विपक्षी एकता – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Wed, 19 Jul 2023 06:59:44 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 कांग्रेस की कुर्बानी मजबूरी या बड़प्पन? https://samacharpacheesa.com/?p=7410 Wed, 19 Jul 2023 06:59:43 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7410 2024 चुनाव को लेकर सरगर्मियां लगातार बढ़ती जा रही है। चुनाव में 1 साल से भी कम का वक्त है। ऐसे में इसको लेकर राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। वर्तमान में देखें तो ऐसा लगता है कि आगामी चुनाव एनडीए बनाम विपक्षी एकता रहने वाला है जिससे इंडिया का नाम दिया जा रहा है। आज की बेंगलुरु की बैठक से कई बड़े संदेश भी निकले हैं। इस बैठक पर पूरे देश की नजर थी। बैठक में 26 दलों के प्रमुख शामिल हुए। बैठक के बाद कहीं ना कहीं लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्षी दलों के राजनीति साफ तौर पर दिखाई देने लगी है। आज की बैठक के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने एक ऐसा बयान दिया है जिसके बाद कांग्रेस की कुर्बानी के चर्चे हो रहे हैं। विपक्ष की बैठक में खरगे ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष और पार्टी नेता पुराने सहयोगियों से समझौता करने के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य दौड़ लगा रहे। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि कांग्रेस को सत्ता या प्रधानमंत्री पद में कोई दिलचस्पी नहीं। हमारा इरादा अपने लिए सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय की रक्षा करना है। खड़के के बयान से इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस ने पहले ही प्रधानमंत्री पद से अपनी दावेदारी छोड़ दी है? इसे कांग्रेस की कुर्बानी भी समझी जा रही है। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ने यह कुर्बानी दी या फिर आत्मसमर्पण किया? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भविष्य को देखते हुए कांग्रेस की ओर से यह राजनीतिक सौदेबाजी है। कांग्रेस फिलहाल विपक्षी दलों को अपने भरोसे में रखना चाहती है। कांग्रेस यह नहीं चाहती कि 2024 चुनाव से पहले विपक्षी एकता में किसी भी तरह का रोड़ा उत्पन्न हो। कांग्रेस को अच्छे से पता है कि मिल बैठकर बात कर लेने भर से ही सारे मसले का हल नहीं निकलेगा, गठबंधन की असली परीक्षा सीट बंटवारे को लेकर होगी। ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी की ओर से दावा किया जा रहा है कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत है वहां कांग्रेस को मैदान खाली कर देना चाहिए। भविष्य में सीटों के बंटवारे में अड़चन ना आए इसलिए अभी से ही कांग्रेस ने अपना नरम रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस को यह बात अच्छे से पता है कि अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी जैसे नेताओं से डील नरम रुख के आधार पर ही हो सकता है। तेवर रखने पर मामला बिगड़ सकता है। कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है। सभी राज्यों में इसकी मौजूदगी है। ऐसे में कांग्रेस को यह लगता है कि अगर वह सबसे ज्यादा सीट जीत जाती है तो प्रधानमंत्री पद उसके पास से कहीं और नहीं जाएगा। यही कारण है कि सीट शेयरिंग के फार्मूले को लेकर कांग्रेस थोड़ा नाम रख रही है। कांग्रेस ने अभी से ही यह कुर्बानी इसलिए भी देनी शुरू कर दी है ताकि क्षेत्रीय दल भी जरूरत पडऩे पर कांग्रेस के लिए कुर्बानी दे सकें।

