शराबबंदी – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Thu, 01 Jun 2023 08:06:23 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 शंकराचार्य ने बताया समाधान शराबबंदी के लिए पीना छोड़ दो https://samacharpacheesa.com/?p=7017 Thu, 01 Jun 2023 08:06:22 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7017 छत्तीसगढ़ सरकार के लिए शराबबंदी का वायदा गले की फांस बना हुआ है।कहा जाता है कि वह राजा लोकप्रियता हासिल करता है जो जनता की दैनंदिनी दिनचर्या में कम से कम हस्तक्षेप करता है।जीवन को अपने ढंग से जीने की आजादी प्रदान करता है।प्रजातंत्र की मूल मंशा भी यही मानी गई है। इतिहास में दफन अनेक राजतांत्रिक राजा-महाराजाओं व बादशाहों के किस्से इस मामले में दर्ज हैं। जिन्होंने जनता के जीवन में उनकी इच्छा व उनकी धार्मिक आस्थाओं में चोट पहुंचाने की कोशिश की तो उनका हश्र क्या हुआ।चाहे वो औरंगजेब, मो.तुगलक, चंगेज खान, सिकन्दर से लेकर हिटलर, मुसोलिनी व कोई अन्य हों या अंग्रेजी शासनकाल का काला साम्राज्य हो। 1947 में आजादी के बाद भारतवर्ष में प्रजातंत्र को भारत की जनता ने अपनाया।लगा अब इन सबसे हट कर कुछ अलग ही आने लगा है।आया भी पर जैसे जैसे हम आजादी के वर्षों को भोगते हुए अपने प्रजातांत्रिक शासकों के साथ आगे बढ़े तो सत्ता(तख्ते-ताऊस) का नशा चढऩा शुरू हुआ।बिना सुरक्षा के जनता के बीच बिंदास विचरण करने वाले नेता अपने कर्मों के कारण अब 20-20 कमांडो के बीच अपनी सुरक्षा के बाद भी सुरक्षित नहीं हैं। अपने जीवन की सुरक्षा के लिए चिंतित दिखाई दे रहे हैं।कोई दूसरा रास्ता नहीं मिल रहा तो प्रजातंत्र में राजाओं की तरह जनता पर अपनी मंशा थोपने का काम वोट पाने के चक्कर में शुरू कर रहे हैं। मुफ्त की रेवड़ी जिसे कहा जा रहा है वो राजनेताओं के घर के पैसे से नहीं बल्कि जनता के टैक्स के पैसे, उन्हें मदद के रूप में जनहित में लौटाने की प्रक्रिया मानी जानी चाहिए।यह जरूर कि मदद जरूरत मंदों को ही मिले यह तय होना चाहिए।कानून बनाने की शक्तियां होने के कारण सरकारें अब बंदिशों के सहारे भी वोट लेने की सोचने लगी है।जनता को सरकारों के बंदिशों के निर्णयों से अपनी प्रजातांत्रिक आजादी घुटती सी नजर आने लगी है। कभी कभी तो ऐसा भी सोचने लगी है कि क्या हम सच में अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए हैं , या यह सिर्फ अहसास मात्र है ? इतनी बंदिशें इतने अवरोध और ऊपर से हर चीज मंहगाई के मार से ग्रस्त है। देश की जनता सोचती है कि अब आखिर विकल्प है क्या ? प.जवाहरलाल नेहरू से ,लाल बहादुर शास्त्री,गुलजारीलाल नंदा (दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री) इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह,राजीव गांधी,विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर,पी.व्ही.नरसिम्हाराव,अटल बिहारी बाजपेयी,एच.डी.देवेगौड़ा , इंद्र कुमार गुजराल, मनमोहन सिंह, और अब नरेंद्र मोदी के रास्ते पर चल रहा यह महान देश भारतवर्ष, कभी भी महंगाई से निजात नहीं पा सका, ना गरीबी से ऊपर ही उठ पाया। बल्कि इस नए दौर में तो महंगाई के समर्थन करने वाले अंध भक्त भी देखने को मिल रहे हैं , जो कभी नहीं थे। यह जरूर इस देश ने देखा कि अनेक प्रधानमंत्रियों ने अपना नाम पैदा करने करोड़ो का जनधन लुटाया। आज भी लुटा रहे हैं, लेकिन अपने कोष से धन के दुरुपयोग को जनता रोक नहीं पाती। बंदिशों की कितनी बात की जाए , कितनी नहीं? कौन दोषी-कौन नहीं? इसी पचड़े में देश की