संयुक्त राष्ट्र संघ – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Tue, 10 Jan 2023 06:14:23 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 विश्व में लहरा रही हिंदी की पताका https://samacharpacheesa.com/?p=5682 Tue, 10 Jan 2023 06:14:23 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5682 10 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था। तब वहाँ संकल्प लिया गया था कि एक दिन हिंदी संयुक्त राष्ट्र में गूँजेगी। और इसका प्रत्यक्ष अनुभव मुझे 13 जुलाई 2007 को न्यूयार्क के विश्व हिंदी सम्मेलन में हुआ, जिसमें मैं शामिल हुआ था। संयुक्त राष्ट्र संघ के उस समय के महासचिव बान-की-मून ने अपना प्रारंभिक उद्बोधन हिंदी में ही दिया था। भारत के लगातार दबाव के बाद फिलहाल अब यह स्थिति है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी के साथ बांग्ला और उर्दू में भी वहां की सूचनाएं प्रकाशित होने लगी हैं। आने वाले समय में अधिकृत भाषा के रूप में हिंदी भी अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश की तरह संयुक्त राष्ट्र की भी आधिकारिक भाषा ज़रूर बनेगी। अब तो हिंदी का निरंतर विस्तार हो रहा है। अमेरिका, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद, लंदन, सूरीनाम आदि में विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं। इस बार फरवरी 2023 में फिजी में सम्मेलन होने जा रहा है। इन सम्मेलनों के कारण न केवल वहाँ और अन्यान्य देशों में भी हिंदी को लेकर एक सकारात्मक वातावरण बना है। आज दुनिया के 140 देशों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। अगर हिंदी और उर्दू को एक साथ हम जोड़ करके उसे हिंदुस्तानी कहें तो हिंदी विश्व की नंबर वन भाषा है। इसे हिंदी के एक महत्वपूर्ण अनुसंधानकर्ता प्रो जयंतीप्रसाद नौटियाल ने सिद्ध भी किया है। वर्षो के शोध के बाद उन्होंने सप्रमाण बताया है कि पूरी दुनिया में हिंदी बोलने वालों की संख्या इस समय एक अरब, पैंतीस करोड़, साठ लाख है। चीन की भाषा मंदारिन बोलने वाले एक अरब, बारह करोड़ हैं। जबकि अँग्रेज़ी भाषा तीसरे क्रम में हैं। उसके बोलने वाले हिंदी से एक करोड़, बावन लाख कम हैं। हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम विदेशी आंकड़ों पर अधिक भरोसा करते हैं और अपने लोगों द्वारा किए गए ईमानदार शोध को पर भरोसा नहीं करते। हमारे हिंदी के अनेक तथाकथित विद्वान किसी भी साहित्यिक विषय पर विमर्श करते हुए विदेशी लेखकों को तो खूब उद्धृत करते हैं मगर अपने महान रचनाकारों को भूल जाते हैं। शेक्सपियर का उल्लेख करेंगे, तुलसी, कबीर को भूल जाएंगे। कालिदास को भारत का शेक्सपियर बताएँगे, जबकि कहाँ कालिदास और कहाँ शेक्सपियर। हमें ऐसी हीनता से ऊपर उठना है। हिंदी के मामले में तो हीनता का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। गुलामी हमारी मानसिकता में इस कदर घर कर गई है कि हम सोचते हैं कि अँग्रेज़ी के बिना हमारा कुछ नहीं हो सकता। विश्व के नंबर वन फुटबॉल खिलाड़ी मेसी को अँग्रेज़ी नहीं आती। यह भाषा उसके विकास में कभी आड़े नहीं आई। ऐसे लाखों प्रतिभाशाली लोग हैं, जिन्होंने बिना अँग्रेज़ी ज्ञान के विश्व में अपना परचम लहराया। दुनिया के अनेक देशों में उनकी ही राष्ट्रभाषा में ही कार्य होता है। अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष अपनी भाषा में ही संवाद करते हैं। इसी परंपरा को हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आत्मसात किया है। उन्हें अच्छी अँग्रेज़ी आती है लेकिन विदेश यात्रा के दौरान दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष से वह हिंदी में बात करते हैं। उनकी बातों का दुभाषिये उस देश की भाषा में अनुवाद करते हैं।