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फंसेगा विपक्षी एकता का पेंच https://samacharpacheesa.com/?p=7136 Sat, 24 Jun 2023 08:36:36 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7136 भाजपा के खिलाफ 15 से ज्यादा दल इका होने की मुहिम में शामिल हुए हैं। हालांकि, इनमें से ज्यादातर राजनीतिक दल वे हैं जिन्होंने कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई लड़ कर अपने अस्तित्व को खड़ा किया है। चाहें इस बैठक की मेजबानी कर रहे नीतीश कुमार की पार्टी जदयू हो या फिर लालू यादव की पार्टी राजद, अखिलेश यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी या फिर अन्य दल हो। 2024 चुनाव को लेकर अभी से ही सभी पार्टियों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। हालांकि, ऐसा लग रहा है कि आगामी 2024 का चुनाव भाजपा के लिए एक चुनौती भरा हो सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि 15 से अधिक दलों की बिहार की राजधानी पटना में एक बड़ी बैठक हुई। इस बैठक में भाजपा को हराने की रणनीति पर चर्चा हुई। साथ ही साथ भाजपा के खिलाफ सभी दल एकजुट होकर कैसे काम कर सके, इस पर भी रणनीति बनी। हालांकि, यह बात भी सच है कि सभी दलों के अपने-अपने एजेंडे हैं और सभी उन्हीं पर आगे बढऩा चाहते हैं। बड़ा सवाल यह है कि 2024 के लिए सभी दल एक प्लेटफार्म पर तो आ गए हैं लेकिन क्या यह उतना एकजुट रह पाएंगे जितना ये तस्वीरों में दिख रहे हैं? भाजपा के खिलाफ 15 से ज्यादा दल इका होने की मुहिम में शामिल हुए हैं। हालांकि, इनमें से ज्यादातर राजनीतिक दल वे हैं जिन्होंने कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई लड़ कर अपने अस्तित्व को खड़ा किया है। चाहें इस बैठक की मेजबानी कर रहे नीतीश कुमार की पार्टी जदयू हो या फिर लालू यादव की पार्टी राजद, अखिलेश यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी या फिर अन्य दल हो। आज की बैठक में कुछ ऐसे दल भी शामिल हुए हैं जो शुरू से ही कांग्रेस के लगातार विरोधी रहे हैं जिसमें उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस शामिल है। सभी पार्टियों के एक दूसरे से मतभेद है। लेकिन सभी भाजपा के खिलाफ एकजुट होने की पहल में शामिल हो रहे हैं। जानकारी के मुताबिक बैठक में साझा कार्यक्रम पर भी जोड़ दिया गया है। हाल के दिनों में देखें तो राजनीतिक दंगल विपक्षी दलों के बीच भी जारी है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर जबरदस्त तरीके से हमलावर है। इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ममता सरकार के खिलाफ धरने पर ही बैठ गए हैं। बैठक में ममता बनर्जी ने इस पर नाराजगी भी जताई। कांग्रेस पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार पर लगातार हिंसा के आरोप लगा रही है। वहीं, हाल में ही अरविंद केजरीवाल ने राजस्थान में एक चुनावी जनसभा के दौरान कांग्रेस पर निशाना साधते हुए अशोक गहलोत की सरकार को भ्रष्टाचार में डूबा हुआ बता दिया। दिल्ली में अध्यादेश को लेकर केजरीवाल लगातार कांग्रेस पर हमलावर है। उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि जब हमें 370 पर कई दलों से समर्थन चाहिए था, तब कुछ दल खुशी मना रहे थे। सवाल यह भी है कि 15 से ज्यादा राजनीतिक दल एक साथ तो हुए हैं लेकिन क्या इनके वोट बैंक एक दूसरे को ट्रांसफर होंगे?