जनता को कोई और दूसरा विचार आ ही नहीं पाता। किसी एक घटना को जेहन में दबा देने के लिए अन्य घटनाओं की इतनी परतें एक के ऊपर एक ऐसे जमा दी जाती हैं कि मूल समस्या गहरे दफन हो जाती हैं। जनता के लिए बस एक ही शब्द कहने को बच जाता है। बस “भारत भाग्य विधाता” कहा जाए। यानी भारत की जनता का भाग्य विधाता के ही हाथ है, जो इसे चला रहें हैं। महंगाई,पेट्रोल के दाम,अनाज व तेल के दाम अनेक घटनाएं जनता को याद ना आये। उसके जेहन में सिर्फ अनेक दूसरे-दूसरे प्रश्न उठते रहें ,और वो इसमें ही उलझता रहे। मूल समस्या से उसका ध्यान बंटा रहे। इसके रास्ते सरकारों के नुमाइंदे आसानी से निकाल लेते हैं। देश में यही परिदृश्य लंबे समय से दिखाई दे रहा है। कोई कुछ कर सके, यह स्थिति भी नही है। सरकारें यह क्यों नहीं सोचती कि इसी जनता के दिये मतों से ही वे सरकार में हैं। जनता के जीवन के सफर में कम से कम बाधा व हस्तक्षेप रहे, इसका ख्याल क्यों नहीं रखतीं? जैसे ही सरकारें बन जाती हैं, बंदिशों का दौर शुरू हो जाता है। अरे भाई जनता को अपनी भलाई स्वयं निर्धारित करने दीजिए। देश की दो तीन सरकारों ने शराब बंदी की, क्या परिणाम हुआ? जाने समझे बगैर क्यों छतीसगढ़ में शराबबंदी को वायदे में शामिल किया गया। यह समझ कोई नहीं पाया। अब जाकर सरकार को इसका हर पक्ष समझ में आ रहा है। दिनों दिन बयान बदल रहे हैं। भाजपा हो या कांग्रेस या कोई अन्य सब जानते हैं ,शराबबंदी का सच क्या है। इस आदिवासी बाहुल्य राज्य में यह झटके में करना असंभव ही नहीं,नामुमकिन है। सच वो है जो कल ज्योतिष्पीठाधीश्वर शकराचार्य महाराज अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने कहा कि शराबबंदी के लिए कानून बनने की बाट क्यों जोह रहे हैं? उसका सीधा सा हल है कि जो शराबबंदी चाहते हैं वे शराब पीना स्वयं से ही छोड़ दें। कानून नहीं बना रहे , इसलिए सरकार से नाराज होने से हल नहीं है। खुद शराब पीना छोड़ दें तत्काल समाधान हो जाएगा। शंकराचार्य जी ने सच कह दिया मानना ना मानना आपका काम है। यानी आप शराबबंदी चाहते हैं तो तत्काल छोड़ दें। कानून से नहीं यह समस्या दृढ़ इच्छाशक्ति से सुलझेगी। शंकराचार्य जी की बात आप समझे कि नहीं? ना समझे वो………?

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आदिवासी क्षेत्र में शराबबंदी एक बड़ी चुनौती, सांसत में सरकार https://samacharpacheesa.com/?p=6554 Thu, 16 Mar 2023 06:01:09 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6554 शराबबंदी छत्तीसगढ़ सरकार की गले की फांस बन गई है। भाजपा-कांग्रेस के सदस्य अच्छी तरह जानते हैं कि आदिवासी बाहुल्य छतीसगढ़ प्रदेश में इसे लागू करना कोई खेल नहीं। यह बहुत ही पेचीदा मामला है। यदि बिना सोचे समझे ,नोटबन्दी की तरह शराबबंदी की गई तो उसके परिणाम जनता के साथ सरकार को भी भुगतने पड़ेंगें। आदिवासी क्षेत्र के लोग शराब बंदी को किस तरह लेंगें। इस बारे में व्यापक सर्वे की जरूरत है। आदिवासी जन के शादी ब्याह,धार्मिक कार्य में शराब का अपना महत्व होता है। यह मामला उनकी भावना व आस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। इसे हसीं में नहीं लिया जा सकता।