हमें ऐसी राष्ट्रभाषा पर गर्व करना चाहिए जो आज दुनिया में सबसे अग्रणी है। राष्ट्रभाषा के सवाल पर कभी मुंशी प्रेमचंद ने बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी कि राष्ट्रभाषा से हमारा क्या आशय है। इसके विषय में मैं आपसे दो शब्द कहूँगा। इसे हिंदी कहिए,हिंदुस्तानी कहिए या उर्दू कहिए ,चीज एक ही है। नाम से हमारी कोई बहस नहीं। ईश्वर भी वही है, जो खुदा है। और राष्ट्रभाषा में दोनों के लिए समान रूप से सम्मान का स्थान मिलना चाहिए। अगर हमारे देश में ऐसे लोगों की काफी तादाद निकल आए जो ईश्वर को गॉड कहते हैं तो राष्ट्रभाषा उनका भी स्वागत करेंगी। जीवित भाषा तो जीवित देव की तरह बराबर बनती रहती है। शुद्ध हिंदी तो निरर्थक शब्द है। जब भारत शुद्ध हिंदू होता तो उसकी भाषा शुद्ध हिंदी होती। जब तक यहाँ मुसलमान, ईसाई, पारसी, अफगानी सभी जातियां मौजूद हैं, हमारी भाषा भी व्यापक रहेगी। अमीर खुसरो जैसा विद्वान हिंदी को महिमामंडित करते हुए सैकड़ों साल पहले कहता है कि मैं हिंदुस्तान की तूती हूँ। अगर तुम कुछ पूछना चाहते हो तो हिंदी में पूछो। मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूँगा। खुसरो की तरह जायसी, रहीम, रसखान आदि कुछ मुस्लिम कवियों ने हिंदी में लिखा। कुछ मुगल बादशाह भी हिंदी प्रेमी थे। औरंगजेब का अपनी क्रूरता का दु:खद इतिहास है, पर जो प्रमाण मिलते हैं, उसके अनुसार वह हिंदी प्रेमी था। वह आम को रसना-विलास और सुधा रस कहा करता था। हिंदी आज अपने देश मे ही राजनीति का शिकार है। हिंदी की सहजता, सरलता को कुछ लोग जानबूझ कर स्वीकार नहीं करते ।लेकिन इससे हिंदी को कोई फर्क नहीं पड़ता। हिंदी तो एक नदी की तरह निरंतर प्रवाहमान बनी हुई है और देश की सीमा रेखा पार कर वह दुनिया में न जाने कहाँ-कहाँ फैलती चली जा रही है। सीएफ एंड्रयूज़ जैसे विद्वान ने कितनी अच्छी बात कही है कि मेरी समझ में हिंदी ऐसी भाषा बन गई है जिसमें नए विचारों को बड़ी सरलता के साथ व्यक्त किया जा सकता है। महात्मा गांधी ने तो दो टूक कहा था, हिंदी के बिना स्वराज निरर्थक है! यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमें स्वराज्य तो प्राप्त हो गया मगर हम हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बना सके। गनीमत है यह राजभाषा तो बन ही गई। बहरहाल, अपने ही एक मुक्तक के साथ अपनी बात खत्म कर रहा हूँ कि
जिसे खुसरो ने दुलराया, कबीरा ने जिसे पाला।
जो तुलसी के यहाँ विकसी जिसे रसखान ने ढाला।
मोहम्मद जायसी की और रहिमन की धरोहर है ।
ये हिंदी ओढ़ कर बैठी है, उर्दू का भी दोशाला।।

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मानवाधिकार जुमला न बने https://samacharpacheesa.com/?p=5321 Tue, 20 Dec 2022 06:38:21 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=5321 पिछले दिनों मानवाधिकार दिवस मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर1948 से को यह निर्णय किया था। इसके पीछे भावना यही थी कि पूरी दुनिया में मानव समाज को बेहतर जीवन जीने का हक मिले। वह पूरी आजादी के साथ अपने को अभिव्यक्त कर सके। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि मानवाधिकार धीरे-धीरे एक नारा बनकर रह गया है। इसे कार्य रूप में परिणित होते हम कम देख पाते हैं। हमारे संविधान में भी मानवाधिकार की व्याख्या की गई है। लेकिन क्या सचमुच मानवाधिकारों का न्याय संगत परिपालन हो रहा है? इस पर जब दृष्टिपात करते हैं तो गहरी निराशा होती है। मनुष्य की रोजी-रोटी, शिक्षा,स्वास्थ्य जैसे बुनियादी विषय हैं , जो अभी तक विश्व के करोड़ों लोगों तक पहुंच नहीं सके। दुनिया के ऐसे अनेक देश हैं, आज भी कुपोषण और बेकारी है, बदहाली है। