छत्तीसगढ़ में अब पत्रकारों की सुरक्षा हेतु कानून बनेगा। यह सुखद संकेत है । पिछले दिनों सरकार ने ठोस कदम उठाते हुए अन्तत: विधेयक पारित कर दिया है। उम्मीद की जाती है कि राजपाल की अनुशंसा के बाद यह विधेयक कानून में तब्दील हो जाएगा और मीडिया कर्मियों को काम करने में आने वाली दिक्कतों से शायद कुछ मुक्ति मिलेगी । ‘शायद’ इसलिए कह रहा हूं कि कानून तो बहुत सारे बने होते हैं लेकिन उनका अनुपालन ठीक से नहीं होता ।लेकिन पत्रकार सुरक्षा के मामले में ऐसा न हो तो बेहतर। इसमें दो राय नहीं की मीडिया कर्मी खतरों के खिलाड़ी होते हैं ।और खतरा सिर्फ शारीरिक नहीं होता, जान का नहीं होता, वह मान और अपमान का भी होता है। अखबारों में छपी किसी विशेष खबर का या लेख का संज्ञान लेकर कभी-कभी पत्रकारों पर मुकदमें ठोक दिए जाते हैं। ऐसा हो चुका है। इस मामले पर भी सुरक्षा कानून में प्रावधान किया जाना चाहिए कि किसी भी पत्रकार के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करने के पहले उस लेख या समाचार का पूरा संज्ञान लिया जाए। उसकी समुचित पड़ताल की जाए कि सही मायने में इससे किसी की मानहानि हुई है अथवा नहीं। कई बार सिर्फ संकेतों के आधार पर यह समझ लिया जाता है कि किसी खास नेता या व्यक्ति की मानहानि कर दी गई है। तब कुछ राजनीतिक अंध भक्त पत्रकार के विरुद्ध थाने में रिपोर्ट कर देते हैं, और दुर्भाग्यवश उस पर तुरंत कार्रवाई भी हो जाती है। शासन को पत्रकार सुरक्षा कानून में इस प्रावधान को शामिल करना चाहिए कि कोई किसी भी मानहानि के मामले में सबसे पहले खबर या लेख का विशेषज्ञों द्वारा न्यायसंगत परीक्षण किया जाए। इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। संकेतों में, प्रतीकों में लेखक-पत्रकार अपनी बात कहते रहे हैं। अगर वह इतना भी नहीं कर सकेंगे तो अभिव्यक्ति की आजादी का कोई मतलब नहीं होता। हालाँकि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब किसी भी व्यक्ति की मानहानि कदापि नहीं हो सकती ।अगर मानहानि सत्य पाई गई तो निसंदेह उस लेखक या पत्रकार पर भी कार्रवाई की जानी चाहिए। दुर्भाग्यवश हमारे समाज में एक ऐसा वर्ग भी है जो लकीर का फकीर है ।हालत यह है कि कई बार छपी हुई बातों का अनर्थ लगा लिया जाता है। बहुत पहले दुष्यंत कुमार ने कहा था, मत कहो आकाश में कुहरा घना है /यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। तो हालत यह है कि अगर पत्रकार कहता है कि आजकल कोहरा घना है, तो हो सकता है सत्ता से जुड़ा कोई व्यक्ति यह समझ ले कि हमारी सरकार की आलोचना की जा रही है। मैंने भी कभी शेर कहा था, हमने अपनी बात कही, वे समझे या निंदा है/ लोकतंत्र शर्मिंदा है। तो सुरक्षा कानून में यह प्रावधान भी बहुत जरूरी है कि किसी भी पत्रकार के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दर्ज करने के पहले उसकी खबर या लेख पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए ।पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार ने फिलहाल जो प्रावधान किए हैं, वे संतोषप्रद हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि पत्रकारों को समाचार संग्रह करने के मामले में अब पुलिस का पूरा सहयोग मिलेगा। उनके सम्मान की रक्षा की जाएगी। पत्रकार किसी भी शासकीय कार्यालय में जाकर समाचार संग्रह कर सकेंगे और सरकारी विभाग उनके साथ पूरी तरह सहयोग करेगा। अगर किसी पत्रकार को यह महसूस होता है कि उसकी जान का खतरा है, उसे किसी समाचार के मामले को लेकर धमकी दी गई है, तो उसकी सुरक्षा के लिए समुचित प्रबंध किए जाने चाहिए । विधेयक पारित कर दिया गया है, यह अभिनंदन योग्य कदम हैम इसमें अगर कुछ कमी रह गई है, तो उसे बाद में दूर भी किया जा सकता है। फिलहाल सरकार की इस मंशा का स्वागत तो होना ही चाहिए कि वह पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सिंचित है और जो कहा, वह कर दिखाया। मतलब पत्रकार सुरक्षा कानून विधेयक पारित तो कर दिया।