शायद कांग्रेस के घोषणापत्र बनाने वाले लोगों को महिलाओं पर हुए सर्वे में शराब की सामाजिक बुराइयों का दर्द महसूस हुआ होगा। इसी कारण इस मुद्दे पर सभी भावना में बह गए होंगे। इसके सभी पहलुओं को जानते समझते भी 15 साल के राजनैतिक वनवास को समाप्त करना भी तो जरूरी था। इसीलिए ही वोट पॉलिटिक्स के दबाव में घोषणा पत्र में यह मुद्दा शामिल किया गया होगा। लगा होगा कि 4 साल में हम प्रदेश में इसका सकारात्मक सामूहिक विचार विमर्श करके कोई ना कोई हल निकाल लेंगें। पर ऐसा हो नहीं पाया। ये तो मानना ही पड़ेगा कि कोरोना व प्रारम्भिक दौर में ही अनेक स्थानीय निकायों व पंचायतों के चुनाव ने इस सरकार के हाथ पैर बांध दिये। दो से ढाई साल तो यूं ही समस्यायों का सामना करने में निकल गए। ढाई साल आते ही कुछ और समस्या खड़ी हुई जिसने एक बार तो लगा कि सुनामी का रूप ले लेगी। सुनामी चली भी लेकिन कुछ ऐसा उच्च स्तरीय राजनैतिक दांव खेला गया। अंतत: सब ठीक हो गया। ठीक होते होते भी एक साल गद्दी बचाने के इस ढाई -ढाई साल के संघर्ष ने एक साल बर्बाद कर दिया। साढे तीन साल यूं ही बीत गए। सभी वायदों पर विचार संभव नहीं हो पाया। अब शराबबंदी की बात फिर उठने लगी। भाजपाईयों ने इसे महत्वपूर्ण मुद्दा बना लिया है। शराबबंदी के लिए सरकार के खिलाफ बड़ी घेराबंदी करनी शुरू कर दी है। घेरने लायक मुद्दा है भी।
टीवी चैनलों में डिबेट चलने लगे,भाजपा प्रवक्तागण हमलावर हैं। कांग्रेस को सूझ नहीं रहा कि आखिर कहें तो क्या कहें ? अब सच को स्वीकार करना शुरू कर दिया गया। कहा जाने लगा है कि यह विषय बहुत गंभीर है। अति संवेदनशील मुद्दा है। यूं ही हड़बड़ी में मानव जीवन से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। यह भी जोर देकर कहा रहे हैं कि हम शराब बंदी करेंगें जरूर। इस राह में हम हल्के हल्के कदम रखते हुए शराबबंदी की ओर अग्रसर हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता अपनी अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन सरकार के बचाव के लिए कर रहे हैं। भाजपा के प्रवक्ता भी अपनी पूरी ताकत के साथ सरकार का झूठा वायदा या झूठ बोलने वाली सरकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने में जुट गए हैं। सरकार का कहना है हमने अधिकांश काम कर दिया है। शराबबंदी के वायदे को भी पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। भाजपा को कोई एक भी मुद्दा नहीं मिल रहा है। इसीलिए अपने कार्यकाल में शराब के व्यापार का सरकारीकरण करने वाली 15 साल की सरकार के सदस्यों को सिर्फ शराब सूझ रही है। इनकी पार्टी की सरकार ने शराब का व्यापार 5500 करोड़ तक पहुंचाने का काम किया था। चाहते तो इस व्यापार का राजस्व धीरे धीरे कम कर सकते थे,नहीं किया। हमने करने का संकल्प लिया है। हमें ये हताश कर रहे हैं। हम शराबबंदी में भविष्य में आने वाली सारी परेशानियों का अध्ययन कर लेना चाहते हैं। शराबबंदी के बाद जो सामने आ सकती हैं। इसलिए हमने कमेटी बनाई है वो पूरी गंभीरता से उन राज्यों में जाकर अध्ययन कर रही है, जहां शराबबंदी की गई है। देखा गया कि उन राज्यों में राजस्व भी गया और शराब अभी भी उपलब्ध हो जाती है। बहुत सी अन्य बातों का भी अध्ययन किया गया। सबक यह मिला है कि जल्दबाजी में इस गंभीर विषय पर निर्णय लेना ठीक नहीं। यह भी कि हम अपनी बात पर कायम हैं। हम जागरूकता पैदा करने कार्यक्रम चलाए जाने पर सोच रहे हैं। अंतत: हम शराबबंदी कर ही देंगें। इधर भाजपा का कहना है कांग्रेस ने घोषणा पत्र में पूर्ण शराबबंदी की बात की थी। अब किंतु- परंतु का क्या मतलब ? लगता है आने वाले चुनाव तक यह मुद्दा कई रूप बदलेगा। भाजपा धर्मांतरण,हिदुत्व,कानून व्यवस्था,हिन्दू-मुस्लिम, आवास योजना के बाद शराबबंदी को सबसे बड़ा मारक मुद्दा मान कर चल रही है।