बस्तर के राजा प्रवीरचंद भंजदेव जब तक जीवित रहे,कभी किसी आदिवासी ने अपने धर्म का त्याग नहीं किया था। राजा साहब आदिवासियों को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि अपना धर्म अपनी परम्परा ही हमारी सांस्कृतिक सम्पति है। यही हमारा सम्मान है। यही हमारा जीवन है।जीवन जीने का तरीका भी यही है। अपने धर्म व परम्परा के साथ ही हमारा मानव जीवन है। उनके रहते आदिवासी जन के साथ बस्तर क्षेत्र की समस्त जनता अपने धर्म व परम्पराओं का निर्वहन निर्विघ्न रूप से कर अपना जीवन जीते रहे। समस्या तब आई जब एक घटना में राजा प्रवीर चंद भंजदेव की गोलीकांड में हत्या कर दी गई। आदिवासियों के बीच नेतृत्व शून्यता आने से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। आदिवासी अपने राजा का विकल्प ना पा कर किसको मुखिया माने की स्थिति में आ गया। यही जो गैप बना उसी का फायदा एक तरफ नक्सलियों ने तो दूसरी तरफ ईसाई मिशीनरीयों ने भरपूर उठाया। दोनों ने ही अपना प्रचार प्रसार इसी शून्यता का लाभ उठाते हुए आदिवासियों के बीच खूब किया। आदिवासी जो नए नेतृत्व की तलाश में था कहीं ना कहीं भ्रमित होने लगा। यहीं से नक्सलियों के शनै:शनै: क्षेत्र में पैठ बढ़ाने व मिशिनरियों को आदिवासियों को रिझाने का मौका भरपूर मिला। चंगाई सभा व प्रार्थनाओं की श्रृंखलाएं शुरू हुई। चर्चों का जगह जगह निर्माण धड़ल्ले से शुरू हुआ। आदिवासियों को सरकारी विकास की घोषणाओं के बाद भी जल-जंगल और जमीन के मामले में जहां खड़े थे वहीं खड़े रहने की अपने तरीके से वजहें बताई जाने लगी। सरकारों के खिलाफ भीतरी तौर पर माहौल बनाने का बड़ा खेल शरू हुआ। तत्कालीन किसी भी सरकार ने इस मुद्दे पर कोई गंभीर संज्ञान नहीं लिया। मध्यप्रदेश के दौर से लेकर छतीसगढ़ बनने तक। धर्मान्तरण के खिलाफ कोई आवाज उठी हो,आंदोलन या कड़ा प्रतिकार हुआ हो,ऐसा देखने सुनने में नहीं आया। जब छतीसगढ़ की पहली अपनी सरकार बनी। आदिवासी के नाम पर अजित जोगी प्रथम मनोनीत मुख्य मंत्री बने। सोचा गया कि अब आदिवासियों का निश्चित रूप से उद्धार होगा। लेकिन अंतराल में वे आदिवासी से ज्यादा ईसाई बने हुए दिखे। धर्मान्तरण का दौर तेजी से चलने की खबरें आने लगी। विपक्ष ने आरोप लगाने शुरू किये कि जोगी ईसाई मिशनरी को बढ़ावा दे रहे हैं। धर्मान्तरण को बढ़ावा दे रहे हैं। भाजपा ने निश्चित रूप से विरोध दर्ज कराया लेकिन वह प्रभावशाली नहीं रहा। 2004 में धर्मान्तरण का किंचित विरोध करने वाले दल भाजपा की खुद की सरकार विषम परिस्तिथियों में बनी। डॉ. रमनसिंह प्रथम निर्वाचित मुख्य मंत्री बने। 15 साल राज किया लेकिन धर्मान्तरण रोकने के लिए कोई कानूनी प्रावधान करने से गुरेज करते रहे। धर्मान्तरण के खिलाफ इन 15 सालों में भाजपा ने कोई बडा आंदोलन या प्रदर्शन नहीं किया। पूरा 15 साल का कार्यकाल सिर्फ शासन का आनंद लेने में बीत गया। बातें खूब होती रहीं, धर्मान्तरण भी खूब होता रहा। 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। धर्मान्तरण चूंकि कांग्रेस के एजेंडे में नहीं है , इसलिए पूरे 5 साल कांग्रेस की इस बारे में आवाज नहीं सुनाई दी। 15 साल के बाद भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर हमले करना शुरू किया। धर्मान्तरण को बड़ा मुद्दा किसी खास योजना की तहत बनाया गया। लगातार हमलावर हुई भाजपा ने शनै:शनै: मुद्दे को राई से पहाड़ बनाने में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी। अब तो ऐसा लगता है जैसे जैसे भाजपा की साय सरकार आगे बढ़ रही है,वैसे वैसे भाजपा धर्मान्तरण पर आक्रामक रुख अपना रही है। उसके साथ उनके साथी संगठन विश्व हिन्दू परिषद,हिन्दू जागरण मंच,बजरंग दल व अन्य इसी तरह के अनुसांगिक संगठन आये दिन इसी समाज के चंगाई सभा व प्रार्थना बैठकों पर आक्रामक होती जा रही है। आने वाले चुनाव तक यह किस रूप तक पहुंचेगी कहा नहीं जा सकता। भाजपा अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे पर शिद्दत से काम कर रही है। आदिवासियों को साधने पर उसकी पैनी नजर है। उनके अनुसार आदिवासी हिन्दू है,सनातनी हैं,यह सच भी साबित किया जा सकता होगा। लेकिन आदिवासियों में अधिकांश आदिवासी अपने को हिन्दू नहीं मानते,अनेक मानते हैं कि वे हिन्दू ही हैं। इस मतभेद का भाजपा को भविष्य में अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए सामना करना होगा। मुद्दे का केंद्र सरकार ही संविधान संशोधन के द्वारा हल निकाल सकती है। जब इस बात का प्रयास होगा तब आदिवासी समाज में कैसी और क्या प्रतिक्रिया होती है यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल यही कहा जा सकता है कि रमन व साय सरकार कोई ऐसा कानून नहीं बना पाई जिससे धर्मान्तरण पर रोक लग सके। सिर्फ जूदेव परिवार के प्रयासों के सहारे इसका हल निकलना मुश्किल है।