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कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाना चाहिए https://samacharpacheesa.com/?p=6983 Thu, 25 May 2023 08:08:17 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6983 कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम से कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों की एकता को बल मिला है। राज्य में कांग्रेस की यह सबसे बड़ी जीत कही जा सकती है क्योंकि उसे 1989 के बाद से सबसे अधिक 42.9 प्रतिशत वोट मिला है, वहीं भाजपा ने 36 प्रतिशत वोट ही प्राप्त किया है। कांग्रेस की तरफ से सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने से जनता ने उसे शानदार बहुमत देकर भाजपा को एक सबक देने की कोशिश की है। कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय की बैटिंग करके कांग्रेस के पुराने चरित्र को बदलने का प्रयास किया है। ऐसा नहीं है कि ऐसा इस चुनाव से शुरू किया गया है, बल्कि इसकी नींव रायपुर में कांग्रेस के 85वें अधिवेशन में अनुसूचित जाति, आदिवासी, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के लिए कांग्रेस प्रतिनिधियों और सभी पदों पर 50 फीसदी आरक्षण की घोषणा के रूप में पड़ी थी। इस मुद्दे को तब और बल मिला, जब ‘मोदी सरनेमÓ वाले बयान पर राहुल गांधी को सूरत की अदालत ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अपमान करने का दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनायी, जिससे उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द हो गयी। भाजपा ने राहुल गांधी पर ओबीसी के अपमान को लेकर हमले किये और इसी हमले को कांग्रेस ने कर्नाटक में सियासी हथियार बनाया। राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं में जातिगत जनगणना की मांग कर ‘जितनी आबादी, उतना हकÓ की वकालत कर इस नारे को असमानता से जोडऩे का सफल प्रयास किया। ठीक ऐसा ही नारा समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया देते थे- ‘पिछड़ा पावे सौ में साठÓ यानी राजनीति में हिस्सेदारी हो या संसाधनों पर अधिकार, पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी 60 फीसदी होनी चाहिए। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम का नारा था- ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। सामाजिक न्याय और समता के सवाल एक बार पुन: राष्ट्रीय राजनीति के विमर्श बदल रहे हैं। सामाजिक न्याय और जातिगत जनगणना के मुद्दे पर नीतीश कुमार देश के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे हैं। बिहार में हो रहे जातिगत सर्वेक्षण को पटना उच्च न्यायालय ने रोक दिया है, लेकिन जातिगत जनगणना के मुद्दे ने संपूर्ण विपक्ष को एक मंच पर लाने का काम अवश्य किया है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर लडऩे की जमीन भी कर्नाटक चुनाव ने तैयार कर दी है। इन मुद्दों के सूत्रधार नीतीश कुमार हैं। विभिन्न राज्यों के लगभग एक दर्जन से अधिक क्षेत्रीय पार्टियां जातिगत जनगणना कराने की मांग लंबे समय से कर रही हैं। इनमें डीएमके, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जेडीयू आदि प्रमुख हैं। देश में 1931 से अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की जाति की गणना होती आ रही है, इसलिए शेष जातियों की गणना भी बहुत जरूरी है। यदि कोई जाति सामाजिक संरचना में वंचना का शिकार है, तो उसे मुख्यधारा में लाने के लिए अतिरिक्त अवसर मुहैया कराया जाना चाहिए। ओबीसी वर्ग में कई जातियों को लंबे समय से सामाजिक अन्याय का शिकार होना पड़ा है।
