सोनिया गांधी – SAMACHARPACHEESA.COM https://samacharpacheesa.com Thu, 18 May 2023 06:40:51 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 ममता-स्वामी के बीच पकती खिचड़ी https://samacharpacheesa.com/?p=6857 Thu, 11 May 2023 07:20:07 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6857 इसमें कोई दो राय नहीं कि पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी एक विद्वान राजनेता और चिंतक हैं। उनकी कई जनहित याचिकाओं पर आये निर्णयों ने भी देश और समाज को लाभ पहुँचाया है। लेकिन यह बात भी सही है कि सुब्रमण्यम स्वामी एक अस्थिर राजनेता भी हैं। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि स्वामी किसी दल के साथ ज्यादा समय टिकते नहीं, यही नहीं वह अपने खुद के दल में भी ज्यादा समय नहीं टिके थे। स्वामी का हालिया राजनीतिक इतिहास देखें तो कांग्रेस विरोध से अपनी राजनीतिक शुरुआत करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने 1999 में कांग्रेस से हाथ मिला लिया था और सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने के चक्कर में स्वामी ने जयललिता से समर्थन वापस करवा कर अटलजी की सरकार तक गिरवा दी थी। लेकिन मध्यावधि चुनावों में देश की जनता ने अटलजी को दोबारा देश की कमान सौंप दी थी। स्वामी की योजना कामयाब नहीं होते देख जयललिता ने उनसे दूरी बना ली और कुछ दिनों बाद स्वामी के जयललिता से राजनीतिक रिश्ते बिगड़ गये थे और बात कोर्ट कचहरी तक गयी थी। कुछ समय बाद स्वामी ने अपनी जनता पार्टी का एनडीए के साथ गठबंधन कर लिया और फिर बाद में अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया। स्वामी मोदी-मोदी के नारे लगाने लगे और खुद को सबसे बड़े हिंदूवादी नेता के रूप में देखने लगे। स्वामी को मोदी इतने भाये कि वह उनके पक्ष में वह हर मंच से दलीलें देने लगे। केंद्र में मोदी सरकार बनने पर स्वामी को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया और दिल्ली के लुटियंस जोन में बड़ा बंगला भी दे दिया गया लेकिन जैसे ही उन्हें भनक लगी कि उनको राज्यसभा में दोबारा नहीं भेजा जायेगा वैसे ही वह सरकार के आलोचक बन गये। अब वह हर मंच से भाजपा और मोदी की बुराई करते नजर आते हैं। स्वामी की नजर में अब प्रधानमंत्री पद के लिए ममता बनर्जी सबसे उपयुक्त शख्सियत हैं। लेकिन सवाल उठता है कि जिन मुख्यमंत्री के कार्यकाल में मानवाधिकारों के हनन के सबसे ज्यादा आरोप लगते हैं, जिन मुख्यमंत्री का राज्य राजनीतिक हिंसा की घटनाओं, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और प्रशासनिक नाकामियों के मामले में शीर्ष पर है और जिन्हें अदालत से लगातार फटकार सुनने को मिलती है, वह मुख्यमंत्री आखिर किस लिहाज से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व करने लायक हैं? हम आपको बता दें कि 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले ‘मोदी हटाओ’ अभियान को विपक्ष के नेता तो आगे बढ़ा ही रहे हैं साथ ही स्वामी जैसे कुछ भाजपा नेता भी इस मिशन की सफलता के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। इसी कड़ी में स्वामी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की और उन्हें एक ऐसा व्यक्ति करार दिया जिसे ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता। यही नहीं स्वामी यह भी कह गये कि ममता बनर्जी को भारत का प्रधानमंत्री होना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने विपक्ष को भी सलाह देते हुए कहा कि देश को एक सच्चे विपक्ष की जरूरत है जो सत्तारुढ़ पार्टी से डरे नहीं।

