस पार्टी का जन अधिकार रैली का आयोजन राजधानी में किया गया था, जिसमें कांग्रेस पार्टी के मंत्रियों और विधायकों को शामिल होना था। इस प्रकार जो चर्चा विधानसभा के सदन में हो सकती है उसे सार्वजनिक तौर पर रैली के माध्यम से करना विधानसभा के प्रति कम होती आस्था को दर्शाता है। विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान भी बार-बार विधानसभा अध्यक्ष की ओर से यह हिदायत मंत्रियों को दी जा रही है कि वे तैयारी कर सदन में आए। इसका मतलब है कि मंत्री विधानसभा की कार्रवाई को लेकर गंभीर नहीं है। संसदीय लोकतंत्र के मंदिर के प्रति निर्वाचित प्रतिनिधियों की आस्था कम होगी तो यह लोकतंत्र को कमजोर करेगा।

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राजभवन के सवाल सरकार के जवाब https://samacharpacheesa.com/?p=5500 Thu, 29 Dec 2022 06:16:08 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5500 प्रदेश में विभिन्न वर्गों को आरक्षण का कोटा बढ़ाने संबंधी विधेयक विधानसभा में पास होकर राजभवन में राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए अटका हुआ है। यह विधेयक उस विषय पर है जिसे उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण का कोटा बढऩे के कारण आदिवासियों को दिया गया 32 प्रतिशत का आरक्षण अवैध है। स्वाभाविक है जब 58 प्रतिशत को कोर्ट ने खारिज कर दिया तो विधानसभा से पारित 76 प्रतिशत के आरक्षण कोटे को न्यायालय कैसे स्वीकृति देगा? यही सवाल राजभवन पैदा हुआ और इसका जवाब देने के लिए सरकार तक भेजा गया। राजभवन के द्वारा विधेयक पर सवाल किए जाने पर राजनीति शुरु हो गयी। सरकार की ओर से राजभवन के विरुद्ध टिप्पणियां होने लगी, यहां तक के उस विधि विशेषज्ञ पर सवाल भी सवाल दागे गए और इस प्रक्रिया को गैर संवैधानिक बताया गया। कांग्रेस पार्टी ने विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं करने का विरोध करते हुए 3 जनवरी से पूरे प्रदेश में आंदोलन करने की भी घोषणा कर दी है। इसका मतलब है कि सरकार जिनके द्वारा बनाई गई है, उसी सरकार की पार्टी अपने मुखिया के विरुद्ध आंदोलन करेगी। यह भी हुआ कि सरकार 10 सवालों का जवाब दे देगी और मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि जवाब राजभवन को भेज दिए गए है। ऐसी जानकारी मिल रही है कि जवाब के नाम पर कोई तथ्यात्मक जानकारी सरकार की ओर से राजभवन को नहीं दिए गए है। यहां से कई सवाल खड़े होते है पहला तो यह कि किसी विधेयक पर हस्ताक्षर कब करेगी यह संविधान में नहीं लिखा है और राज्यपाल को दस्तखत करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह है कि क्या राजभवन के पास किसी विधेयक से संबंधित सवाल पूछने का अधिकार है? एक बात तो तय है कि राज्यों में नियुक्त राज्यपाल के पास संवैधानिक विशेषाधिकार होते है। इस विशेषाधिकार के तहत वह अपनी सरकार से किसी भी विषय पर सवाल पूछ सकती है और सवाल पूछे भी है तो उस पर आपत्ति क्यों होना चाहिए। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को खंडित करना क्या सरकार के लिए उचित होगा? पूरे प्रकरण में एक बात तय है कि आरक्षण का विधेयक नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में जनजाति और पिछड़े वर्ग को लाभ देने के लिए लाया गया है और संभावना यह है कि मामला न्यायालयीन प्रक्रियाओं में उलझेगा। कोशिश यही होगी जैसे-तैसे चुनाव तक मामले को लटकाया जाए।

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