इन्ही मुद्दों के रास्ते सत्ता में लौटना चाहती है। देखना यह होगा कि प्रदेश की जनता इसे किस रूप में समझ रही है। पूरे परिदृश्य पर नजर डाले व बुद्धिजीवियों की माने तो कुछ बातें साफ दिखाई पड़ रहीं हैं। यह कि दबाव में आकर अगर जल्दबाजी में कुछ कर दिया गया तो सरकार को आदिवासियों का कोप भाजन बनना पड़ सकता है। प्रदेश की 44 विधानसभाओं में आधी आबादी आदिवासियों की है।वे शराबबंदी को किस रूप में लेंगें,इसे समझना जरूरी है। भाजपा इसका किस रूप में और कितना लाभ उठाती है यह तो समय बताएगा। यह तय होगया है कि भाजपा द्वारा चुनाव तक यह मुद्दा जिंदा रखा जाएगा। कांग्रेस इसका निदान का रास्ता किस तरह निकालेगी यह देखना दिलचस्प होगा।

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जेब में पैसा और शराब की बिक्री https://samacharpacheesa.com/?p=5795 Thu, 19 Jan 2023 05:48:28 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5795 प्रदेश में कांग्रेस सरकार को चार साल पूरे हो गए है लेकिन 2018 चुनाव के पहले कांग्रेस द्वारा जारी किए जनघोषणा पत्र के कई महत्वपूर्ण वादे पूरे नहीं हुए। इनमें शराबबंदी प्रमुख है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बार-बार यह कहते है कि धान की अच्छी कीमत देकर वे किसानों की जेब में पैसा डाल रहे है। यह बात सही भी है क्योंकि समर्थन मूल्य से लगभग प्रति क्विंटल 600 रुपए अधिक किसानों को मिल रहा है। लेकिन क्या जेब में पैसा डालने वाले नारे से सरकार का उद्देश्य पूरा हो जाता है। अर्थव्यवस्था का एक सिद्धांत है कि लोगों की जेब में जब पैसा आता है तो वस्तुएं की कीमतें बढ़ जाती है। यह तो अर्थशास्त्रियों के लिए शोध का विषय है कि किसानों की जेब में पैसा डालने का महंगाई पर कितना असर पड़ा। यह भी शोध होना चाहिए कि 4 वर्षों में 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से जो कीमत किसानों को मिल रही है उससे किसान समुदाय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कितना विकास हुआ। एक बात जो तय है कि जब जनता के हाथ में पैसा आता है तो उसका दुरुपयोग भी करते है। प्रदेश में शराब की बढ़ती खपत और सरकार को उत्पाद शुल्क से मिलने वाले राजस्व में उत्तरोतर बढ़ोत्तरी इस बात को साबित करती है। वर्ष 2006-07 में राज्य के उत्पाद शुल्क से 706 करोड़ रुपए की आय होती थी जिसमें 256 करोड़ देशी शराब और 243 करोड़ विदेशी शराब की बिक्री से मिलते थे। जब 1 रुपए किलो चावल की योजना चली उसके बाद से 2017-18 तक शराब की बिक्री से सरकार को होने वाली आय 4 हजार 53 करोड़ हो गई। इसमें देशी शराब लगभग 2 हजार करोड़ रुपए और विदेशी शराब से 1हजार 26 करोड़ रुपए की आय बढ़ी। इसका मतलब है कि 1 रुपए किलो चावल से जो आर्थिक लाभ हुआ उससे देशी शराब की बिक्री 10-11 वर्षों में 9 गुना हो गई। अब जब किसानों को धान की अच्छी कीमत मिल रही है तो राज्य में उत्पाद शुल्क से आय 6 हजार करोड़ के आसपास पहुंच गई है। 2020-21 में यह 4 हजार 635 करोड़ रुपए थी। रोचक बात यह है कि देशी शराब से आय 2017-18 की तुलना में कम होकर 15 सौ 74 करोड़ हो गई। जबकि विदेशी शराब से प्रदेश की आय 2017-18 की तुलना में 6 सौ करोड़ रुपए से अधिक बढ़ गई। इसका मतलब है कि लोग अब विदेशी शराब ज्यादा पी रहे है। अब सरकार शराबबंदी कर देती तो संभव है गांव की समृद्धि और अधिक दिखाई देती। शराब के बढ़ते कारोबार से महिलाएं परेशान है, अपराध बढ़ रहे है। किसानों की जेब में पैसा डालने के इस दुष्प्रभाव पर सरकार को चिंतन करना चाहिए।

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