प्रदेश व देश की सरकार के लिए भी और हर भारतीय व्यक्ति के लिए गौधन की रक्षा की प्राथमिकता से सोच होना चाहिए। केंद्र सरकार ने कोई केंद्रीय बड़ा उद्दम इस के लिए किया हो ऐसा अभी कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। लेकिन कुछ प्रदेश सरकारें अपने प्रयासों से गौमाता की चिंता कर रहीं हैं। यह भारतीय समाज के उत्साह का विषय है। इन राज्य सरकारों में सौभाग्य से हमारी छत्तीसगढ़ की सरकारों ने अच्छा काम किया है और कर रहे हैं। बिना शक कहा जा सकता है कि इसकी शुरुवात कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने की। जिसने गौठान निर्माण-गोबर खरीदी-गौमूत्र खरीदी-नरवा-गरुवा-घुरुवा-बारी और अनेक योजनाओं के माध्यम से गौ-संरक्षण का काम शुरू किया। इसे देख कर कुछ राष्ट्रीय स्वयं संघ सदस्यों ने अपने गौरक्षा के एजेंडे की भावना के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से उनके सरकारी आवास में भेंट कर उन्हें साधुवाद भी दिया था। इस संबंधी समाचार अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित भी हुआ। कांग्रेस सरकार अपनी योजना की सार्थकता से उत्साहित हुई। पीछे देखें तो 15 साल के रमन राज -अजित जोगी राज में इस पर सिर्फ और सिर्फ चर्चा होती रही। कुछ हुआ नहीं। सबसे महत्वपूर्ण पहलू इस योजना का यह रहा कि मुख्य मंत्री भूपेश बघेल ने इसे गौधन सुरक्षा के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना दिया। इसे ग्रामीण विकास के आर्थिक पहलू से जोड़ दिया। कई गौठानों में गोबर से कंडे-अगरबत्ती-दीया-गोबर स्टीक व अन्य अनेक प्रोडक्ट बनाए जाने लगे। ग्रामीणों को तकनीकी सहयोग करने वालों ने इसे ऑनलाइन मार्केट से भी जोड़ दिया। ये उत्पाद ऑनलाइन बिकने लगे थे। ग्रामीणों की आय में इजाफा होने लगा था। इसकी लोक प्रियता बढऩे लगी। साथ ही गौमाता की सुरक्षा भी आसानी से होने लगी। सड़कों पर आवारा कहलाने वाले मवेशियों की आमद घटने लगी। पशुओं की सड़क दुर्घटनाओं में दुर्भाग्यजनक मौतों में कमी आने लगी। इस बढ़ते दौर में लोकप्रियता चरम पर जाने लगी। अचानक इसपर राजनीति की नजर लग गई। बड़े बड़े खेल होने लगे। इस योजना को बदनाम करने का बीड़ा उठाया गया। बदनाम करने का पहले ही वार के रूप में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप विपक्षी दल ने योजना बद्ध तरीके से लगाने सिलसिलेवार लगाने शुरू किये। तीर निशाने पर बैठा। बात जनता के बीच शुरू हो गई। गोबर पानी में बह गया जैसे सामान्य आरोप भी कारगर साबित हुए। ये जनता है,कब क्या और क्यों सोच ले कहना मुश्किल है। भूपेश सरकार की यह महत्ती योजना अपनी निर्णायक स्थिति तक पहुंचने के पहले ही बदनाम कर दी गई। बदनामी इतनी हुई कि, सरकार ही चली गई। आरोप लगाने वाली पार्टी की सरकार आ गई। आते ही अपने आरोपों को सही साबित करने की सोच से गौठान बन्द करवा दिए गए। गोबर खरीदी,गौमूत्र खरीदी-गोबर के बायो प्रोडक्ट बन्द कर दिए गए। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को मददगार इस योजना का लगभग दम निकाल दिया गया। लगा वर्तमान सरकार ने विपक्ष में रहते सही आरोप लगाए थे। लगभग डेढ़ साल तक योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। अब अचानक वर्तमान सरकार को इस योजना के बन्द करने के नुकसान समझ में आने लगे हैं। अब सरकार ने इस योजना को नए अवतार में प्रदेश में उतारने की ठानी है। पहले इसे गौ- अभ्यारण की योजना बनाया। अब इसका नया नामकरण हुआ है गौधाम. सरकार के एक प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल में बताया कि दोनों अलग अलग योजनाएं हैं। अभ्यारण 110 एकड़ में फैले परिसरों में बनेगा। उसका स्वरूप भले ही नहीं बताया गया लेकिन भव्य होगा और अनेक सुविधाएं गौधन के लिए यहां होगी यह कहा गया। गौधाम उससे छोटी योजना है इसका विस्तार प्रदेश के हर ब्लाक में होगा बताया गया। बजट बन गया है। जमीनों को फिर से चिन्हित कर लिया गया है,या पुराने ही गौठानों के स्थान पर बनाए जायेंगें यह अभी जनता के दरबार में सामने नहीं आया है। जनता के धन के खजाने से फिर से बड़ा खर्च किया जाएगा।यह जरूर समझ आने लगा है। इसमें भी भ्रष्टाचार होगा या नहीं होगा यह अभी नहीं बाद में सामने आएगा। गौठान हो या गौधाम एक बात समझ में आ रही हैं कि कहीं ना कहीं भूपेश सरकार की योजना का वजन वर्तमान सरकार को भी समझ में आ गया है। इसीलिए नए सिरे से अच्छी तरह योजना को भले ही नए अवतार में सही चलाने की सोच बनाई गई है। इस सोच का स्वागत होना चाहिए। बधाई पूर्ववर्ती व वर्तमान सरकार को जिन्होंने इस घोर कलयुग में सबसे दुर्भाग्यजनक़ स्थिति भोग रहे गौधन की किसी भी रूप में चिंता तो की।