कुछ जातियां सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से इतनी कमजोर हैं कि उनकी स्थिति दलित जातियों से भी अधिक खराब है। अत्यंत पिछड़ी जातियों के संदर्भ में मंडल आयोग के एकमात्र दलित सदस्य एलआर नाइक के असहमति नोट को पुन: देखने की जरूरत है, जिसमें उन्होंने ओबीसी आरक्षण को दो बराबर प्रमुख भागों में बांटने का सुझाव दिया था। उनका मानना था कि ओबीसी के अंदर एक खेतिहर वर्ग है और दूसरा वर्ग उन जातियों का है, जो कारीगरी, शिल्पकारी, बागवानी कर जीवनयापन करती हैं। ये जातियां अधिकांशत: भूमिहीन हैं और नब्बे के दशक में वैश्वीकरण के बाद इनकी स्थिति और बदतर होती गयी क्योंकि बाजार और तकनीक ने इनकी रोजी-रोटी की संभावनाओं को लगभग शून्य कर दिया। यही कारण है कि अब तक 10 राज्यों ने ओबीसी आरक्षण को दो या दो से अधिक भागों में बांटने की जरूरत समझी। इससे उन राज्यों में अति पिछड़ी जातियों की राजनीतिक एवं शैक्षणिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। इनमें प्रमुख रूप से तमिलनाडु और बिहार हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कर्पूरी मॉडल को लागू कर अति पिछड़ी जातियों को एक नयी राजनीतिक दिशा प्रदान की है।
भाजपा के लगातार चुनाव जीतने का प्रमुख कारण अति पिछड़ी जातियां हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अवश्य कर्नाटक में ओबीसी के हित में होने वाली नीतियों की पहचान कर ली और सामाजिक न्याय के मुद्दों को उछाल कर तमाम क्षेत्रीय दलों को लोकसभा चुनाव एक साथ लडऩे का आत्मविश्वास पैदा कर दिया है, लेकिन कांग्रेस अभी भी इन अति पिछड़ी जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल से अनभिज्ञ नजर आ रही है। क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस को अति पिछड़ी जातियों के समावेशी प्रतिनिधित्व के सवालों पर सोचने की जरूरत है तथा कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाते हुए क्षेत्रीय पार्टियों को उचित स्थान देने की जरूरत है ताकि भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में हराया जा सके।

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क्या एकजुट विपक्ष भाजपा को हरा पाएगा? https://samacharpacheesa.com/?p=6693 Sat, 01 Apr 2023 05:54:15 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6693 मल्लिकार्जुन खडग़े के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद विपक्षी एकता की संभावनाएं बढ़ी हैं। जो राजनीतिक दल राहुल गांधी को पसंद नहीं करते थे, वे भी अब मल्लिकार्जुन खडग़े की बुलाई बैठकों में आने लगे हैं। मल्लिकार्जुन खडग़े के घर पर हुई विपक्षी दलों की बैठक में 18 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया। लेकिन इन सारे राजनीतिक दलों की लोकसभा में हैसियत 144 सीटों की है। इनमें भी सिर्फ तीन दलों डीएमके, टीएमसी और जेडीयू की सीटें डबल डिजिट में है। बाकी सब सिंगल डिजिट वाले राजनीतिक दल हैं। लोकसभा में 9 सीटों वाली भारत राष्ट्र समिति और 4 सीटों वाली शरद पवार की एनसीपी को भी जोड़ लें तो कांग्रेस समेत इन सभी दलों की हैसियत 127 दलों की है। बाकी 12 दलों के सिर्फ 17 सांसद हैं। तीन पार्टियों का एक एक सांसद है, चार पार्टियों के सांसद ही नहीं हैं। सबसे पहले लोकसभा में 22 सीटों वाली वाईआरएस कांग्रेस, 12 सीटों वाला बीजू जनता दल और 10 सीटों वाली बहुजन समाज पार्टी। तीन सीटों वाली तेलुगु देशम पार्टी, 2 सीटों वाला अकाली दल। पचास सीटों के साथ ये पांच दल अभी तटस्थ हैं। जहां तक शिवसेना का सवाल है, तो शिवसेना के 19 में से 15 सांसद वापस भाजपा के साथ जा चुके हैं। उद्धव ठाकरे के साथ लोकसभा के चार और राज्यसभा के तीन सांसद बचे हैं, लेकिन उद्धव ठाकरे की बची-खुची शिव सेना ने भी वीर सावरकर के मुद्दे कांग्रेस का बायकाट कर दिया है। राहुल गांधी की राजनीति नासमझी के हर रोज नए सबूत सामने आ जाते हैं। खुद को गांधी बता कर