सियासत – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Fri, 08 Sep 2023 09:56:08 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 काशी-अयोध्या से बिछ रही सनातन पर सियासत https://samacharpacheesa.com/?p=7975 Fri, 08 Sep 2023 09:56:07 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7975 तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने जब सनातन पर विवादित बयान दिया तो उनको इस बात का अंदाजा जरूर रहा होगा कि इसका असर कितना व्यापक होने वाला है। अब उसी सनातन के विवादित बयान के आधार पर भारतीय जनता पार्टी ने जब तमिलनाडु के रास्ते नॉर्थ इंडिया के राज्यों में लॉन्ग डिस्टेंस सियासत की रणनीति बनाकर आगे बढऩा शुरू किया है। योजना के मुताबिक, तमिलनाडु के मंत्री की सनातन पर की गई तल्ख टिप्पणी के बाद अब अयोध्या और बनारस के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी अपनी सियासत को मजबूत करने जा रही है। इसके लिए बाकायदा तमिलनाडु बीजेपी से लेकर केंद्रीय भाजपा नेतृत्व के पदाधिकारियों से विचार विमर्श भी किया गया है। इसमें तमिलनाडु के तीन प्रमुख शहरों से स्टालिन को काउंटर करने और वहां से सनातन की सियासत की बड़ी रणनीति बनाई जा रही है। भारतीय जनता पार्टी ने डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन के सनातन पर दिए गए विवादित बयान के बाद राजनीतिक सरगर्मियों को आगे बढ़ा दिया है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक उदयनिधि ने भले ही तमिलनाडु में अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने के लिए अपने बाबा एम करुणानिधि की सियासत का दांव चला है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने तमिलनाडु के विवादित बयान को उत्तर भारत में सियासी रूप से बहुत बड़ा बनाने की योजना बना डाली है। योजना के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी अब सनातन के मुद्दे पर तमिलनाडु को सीधे अयोध्या और बनारस से जोडऩे जा रही है। अयोध्या में अगले साल होने वाले राम मंदिर के शुभारंभ पर तमिलनाडु से आने वाले राम भक्तों की संख्या सबसे ज्यादा होने वाली है। अभी भी बनारस और अयोध्या में लगातार दक्षिण भारत के राज्यों में तमिलनाडु के लोगों की संख्या इन शहरों में सबसे ज्यादा हो रही है। रणनीति के मुताबिक तमिलनाडु में ज्यादा से ज्यादा लोगों को अयोध्या और बनारस में दर्शन के माध्यम से सनातन को मजबूत करने का सफल प्रयास करने की योजना बनाई गई है। योजना के मुताबिक, रामलला के दर्शन करने के साथ काशी विश्वनाथ के दर्शन को आने वाली ट्रेनों और वहां से आने वाले भक्तों की संख्या को देखते हुए भाजपा की तमिलनाडु इकाई ने बड़ा अभियान शुरू किया है। तमिलनाडु के एक वरिष्ठ भाजपा नेता बताते हैं कि जनवरी में रामलला के दर्शन की शुरुआत वाले दिन के आसपास सिर्फ तमिलनाडु से ही पांच लाख लोगों के जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह संख्या वह दोगुनी करने की तैयारी में लगे हुए हैं। हालांकि,बीते डेढ़ साल के भीतर तमिलनाडु के अलग-अलग इलाकों के हजारों लोगों ने न सिर्फ काशी विश्वनाथ का दर्शन किया है बल्कि अयोध्या में रामलला के भी दर्शन किए हैं।

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दोराहे पर खड़ी ममता https://samacharpacheesa.com/?p=7151 Tue, 27 Jun 2023 09:12:15 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=7151 पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी इन दिनों सियासत के दोराहे पर खड़ी हैं। एक तरफ बंगाल को कांग्रेस और भाजपा मुक्त बनाने की उनकी जिद है तो दूसरी तरफ कांग्रेस की अगुवाई में बनने वाले मोर्चा में शामिल होने की ख्वाहिश, बेहतर होगा इसे मजबूरी भी कह लें, भी है। अब यह देखना होगा कि ममता बनर्जी कांग्रेस के कितना पास और कितना दूर हैं? कर्नाटक चुनाव का परिणाम आने से पहले के परिदृश्य पर अगर गौर करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि कांग्रेस और ममता बनर्जी के बीच फासला बहुत ज्यादा था। राहुल गांधी पर फिकरा कसते हुए उन्होंने कहा था कि भाजपा के लिए सबसे बड़ी टीआरपी तो राहुल गांधी ही हैं। कर्नाटक चुनाव का नतीजा आने के बाद परिदृश्य बहुत बदल गया। पहले तो ममता बनर्जी सवाल करते हुए कहती थीं कांग्रेस, कहां है कांग्रेस? उन्होंने गोवा के लुई फेलेरियो, त्रिपुरा के पीजुसी कांति विश्वास और मेघालय के मुकुल संगमा जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को तोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल कर लिया था। ये अपने साथ काफी समर्थक भी ले आए थे। तृणमूल कांग्रेस ने इन राज्यों के विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार भी खड़े किए थे। मजे की बात यह है विधानसभा चुनाव के बाद ये वापस भी चले गए थे। राहुल गांधी ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ममता बनर्जी ने भाजपा को फायदा पहुंचाया था। इसकी सफाई देते हुए ममता बनर्जी ने कहा था कि राष्ट्रीय दल की हैसियत बनाए रखने के लिए उन्होंने ऐसा किया था। पर हाल ही में एक उपचुनाव में जीत कर आए एकमात्र कांग्रेसी विधायक बायरन विश्वास को उन्होंने तृणमूल कांग्रेस में शामिल कर लिया और कांग्रेस विधानसभा में फिर शून्य हो गई। कांग्रेस के प्रवक्ता जयराम रमेश ने इसकी तीखी निंदा की थी। जाहिर है कि ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस इन जख्मों को भुला पाएगी, जब कांग्रेस सहित विपक्षी सांसद मोदी सरकार का विरोध कर रहे थे तो तृणमूल कांग्रेस के सांसद दूरी बना कर रखते थे। यह सच है की राजनीति में कोई स्थाई शत्रु या मित्र नहीं होता है। पर यह भी सच है कौन कितना फायदेमंद है इसे तो राजनीति की तराजू पर ही तौल कर देखा जाएगा। इस नजरिए से अगर गौर करते हैं तो साफ दिखता है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एवं वाम मोर्चा और तृणमूल के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। क्या 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और वाम मोर्चा के नेता तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के साथ मंच साझा कर पाएंगे? क्या कांग्रेस, वाम मोर्चा के नेताओं का साथ गंवाने का जोखिम उठा सकती है? क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी उन संसदीय सीटों को छोडऩे के लिए तैयार हो जाएंगी जिन-जिन पर भाजपा के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है? बायरन विश्वास के हश्र के बाद यह उम्मीद नामुमकिन ही लगती है। पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीतिक हालत के मद्देनजर अगर कांग्रेस को वाममोर्चा और तृणमूल में से किसी एक को चुनना है तो कांग्रेस क्या फैसला लेगी? जाहिर है कि उनके लिए 2024 के पहले सेमीफाइनल में कौन कितना फायदा दे सकता है इस पर गौर किया जाएगा।


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