भाजपा ने 50 साल पुरानी आपातकाल की भूली हुई यादों को फिर से जिंदा करने हर साल 25 जून को सरकारी तौर पर देश भर में संविधान हत्या दिवस मनाने का बड़ा फैसला किया है। उनका कहना है कि नई पीढ़ी इस घटना को नहीं जानती। उसे जानना चाहिए कि देश में किसने और किस पार्टी की नेता ने संविधान की हत्या की थी। 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया था। नागरिकों के समस्त मौलिक अधिकारों को समाप्त कर दिया था। प्रेस पर नियंत्रण करते हुए उस की आजादी पर बंदिश लगा दी थी। कोई भी समाचार सरकारी अधिकारियों व पार्टी नेताओं की सहमति के बगैर प्रकाशित नहीं हो सकता था। अदालतें भी दबाव से बची नहीं थीं। अधिकारी व कांग्रेस नेता तानाशाही पर उतर आये थे। जनता को भी परेशानी झेलनी पड़ी। हजारों -हजार विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। सभी दिग्गज विपक्षी नेताओं की आवाज दबा दी गई। जेलों में अनेक यातनाओं को झेलते हुए सभी नेतागण 22 महीने अभिव्यक्ति की आजादी से दूर कर दिए गए। जनता में जिसने भी आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाई उनमें से अधिकांश को जेल भेज दिया गया,या उन पर घोर अत्याचार किया गया। अन्याय अत्याचार तानाशाही का ऐसा दौर चला कि लोग उफ्फ भी ना कर पाए। आपातकाल लगाने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विश्वस्त नेताओं व खुफिया एजेंसियों की खबरों पर यकीन करके आपातकाल की घोषणा की थी। उनको बताया गया कि देश के बड़े व प्रभावी विपक्षी दल के नेता किसी बड़े आंदोलन को अंजाम देने की फिराक में हैं। इस आंदोलन से देश में आंतरिक युद्ध की स्थिति पैदा होने वाली है। यह भी कहा गया कि आपकी कुर्सी को भी खतरा है। दरअसल हुआ यह था कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जिन राजनारायण ने इलाहाबाद से चुनाव लड़ा था,उन्होंने चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। इस संदर्भ में एक याचिका उत्तर प्रदेश की उच्च न्यायालय में लगाई थी। उस याचिका में इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला आ गया जिसमें श्रीमती गांधी को चुनाव लडऩे की भी पाबंदी का फैसला था। विषम स्थितियों को देखकर श्रीमती गांधी ने आपातकाल लगाया। संविधान के अनुच्छेद 352 में प्रावधान था कि देश में आंतरिक अशांति की स्थिति में आपातकाल लगाया जा सकता है। उसी का प्रयोग करते हुए इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया। सीधे तौर पर देखने में यह अपनी गद्दी को बचाने की कवायद ही नजर आती है। यहां तक सब कुछ संविधान में प्रावधानों के अनुसार था। परन्तु जिस तरह अपमानजनक ढंग से विपक्षी नेताओं को चुन चुन कर जेल के सीखचों के पीछे भेजा गया। यातनाएं दी गई,अमानवीय व्यवहार किया गया। यहां तक कि जेल में बंद रहने के समय सम्बन्धियों की मृत्यु में भी पेरोल नहीं दिया गया। जनता व प्रेस को भी घेरे में लिया गया,बंदिशें लगाई गईं। देश में अराजक स्थिति पैदा हुई। मनमानी व तानाशाही पूर्ण रवैया अपनाया गया। वह तत्कालीन जनता को नहीं भाया। जनता की नाराजी की समझ बनती उसके पहले ही हालात बिगड़ चुके थे। इंदिरा गांधी ने स्थिति की नाजुकता को समझते हुए,आपातकाल वापस लेने की घोषणा कर दी। साथ ही आम चुनाव की घोषणा कर दी। तब तक बात बिगड़ चुकी थी। हवा उल्टी बहने लगी कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हार गई। जीते हुए सारे दलों ने मिलकर जनतादल का गठन किया। जनता दल में विचारधारात्मक रूप से अलग अलग विचार रखने वाले नेता इकठ्ठे हुए थे। एक मंच भाया नहीं। परिणाम वही आया जो आना था। कई प्रयोगों व नेतृत्व बदलने के खेल के बाद अन्तत: जनतादल का प्रयोग विफल साबित हुआ। इसका पूरा फायदा लेते हुए इंदिरा गांधी फिर से कांग्रेस सरकार सत्ता में लाने में सफल हुई। फिर इंदिरा गांधी का दौर शुरू हुआ जो उनकी हत्या तक जारी रहा। कई कवायदों के बाद 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अपने दम पर पूरी ताकत से केंद्र में सरकार बनाई। कांग्रेस का कहना है कि तब से अलग तरह की बदले की राजनीति का सूत्रपात हुआ। अघोषित आपातकाल चलाया जा रहा है। तब के आपातकाल से बदतर स्थिति आज है। बदला लिया जा रहा है। इसी बदले की राजनीति के चलते भाजपा 50 साल बाद जिस आपातकाल को जनता ने भुला दिया था। उसे याद दिलाने संविधान की हत्या दिवस \ का नाम देकर एक राजनैतिक माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। शिवसेना के संजय राउत जैसे नेता आपातकाल को संविधान के अनुरूप किया गया काम बताते हैं। भाजपा इसे संविधान की हत्या बता रही है। लोग इस मुद्दे को लेकर दो विचारों में विभक्त हैं। कुछ कह रहे हैं इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र व संविधान की हत्या की थी। कुछ कहते हैं कि ज्यादतियों की खबरों के बीच आपातकाल ने देश में अनेक सुधार भी किये थे। जैसे कोरोना के समय प्रदूषण मुक्त स्थिति बनी तो गंगा साफ हो गई थी। उसी तरह आपातकाल लगने से अनेक अपराध व बुराइयां उस वक्त समाज से खत्म सी हो गई थी। अपराध नियंत्रित थे। अपनी अपनी बात अपने अपने विचार।राजनीति अपनी जगह है पर कुछ रूप में आपातकाल का अनुभव खराब रहा तो कुछ मायनों में अच्छा भी रहा।