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों का दमन होते रहता है और आश्चर्य, संयुक्त राष्ट्र संघ कोई कड़ा कदम उठा नहीं पाता। कदम-कदम पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले सामने आते हैं। न केवल भारत वरन विदेश में भी। आज भी वहाँ गोरी-काली चमड़ी का भेद स्पष्ट दिखाई देता है। गोरी चमड़ी पर इतराने वाले देश के नागरिक वहां रहने वाले अश्वेत लोगों को घृणा की नजर से देखते हैं । अमेरिका जैसे विकसित देश में भी यह मानसिकता दिखाई देती है। वहां की गोरी पुलिस अश्वेत नागरिकों का दमन करने से नहीं चूकती। कभी कभी तो उनकी जान भी ले लेती है। भारत में मानवाधिकार की हालत बहुत ज्यादा खराब है। यह कितने शर्म की बात है की 2021 में ‘फ्रीडम इन द वर्ल्डÓ नामक जो रिपोर्ट सामने आई, उसमें भारत देश के बारे में यह टिप्पणी की गई कि यह देश ‘आंशिक रूप से स्वतंत्रÓ है। यह टिप्पणी अनायास नहीं की गई है ।उसके पीछे गहन अध्ययन मनन किया गया है। हम देखते हैं कि इस लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्राय: दमन होता रहा है। आज भी अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर निकलने वाले लोगों पर पुलिस का बर्बर अत्याचार होता है। धरने पर बैठे लोगों पर डंडों से प्रहार किया जाता है। किसी मंत्री मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ प्रदर्शन करते हुए जाने वाले लोगों पर लाठीचार्ज होता है, उनकी गिरफ्तारी, उनकी पिटाई होती है। यह सीधे-सीधे मानवाधिकार का उल्लंघन है।
12 अक्टूबर 1993 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ लेकिन यह आयोग भी सफेद हाथी साबित हो रहा है। हजारों ऐसे मामले हैं, जिसमें पुलिस द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है। उस पर संज्ञान लेकर कड़ी कार्रवाई नहीं होती। यानी दोषी लोग बर्खास्त नहीं होते । यही कारण है कि पुलिस का हौसला बढ़ता है। भारत देश में सबसे ज्यादा इसी तरह के मामले आते हैं। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक मामले पिछले वर्ष दर्ज किए गए। अन्य राज्यों में भी प्रताडऩा के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। आज भी अपने देश में पुलिस मनमानी करती है। जिस किसी को भी वह चाहे गिरफ्तार कर सकती है,प्रताडि़त कर सकती है। गोया उसे प्रताडि़त करने का लाइसेंस मिला हुआ है। न्यायमूर्ति आनंद नारायण मुल्ला ने वर्षों पहले कहा था, पुलिस वर्दीधारी गुंडों का संग्रहित गिरोह है। पुलिस को अपनी इस स्याह छवि से बाहर निकलना होगा। पुलिस हिरासत में मौतों का मामला बेहद गंभीर है। एक स्वस्थ व्यक्ति गिरफ्तार होने के बाद थाने जाता है और दो दिन बाद पता चलता है, उस ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली! यह सारी स्टोरी समझ में आती है कि हकीकत में हुआ क्या था। कहने को हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं लेकिन चुनी हुई सरकारों के संरक्षण में ही मानवाधिकार का अपमान होता है। उल्लंघन होता है। यह भी तय है कि जनप्रतिनिधि मानवाधिकारों का संरक्षण चाहते हैं लेकिन वह प्रशासनिक तंत्र से इस कदर घिरे रहते हैं कि वे चाह कर भी प्रतिवाद नहीं कर पाते और पुलिस अपने हिसाब से आम लोगों को परेशान करती रहती है। सर्वाधिक अत्याचार प्रदर्शनकारियों पर होता है। आश्चर्य होता है कि प्रदर्शनकारियों को हमारी पुलिस को गोली मार देती है, जबकि यह प्रदर्शनकारी पूरी तरह निहत्थे होते हैं! यह अपने आप में बहुत गंभीर अपराध है और मानवाधिकार के उल्लंघन का शर्मनाक अध्याय है। अमेरिका में श्वेत अश्वेटन के बीच संघर्ष होता है। वहाँ अश्वेतो का दमन होता है तो भारत देश में आर्थिक आधार पर दमन का खेल चलता है। जो पैसे वाले हैं, वे मोटी रकम देकर पुलिस प्रताडऩा से बच जाते हैं, पर गरीब पिसता है। आज भी अनेक निर्दोष आदिवासी और अन्य लोग जेलों में सड़ रहे हैं। तुम ऐसा है कि उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। काश! मानवाधिकार सिर्फ एक जुमला न बने, वह यथार्थ में कार्यान्वित होता भी दिखाई दे।

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