संगठन – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Sat, 11 Feb 2023 05:50:54 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 प्रदेश कांग्रेस संगठन में अंदरुनी कलह https://samacharpacheesa.com/?p=6215 Sat, 11 Feb 2023 05:50:54 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6215 कांग्रेस पार्टी के लिए संगठन के भीतर कलह होना या बड़े नेताओं की गुटबाजी के कारण विवाद होना कोई नई बात नहीं है। यही आश्चर्य का विषय है कि 2018 के विधानसभा चुनाव के समय पार्टी एकजुट होकर कैसे लड़ी? 2003-2018 के बीच ज्यादातर चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार के पीछे बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई बहुत हद तक जिम्मेदार थी। पूर्व प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के पहले सभी बड़े नेताओं को एकसूत्र में पिरो दिया था। लेकिन सरकार बनने के बाद जब मोहन मरकाम प्रदेश के अध्यक्ष बने उसके बाद सत्ता और संगठन के बीच मनमुटाव शुरु हो गया है। अभी कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी संगठन महामंत्री अमरजीत चावला को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस शिकायत के बाद जारी किया गया है जिसमें रायपुर में हो रहे कांग्रेस पार्टी के अखिल भारतीय महाधिवेशन के आयोजन समिति में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम का नाम कर दिया गया था। पिछले दिनों भानुप्रतापपुर में हुए उपचुनाव के दौरान अरविन्द नेताम ने सर्वआदिवासी समाज के उम्मीदवार के पक्ष में बयान दिया था। स्वाभाविक है कि यह पार्टी विरोधी गतिविधि में आता है लेकिन दो माह बीत गए कांग्रेस पार्टी ने उनके पार्टी विरोधी गतिविधि के कारण कोई नोटिस जारी नहीं किया गया। इसका मतलब है कि अरविन्द नेताम अभी भी कांग्रेस पार्टी के नेता है। दूसरी ओर उनकी वरिष्ठता और केंद्र में मंत्री होने के व पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के निकट होने के कारण केंद्र के बड़े कांग्रेसी नेता उनका सम्मान करते है। नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी हरियाणा से आई कुमारी शैलजा का भी अरविन्द नेताम के प्रति सम्मान है। संभव है कि यह आयोजन समिति में अरविन्द नेताम का नाम शामिल करने की पहल स्वयं प्रदेश प्रभारी ने की हो। इस आधार पर प्रभारी संगठन महामंत्री अमरजीत चावला ने जो सूची जारी कि उसमें अरविन्द नेताम का नाम आ गया। दूसरी ओर इस घटना के कारण संगठन के भीतर अध्यक्ष मोहन मरकाम और प्रभारी महामंत्री के विरोधियों को उनके खिलाफ माहौल बनाने का एक अवसर मिल गया। केंद्रीय नेतृत्व से भी तो प्रदेश अध्यक्ष की भी शिकायत की गई थी। लेकिन नोटिस अरविन्द नेताम और अमरजीत चावला के नाम जारी किया गया है। यह घटना कांग्रेस पार्टी में सत्ता और संगठन के बीच वर्चस्व की लड़ाई की ओर इशारा करता है। चुनाव के पहले सत्ता और संगठन की यह लड़ाई पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है। कांग्रेस पार्टी को एकजुट बनाए रखने के लिए समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी प्रदेश प्रभारी महासचिव की है।

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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन फिर मुरली बजाएंगे या …? https://samacharpacheesa.com/?p=5196 Wed, 14 Dec 2022 07:12:48 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5196 हिमांचल प्रदेश के चुनाव निपटने के पहले एक चर्चा हमारे प्रदेश में चली थी कि क्या मोहन मरकाम प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाएंगे या रहेंगें ? इसी बीच मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को हिमांचल प्रदेश