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राजनीति का गालीवाद! https://samacharpacheesa.com/?p=6813 Tue, 02 May 2023 08:45:37 +0000 https://samacharpacheesa.com/?p=6813 आजादी के तुरंत बाद कम-से-कम एक दशक की राजनीति कुछ-कुछ मानवीय मूल्यों से भरी हुई थी। लेकिन धीरे-धीरे वैचारिक मतभेद मनभेद में बदलते चले गए। और आज तो हालत यह है कि मनभेद जहरीली मानसिकता में बदल चुका है। उसका चरम हमें उस वक्त दिखाई देता है, जब विपक्ष मैं बैठे लोग प्रधानमंत्री को जहरीला सांप, गंदी नाली का कीड़ा, या मोदी तेरी कब्र खुदेगी जैसे अनेक घृणास्पद वाक्य बोलकर अपनी कुंठा का इजहार करते हैं। एक सज्जन तो आंकड़ा पेश किया कि प्रधानमंत्री को अब तक इक्यानवे बार गालियां दी गई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री को जहरीला सांप कहा। यह शायद इनक्यावनवीं गाली थी। जब इस बयान का व्यापक विरोध होने लगा तो उन्होंने आत्म-मंथन किया और अपने इस कथन के लिए खेद भी व्यक्त करते हुए कहा कि मैंने ऐसा मोदी के लिए नहीं, भाजपा के लिए कहा था। अगर खेद व्यक्त नहीं करते तो इनको भी मानहानि का मुकदमा झेलना ही पड़ता। वैसे देखा जाए तो भाजपा में भी जवाबी हमला करके घृणास्पद बोल बोलने वाले कम नहीं हैं। भाजपा के एक विधायक ने सोनिया गांधी को विष-कन्या कह दिया। हालांकि उन्होंने जहरीले सांप के ज़वाब में ऐसा कहा, लेकिन नहीं कहना चाहिए था। सोनिया गांधी को कांग्रेस की विधवा भी कहा गया। राजनीति में अगर भाषा का संयम न रखा गया, तो वह खतरनाक मोड़ पर पहुंच जाती है, और इस समय ऐसे ही दुखद स्थितियां सामने नजर आ रही हैं। राजनीति में जो विपक्ष में है, वह दरअसल इस आशंका से बौखला यह हुआ है कि पता नहीं कल उसे सत्ता मिलेगी या नहीं। इसलिए वह सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की छवि खराब करने की पूरी कोशिश कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों से यही सिलसिला चल रहा है राजनीति की भाषा इतनी विकृत होगी, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। अब लोग विचारों के सहारे नहीं, गालियों के सहारे आरोप-प्रत्यारोप का खेल कर रहे हैं ।जैसे राहुल गांधी ने कह दिया कि सारी मोदी चोर क्यों होते हैं। भगोड़े ललित मोदी,नीरव मोदी के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी का नाम ले लिया। उस का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। सांसदी से हाथ धो बैठे। अब अदालत की चक्कर लगा रहे। अगर एक मोदी चोर है, तो सारे मोदी को आप कैसे अपमानित कर सकते हैं ? नीरव-ललित मोदी का नाम ले कर आप उनको सौ बार चोर कहें, भगोड़ा कहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन आप उसी केटेगरी में देश के प्रधानमंत्री को भी घसीट लेंगे, तो मानहानि का मामला तो बनता-ही-बनता है। फिर आप कहें कि मैं माफी नहीं मागूंगा, यह अनुचित बात है। अगर अति उत्साह में मुँह से कोई गलत बात निकल गई है, तो उसके लिए खेद व्यक्त करने में कोई बुराई नहीं। आखिर कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने जहरीले सांप वाले अपने बयान पर खेद व्यक्त किया ही न! वैसे राजनीति में यह चरित्र भी पनप रहा है कि पहले आप किसी की मानहानि करें, फिर बाद में माफी भी मांग लें। आप किसी के विरुद्ध कुछ बोलना चाहते हैं तो प्रवृत्तियों पर प्रहार करें। प्रतीकों में बात करें, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। यह उचित नहीं कि आप सीधे-सीधे किसी व्यक्ति का नाम ले कर उस पर गंभीर आरोप लगा दें। आज हालत यह है कि देश के अनेक नेता मानहानि का मुकदमा झेल रहे हैं। अंत में ये लोग जान छुड़ाने के लिए अदालत में माफी भी मांग लेते हैं। प्रश्न यह है कि ऐसी नोबत आए ही क्यों? इसलिए वाक-संयम ज़रूरी है। अगर राजनीति में लंबे समय तक टिके रहना है तो भाषा का संयम, शालीनता, शुचिता का होना बहुत जरूरी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि धीरे-धीरे राजनीति का चल पड़ा गालीवाद खत्म होगा।

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