और वीर सावरकर को माफी मांगने वाला बता कर राहुल गांधी ने उस उद्धव ठाकरे को भी नाराज कर लिया, जो भाजपा का साथ छोड़कर उनके साथ आए थे। यह जो 18 दलों का ढिंढोरा पीता जा रहा है, उसकी सच्चाई क्या है। क्या आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति पुरानी बातें भुलाकर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करेंगी। क्या समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी। ये चारों दल गैर भाजपा, गैर कांग्रेस की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 80 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है और दूसरी सूची भी जारी होने वाली है। इसी तरह तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कर्नाटक में कांग्रेस को हराने के लिए जेडीएस के पक्ष में प्रचार करने का एलान किया है, और जेडीएस मल्लिकार्जुन खडग़े की बुलाई बैठक में शामिल नहीं थी। जिस समय मल्लिकार्जुन खडग़े के घर पर बैठक चल रही थी, उसी समय ममता बनर्जी और कुमारस्वामी कर्नाटक में कांग्रेस को निपटाने की रणनीति बना रहे थे। इसलिए मल्लिकार्जुन खडग़े के घर पर हुई बैठक के 144 सांसदों में से तृणमूल कांग्रेस, बीआरएस और समाजवादी पार्टी के 35 सांसद निकाल दीजिए, यानी कुल मिला कर 109 लोकसभा सांसदों के दलों की बैठक थी, 35 सांसदों के दल सिर्फ सहानुभूति प्रकट करने गए थे।

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केसी वेणुगोपाल ने विपक्षी एकता पर दिया जोर https://samacharpacheesa.com/?p=6345 Mon, 20 Feb 2023 08:08:38 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6345 नईदिल्ली। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सोमवार को विपक्षी एकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी सरकार से अकेले नहीं लड़ सकती। दरअसल, 2024 चुनाव को लेकर अब राजनीतिक दल अपनी अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। 2024 में भाजपा पहले ही दावा कर चुकी है कि उसके प्रधानमंत्री पद के चेहरा नरेंद्र मोदी ही होंगे। लेकिन विपक्ष की ओर से चेहरा कौन होगा, इसको लेकर अभी भी सब के अलग-अलग दावे हैं। वहीं, केसी वेणुगोपाल से भारत जोड़ो यात्रा में कुछ विपक्षी दलों के नहीं आने पर सवाल पूछा गया था। इसी सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कांग्रेस अकेले इस सरकार से नहीं लड़ सकती।
केसी वेणुगोपाल ने अपने बयान में कहा कि विपक्षी एकता के लिए हमारा प्रयास बहुत ईमानदार है। उन्होंने कहा कि भले ही हमारे पास इतने सारे अनुभव हैं जो हमें चोट पहुँचाते हैं, पर हम इस तानाशाही सरकार को हटाने के लिए सब कुछ भूलने को तैयार हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हम पूरी तरह से विपक्ष में एकता के लिए हैं। केसी वेणुगोपाल ने आगे कहा कि कांग्रेस भी विपक्षी एकता को लेकर उतनी ही चिंतित है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने कई मौकों पर ठीक ही कहा है कि वर्तमान स्थिति में, कांग्रेस अकेले इस सरकार से नहीं लड़ सकती।
पार्टी महासचिव ने कहा कि कांग्रेस किसी भी कीमत पर लड़ेगी लेकिन हमें इस अलोकतांत्रिक, तानाशाही सरकार के खिलाफ लडऩे के लिए विपक्षी एकता की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से वे मीडिया समेत एजेंसियों को मिस कर रहे हैं। इसलिए इन ताकतों से लडऩे के लिए विपक्षी एकता की जरूरत है। पिछले संसद सत्र में, हमारे राष्ट्रपति ने अडानी मुद्दे के खिलाफ सभी समान विचारधारा वाले दलों को बुलाने और संसद में एक आवाज उठाने की पहल की थी। हम मोटे तौर पर सोच रहे हैं कि हमें बीजेपी के खिलाफ जाना चाहिए और बीजेपी विरोधी वोटों को विभाजित करने का मौका नहीं देना चाहिए।

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