में चुनाव ऑब्ज़र्वर के रूप में नियुक्त कर दिया गया वे वहां व्यस्त हो गए। छतीसगढ़ के इस भावी परिवर्तन की चर्चा लगभग बंद सी हो गई। संगठन में बदलाव का इंतजार कर रहे लोगों ने समझ लिया कि हिमांचल प्रदेश के परिणाम आने के बाद ही अब कुछ संभव है। जैसे ही हिमांचल के परिणाम आये और वहां कांग्रेस की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ वैसे ही चर्चा चल पड़ी कि अब प्रदेश संगठन में बदलाव हो सकता है। हिमांचल में भूपेश बघेल के छतीसगढ़ मॉडल के प्रचार ने जादू कर दिया। राजनीति में कद व पद का बड़ा महत्व माना जाता है। पद तो पहले से ही बड़ा है ही, भूपेश बघेल को हिमांचल के चुनाव की सफलता ने और वहां मुख्यमंत्री के चयन करवाने में उनकी भूमि का के चलते उनका राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में कद भी और बढ़ गया है, यह मानने वालों की बड़ी संख्या है। छतीसगढ़ में जीत के बाद 2018 में कौन बनेगा मुख्यमंत्री की कवायद में बाजी मारने वाले भूपेश बघेल ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। प्रदेश के बड़े बड़े दिग्गजों को पीछे छोड़ते हुए वे काफी आगे बढ़ गए। अनेक उतार चढ़ाव देखते हुए वे आज राष्ट्र व राज्य में अच्छी प्रतिष्ठा पा चुके हैं। आज की स्थिति में छतीसगढ़ का कोई भी निर्णय भूपेश बघेल को छोड़ कर करने की बात असंभव सी लगने लगी है। हर मायनों व प्रत्येक फ्रेम में कांग्रेस हाई कमान की नजर में भूपेश बघेल ने अपना अग्रणी स्थान बना लिया है। अब उन्हें पहले की तरह हाई कमान के पास तक पहुंचने के लिए किसी बिचौलिए या माध्यम की कोई जरूरत नहीं रहती है। वे जो बात हाई कमान तक पहुंचना चाहते हैं। जिस भाषा व मायनों में पहुंचना चाहते हैं, स्वयं पहुंचा सकते हैं। इस बदली राजनैतिक परिस्थितियों में प्रदेश का निर्णय एकतरफा हाई कमान कर ले, यह लगता नहीं है। यह भी सच है कि इन दिनों में मोहन मरकाम ने भी हाई कमान से अपनी नजदीकियां कायम की हैं। जिस तरह भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी ने उनको महत्व दिया वह भी बड़ा महत्वपूर्ण है। प्रदेश अध्यक्ष आदिवासी समाज से हैं। उन्हें हटाया गया तो आदिवासी समाज का सदस्य ही अध्यक्ष बनेगा यह राजनैतिक विश्लेषकों की राय है। मरकाम ने प्रदेश अध्यक्ष रहते बहुत काम किया है। खास कर बस्तर क्षेत्र में माहौल बनाने का काम किया है, मेहनत की है। यह माना जा रहा है कि इन बातों को भी प्रदेश अध्यक्ष का चयन करते समय विचार में रखना होगा। एक बात और कि दोनों दलों की प्रारम्भिक चुनावी कवायद देख कर यह लगभग दिखाई देने लगा है कि आने वाले चुनाव में ओबीसी व आदिवासी वर्ग पर दलों का मुख्य लक्ष्य केंद्रित होगा। भाजपा ने दो बड़े पदों पर प्रदेश में संबसे अधिक जनसंख्या होने के आधार पर ओबीसी कार्ड खेला है। दोनों पदों पर अरुण साव व नारायण चन्देल के रूप में ओबीसी नेताओं को तवज्जो दी है। दोनों ने मेहनत भी करना शुरू कर दिया है। अब कांग्रेस में उम्मीद की जा रही है कि संगठन में बदलाव होगा। यह भी साफ दिखाई दे रहा है कि किसी भी नियुक्ति के निर्णय में अबकी बार भूपेश बघेल की मर्जी का सबसे बड़ा रोल रहेगा। हाई कमान भी चुनावी वर्ष के पूर्व कोई जोखिम नहीं उठाना चाहेगी। दोनों ही बातें अपनी अपनी जगह प्रभाव डालेंगी। देखने वाली बात होगी कि मोहन मरकाम ही रिपीट होते है या भूपेश बघेल की पसंद का कोई नेता इस पद पर काबिज होगा। चुनावी टिकट वितरण के दौर में प्रदेश अध्यक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके मद्दे नजर मुख्य मंत्री व प्रदेश अध्यक्ष का तालमेल बहुत महत्वपूर्ण तथ्य होता है। मुख्यमंत्री कभी नहीं चाहेंगे कि प्रदेश अध्यक्ष ऐसा हो जिसके बीच तालमेल का हो।

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